विषय
चुनाव आयोग
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देश
'ज़मीर की पुकार' पर कॉलम अशोक लवासा ने लिखा, जो अगस्त 2020 में आयुक्त पद छोड़ चुके हैं, मौजूदा विवाद के संधू या जोशी नहीं
रविवार, 27 सितंबर की सुबह 10:53 बजे इंडियन एक्सप्रेस में छपे इस कॉलम की सुर्ख़ी लेखक को 'असहमति लिखने वाला आयुक्त' बताती है। कॉलम की आख़िरी पंक्ति ख़ुद कहती है कि लेखक एक पूर्व निर्वाचन आयुक्त हैं, जो मौजूदा विवाद के केंद्र में मौजूद दोनों सेवारत आयुक्तों में से कोई नहीं। क़रीब ग्यारह सौ शब्दों के इस निबंध में मौजूदा विवाद का ज़िक्र सिर्फ़ एक वाक्य में है।
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पैसा
गुजरात के चार दलों पर आयकर विभाग की शिकायत, तीन पर अलग एफ़आईआर दर्ज
शनिवार, 26 सितंबर को गुजरात पुलिस की सीआईडी क्राइम ने तीन ग़ैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों, स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी, गरीब कल्याण पार्टी और सत्यवादी रक्षक पार्टी के ख़िलाफ़ अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज कीं, हर एक आयकर विभाग की शिकायत पर। तीन दिन पहले, बुधवार को, अहमदाबाद के उप आयकर आयुक्त ने एक चौथी पार्टी, भारतीय नेशनल जनता दल पर सीधे अपनी शिकायत दाख़िल की थी, अकेले उस पर 1,143.85 करोड़ रुपये के बोगस दान का आरोप है। दोनों मामलों को मिलाकर कुछ रिपोर्टों में चला 'तीन दल, 1,870 करोड़ रुपये' का आँकड़ा जोड़ में सही बैठता है, पर पार्टियाँ ग़लत हैं: शनिवार की तीन एफ़आईआर में बीएनजेडी शामिल नहीं है।
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समझिए
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का रास्ता जज वाला, बाक़ी आयुक्तों का बिल्कुल अलग
6 अप्रैल 2026 को लोकसभा और राज्यसभा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के दो नोटिस बिना कोई वजह बताए ठुकरा दिए थे, आज़ाद भारत में किसी बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ यह पहला औपचारिक प्रयास था। पाँच महीने बाद कांग्रेस और वाम दल एक नई कोशिश की तैयारी में हैं। संविधान का अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी सुरक्षा देता है, पर उसी अनुच्छेद का अगला हिस्सा बाक़ी निर्वाचन आयुक्तों को महज़ मुख्य आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाने लायक़ बना देता है। यह लेख उसी प्रक्रिया, उसकी शर्तों और अब तक के इतिहास को खोलता है।
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देश
आयोग की विज्ञप्ति की सुर्ख़ी 'सर्वसम्मत' कहती है, उसी का मत्न दस महीने के आंतरिक नोट मानता है
बुधवार, 23 सितंबर को दोपहर 3:29 बजे जारी विज्ञप्ति (PRID 2313958) में निर्वाचन आयोग लिखता है कि एसआईआर सहित पिछले एक साल के सभी फ़ैसले सर्वसम्मत हैं। उसी विज्ञप्ति में यह भी दर्ज़ है कि दस महीनों में फैले कुछ आंतरिक नोट मौजूद हैं, इंडियन एक्सप्रेस की उस पड़ताल के कुछ घंटे बाद जिसका दावा है कि दो निर्वाचन आयुक्तों ने चौदह बार लिखित आपत्ति दर्ज की।
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देश
चुनाव आयुक्त नियुक्ति क़ानून पर पीठ बँटी, फ़ैसला अब मुख्य न्यायाधीश पर
बुधवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले 2023 के क़ानून को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं पर बँटा हुआ आदेश दिया। सवाल क़ानून के सही या ग़लत होने का नहीं था, सवाल यह था कि फ़ैसला मौजूदा दो जजों की पीठ करे या पांच जजों की संविधान पीठ। दोनों जज असहमत रहे, इसलिए कितनी बड़ी पीठ बनानी है, यह तय करने के लिए मामला अब मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के पास जाएगा।
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देश
दिल्ली एसआईआर नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने ईसीआई को नोटिस भेजा, रिपोर्ट माँगी
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मंगलवार को अंजलि भारद्वाज की याचिका पर नोटिस जारी किया और चुनाव आयोग से पहली स्टेटस रिपोर्ट माँगी। सुनवाई की एक टिप्पणी को लाइव लॉ, बार एंड बेंच, वर्डिक्टम और द डेली गार्जियन, चारों ने अलग-अलग शब्दों में छापा। अदालत का अपना आदेश सार्वजनिक तौर पर पढ़ा नहीं जा सका, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की केस-स्टेटस और डेली-ऑर्डर खोजें दोनों कैप्चा माँगती हैं।
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देश
सुप्रीम कोर्ट की आज की सूची में दिल्ली की नोटिस-याचिका मद 13 पर, बंगाल की अपील-याचिका मद 22 पर
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की अदालत आज सुबह साढ़े दस बजे बैठी, और उसकी आज की सूची में अंजलि भारद्वाज बनाम निर्वाचन आयोग तथा मोस्तरी बानू बनाम निर्वाचन आयोग के बारह जुड़े मुक़दमे दर्ज थे। भारद्वाज की याचिका के 33,12,919 नोटिस मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के अपने प्रेस नोट के 31,63,930 से 1,48,989 ज़्यादा हैं, और यह फ़र्क़ किसी दस्तावेज़ में मिलता नहीं। पीठ ने इन दो मद पर क्या किया, वह सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक दर्ज नहीं हुआ था।
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देश
दिल्ली में 31,63,930 नोटिस निकले, जवाब की मियाद सात दिन, सुनवाई मंगलवार को
मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के 19 सितंबर के प्रेस नोट में लिखा है कि अब तक 31,63,930 नोटिस बने हैं और मतदाताओं तक पहुँचाए जा रहे हैं। अख़बारों में चल रही संख्या 33,12,919 है, जो प्रशांत भूषण की दाख़िल की याचिका से आई है। फ़र्क़ 1,48,989 का है और इसे मिलाने वाला कोई काग़ज़ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की 22 सितंबर की वाद-सूची में दिल्ली मद 13 पर है और बंगाल मद 22 पर।
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देश
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची पर दाख़िल 38 लाख अपीलों में से 1,02,231 पाँच महीने में निपटी हैं
चुनाव आयोग ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में जो हलफ़नामा दाख़िल किया, उसमें 24 ज़िलों की तालिका है और जोड़ है 38,20,683 अपीलें, 1,02,231 निपटान, 37,18,452 लंबित। दर 2.68 फ़ीसदी बैठती है। अदालत ने 25 अगस्त को चार सवाल पूछे थे और उनमें दूसरा सवाल यह था कि इन अपीलों में कितनी उन लोगों की हैं जिनके नाम कटे और कितनी किसी और का नाम कटवाने के लिए हैं। तालिका में वह ख़ाना नहीं है।
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देश
राजस्थान के 10,235 पार्षदों में 2,273 निर्दलीय, 143 निकायों में अध्यक्ष का फ़ैसला पार्षदों के गुप्त मतदान पर
राज्य निर्वाचन आयोग की अपनी तालिका में 309 नगरीय निकायों के 10,244 वार्डों में से 10,235 का परिणाम दर्ज है: भाजपा 4,179, कांग्रेस 3,613, निर्दलीय 2,273, आरएलपी 63, आप 42, माकपा 38, बसपा 19 और भारत आदिवासी पार्टी 8। गिनती के दिन छपी संख्याएँ इनसे छोटी हैं, क्योंकि वे गिनती चलते हुए की हैं। अध्यक्ष और महापौर सोमवार, 21 सितंबर को इन्हीं पार्षदों के गुप्त मतदान से चुने जाएँगे।
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समझिए
मतदाता सूची में नाम पर निशान लगना नाम कटना नहीं है, पर सफ़ाई देने की बारी मतदाता की ही है
कर्नाटक की विसंगति-सूची में नंदन नीलेकणि, सी.एन.आर. राव और कामथ भाइयों के नाम आने के बाद यह सवाल बड़ा हो गया कि 'अनमैप्ड' श्रेणी का मतलब क्या है। चुनाव आयोग की अपनी विज्ञप्तियाँ बताती हैं कि यह क़वायद इस समय 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में चल रही है और इसके दायरे में 36.73 करोड़ मतदाता हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली और झारखंड से आ रहे आँकड़े और आरोप अलग-अलग दिशाओं में इशारा करते हैं।
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देश
मणिपुर की अंतिम मतदाता सूची छप गई, और कितने नाम कटे इसकी तीन अलग गिनतियाँ छपी हैं
एक रिपोर्ट कहती है 1.32 लाख, दूसरी 1.89 लाख, तीसरी कहती है मसौदे से पहले 1.58 लाख बाहर हुए और उसके बाद 30,650 और। अंतिम सूची में कुल मतदाता 19,60,620 हैं।
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इत्मीनान पहला आम चुनाव: हर उम्मीदवार का अपना मतपेटी थी, और वोटर को कुछ लिखना नहीं था सुकुमार सेन की अपनी रिपोर्ट कहती है कि देश में साक्षरता सिर्फ़ 16.6 फ़ीसदी थी, इसलिए मतपत्र पर नाम छापने का कोई मतलब नहीं था। जो तरीक़ा निकाला गया, उसमें पचीस लाख से ज़्यादा पेटियाँ लगीं।