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'ज़मीर की पुकार' पर कॉलम अशोक लवासा ने लिखा, जो अगस्त 2020 में आयुक्त पद छोड़ चुके हैं, मौजूदा विवाद के संधू या जोशी नहीं

रविवार, 27 सितंबर की सुबह 10:53 बजे इंडियन एक्सप्रेस में छपे इस कॉलम की सुर्ख़ी लेखक को 'असहमति लिखने वाला आयुक्त' बताती है। कॉलम की आख़िरी पंक्ति ख़ुद कहती है कि लेखक एक पूर्व निर्वाचन आयुक्त हैं, जो मौजूदा विवाद के केंद्र में मौजूद दोनों सेवारत आयुक्तों में से कोई नहीं। क़रीब ग्यारह सौ शब्दों के इस निबंध में मौजूदा विवाद का ज़िक्र सिर्फ़ एक वाक्य में है।

तमिलनाडु में एक सड़क किनारे अख़बार-पत्रिका स्टैंड, दिसंबर 2011 की तस्वीर; लवासा का कॉलम भी ऐसे ही किसी पाठक तक अख़बार की वेबसाइट के ज़रिए पहुँचा, काग़ज़ पर नहीं
तस्वीर: Girish Gopi from London, UK, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

रविवार, 27 सितंबर की सुबह 10 बजकर 53 मिनट पर इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट पर एक कॉलम चढ़ा। पहली पंक्ति शेक्सपियर के हैमलेट से है। ज़मीर हम सबको कायर बना देता है, यह उसका भाव है। अख़बार ने जो सुर्ख़ी दी, उसका लब्बोलुआब यह है कि "असहमति लिखने वाला आयुक्त" ज़मीर की पुकार और उसे सुनने के डर पर लिख रहा है। सुर्ख़ी भारी है। यह ठीक उसी हफ़्ते छपा है जब निर्वाचन आयोग के भीतर दो आयुक्तों की चौदह लिखित आपत्तियों की ख़बर, आयोग की अपनी सफ़ाई और फिर शनिवार की बैठक, सब एक के बाद एक आए हैं। सवाल यहीं से शुरू होता है: बोल कौन रहा है।

सुर्ख़ी पढ़कर पहला अनुमान यही बनता है कि कोई मौजूदा आयुक्त बोल रहा है। यह अनुमान ग़लत निकलता है। कॉलम की आख़िरी पंक्ति में लेखक ख़ुद अपना परिचय देता है, और अनुमान वहीं टूट जाता है। दोपहर 12 बजकर 12 मिनट पर अख़बार ने कॉलम में मामूली संशोधन भी किया। निर्वाचन आयोग की तरफ़ से इस कॉलम पर कोई बयान नहीं आया, न रविवार को, न इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक। चुप्पी भी एक तथ्य है।

लेखक अशोक लवासा हैं: अगस्त 2020 में आयुक्त पद छोड़ चुके एक पूर्व आयुक्त

कॉलम की बाईलाइन में नाम है अशोक लवासा। आख़िरी पंक्ति ख़ुद कहती है: लेखक एक पूर्व निर्वाचन आयुक्त हैं। लवासा जनवरी 2018 में निर्वाचन आयुक्त बने थे। उन्होंने 18 अगस्त 2020 को इस्तीफ़ा दिया। राष्ट्रपति ने इसे 31 अगस्त 2020 से प्रभावी मंज़ूर किया। इससे ठीक एक महीने पहले उनका नाम एशियाई विकास बैंक के उपाध्यक्ष पद के लिए घोषित हुआ था। आज, छह साल बाद, अख़बार उन्हें सिर्फ़ "पूर्व निर्वाचन आयुक्त" लिखता है। कोई और पदवी नहीं जोड़ता।

यह वही लवासा हैं जिनकी 2019 की असहमति का ज़िक्र इस डेस्क के 24 सितंबर के लेख में हो चुका है। आयोग ने प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष को आदर्श आचार संहिता के मामलों में क्लीन चिट दी थी, लवासा ने असहमति जताई थी, और आयोग ने उनकी असहमति को अंतिम आदेश में दर्ज करने से इनकार कर दिया था। वह प्रकरण सात साल पुराना है। इसे यहाँ दोबारा नहीं खोला जा रहा।

आज का विवाद अलग है। और अलग लोगों का है। इसके केंद्र में दो सेवारत आयुक्त हैं, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, जिनकी चौदह लिखित आपत्तियों की ख़बर इंडियन एक्सप्रेस ने ही 23 सितंबर को छापी थी। लवासा उनमें से कोई नहीं। वह पाँच साल से आयोग में नहीं हैं। कॉलम की सुर्ख़ी लेखक को "असहमति लिखने वाला आयुक्त" बताकर उसकी पहचान बताती है, यह ग़लत नहीं। पर वह पहचान 2019 की है, 2026 की नहीं। सुर्ख़ी पढ़ने वाला यह फ़र्क़ ख़ुद नहीं जान पाता।

यह भी पहला मौक़ा नहीं जब लवासा इस हफ़्ते बोले हों। ओनमनोरमा ने 25 सितंबर को उनका एक साक्षात्कार छापा, जिसमें उन्होंने कहा कि जनता को यह जानने का हक़ है कि आयोग के फ़ैसले कैसे लिए गए। वह एक साक्षात्कार था। यह एक कॉलम है। दोनों अलग हैं। और दोनों में लवासा ख़ुद को आज के मामले के भीतर का व्यक्ति नहीं बताते।

मनीला में एशियाई विकास बैंक का मुख्यालय, गेट से ली गई तस्वीर; लवासा अगस्त 2020 में आयोग छोड़कर यहीं उपाध्यक्ष बने थे
तस्वीर: Eugene Alvin Villar (seav), विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

निबंध शेक्सपियर, एक अंग्रेज़ अफ़सर और एक केन्याई धावक से बुना है

कॉलम लगभग ग्यारह सौ शब्दों का है। इसका ज़्यादातर हिस्सा मौजूदा विवाद का ज़िक्र तक नहीं करता। लवासा हैमलेट की उस पंक्ति से शुरू करते हैं जहाँ ज़मीर आदमी को कायर बना देता है। फिर पूछते हैं: ज़मीर आख़िर है क्या, और वह किसी को डरपोक कैसे बनाता है। इसके बाद वह लिखते हैं कि जनसेवा में आया हर अफ़सर या जनप्रतिनिधि दो क़समें खाता है, संविधान के प्रति निष्ठा की और गोपनीयता की। ऐसे शब्द, वह जोड़ते हैं, उतना ही वज़न रखते हैं जितना कोई व्यक्ति उन्हें देना चाहे। शब्द भारी हैं, पर बंधन हल्का है, यही उनका इशारा है।

बीच में लवासा एक चार-चरण की प्रक्रिया भी गिनाते हैं, जिससे कोई अपने ज़मीर पर अमल करता है: मक़सद की स्पष्टता, यह यक़ीन कि मक़सद सही है, उस पर चलने का साहस, और नतीजा भुगतने की क्षमता। सच्चाई तभी टिकती है जब उसकी क़ीमत चुकाने को कोई तैयार हो, वह लिखते हैं। यह चार चरण किसी एक घटना से नहीं जुड़े। यह एक सामान्य ढाँचा है, हर मामले पर लागू होने वाला।

इसके बाद एक पुराना अंग्रेज़ मामला आता है। क्लाइव पॉन्टिंग ब्रितानी रक्षा मंत्रालय के अफ़सर थे। फ़ॉकलैंड युद्ध में एक अर्जेंटीनी जहाज़ डुबाने से जुड़े दस्तावेज़ उन्होंने विपक्षी सांसद को लीक कर दिए थे। मुक़दमा चला। जज ने दोषी ठहराने की कोशिश की। जूरी ने 11 फ़रवरी 1985 को पॉन्टिंग को बरी कर दिया। लवासा का तर्क है कि पॉन्टिंग ने गोपनीयता की क़सम तोड़कर भी संविधान और जनता के प्रति अपनी असली प्रतिबद्धता निभाई। नियम टूटा, फ़र्ज़ नहीं।

तीसरा उदाहरण खेल का है। 2012 के लंदन ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता केन्याई धावक एबल मुताई स्पेन की एक दौड़ में आगे थे। स्पेनिश भाषा का इशारा वह समझ नहीं पाए। फ़िनिश लाइन से कुछ क़दम पहले ही रुक गए। पीछे दौड़ रहे स्पेनिश धावक इवान फ़र्नांडेज़ ने अपनी जीत छोड़कर उन्हें आगे धकेला और जिताया। पूछे जाने पर फ़र्नांडेज़ ने बस इतना कहा कि वह अपनी माँ को क्या मुँह दिखाते। लवासा के लिए यह "माँ" ज़मीर का ही दूसरा नाम है, और सरकारी अफ़सरों के लिए वह जनता है।

इन उदाहरणों के बीच लवासा एक बात सीधे लिखते हैं। दफ़्तरों में अब बॉस मातहत की स्वतंत्र टिप्पणी नहीं चाहते। वे सोच में तालमेल माँगते हैं, और सत्ता वफ़ादार अफ़सरशाही चाहती है। ईमानदार अफ़सर पहले पूजा जाता था। आज वही असुविधाजनक माना जाता है, वह लिखते हैं। कॉलम एक शेर पर ख़त्म होता है, उर्दू शायर कृष्ण बिहारी 'नूर' का। भाव इतना है: ज़मीर काँपता है, ग़लती से पहले भी और उसके बाद भी। शेर के बोल यहाँ नहीं दोहराए जा रहे।

और मौजूदा विवाद? पूरे कॉलम में उसका ज़िक्र सिर्फ़ एक जगह है। दो निर्वाचन आयुक्तों ने आयोग के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ अपनी बात दर्ज कराने का जो फ़ैसला किया, लवासा उसे केवल "आपत्तियां" शब्द से बताते हैं। यह शब्द भी अपने ही, अंग्रेज़ी में उद्धरण चिह्नों में रखा हुआ। न कोई नाम। न फ़ॉर्म 6 का ज़िक्र। न दस महीने का हवाला, न कोई तारीख़।

एक पुराने टाइपराइटर पर टाइप करते हाथ, अप्रैल 2017 की एक प्रतिनिधि तस्वीर; लवासा का कॉलम भी लेखन और ज़मीर पर एक निजी निबंध है, किसी दस्तावेज़ की तरह तथ्य गिनाने वाला विवरण नहीं
तस्वीर: rawpixel.com rawpixel, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

23 सितंबर की विज्ञप्ति पर निबंध मौन है

यह डेस्क पहले ही लिख चुका है कि 23 सितंबर को दोपहर 3:29 बजे जारी आयोग की विज्ञप्ति (पीआरआईडी 2313958) अपने मत्न में "दस महीनों की अवधि में फैले कुछ विशिष्ट आंतरिक नोटों" की बात मानती है, भले ही उसकी सुर्ख़ी सब कुछ सर्वसम्मत बताए। सवाल यही था: क्या लवासा का कॉलम इस दावे की पुष्टि करता है, उसमें कोई शर्त जोड़ता है, या उसका खंडन करता है।

जवाब तीनों में से कोई नहीं है। कॉलम में "दस महीने" शब्द नहीं आता। "आंतरिक नोट" नहीं आता। फ़ॉर्म 6 नहीं आता। पश्चिम बंगाल की अपीलें नहीं आतीं। डेटाबेस तक पहुँच का सवाल भी नहीं। संधू और जोशी के नाम भी नहीं आते, न मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का। जो एक वाक्य विवाद की तरफ़ इशारा करता है, वह ऊपर उद्धृत हो चुका है। उसमें भी कोई नया तथ्य नहीं जुड़ता।

यह ख़ाली जगह ख़ुद एक जवाब है। सुर्ख़ी ने उम्मीद बंधाई थी कि कोई आयुक्त भीतर की बात बताने जा रहा है। कॉलम उस उम्मीद पर खरा नहीं उतरता। लवासा का विषय अंतरात्मा है, कोई दस्तावेज़ नहीं। उनके पास मौजूदा विवाद की भीतरी जानकारी हो भी, तो कॉलम में वह कहीं दर्ज नहीं। इसे पढ़कर कोई यह दावा नहीं कर सकता कि किसी पूर्व आयुक्त ने आज के मामले पर कोई नई बात बताई है।

इस हफ़्ते के दूसरे दस्तावेज़ में यह फ़र्क़ थोड़ा अलग तरह का था। आयोग की अपनी विज्ञप्ति की सुर्ख़ी और उसका मत्न अलग बात कहते पाए गए थे, सुर्ख़ी और मत्न में सीधा विरोधाभास। लवासा के कॉलम में विरोधाभास नहीं है। यहाँ एक ख़ालीपन है। सुर्ख़ी वादा करती दिखती है, मत्न उसे निभाता ही नहीं। दोनों ग़लतियाँ अलग हैं। पर दोनों एक ही सबक़ देती हैं: दस्तावेज़ पढ़े बिना सुर्ख़ी पर भरोसा मत करो।

एक सवाल फिर भी बचता है, दस्तावेज़ के भीतर की जानकारी का नहीं, उसके लिखे जाने के अधिकार का।

निर्वाचन आयुक्तों के लिए आचरण का कोई लिखित नियम नहीं मिला

एक सवाल यह भी था: क्या किसी मौजूदा या पूर्व निर्वाचन आयुक्त के सार्वजनिक रूप से लिखने पर कोई आचार-नियम लागू होता है। इसका जवाब खोजने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 का पूरा मत्न पढ़ा गया, भारत के राजपत्र की संख्या 57 (28 दिसंबर 2023) से। यह अधिनियम कुल 21 धाराओं का है। किसी एक में भी आचरण, गोपनीयता या पद छोड़ने के बाद बोलने-लिखने पर पाबंदी नहीं मिलती।

धारा 11 सिर्फ़ इस्तीफ़े और हटाए जाने की प्रक्रिया तय करती है। धारा 13(1) कहती है कि जो व्यक्ति सरकारी सेवा में था, वह जिस दिन निर्वाचन आयुक्त का पद संभालता है, उसी दिन से सेवा से सेवानिवृत्त माना जाता है। यानी लवासा जिस दिन 2018 में आयुक्त बने, उसी दिन से वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के किसी भी आचार-नियम से बाहर हो गए। धारा 16 आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज पर मुक़दमे से बचाती है। यह भी बोलने पर पाबंदी नहीं, काम पर छूट है। धारा 21 पुराने 1991 वाले क़ानून को रद्द करती है, और यह अधिनियम उसकी जगह लेता है। दोनों दौर के क़ानून में यह जगह ख़ाली मिलती है। कहीं कोई गोपनीयता खंड नहीं, कहीं कोई आचरण संहिता नहीं।

झारखंड सरकार की एक राजपत्र अधिसूचना का पहला पन्ना, जुलाई 2025 की तस्वीर; यह केंद्र का राजपत्र नहीं, झारखंड का है, पर दिखाता है कि ऐसी अधिसूचना काग़ज़ पर कैसी दिखती है
तस्वीर: Jharkhand Government Press, Government of Jharkhand, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

लवासा अपने ही कॉलम में लिखते हैं कि लोकसेवक "गोपनीयता की क़सम" से बंधे होते हैं। यह बात संविधान की तीसरी अनुसूची में जाँची जा सकती है, क्योंकि वहीं शपथ के तय फ़ॉर्म दर्ज हैं। कुल नौ फ़ॉर्म हैं। मंत्रियों के, सांसदों-विधायकों के, जजों के, नियंत्रक-महालेखा परीक्षक के। निर्वाचन आयुक्त का कोई फ़ॉर्म इनमें नहीं है। "गोपनीयता की शपथ" वाला हिस्सा भी सिर्फ़ दो जगह है, मंत्रियों के फ़ॉर्म II और फ़ॉर्म VI में। जजों तक के फ़ॉर्म में यह शब्द नहीं। यह इस बात का सबूत नहीं कि कोई और नियम कहीं मौजूद ही नहीं। इतना पक्का है: इस डेस्क को न अधिनियम में, न संविधान की इस अनुसूची में, ऐसा कोई नियम मिला।

आयोग का आख़िरी बयान लवासा के कॉलम से क़रीब सत्रह घंटे पहले आया

निर्वाचन आयोग की तरफ़ से लवासा के कॉलम पर, इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक, कोई सीधा जवाब नहीं आया। आयोग की सबसे हालिया विज्ञप्ति (पीआरआईडी 2315365) शनिवार, 26 सितंबर की शाम 5:36 बजे पीआईबी दिल्ली ने जारी की, उसी दिन दोपहर 3 बजे निर्वाचन सदन में हुई पूरे आयोग की बैठक के बाद। यह लवासा के कॉलम से क़रीब सत्रह घंटे पहले की बात है। वह विज्ञप्ति कॉलम का जवाब हो ही नहीं सकती।

विज्ञप्ति में आयोग ने नौ फ़ैसले गिनाए हैं, जिनमें एसआईआर की सूचनाओं पर अब घर जाकर दस्तावेज़ लेना और बैठकों के एजेंडे पहले से जारी करना शामिल है। एक अलग पैराग्राफ़ में आयोग ने यह भी दोहराया कि एसआईआर के सारे बड़े आदेश "आयोग की सर्वसम्मत मंज़ूरी" से जारी हुए थे। सर्वसम्मति का दावा क़ायम रहा। 23 सितंबर की भाषा 26 सितंबर में भी वही रही।

पीआईबी का अपना रिकॉर्ड बताता है कि रविवार, 27 सितंबर को आयोग की तरफ़ से एक भी नई विज्ञप्ति जारी नहीं हुई। शून्य। इतवार है, इसलिए यह अपने आप में असामान्य नहीं। यह चुप्पी किसी रणनीति की उपज नहीं भी हो सकती, महज़ इतवार की हो सकती है।

1995 के उसी फ़ैसले में एक और चेतावनी: 'सजावटी' आयुक्त बनने की

रविवार को ही द हिंदू में एक अलग पड़ताल छपी, शनिवार रात 8:04 बजे प्रकाशित और रविवार सुबह 6:31 बजे अपडेट हुई। सुर्ख़ी का मतलब है कि "श्रेष्ठ" मुख्य निर्वाचन आयुक्त बाक़ी आयुक्तों को "निष्क्रिय" बना देता है, ऐसी चेतावनी सुप्रीम कोर्ट पहले दे चुका है। यह चेतावनी अनूप बरनवाल के 2023 वाले फ़ैसले की नहीं है। उस फ़ैसले का ज़िक्र इस डेस्क के 24 सितंबर के एक अलग लेख में पहले ही आ चुका है, चुनाव आयुक्त नियुक्ति क़ानून पर हाल के बँटे हुए आदेश के हवाले से। आज की चेतावनी उसी टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले की है, 14 जुलाई 1995 का फ़ैसला। इस डेस्क के 24 सितंबर के एक दूसरे लेख ने इसी फ़ैसले को बहुमत वाले नियम के लिए इस्तेमाल किया था।

फ़ैसले में एक अलग पंक्ति है। यह उस लेख में उद्धृत नहीं हुई थी। पाँच जजों की बेंच ने, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी समेत, लिखा: "अगर मुख्य आयुक्त को इस मायने में श्रेष्ठ माना जाए कि उसकी बात आख़िरी है, तो वह बाक़ी आयुक्तों को निष्क्रिय या सजावटी बना देगा।" फ़ैसला आगे कहता है कि ऐसा इरादा अनुच्छेद 324 से निकालना मुश्किल है। यह पंक्ति ख़ुद शेषन की उसी दलील के जवाब में लिखी गई थी कि बतौर मुख्य आयुक्त उनका फ़ैसला अंतिम होना चाहिए। दलील ख़ारिज हुई।

इकतीस साल पुरानी यह पंक्ति आज के विवाद से जुड़ती है, पर एक हद तक ही। दो आयुक्तों ने जो आपत्तियाँ दर्ज कीं, इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, वे ठीक इसी डर की भाषा में हैं: फ़ैसले उनके नाम पर लिए गए, बिना उनकी जानकारी के। अदालत ने 1995 में जिस ख़तरे को असंभव बताया था, वह आज हक़ीक़त बन गया, यह किसी ने साबित नहीं किया। न इस कॉलम में, न कहीं और। जो सामने है, वह सिर्फ़ इतना है: तीस साल पहले की एक चेतावनी, आज फिर पढ़ी जा रही है।

स्रोतभारत पन्ना, 24 सितंबर 2026: इस डेस्क का अपना लेख, धारा 18(2), टी.एन. शेषन (1995) का बहुमत-नियम और 2019 का लवासा प्रकरण, भारत पन्ना, 24 सितंबर 2026: इस डेस्क का अपना लेख, अनूप बरनवाल (2023) के हवाले वाला बँटा हुआ आदेश (2026 INSC 1040), इंडियन एक्सप्रेस, अशोक लवासा, 27 सितंबर 2026, सुबह 10:53 (अपडेट दोपहर 12:12): 'द कॉल ऑफ़ कॉन्शन्स ऐंड फ़ियर ऑफ़ हीडिंग इट', द हिंदू, 26 सितंबर 2026 रात 8:04 (अपडेट 27 सितंबर सुबह 6:31): सुप्रीम कोर्ट की 1995 की चेतावनी पर पड़ताल, इंडियन कानून: टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट, याचिका सिविल संख्या 805/1993, फ़ैसला 14 जुलाई 1995, पीठ: ए.एम. अहमदी (मुख्य न्यायाधीश), जगदीश सारन वर्मा, एन.पी. सिंह, एस.पी. भरूचा, एम.के. मुखर्जी, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, संख्या 57, 28 दिसंबर 2023: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 का पूरा मत्न, 21 धाराएँ, पत्र सूचना कार्यालय, निर्वाचन आयोग, 23 सितंबर 2026, दोपहर 3:29: 'दस महीनों की अवधि में फैले' आंतरिक नोटों वाली विज्ञप्ति, पत्र सूचना कार्यालय, निर्वाचन आयोग, 26 सितंबर 2026, शाम 5:36: 26.09.2026 की आयोग बैठक के नौ फ़ैसले, इंडियन एक्सप्रेस, 26 सितंबर 2026, रात 7:50 (अपडेट 27 सितंबर सुबह 3:49): आयोग की बैठक की रिपोर्ट, ओनमनोरमा, 25 सितंबर 2026: अशोक लवासा का साक्षात्कार, स्क्रॉल.इन, अगस्त 2020: अशोक लवासा के इस्तीफ़े और एशियाई विकास बैंक नियुक्ति की रिपोर्ट, संविधान की तीसरी अनुसूची: शपथ और प्रतिज्ञान के फ़ॉर्म, मूल पाठ — नौ फ़ॉर्म, कोई निर्वाचन आयुक्त का नहीं, गोपनीयता की शपथ केवल मंत्रियों के फ़ॉर्म II और VI में

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।