आयोग की विज्ञप्ति की सुर्ख़ी 'सर्वसम्मत' कहती है, उसी का मत्न दस महीने के आंतरिक नोट मानता है
बुधवार, 23 सितंबर को दोपहर 3:29 बजे जारी विज्ञप्ति (PRID 2313958) में निर्वाचन आयोग लिखता है कि एसआईआर सहित पिछले एक साल के सभी फ़ैसले सर्वसम्मत हैं। उसी विज्ञप्ति में यह भी दर्ज़ है कि दस महीनों में फैले कुछ आंतरिक नोट मौजूद हैं, इंडियन एक्सप्रेस की उस पड़ताल के कुछ घंटे बाद जिसका दावा है कि दो निर्वाचन आयुक्तों ने चौदह बार लिखित आपत्ति दर्ज की।

बुधवार, 23 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 29 मिनट पर भारत निर्वाचन आयोग ने एक विज्ञप्ति जारी की। हेडिंग में एक ही दावा है: "एसआईआर सहित सभी निर्णय आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों के परिणाम हैं।" यह पत्र सूचना कार्यालय की विज्ञप्ति PRID 2313958 है। उसी विज्ञप्ति के मत्न में आयोग ख़ुद लिखता है कि "दस महीनों की अवधि में फैले कुछ विशिष्ट आंतरिक नोटों/अवलोकनों" की बात हो रही है, और यह भी कि "किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान मतभेद और टिप्पणियां होना सामान्य बात है।" हेडिंग का शब्द सर्वसम्मत है। मत्न का शब्द मतभेद है। यही फ़र्क़ इस लेख का विषय है।
यह विज्ञप्ति अपने आप में नहीं आई। कुछ घंटे पहले इंडियन एक्सप्रेस में एक पड़ताल छपी थी। रिपोर्टर ऋतिका चोपड़ा का दावा है कि तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों, पूर्व उत्तराखंड मुख्य सचिव सुखबीर सिंह संधू और पूर्व हरियाणा मुख्य सचिव विवेक जोशी, ने बीते दस महीनों में कम से कम चौदह बार लिखित आपत्ति दर्ज की। दोनों का दावा है कि पूरे आयोग के नाम पर लिए गए कई फ़ैसले उनकी जानकारी के बिना हुए। इस डेस्क ने वे मूल नोट नहीं देखे हैं। जो कुछ पता है, वह इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और ख़ुद आयोग की विज्ञप्ति से है। दोनों दस्तावेज़ एक बात पर सहमत हैं: नोट मौजूद हैं। असहमति इस पर है कि उनका मतलब क्या निकलता है।
आयोग की विज्ञप्ति ख़ुद क्या कहती है
विज्ञप्ति की भाषा शुरू से आख़िर तक एक ही तर्क चलाती है। पहली पंक्ति भारत निर्वाचन आयोग को "संविधान के अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के सख्त जनादेश" के तहत काम करने वाली संस्था बताती है, और कहती है कि यह "बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय" है। इसके बाद लिखा है कि लिखित टिप्पणियां, अवलोकन, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल आयोग की "निरंतर प्रक्रियाएं" हैं, जो पारदर्शिता और क़ानूनी अनुपालन के लिए बनाई गई हैं। अगली पंक्ति आयोग के सारे आदेश और निर्देशों को "मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023" के तहत "पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त" बताती है।
फिर मोड़ आता है। विज्ञप्ति कहती है कि मसौदा तैयार करने के चरण में सदस्यों के उठाए सवाल "मानक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा" हैं। किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान मतभेद होना सामान्य बात है, यह भी वहीं दर्ज है। तीनों आयुक्त ही नहीं, आयोग का हर अधिकारी सुझाव देने के लिए "पूर्ण रूप से अधिकृत" है, यह दावा भी उसी पंक्ति में है। इसके ठीक बाद वह वाक्य आता है जिसके लिए यह विज्ञप्ति असल में लिखी गई। "दस महीनों की अवधि में फैले कुछ विशिष्ट आंतरिक नोटों/अवलोकनों पर प्रकाश डालना... तस्वीर का केवल एक हिस्सा प्रस्तुत करता है।" आयोग गिनती भी देता है। हाल के महीनों में लगभग 40 नई पहलें, और बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम व पश्चिम बंगाल के चुनाव सफलतापूर्वक कराए जाने का ज़िक्र। निष्कर्ष वाला वाक्य साफ़ है: "ये सभी निर्णय पिछले एक वर्ष में आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों के परिणाम हैं।"
आयोग ने वही विज्ञप्ति अंग्रेज़ी में भी उसी मिनट जारी की, PRID 2313884, दोपहर 3:29 बजे। दोनों प्रतियाँ पैराग्राफ़-दर-पैराग्राफ़ मिलती हैं। "दस महीनों की अवधि" वहाँ "the period of 10 months" है। "लगभग 40 नई पहलें" वहाँ "around 40 new initiatives" है। "सर्वसम्मत निर्णयों के परिणाम" को "outcome of the unanimous decisions" लिखा गया है। दोनों भाषाओं के बीच कोई भेद नहीं मिला। यह जाँचने लायक़ सवाल था, और जवाब नहीं में है।
क़ानून की धारा 18: 'यथासंभव सर्वसम्मति', मतभेद पर बहुमत
विज्ञप्ति जिस 2023 के अधिनियम का नाम लेती है, उसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली थी। भारत के राजपत्र, असाधारण भाग 2, खंड 1 में यह अधिनियम संख्या 57 के तहत छपा है। इसका चौथा अध्याय सीधे इसी सवाल पर है कि आयोग अपना कामकाज कैसे चलाए। धारा 17 सीधी है, आयोग का कामकाज "इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार" चलेगा। असली शर्त धारा 18 में है।

धारा 18 की उपधारा (1) कहती है कि आयोग सर्वसम्मत निर्णय से अपने कामकाज और सदस्यों के बीच ज़िम्मेदारियों के बँटवारे की प्रक्रिया तय कर सकता है। उपधारा (2) मूल अंग्रेज़ी शब्दों में यह कहती है: "All business of the Election Commission shall, as far as possible, be transacted unanimously, and if the Chief Election Commissioner and other Election Commissioners differ in opinion on any matter, such matter shall be decided according to the opinion of the majority." यानी आयोग का कामकाज "जहाँ तक संभव हो" सर्वसम्मति से चले। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और बाक़ी आयुक्तों में मतभेद होने पर फ़ैसला बहुमत की राय से होगा। यही अधिनियम धारा 21 के ज़रिए 1991 के पुराने क़ानून को निरस्त भी करता है, एक बचत खंड के साथ: पुराने क़ानून के तहत हुआ कोई भी काम नए क़ानून के तहत हुआ माना जाएगा।
यहीं वह बात है जो विज्ञप्ति ख़ुद नहीं कहती। अनुच्छेद 324 का खंड (2) आयोग की बनावट को संसद के बनाए क़ानून के अधीन रखता है। सर्वसम्मति या बहुमत का सवाल संविधान तय नहीं करता, संसद तय करती है। और संसद ने जो तय किया, वह पूर्ण सर्वसम्मति की गारंटी नहीं है। क़ानून मतभेद को सामान्य मान के चलता है, और उसके निपटारे का एक रास्ता भी साथ रखता है। विज्ञप्ति का दावा तथ्य का दावा है, क़ानून की माँग नहीं। न विज्ञप्ति और न इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट यह बताती है कि रिपोर्ट में गिनाई गई चौदह आपत्तियों में से किसी पर धारा 18(2) की बहुमत वाली प्रक्रिया वाक़ई इस्तेमाल हुई या नहीं। यह सवाल दोनों दस्तावेज़ों में अनुत्तरित है।
1995 का फ़ैसला: बहुमत का नियम शेषन के ख़िलाफ़ आया था
यह बहुमत वाला प्रावधान 2023 में नया नहीं गढ़ा गया। इसकी जड़ 1993 में है, जब आयोग सचमुच एक व्यक्ति का दफ़्तर था। टी.एन. शेषन तब अकेले मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे। उन्होंने आदर्श आचार संहिता को सख़्ती से लागू किया, शरद पवार और प्रणब मुखर्जी जैसे नेताओं से जुड़े चुनाव टाले, और प्रधानमंत्री की एक राज्य में विधानसभा चुनाव टालने की माँग तक ठुकरा दी। 1 अक्तूबर 1993 को राष्ट्रपति ने अध्यादेश संख्या 32 जारी कर एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को दो नए निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया। आयोग तीन सदस्यों का हो गया। यह अध्यादेश 4 जनवरी 1994 को अधिनियम बना।
शेषन ने इसे अदालत में चुनौती दी। उनका तर्क था कि यह क़दम बदले की भावना से उठाया गया है, ताकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की शक्तियाँ "जमा दी जाएँ" और सत्तारूढ़ दल के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाइयाँ कमज़ोर पड़ें। सुप्रीम कोर्ट ने 14 जुलाई 1995 को टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में यह याचिका ख़ारिज कर दी। अदालत ने कहा कि संविधान बहु-सदस्यीय आयोग की कल्पना करता है, और तीनों की राय बँटने पर फ़ैसला बहुमत से होगा। यह भाषा तब के क़ानून की धारा 10(3) से आई थी, वही भाषा जो आज धारा 18(2) में है, लगभग शब्दश:। तीस साल पहले जिस अकेले सीईसी को बहुमत के नियम ने रोका था, आज वही नियम दो आयुक्तों की आपत्तियों को बहुमत में बदलने का रास्ता भी है। क़ानून वही है। पक्ष बदल गया है।
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल: दस महीनों के दस्तावेज़
चोपड़ा की रिपोर्ट में तारीख़ें भी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ चौदह आपत्तियों में मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया भी शामिल है, और मतदाता सूचियों की सुरक्षा व अभिरक्षा का सवाल भी। हर आपत्ति की तारीख़ और विषय अलग है, पर पैटर्न एक ही है: फ़ैसला हो चुकने के बाद पता चलना। 16 अप्रैल को संधू ने वरिष्ठ अधिकारियों से लिखित रूप में कहा, रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्हीं के शब्दों में, कि "many communications go out in the name of the ECI but they do not have the approval of the Commission." आठ दिन बाद, 24 अप्रैल को जोशी ने लगभग वही बात दोहराई, इस बार अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए। मई में जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के "gradual centralisation" पर सवाल उठाया, यानी धीरे-धीरे केंद्रीकरण, और स्वतंत्र ऑडिट का प्रस्ताव रखा।
सबसे तीखी आपत्ति फ़ॉर्म 6 पर है। यह वही फ़ॉर्म है जिससे कोई नया नागरिक मतदाता सूची में नाम जुड़वाता है। जुलाई में इसमें एक सवाल जोड़ा गया: आवेदक बताए कि उसके माता-पिता या दादा-दादी पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की मतदाता सूची में थे या नहीं। जोशी ने इसे रोकने की कोशिश की। 13 अगस्त को संधू ने लिखित में दर्ज कराया कि यह बदलाव "unauthorised and illegal" है और "must be removed immediately", यानी अनधिकृत, ग़ैर-क़ानूनी, और फ़ौरन हटाया जाना चाहिए। वह सवाल आज भी फ़ॉर्म 6 में है।
इसी अगस्त में संधू ने एक दूसरा मामला उठाया। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल करने के ख़िलाफ़ 16.1 लाख अपीलें दाख़िल हुई थीं। संधू ने पूछा कि यह किसने अधिकृत किया। रिपोर्ट के मुताबिक़ न वे ख़ुद, न जोशी, न बंगाल की मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इसकी प्रक्रिया बताई गई थी। डेटाबेस तक पहुँच पर भी झगड़ा दर्ज है। जोशी ने लिखा कि आईटी निदेशक सीमा खन्ना के पास सांविधिक अधिकारियों की पहुँच रोकने का "कोई क़ानूनी अधिकार नहीं" है। आयोग की विज्ञप्ति में इसी डेटाबेस का ज़िक्र अलग सुर में है: आयोग का डिजिटल मंच ईसीआईनेट "सख़्त डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल" के तहत काम करता है, और यह प्रोटोकॉल अनधिकृत छेड़छाड़ रोकने के लिए है। जोशी की आपत्ति सुरक्षा पर नहीं थी, केंद्रीकरण पर थी, यानी पहुँच किसके पास कितनी है। विज्ञप्ति इस फ़र्क़ को नहीं छूती। सितंबर में संधू और जोशी ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा, काम के बँटवारे में हुए उस बदलाव पर जिसने उनके मुताबिक़ डिजिटल मतदाता-सूची प्रणाली पर उनकी निगरानी की एक परत हटा दी। तीनों आयुक्तों की बैठक 9 सितंबर को हुई, रिपोर्ट के मुताबिक़ चार महीने में पहली बार।

आयोग की विज्ञप्ति में इन आपत्तियों को जिस भाषा में समेटा गया, वह भाषा दर्ज करने लायक़ है: "मसौदा तैयार करने के चरण में आयोग के सदस्यों द्वारा उठाए गए किसी भी परिचालन संबंधी प्रश्न या सुझाव... मानक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।" यह वाक्य सीधे विज्ञप्ति से है। रिपोर्ट पर आयोग की प्रतिक्रिया का सार भी यही है। संधू और जोशी ने चोपड़ा की रिपोर्ट पर कोई अलग बयान नहीं दिया। रिपोर्ट छपने तक दोनों चुप रहे।
सरकार ने लोकतंत्र बताया, विपक्ष ने हटाने की माँग की
भाजपा मुख्यालय में बुधवार को प्रवक्ता संबित पात्रा ने पत्रकारों से कहा कि निर्वाचन आयुक्तों के बीच मतभेद की ख़बरें असल में शुद्ध लोकतंत्र दिखाती हैं, उनके अपने शब्दों में "a reflection of pure democracy"। पात्रा का तर्क था कि आयोग की अपनी विज्ञप्ति ही बताती है कि कोई तानाशाही नहीं चल रही। भाजपा की तरफ़ से किसी ने रिपोर्ट में गिनाई गई तारीख़ों या फ़ॉर्म 6 के सवाल पर अलग से कुछ नहीं कहा।
विपक्ष का सुर बिल्कुल अलग रहा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक्स पर वोट चोरी को भारत के लोगों के ख़िलाफ़ अपराध और संविधान पर हमला बताया। उनके शब्दों में भाजपा, आरएसएस और आयोग ने मिलकर "an act of treason" किया, यानी देशद्रोह। यह पोस्ट बुधवार दोपहर की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफ़े की माँग की और एसआईआर रोकने को कहा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुमार की गिरफ़्तारी और आपराधिक कार्रवाई की माँग की। बंगाल में पुरानी मतदाता सूची पर दोबारा चुनाव भी माँगा। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कुमार को हटाने की माँग की और महाराष्ट्र, बंगाल व तमिलनाडु में मतपत्र से दोबारा चुनाव कराने को कहा। लखनऊ में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि दस महीनों में अलग-अलग अधिकारियों ने चौदह बार पत्र लिखे। भरोसा कहाँ रखा जाए, उन्होंने पूछा।
पाँचों नेताओं की माँगें अलग-अलग हैं, देशद्रोह का आरोप, इस्तीफ़ा, गिरफ़्तारी, दोबारा चुनाव, जाँच। आधार एक ही रिपोर्ट है। किसी ने भी अपनी तरफ़ से कोई नया दस्तावेज़ पेश नहीं किया।
2019 की मिसाल: तब आयोग ने असहमति दर्ज करने से इनकार किया था
आयुक्तों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में दी गई क्लीन चिट पर असहमति दर्ज कराई थी। लवासा चाहते थे कि उनकी असहमति अंतिम आदेश में लिखी जाए। तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा की अगुआई वाले आयोग ने यह माँग ठुकरा दी। आयोग का कहना था कि कार्यकारी आदेशों में असहमति टिप्पणी जोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है। लवासा ने आचार संहिता से जुड़ी बैठकों का बहिष्कार शुरू कर दिया। बाद में वे एशियाई विकास बैंक जाने के लिए आयोग से इस्तीफ़ा दे बैठे।
यह ब्योरा आज दक्कन क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट में दर्ज है, जो मौजूदा विवाद के बीच 2019 के इस प्रकरण को याद दिलाती है। इससे एक बात साफ़ होती है: आयोग का अपना इतिहास असहमति को रिकॉर्ड में लाने से इनकार करने का रहा है, उसे सहर्ष दर्ज करने का नहीं। 2021 में भी एक विवाद खुलकर सामने आया था। तब निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार, जो बाद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने, ने मद्रास हाईकोर्ट की उन टिप्पणियों पर अलग हलफ़नामा दाख़िल करने की कोशिश की जो कोविड की दूसरी लहर के लिए आयोग को ज़िम्मेदार ठहराती थीं। तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा ने इसका विरोध किया। वह असहमति भी सार्वजनिक हुई, आयोग के किसी औपचारिक बहुमत-फ़ैसले के ज़रिए नहीं, अख़बारों के ज़रिए।
जो अब भी साफ़ नहीं है
कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। आयोग ने यह नहीं बताया कि चौदह में से किसी आपत्ति पर धारा 18(2) की बहुमत-प्रक्रिया चली या नहीं। संधू और जोशी के मूल नोट सार्वजनिक नहीं हैं। न आयोग ने, न इंडियन एक्सप्रेस ने उन्हें पूरा छापा है।

फ़ॉर्म 6 का विवादित सवाल हटा या नहीं, इस पर भी आयोग चुप है। विज्ञप्ति ख़ुद दो अलग समय-सीमाएँ इस्तेमाल करती है: "दस महीने" के नोट, और "पिछले एक वर्ष" के सर्वसम्मत फ़ैसले। पर दोनों में टकराव नहीं है। दस महीने एक साल के भीतर ही आते हैं। फिर भी आयोग ने यह नहीं बताया कि दोनों समय-सीमाएँ किस आधार पर चुनी गईं। विज्ञप्ति में गिनाई "लगभग 40 नई पहलें" की कोई सूची कहीं प्रकाशित नहीं मिली, न हिंदी में, न अंग्रेज़ी में। रिपोर्ट का यह दावा भी जाँचा नहीं जा सका कि तीनों आयुक्तों की बैठक सचमुच चार महीने बाद, 9 सितंबर को ही हुई। आयोग ने इस पर कुछ नहीं कहा। और यह भी साफ़ नहीं है कि आयोग संसद की किसी समिति या अदालत में इन नोटों पर आगे कुछ कहेगा। अभी तक ऐसा कोई क़दम दर्ज नहीं हुआ है।
संधू और जोशी ख़ुद अब तक चुप हैं।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, निर्वाचन आयोग, 23 सितंबर 2026, दोपहर 3:29: हिंदी विज्ञप्ति, 'एसआईआर सहित सभी निर्णय आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों के परिणाम हैं', पत्र सूचना कार्यालय, निर्वाचन आयोग, 23 सितंबर 2026, दोपहर 3:29: वही विज्ञप्ति अंग्रेज़ी में, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, संख्या 57, 28 दिसंबर 2023: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 का मूल पाठ, धारा 17, 18 और 21, संविधान का अनुच्छेद 324, मूल पाठ, इंडियन कानून: टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट, 14 जुलाई 1995, पत्र सूचना कार्यालय, निर्वाचन आयोग, 15 मार्च 2024, दोपहर 1:53: ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के निर्वाचन आयुक्त पद संभालने की विज्ञप्ति, स्क्रॉल.इन, 23 सितंबर 2026: इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा की पड़ताल पर रिपोर्ट, तारीख़वार ब्योरे के साथ, द वायर, 23 सितंबर 2026: इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल पर रिपोर्ट, फ़ॉर्म 6 और बंगाल अपीलों के ब्योरे के साथ, सियासत, 23 सितंबर 2026: भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा का बयान, द वीक, 23 सितंबर 2026: ममता बनर्जी का बयान, वनइंडिया, 23 सितंबर 2026: एम.के. स्टालिन का बयान, ईटीवी भारत, 23 सितंबर 2026: उद्धव ठाकरे का बयान, द न्यूज़मिल, 23 सितंबर 2026: अखिलेश यादव की लखनऊ प्रेस कॉन्फ़्रेंस, दक्कन क्रॉनिकल, 23 सितंबर 2026: आयोग के भीतर पुराने मतभेदों पर रिपोर्ट, अशोक लवासा और राजीव कुमार के प्रकरण