दिल्ली एसआईआर नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने ईसीआई को नोटिस भेजा, रिपोर्ट माँगी
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मंगलवार को अंजलि भारद्वाज की याचिका पर नोटिस जारी किया और चुनाव आयोग से पहली स्टेटस रिपोर्ट माँगी। सुनवाई की एक टिप्पणी को लाइव लॉ, बार एंड बेंच, वर्डिक्टम और द डेली गार्जियन, चारों ने अलग-अलग शब्दों में छापा। अदालत का अपना आदेश सार्वजनिक तौर पर पढ़ा नहीं जा सका, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की केस-स्टेटस और डेली-ऑर्डर खोजें दोनों कैप्चा माँगती हैं।

मंगलवार, 22 सितंबर को सुबह साढ़े दस बजे मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने दिल्ली के सघन पुनरीक्षण पर अंजलि भारद्वाज की याचिका सुनी। इस अख़बार की सोमवार की रिपोर्ट में दर्ज था कि सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक इस पर कोई आदेश दर्ज नहीं हुआ था। मंगलवार को यह ख़ाली जगह भरी। पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी किया और चुनाव आयोग से पहली स्टेटस रिपोर्ट माँगी। इतना अदालत की अपनी भाषा में तय है।
बाक़ी जो छपा, वह अदालत की भाषा नहीं, रिपोर्टरों की भाषा है। जस्टिस बागची की एक टिप्पणी चार क़ानूनी वेबसाइटों ने चार अलग वाक्यों में छापी। कोई दो शब्द-दर-शब्द नहीं मिलते। अदालत का अपना आदेश, जिसमें असली शब्द दर्ज होते, इस डेस्क को नहीं मिला। मद 22, यानी बंगाल का बारह मुक़दमों वाला बैच, उसी सूची में उसी पीठ के सामने था। उसका क्या हुआ, यह किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं मिला।
आदेश ख़ुद कहीं दर्ज नहीं मिला
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर आदेश खोजने के दो सीधे रास्ते हैं, और दोनों कैप्चा माँगते हैं। पहला रास्ता है डेली-ऑर्डर-केस-नंबर, जहाँ मामला-संख्या डालकर उस दिन का आदेश खोजा जाता है। दूसरा है केस-स्टेटस-केस-नंबर, जहाँ उसी संख्या से मामले की स्थिति देखी जाती है। यह डेस्क मंगलवार रात दोनों पन्नों पर गया। दोनों पर एक कैप्चा सवाल था। यह डेस्क कैप्चा हल नहीं करता। इसलिए दोनों रास्ते बंद रहे।
जो खुला है, वह वेबसाइट का अपना "नए आदेश" पन्ना है, जिस पर हाल में अपलोड हुए सारे आदेश पार्टियों के नाम और डायरी नंबर के साथ दिखते हैं। इसमें कैप्चा नहीं लगता। यह डेस्क वह पन्ना मंगलवार रात दो बार देख चुका है। सूची में उस रात तक 881 प्रविष्टियाँ थीं, ज़्यादातर 21 और 22 सितंबर की। भारद्वाज बनाम भारत निर्वाचन आयोग या मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग, कोई भी नाम इसमें नहीं मिला। रिट याचिका 1188/2026 किस डायरी नंबर पर दर्ज है, वह नंबर ही इस डेस्क को नहीं पता चला।
तो जो नीचे लिखा है, वह चार क़ानूनी वेबसाइटों की रिपोर्टिंग पर टिका है, अदालत के काग़ज़ पर नहीं। लाइव लॉ ने दोपहर 1 बजकर 19 मिनट पर छापा, रिपोर्टर डेबी जैन के नाम से। बार एंड बेंच ने सुबह 9 बजे छापा और 9:12 बजे अद्यतन किया, रिपोर्टर देबायन रॉय के नाम से। वर्डिक्टम ने दोपहर 4:30 बजे छापा, रिपोर्टर आस्था कौशिक के नाम से। द डेली गार्जियन ने रात 8:23 बजे अद्यतन किया, रिपोर्टर संभव शर्मा के नाम से। चारों तारीख़ें इसी डेस्क ने हर पन्ने की कच्ची एचटीएमएल में जाँचीं, किसी सारांश से नहीं लीं।
एक गड़बड़ी यहीं दिखती है। बार एंड बेंच का पन्ना सुबह 9 बजे छपा दिखता है, जबकि सूची के मुताबिक़ पीठ साढ़े दस बजे बैठी थी। यह या तो पन्ने की शुरुआती ख़ाली संरचना बनने का समय है, जिसे बाद में सुनवाई के ब्योरे से भरा गया, या दो घड़ियों में फ़र्क़ है। कौन सही है, यह तय नहीं हो सका। इसे भी वैसे ही दर्ज किया जा रहा है, जैसे मिला।
"लगभग मशीनी": चार अख़बार, चार अलग शब्द
जिस टिप्पणी पर मंगलवार की हर सुर्ख़ी टिकी, वह जस्टिस बागची की है। चारों वेबसाइटों ने उसे अलग तरह से दर्ज किया।
लाइव लॉ के मुताबिक़ उन्होंने कहा: "Almost mechanically notices are going. In all probability they are machine-generated notices…" बार एंड बेंच के मुताबिक़ वही टिप्पणी थी: "Almost mechanically, notices are being issued. In all probability, they are machine-generated notices. So please examine whether some additional filters are necessary before the notices." वर्डिक्टम ने इसमें एक वाक्यांश जोड़ा जो बाक़ी तीनों में नहीं है: "Refinement of the tool is necessary...Almost mechanical notices are going. In all probability, they are machine-generated notices." द डेली गार्जियन ने इसे सीधे उद्धृत नहीं किया, सिर्फ़ इतना लिखा कि अदालत ने नोटिस को यंत्रवत बताया।
तीन उद्धरण, एक ही पल के, और तीनों अलग हैं। "notices are going" और "notices are being issued" एक ही बात के दो अलग क्रिया-रूप हैं। "Refinement of the tool is necessary" सिर्फ़ वर्डिक्टम में है। यह फ़र्क़ बताता है कि चारों अपनी सुनी हुई बात लिख रहे थे, किसी साझा या आधिकारिक प्रतिलेख से टाँक नहीं रहे थे। अदालत का अपना आदेश, जो असली शब्द दर्ज करता, इस डेस्क को नहीं मिला। यह टिप्पणी इसलिए यहाँ चारों अख़बारों के नाम और तारीख़ के साथ दर्ज है, अदालत के आदेश के तौर पर नहीं।
"तार्किक विसंगति" शब्द पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी पर तीनों वेबसाइटें लगभग एक राय हैं, यह ध्यान देने लायक़ है। उन्होंने कहा कि इस शब्द को थोड़ा साफ़ करने की ज़रूरत है, और अपनी मिसाल ख़ुद दी। मई 2019 में वे चंडीगढ़ से दिल्ली आए थे। इससे पहले उनका वोट चंडीगढ़ में बनता था। लाइव लॉ का शब्द है "You need to clarify 'logical discrepancy' a little," वर्डिक्टम का है "That logical discrepancy, you need to clarify this a little." दोनों का मतलब एक है। शब्द अलग हैं।
यह टिप्पणी है, आदेश नहीं। अदालती भाषा में टिप्पणी, आदेश और फ़ैसला तीन अलग चीज़ें हैं। टिप्पणी सुनवाई के दौरान बोला गया शब्द है। आदेश वह है जो काग़ज़ पर दर्ज होकर पीठ के दस्तख़त के साथ जारी होता है। इस मामले में आदेश अभी तक सार्वजनिक तौर पर पढ़ा नहीं जा सका।
अदालत कक्ष में भूषण, नायडू और सिबल की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से वकील प्रशांत भूषण पेश हुए। उनकी दलील का सार बार एंड बेंच ने दर्ज किया: "What is happening is glaring in the Delhi SIR. They are saying that they are issuing notices to 33 lakh people. There are daily wagers among these people. How many people can respond to these kinds of notices?" उन्होंने एक ठोस उदाहरण भी दिया। सीनियर एडवोकेट हुज़ैफ़ा अहमदी के घर काम करने वाली महिला को नोटिस मिला था। भूषण के मुताबिक़ अहमदी का घराना उस सुबह दफ़्तर गया, तीन घंटे बैठा रहा, और आख़िर में बताया गया कि अधिकारी मौजूद नहीं हैं।
आयु-फ़र्क़ वाली तार्किक विसंगति पर भूषण का सवाल तीखा था। कोई मतदाता अपने माता-पिता से पंद्रह साल से कम उम्र के फ़र्क़ पर नोटिस पाए, तो वह किन काग़ज़ों से जवाब दे। आयोग के बारह तय दस्तावेज़ों में से किसी में माता-पिता की उम्र का ब्योरा नहीं होता। वर्डिक्टम ने भूषण का एक और उदाहरण दर्ज किया: भाई-बहन में समय से पहले जन्म के कारण नौ महीने से कम का फ़र्क़, और दादा-दादी से चालीस साल से कम का फ़र्क़। दोनों उदाहरण उसी दलील का हिस्सा थे कि विसंगति की कसौटी काग़ज़ी सत्यापन की पहुँच से परे है।
चुनाव आयोग की तरफ़ से सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू पेश हुए। उन्होंने हर नोटिस में वजह दर्ज होने की बात दोहराई और कहा कि बिना सुनवाई के एक भी मतदाता का नाम नहीं कटेगा। जनशक्ति बढ़ाने की बात भी उन्होंने रखी। लाइव लॉ, बार एंड बेंच और द डेली गार्जियन, तीनों के मुताबिक़ नायडू ने 14,000 बूथ लेवल अधिकारी और 1,200 निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तैनात होने की संख्या दी। वर्डिक्टम की रिपोर्ट अलग है। उसके मुताबिक़ नायडू ने 14,000 बूथ लेवल अधिकारी और 17,000 बूथ लेवल एजेंट तैनात होने की बात कही, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की गिनती नहीं दी। बूथ लेवल एजेंट पार्टी की तरफ़ से नियुक्त होता है। बूथ लेवल अधिकारी सरकारी अमला है। दोनों एक पद नहीं हैं, और चार में से तीन रिपोर्टें एक संख्या देती हैं, चौथी बिलकुल दूसरी। यह फ़र्क़ किसी रिपोर्ट में सुलझा नहीं मिला।
सीनियर एडवोकेट कपिल सिबल ने याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से एक अलग मुश्क़िल उठाई। वर्डिक्टम का उद्धरण है: "There are several buildings in Delhi that I know, because I have... contested elections, which are five stories high. Five stories high, there's no elevator. You think the BLO goes to each of these? I mean, which world are we living in?" सिबल ने यह भी कहा कि कुछ नोटिस सिर्फ़ इतना कहते हैं कि अधिकारी से मिल लें, जगह नहीं बताते। जस्टिस मोहना ने भी यही देखा।
वर्डिक्टम के मुताबिक़ उनका वाक्य था: "We have also come across a situation where BLOs are not available." यह टिप्पणी है, आदेश नहीं।
नायडू ने एक सफ़ाई दी। बारह दस्तावेज़ों की सूची बंद नहीं है, उनके मुताबिक़। एक दस्तावेज़ न हो तो दूसरा भरोसेमंद काग़ज़ भी चल सकता है। लाइव लॉ का वाक्य है: "Naidu submitted that the 12 documents referred to in the notices were not exhaustive." भूषण को यह मंज़ूर नहीं था। जिसने गणना प्रपत्र पहले ही दे दिया, उससे दोबारा माँगना क्यों, उनका सवाल यही था। दोनों दलीलें दर्ज हुईं, कोई तय नहीं हुआ।
आदेश ने आख़िर में दिया इतना ही
टिप्पणियाँ जितनी भी तीखी रहीं, आदेश उनसे छोटा है। बार एंड बेंच ने अदालत का यह वाक्य सीधे उद्धृत किया: "Issue notice. Let the response also indicate the immediate steps taken so far. List after two weeks." तीन बातें इसी एक वाक्य में हैं।
नोटिस जारी। जवाब में अब तक उठाए गए क़दम बताने का निर्देश। और सुनवाई दो हफ़्ते बाद।
एक और निर्देश इसमें नहीं है, पर लाइव लॉ और द डेली गार्जियन दोनों में है। बार एंड बेंच या वर्डिक्टम में यह नहीं मिला। दोनों के मुताबिक़ मुख्य न्यायाधीश ने बिहार और पश्चिम बंगाल के सघन पुनरीक्षण मामलों में पहले दिए गए अंतरिम निर्देशों का हवाला दिया। आयोग को वही निर्देश यहाँ भी मानने को कहा गया। लाइव लॉ का वाक्य है: "the CJI referred to interim orders passed by the Court in the Bihar and West Bengal SIR matters and directed the authorities to follow those directions." द डेली गार्जियन का वाक्य अलग है, मतलब वही: "The court also directed the Election Commission to follow the interim directions passed by the Supreme Court in the SIR cases relating to West Bengal and Bihar and file a status report." दो स्वतंत्र रिपोर्टें एक ही बात कहती हैं।
स्टेटस रिपोर्ट का मतलब यहीं साफ़ होता है। रिपोर्ट में अब तक उठाए गए क़दम बताने होंगे। यह किसी नतीजे या फ़ैसले की माँग नहीं है। यह सिर्फ़ अब तक क्या हुआ, इसका हिसाब है। कितने दिन में यह दाख़िल होनी है, यह तारीख़ के साथ किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं मिला। इतना दर्ज है कि अगली सुनवाई दो हफ़्ते बाद है।
यह आदेश छोटा है। यह पहला भी है। सोमवार तक इस मामले पर कोई आदेश दर्ज नहीं था, और अब है।
बिहार का निर्देश, इस अख़बार में पहली बार
बिहार का नाम इस अख़बार की एसआईआर रिपोर्टिंग में मंगलवार से पहले नहीं आया था। अब तक इस डेस्क ने दिल्ली और बंगाल को कवर किया है। मंगलवार की टिप्पणी इसे बदलती है, क्योंकि अब आयोग को दिल्ली में भी वही सिद्धांत मानने को कहा गया है जो बिहार में पहले से लागू है।
बिहार का सघन पुनरीक्षण जून 2025 में शुरू हुआ, और एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर की उस मुक़दमे की केस-फ़ाइल में 14 अगस्त 2025 की एक प्रविष्टि है, शीर्षक "Day 5: SC directs ECI to publish details of deleted names"। आकाशवाणी समाचार की 18 अगस्त 2025 की रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है: "The apex court had directed the Election Commission of India on Thursday to publish the names of 65 lakh voters excluded from the draft electoral roll, including reasons behind their exclusion." उसी रिपोर्ट के मुताबिक़ आयोग ने उसके बाद बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर 65 लाख बाहर हुए मतदाताओं की सूची डाली, हर नाम के आगे बाहर होने की वजह के साथ।

बंगाल में यह सिद्धांत इस अख़बार पहले ही पढ़ चुका है। सोमवार की रिपोर्ट में दर्ज है कि सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को मोस्तरी बानू के मामले में जो मूल आदेश दिया, उसकी मूल प्रति उस रिपोर्ट के लिए पढ़ी गई थी: तार्किक विसंगति श्रेणी में डाले गए मतदाताओं के नाम पंचायत भवनों, तालुका दफ़्तरों और वार्ड दफ़्तरों में लगाए जाएँ, और दस अतिरिक्त दिन दिए जाएँ। मंगलवार की टिप्पणी इसी सिद्धांत को दोहराती है, तीसरी बार।
पैटर्न एक जैसा है। बिहार में नाम और वजह दोनों सार्वजनिक हुए, अदालत के आदेश के बाद। बंगाल में नाम पंचायत और वार्ड दफ़्तर की दीवार पर लगे, अदालत के आदेश के बाद। दिल्ली में अभी सिर्फ़ निर्देश दोहराया गया है। दीवार पर कुछ लगा है या नहीं, यह किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं है।
1,48,989 का फ़र्क़ बहस में नहीं आया
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के 19 सितंबर के प्रेस नोट में दर्ज संख्या 31,63,930 है। भारद्वाज की याचिका में दर्ज संख्या 33,12,919 है। यह अख़बार पहले भी दोनों संख्याएँ छाप चुका है, बिना मिलाए, क्योंकि इन्हें मिलाने वाला कोई काग़ज़ अब तक नहीं मिला।
मंगलवार को अदालत में जो संख्या इस्तेमाल हुई, वह बड़ी वाली है। बार एंड बेंच के मुताबिक़ भूषण ने कहा कि आयोग 33 लाख लोगों को नोटिस भेज रहा है। द डेली गार्जियन के मुताबिक़ भूषण ने कहा कि दिल्ली में अब 33 लाख से ज़्यादा लोगों को नोटिस मिल चुके हैं। लाइव लॉ ने अपनी तरफ़ से जोड़ा कि आयोग ने लगभग 33.13 लाख मतदाताओं को नोटिस के लिए चुना था, यानी याचिका का ही आँकड़ा। किसी रिपोर्ट में यह दर्ज नहीं है कि पीठ ने यह संख्या मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अपने 31,63,930 वाले प्रेस नोट से मिलाकर पूछी हो।
फ़र्क़ बना हुआ है। बड़ी संख्या अदालत के सामने पहुँची, इससे छोटी संख्या ग़लत साबित नहीं होती। दोनों दस्तावेज़ अपनी जगह पर सही हैं। कौन सही है, यह सवाल मंगलवार की सुनवाई ने नहीं छुआ।
भूषण ने एक और संख्या अदालत में रखी, जो दिल्ली की नहीं, बंगाल की है। द डेली गार्जियन के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि बंगाल के सघन पुनरीक्षण में एक करोड़ से ज़्यादा लोगों को नोटिस गए थे, यह बताने के लिए कि वहाँ अपीलें बरसों लटक सकती हैं। यह संख्या किसी और जाँची गई रिपोर्ट में नहीं मिली। यह याचिकाकर्ता के वकील का अपना बयान है, आयोग या किसी मुख्य निर्वाचन अधिकारी का दस्तावेज़ नहीं। इसे उसी तरह दर्ज किया जा रहा है, तस्दीक़ के बिना।
मद 22 पर कोई ब्योरा नहीं मिला
मंगलवार की सूची में मद 13 दिल्ली का था, मद 22 बंगाल का, दोनों उसी पीठ के सामने। रिट याचिका 1089/2025, मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग, और उसके साथ बारह जुड़े मुक़दमे, यह सोमवार की रिपोर्ट में मूल सूची से पढ़कर दर्ज हुआ था। मद 13 पर मंगलवार को क्या हुआ, इसकी पुष्टि चार वेबसाइटों से हुई। मद 22 पर मंगलवार को क्या हुआ, इसकी पुष्टि किसी एक वेबसाइट से भी नहीं हुई।
लाइव लॉ, बार एंड बेंच, वर्डिक्टम और द डेली गार्जियन, चारों की मंगलवार की रिपोर्टें सिर्फ़ दिल्ली मामले पर हैं। किसी में मोस्तरी बानू, बारह जुड़े मुक़दमों में से किसी एक नाम, या बंगाल के अधिकरणों का ज़िक्र मंगलवार की सुनवाई के हवाले से नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की "नए आदेश" सूची में भी वह मामला नहीं मिला।
इंडिया लीगल ने मंगलवार एक रिपोर्ट छापी जिसमें बंगाल की अपीलों के नए-से दिखते आँकड़े हैं: 38,31,429 अपील दाख़िल, 22,21,118 नाम बहाल कराने की, 16,10,311 किसी और का नाम जोड़े जाने पर आपत्ति की, 1,26,194 निपटीं, 37,05,235 लंबित। इसमें आयोग के उन्नीस अधिकरणों को बयालीस तक बढ़ाने के प्रस्ताव का भी ज़िक्र है, जो बंगाल की लोकसभा सीटों की गिनती के बराबर बैठता है। यह रिपोर्ट किसी पीठ, किसी तारीख़ या किसी सुनवाई का नाम नहीं लेती। इसके 22,21,118 और 16,10,311 वाले आँकड़े स्क्रॉल की 19 सितंबर की रिपोर्ट के 22.21 लाख और 16.10 लाख से लगभग मिलते हैं, जो इस अख़बार पहले छाप चुका है। यह इसलिए किसी नए हलफ़नामे का सबूत नहीं लगता, पुराने का दोहराव लगता है।

तो साफ़ बात यह है। मद 22 का मंगलवार को क्या हुआ, यह पता नहीं चला। न पास-ओवर की पुष्टि है, न सुनवाई की, न मुल्तवी की। यह ख़ाली जगह अनुमान से नहीं भरी जा रही।
वार्ड दफ़्तर में बीएलओ और मानकीकृत जवाब का मतलब
सुनवाई के दौरान अदालत ने कुछ सुझाव भी दिए, जो आदेश का हिस्सा नहीं बने पर दर्ज ज़रूर हुए। बार एंड बेंच के मुताबिक़ मुख्य न्यायाधीश ने कहा: "Maybe 10 to 15 queries or objections or questions. You can prepare a standard response to that and circulate to all of us. Something like an FAQ. Publish in newspapers, you can put it on websites, you can ask your municipality, you can ask your BLOs." यानी पंद्रह क़िस्म के सवालों के जवाब पहले से तैयार हों, अख़बार और वेबसाइट पर छपें, और बूथ लेवल अधिकारियों के पास भी रहें।
जस्टिस बागची ने एक अलग सुझाव दिया, बूथ लेवल अधिकारियों को वार्ड दफ़्तर में बिठाने का, ताकि मतदाता ख़ुद वहाँ पहुँच सकें। लाइव लॉ के मुताबिक़ नायडू ने जवाब दिया कि ऐसा इंतज़ाम पहले से है। सिबल ने इसी बिंदु पर सवाल उठाया कि कुछ नोटिस सिर्फ़ अधिकारी से मिलने को कहते हैं, दफ़्तर या पता नहीं बताते।

यह किसी मतदाता के लिए अभी क्या बदलता है, यह ठीक से समझना ज़रूरी है। जो सामने आया है, वह अदालती सुझाव है, आदेश का हिस्सा नहीं। इसमें कोई तारीख़ दर्ज नहीं है कि यह मानकीकृत जवाब-सूची कब बनेगी या कब छपेगी। लाइव लॉ के मुताबिक़ नायडू ने भरोसा दिलाया, "not even a single voter could be deleted," सुनवाई से जुड़े सत्यापन के हवाले से। हर आपत्ति मान ली जाएगी, यह इससे नहीं निकलता। बिना सुनवाई के कोई नाम नहीं कटेगा, दावा इतना ही है, और यह दावा आयोग के अपने काग़ज़ों में पहले भी दर्ज मिल चुका है।
पंद्रह-बीस क़िस्म के सवालों की सूची अगर सचमुच बने, तो जो मतदाता अभी दफ़्तर के चक्कर काट रहा है, उसे कम से कम इतना पता चलेगा कि किस काग़ज़ से किस सवाल का जवाब मिलता है। अभी वह सूची मौजूद नहीं है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर पहले से जो सूची है, वह बारह प्रमाणपत्रों की है। माता-पिता की उम्र या पिछले वोट की जगह का कोई अलग खाना उसमें नहीं है।
घड़ी अब एक हफ़्ते की रह गई है
दावे-आपत्ति की अवधि 30 सितंबर को ख़त्म होती है। मंगलवार की सुनवाई और 30 सितंबर के बीच आठ दिन का फ़ासला है। नोटिस निपटाने की तारीख़ 29 अक्तूबर तय है। नायडू ने अदालत में कहा कि प्रक्रिया पूरी न हो तो आयोग इसे बढ़ाने के लिए तैयार है। यह तैयारी है, आवेदन नहीं। इस डेस्क को कोई ऐसा काग़ज़ नहीं मिला जिसमें आयोग ने 29 अक्तूबर बढ़ाने की माँग अदालत या किसी और मंच के सामने रखी हो।
अगली सुनवाई की तारीख़ पर भी रिपोर्टें एक जैसी शब्दावली में नहीं हैं। बार एंड बेंच का शब्द है "List after two weeks," यानी दो हफ़्ते बाद। वर्डिक्टम लिखता है, "the matter was listed for a further date," तारीख़ बताए बिना। दो हफ़्ते बाद का हिसाब लगाएँ तो वह तारीख़ 30 सितंबर के बाद और 29 अक्तूबर से पहले बैठती है। दावे-आपत्ति की अवधि तब तक बंद हो चुकी होगी। नोटिस निपटाने की तारीख़ तब तक नहीं आई होगी।
सोमवार तक इस मुक़दमे पर कोई आदेश नहीं था।
मंगलवार को एक आदेश आया, नोटिस और स्टेटस रिपोर्ट का। मद 22 पर मंगलवार को क्या हुआ, यह अब भी दर्ज नहीं है। 1,48,989 का फ़र्क़ अब भी वहीं है जहाँ सोमवार को था।
स्रोतलाइव लॉ, डेबी जैन, 22 सितंबर 2026, दोपहर 1:19 बजे (मूल एचटीएमएल की datePublished से जाँची गई तारीख़): सुनवाई का पूरा ब्योरा, बिहार-बंगाल अंतरिम निर्देशों का हवाला, नोटिस और स्टेटस रिपोर्ट का आदेश, बार एंड बेंच, देबायन रॉय, 22 सितंबर 2026, सुबह 9:00 बजे प्रकाशित, 9:12 बजे अद्यतन (मूल एचटीएमएल की datePublished/dateModified से जाँची गई तारीख़): अदालत के आदेश का सीधा उद्धरण 'Issue notice. Let the response also indicate the immediate steps taken so far. List after two weeks.', वर्डिक्टम, आस्था कौशिक, 22 सितंबर 2026, दोपहर 4:30 बजे: जस्टिस मोहना का उद्धरण, सिबल की बहुमंज़िला इमारत वाली दलील, 17,000 बूथ लेवल एजेंट का आँकड़ा, द डेली गार्जियन, संभव शर्मा, 22 सितंबर 2026, रात 8:23:59 बजे अद्यतन: बिहार-बंगाल अंतरिम निर्देशों की दूसरी स्वतंत्र पुष्टि, भूषण का बंगाल में एक करोड़ नोटिस वाला बयान, सुप्रीम कोर्ट, हाल में अपलोड हुए आदेशों की सूची, 22 सितंबर 2026 की रात दो बार जाँची गई: 881 प्रविष्टियाँ, कोई भारद्वाज या मोस्तरी बानू नहीं, सुप्रीम कोर्ट, मामला-संख्या से दैनिक आदेश खोजने का पन्ना: खोज कैप्चा के पीछे है, हल नहीं किया गया, सुप्रीम कोर्ट, मामला-संख्या से स्थिति खोजने का पन्ना: खोज कैप्चा के पीछे है, हल नहीं किया गया, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर, बिहार सघन पुनरीक्षण मुक़दमे की केस-फ़ाइल, प्रविष्टि 14 अगस्त 2025: 'Day 5: SC directs ECI to publish details of deleted names', आकाशवाणी समाचार, 18 अगस्त 2025, सुबह 8:20 बजे: 65 लाख बाहर हुए मतदाताओं की सूची प्रकाशन, और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का हवाला, इंडिया लीगल, चायनिका, 22 सितंबर 2026: 38,31,429 अपील, 1,26,194 निपटान और उन्नीस से बयालीस अधिकरण बढ़ाने के प्रस्ताव का ज़िक्र, बिना पीठ या तारीख़ बताए, सुप्रीम कोर्ट, मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग, आदेश 19 जनवरी 2026 (इस अख़बार की 22 सितंबर की रिपोर्ट में मूल प्रति से पहले पढ़ा गया): तार्किक विसंगति श्रेणी के नाम पंचायत और वार्ड दफ़्तरों में लगाने का निर्देश, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 19.09.2026: बिंदु 7 में 31,63,930 नोटिस, लाइव लॉ, 17 सितंबर 2026: भारद्वाज की याचिका का 33,12,919 वाला आँकड़ा, स्क्रॉल, 19 सितंबर 2026: आयोग के जवाब में 22.21 लाख और 16.10 लाख का बँटवारा, जिससे इंडिया लीगल के 22 सितंबर के आँकड़े मिलते हैं, सुप्रीम कोर्ट, 22-09-2026 की दैनिक वाद-सूची: मद 13 पर रिट याचिका 1188/2026, मद 22 पर 1089/2025 तथा बारह जुड़े मुक़दमे, दोनों उसी पीठ के सामने (इस अख़बार की 21 और 22 सितंबर की रिपोर्टों में पहले पढ़ी गई)