जुलाई में शुद्ध एफ़डीआई 7.3 अरब डॉलर, पाँच साल में सबसे ज़्यादा
रिज़र्व बैंक के सितंबर बुलेटिन ने शुक्रवार, 25 सितंबर को यह आँकड़ा दिया, और वह एक घटाव है: जुलाई में 14.6 अरब डॉलर देश में आया, और मुनाफ़ा-वापसी व भारतीय कंपनियों के अपने विदेशी निवेश को हटाने के बाद 7.3 अरब डॉलर बचा। बीते बारह महीनों में छह महीने यह आँकड़ा शून्य से नीचे रहा, डीपीआईआईटी की उसी हफ़्ते आई तिमाही रिपोर्ट अलग ही देशों और राज्यों को ऊपर दिखाती है, और मई 2021 से जो तुलना हो रही है, उसकी अपनी घटाव-तालिका अब तक कहीं दर्ज नहीं मिली।

जुलाई में भारत में शुद्ध विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पाँच साल में सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। यह विदेश से आया वह पैसा है, जिसमें से मुनाफ़ा लेकर लौटे निवेशकों और बाहर निवेश करने वाली भारतीय कंपनियों का हिस्सा घटा दिया गया है। रिज़र्व बैंक के शुक्रवार, 25 सितंबर के बुलेटिन के हवाले से यह आँकड़ा 7.3 अरब डॉलर बताया गया। तुलना मई 2021 से हो रही है। यह वाक्य ग़लत नहीं है।
पर "शुद्ध" शब्द में एक घटाव छुपा है। यह घटाव बताता है कि रिकॉर्ड बना कैसे: निवेश बढ़ने से, या पैसा वापस जाने में कमी आने से। एक तरफ़ नया निवेश आने की कहानी है। दूसरी तरफ़ कम पैसा वापस जाने की। दोनों साथ भी हो सकते हैं। आगे यही घटाव खोला गया है: जुलाई में कितना आया और कितना गया; बारह महीनों में यह आँकड़ा कहाँ-कहाँ घूमा; डीपीआईआईटी और मई 2021 के अपने हिसाब किस बात की याद दिलाते हैं; और एक अलग संख्या, जो एफ़डीआई की है ही नहीं।
जुलाई का हिसाब: 14.6 अरब आया, 7.3 अरब बचा
रिज़र्व बैंक के बुलेटिन में "सकल एफ़डीआई" एक तय ढाँचे से बनता है। इसमें तीन चीज़ें जुड़ती हैं: भारत में आया इक्विटी निवेश, कंपनियों की दोबारा लगाई गई कमाई, और किसी विदेशी कंपनी व उसकी भारतीय शाखा के बीच का क़र्ज़ लेन-देन। यह दूसरा हिस्सा "रीइन्वेस्टेड अर्निंग्स" कहलाता है। क़र्ज़ वाला हिस्सा "अदर कैपिटल" कहलाता है। मई 2021 के बुलेटिन की टिप्पणी में इतना और दर्ज है: यह तीसरा हिस्सा पैरंट कंपनी और उसकी सब्सिडियरी या शाखा के बीच के क़र्ज़ लेन-देन से बनता है। बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स के आँकड़े से मेल न खाए, तो वजह रिपोर्टिंग में लगने वाली देरी होती है। जुलाई में यह जोड़ 14.6 अरब डॉलर बना।
इसमें से दो चीज़ें घटती हैं। पहली, मुनाफ़ा-वापसी या विनिवेश। यह तब होता है जब कोई विदेशी निवेशक भारत में लगाया पैसा या यहाँ से कमाया मुनाफ़ा वापस अपने देश ले जाता है। दूसरी, भारत से बाहर निवेश। यह तब होता है जब भारतीय कंपनियाँ ख़ुद विदेश में कोई कंपनी ख़रीदती हैं या वहाँ शाखा खोलती हैं। दोनों घटाने पर जो बचता है, वही शुद्ध एफ़डीआई है। जुलाई में यह 7.3 अरब डॉलर निकला।
हिसाब सीधा है।
सवाल यह है कि 14.6 अरब में से किस मद में कितना गया। मुनाफ़ा-वापसी कितनी, आउटवर्ड निवेश कितना। इतना पक्का है: दोनों मिलाकर ठीक 7.3 अरब डॉलर बाहर गया, क्योंकि 14.6 घटा 7.3 उतना ही बनता है। जो आया, उसका ठीक आधा उसी महीने वापस चला गया। यह भीतरी बँटवारा किसी रिपोर्ट में अलग से नहीं मिलता। निफ़्टीट्रेडर, व्हेल्सबुक और चार्टफ़ॉरेस्ट, तीनों जुलाई का सकल व शुद्ध आँकड़ा देते हैं। बीच का पड़ाव किसी में नहीं।

यह बँटवारा अटकल का विषय नहीं रहना चाहिए। इसे कहीं और परखा जा सकता है, जहाँ रिज़र्व बैंक ने ख़ुद चारों आँकड़े अलग-अलग दिए। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए बिज़नेस स्टैंडर्ड ने बुलेटिन के हवाले से लिखा: सकल प्रवाह 94.53 अरब डॉलर, मुनाफ़ा-वापसी 53.58 अरब डॉलर। घटाने पर बचा 40.95 अरब डॉलर। रिज़र्व बैंक की अपनी टिप्पणी यह कहती है: "2025-26 में एफ़डीआई प्रवाह पिछले साल से ज़्यादा रहा, सकल और शुद्ध दोनों रूप में।" इसमें से भारतीय कंपनियों का बाहर निवेश, 33.29 अरब डॉलर, फिर घटा। अंत में बचा 7.65 अरब डॉलर। यही साल भर की "शुद्ध एफ़डीआई" थी, जिसे संसद में बाद में संशोधित कर 6.95 अरब डॉलर बताया गया।
जनवरी 2026 के अकेले महीने में भी यही तीन क़दम अलग-अलग मिलते हैं। सकल 5.67 अरब डॉलर था। मुनाफ़ा-वापसी घटाकर बचा 75 करोड़ डॉलर। फिर 2.14 अरब डॉलर का आउटवर्ड निवेश घटा। अंतिम आँकड़ा शून्य से 1.39 अरब डॉलर नीचे निकला। यही ढाँचा जुलाई पर भी लागू होता है, भले उसके बीच के दो पड़ाव अलग से दर्ज न मिले हों।
इसी ढाँचे से जुलाई की तरफ़ लौटा जा सकता है। आउटवर्ड निवेश पर बुलेटिन की टिप्पणी इतना बताती है: यह मई और जून की गिरावट के बाद जुलाई में फिर बढ़ा। बाहर गया पैसा कम नहीं हुआ, ज़्यादा हुआ। अगर आउटवर्ड बढ़ा, और फिर भी कुल घटाव पिछले कई महीनों से कम रहा, तो हिसाब का बड़ा हिस्सा मुनाफ़ा-वापसी में आई कमी की तरफ़ इशारा करता है। जनवरी में यह 4.92 अरब डॉलर थी। सितंबर 2025 में 5.2 अरब डॉलर। दिसंबर में 7.45 अरब डॉलर। यह इस डेस्क का अनुमान है, रिज़र्व बैंक का दिया आँकड़ा नहीं। इसे उसी तरह पढ़ा जाना चाहिए।
जून में शुद्ध एफ़डीआई सिर्फ़ 1.3 अरब डॉलर था। मई में आँकड़ा शून्य से नीचे चला गया, ऋणात्मक 7 करोड़ 40 लाख डॉलर। फ़रवरी से अप्रैल तक तीन महीने यह सकारात्मक रहा था। मई ने वह सिलसिला तोड़ा। मई का सकल प्रवाह भी अप्रैल के मुक़ाबले आधे से कम था, सिर्फ़ 6.1 अरब डॉलर। जुलाई का 14.6 अरब डॉलर इसलिए किसी सीधी लकीर पर नहीं बैठा आँकड़ा है। यह एक तेज़ मोड़ पर बैठा आँकड़ा है।
बारह महीनों में छह महीने आँकड़ा शून्य से नीचे रहा
| महीना | सकल एफ़डीआई | मुनाफ़ा-वापसी + आउटवर्ड | शुद्ध एफ़डीआई |
|---|---|---|---|
| अगस्त 2025 | दर्ज नहीं मिला | दर्ज नहीं मिला | -0.6 अरब डॉलर |
| सितंबर 2025 | 6.6 अरब डॉलर | 5.2 + 3.8 अरब डॉलर | -2.4 अरब डॉलर (एक अन्य रिपोर्ट में -1.66 अरब) |
| अक्तूबर 2025 | 6.54 अरब डॉलर | रिपैट्रिएशन 4.99 अरब | -1.55 अरब डॉलर |
| नवंबर 2025 | दर्ज नहीं मिला | दर्ज नहीं मिला | अलग से दर्ज नहीं मिला |
| दिसंबर 2025 | दर्ज नहीं मिला | रिपैट्रिएशन 7.45 अरब | -1.61 अरब डॉलर (एक अन्य रिपोर्ट में -49 करोड़ 20 लाख) |
| जनवरी 2026 | 5.67 अरब डॉलर | 4.92 + 2.14 अरब डॉलर | -1.39 अरब डॉलर |
| फ़रवरी 2026 | दर्ज नहीं मिला | दर्ज नहीं मिला | +4.44 अरब डॉलर |
| मार्च 2026 | दर्ज नहीं मिला | दर्ज नहीं मिला | +1.57 अरब डॉलर |
| अप्रैल 2026 | 15 अरब डॉलर से ऊपर | दर्ज नहीं मिला | +6.58 अरब डॉलर |
| मई 2026 | 6.1 अरब डॉलर | आउटवर्ड 2.4 अरब | -7 करोड़ 40 लाख डॉलर |
| जून 2026 | दर्ज नहीं मिला | दर्ज नहीं मिला | +1.3 अरब डॉलर |
| जुलाई 2026 | 14.6 अरब डॉलर | संयुक्त 7.3 अरब | +7.3 अरब डॉलर |
अगस्त 2025 से जनवरी 2026 तक, लगातार छह महीने, शुद्ध एफ़डीआई शून्य से नीचे रहा। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने रिज़र्व बैंक के मार्च 2026 बुलेटिन के हवाले से लिखा कि जनवरी उसमें लगातार पाँचवाँ महीना था। फ़रवरी में सिलसिला टूटा, आँकड़ा 4.44 अरब डॉलर पर आया। मार्च में यह घटकर 1.57 अरब डॉलर रहा, अप्रैल में बढ़कर 6.58 अरब डॉलर हुआ। मई ने फिर झटका दिया, जून हल्का रहा। जुलाई रिकॉर्ड पर पहुँचा। एक चौड़े फ़्रेम में देखें तो जनवरी 2025 से जनवरी 2026 तक के तेरह महीनों में से आठ महीने यह आँकड़ा शून्य से नीचे रहा। यह बिज़नेस स्टैंडर्ड की एक अलग रिपोर्ट में दर्ज है।
दो महीनों पर रिपोर्टें आपस में मेल नहीं खातीं। दोनों जगह दर्ज करना किसी एक को सही मान लेने से बेहतर है। सितंबर 2025 के लिए स्ट्राइवएज आईएएस ने पूरा ब्यौरा दिया: सकल 6.6 अरब डॉलर, मुनाफ़ा-वापसी 5.2 अरब डॉलर, आउटवर्ड 3.8 अरब डॉलर, शुद्ध ऋणात्मक 2.4 अरब डॉलर। यह जोड़-घटाव पूरी तरह मिलता है। बिज़नेस टुडे ने दिसंबर 2025 के बुलेटिन के हवाले से उसी सितंबर के लिए ऋणात्मक 1.66 अरब डॉलर और मुनाफ़ा-वापसी 4.61 अरब डॉलर लिखा। दिसंबर 2025 का आँकड़ा भी दो जगह अलग है। द वायर ने फ़रवरी 2026 के बुलेटिन के हवाले से ऋणात्मक 1.61 अरब डॉलर लिखा। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने मार्च 2026 के बुलेटिन के हवाले से उसी महीने के लिए ऋणात्मक 49 करोड़ 20 लाख डॉलर लिखा। बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स के मासिक आँकड़े अनंतिम होते हैं। ये आगे संशोधित होते रहते हैं। पर इतना बड़ा फ़र्क़ यह दिखाता है कि किसी एक महीने के आँकड़े को अंतिम मान लेना जल्दबाज़ी होगी।
डीपीआईआईटी का हिसाब: वही हफ़्ता, अलग तस्वीर
रिज़र्व बैंक जिसे "सकल एफ़डीआई" कहता है, उसमें तीन चीज़ें जुड़ती हैं। वाणिज्य मंत्रालय के उद्योग व आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग, यानी डीपीआईआईटी, का अपना आँकड़ा अलग है। यह सिर्फ़ इक्विटी तक सीमित रहता है। यह कंपनियों के एफ़सी-जीपीआर फ़ॉर्म से जुटाया जाता है, और महीनों बाद जारी होता है। दोनों एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते। डीपीआईआईटी की सबसे ताज़ा तिमाही तथ्य-पत्रिका 25 सितंबर को आई, रिज़र्व बैंक के बुलेटिन वाले ही दिन। यह अप्रैल-जून 2026 तिमाही का हिसाब देती है, जुलाई का नहीं।
इस तिमाही में कुल इक्विटी निवेश 19.81 अरब डॉलर रहा। यह पिछले साल की इसी तिमाही से 6 फ़ीसदी ज़्यादा है। महीने-दर-महीने तस्वीर उछल-कूद भरी है। अप्रैल में 12.1 अरब डॉलर आया, पिछले साल के 6.6 अरब डॉलर से लगभग दोगुना। मई में सिर्फ़ 2.8 अरब डॉलर आया, यानी 45 फ़ीसदी नीचे। जून में 4.91 अरब डॉलर, 29 फ़ीसदी नीचे। स्रोत देशों में जापान सबसे ऊपर रहा, 5.71 अरब डॉलर के साथ। फिर सिंगापुर, 5.22 अरब डॉलर। फिर मॉरीशस, 2.31 अरब डॉलर, और नीदरलैंड, 1.38 अरब डॉलर। अमेरिका छठे नंबर पर खिसक गया, सिर्फ़ 1.34 अरब डॉलर के साथ। यह पिछले साल की इसी तिमाही के 5.61 अरब डॉलर से 76 फ़ीसदी कम है।

यह सूची जुलाई की उस सूची से मेल नहीं खाती जिसका हवाला अख़बारों ने रिज़र्व बैंक के बुलेटिन से दिया। उसमें मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका, तीनों मिलाकर क़रीब 70 फ़ीसदी इक्विटी प्रवाह के लिए ज़िम्मेदार बताए गए थे। वजह सीधी है। एक तिमाही भर की सिर्फ़ इक्विटी गिनती है। दूसरा एक महीने का पूरा प्रवाह है, जिसमें दोबारा लगाई कमाई और क़र्ज़ लेन-देन भी शामिल हैं। दोनों सही हो सकते हैं, और फिर भी अलग-अलग जवाब दे सकते हैं।
राज्यों की सूची में यह उतार-चढ़ाव और साफ़ दिखता है। अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 तक के नौ महीनों में महाराष्ट्र 32 फ़ीसदी हिस्से के साथ शीर्ष पर था। तमिलनाडु उसी सूची में सिर्फ़ आठ फ़ीसदी के साथ चौथे नंबर पर था। अकेले अप्रैल-जून 2026 तिमाही में तमिलनाडु 5.95 अरब डॉलर के साथ पहले नंबर पर पहुँच गया। महाराष्ट्र 4.22 अरब डॉलर के साथ दूसरे पर खिसक आया। तीन महीने में शीर्ष राज्य बदल गया। "कौन सबसे आगे है" का जवाब भी इस बात पर निर्भर करता है कि कितने महीनों की खिड़की से देखा जा रहा है।
मई 2021 का मुक़ाबला अधूरा रह जाता है
"मई 2021 के बाद सबसे ज़्यादा": यह तुलना जुलाई के आँकड़े के साथ बार-बार जुड़ी है। उस महीने का सकल एफ़डीआई 12.32 अरब डॉलर था। यह जुलाई 2026 के 14.6 अरब डॉलर से भी कम है। यह आँकड़ा सेटइंडियाबिज़ की अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट में मिलता है, जो जुलाई 2025 के 11.11 अरब डॉलर को "मई 2021 के बाद सबसे ऊँचा" बताती है। पर मई 2021 का शुद्ध आँकड़ा कहीं दर्ज नहीं मिला। मुनाफ़ा-वापसी और आउटवर्ड निवेश घटाने के बाद उस महीने क्या बचा, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं मिला। रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पुराने बुलेटिन तक स्वचालित पहुँच रोकती है। एक निजी संस्था की रखी प्रति में सिर्फ़ प्रेस विज्ञप्ति मिली, पूरी सांख्यिकी-तालिका नहीं। उस महीने का शुद्ध आँकड़ा दोहराने वाली कोई दूसरी रिपोर्ट भी नहीं मिली।
इतना ज़रूर रिज़र्व बैंक के अपने जुलाई 2021 बुलेटिन में दर्ज है, जिसकी एक प्रति एफ़आईडीसी इंडिया की वेबसाइट पर पढ़ी जा सकी। उस समय देश कोविड की दूसरी लहर से बाहर निकल रहा था। बुलेटिन ने लिखा कि लहर का उतार और टीकाकरण की रफ़्तार "निकट भविष्य की संभावनाओं को उजला" कर रहे थे। जिस महीने से आज का आँकड़ा नापा जा रहा है, उसकी महामारी-पृष्ठभूमि पता है। उसकी अपनी घटाव-तालिका पता नहीं। तुलना ग़लत नहीं है। अधूरी है।
छह राज्य, सड़सठ फ़ीसदी, पर यह एफ़डीआई की सूची नहीं
जुलाई के आँकड़े के साथ एक और संख्या जुड़ी है। छह राज्य 2025-26 में बैंकों से मंज़ूर हुई परियोजनाओं की 67.1 फ़ीसदी लागत समेटे हैं। यह अनाम अफ़सरों के हवाले की बात नहीं है। यह रिज़र्व बैंक के उसी सितंबर बुलेटिन के तीसरे लेख से आती है: "निजी कॉरपोरेट निवेश: 2025-26 में बढ़त और 2026-27 का परिदृश्य", जिसे पूर्णेंदु कुमार, स्निग्धा योगींद्रन, सुक्ति खंडेकर और भाव्यश्री के ने लिखा है।
लेख के मुताबिक़ बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 2025-26 में 1,032 परियोजनाओं को मंज़ूरी दी। कुल लागत रिकॉर्ड 4.4 लाख करोड़ रुपये रही, पिछले साल के 3.7 लाख करोड़ रुपये से 18.9 फ़ीसदी ज़्यादा। महाराष्ट्र सबसे आगे रहा, 20.2 फ़ीसदी लागत के साथ। फिर गुजरात, 17.9 फ़ीसदी। राजस्थान 11.1 फ़ीसदी, कर्नाटक 7.9 फ़ीसदी, आंध्र प्रदेश 5.8 फ़ीसदी और तमिलनाडु 4.3 फ़ीसदी। इन छहों को जोड़ने पर 67.1 फ़ीसदी बनता है। बिजली क्षेत्र की अगुवाई में इन्फ़्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का हिस्सा 54.2 फ़ीसदी है। 89.2 फ़ीसदी परियोजनाएँ बिल्कुल नई हैं, किसी पुराने कारख़ाने का विस्तार नहीं। बुलेटिन का अपना अनुमान है कि 2026-27 में इन्हीं चैनलों से पूँजी ख़र्च 3.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचेगा, 2025-26 के 2.6 लाख करोड़ रुपये से ऊपर। लेख ख़ुद यह भी लिखता है कि अगले साल मंज़ूर होने वाली नई परियोजनाओं की पूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं। यह अनुमान इसलिए पुरानी मंज़ूर परियोजनाओं की कतार पर टिका है।

यह आँकड़ा एफ़डीआई नहीं है। ग़लतफ़हमी आसानी से बन सकती है, क्योंकि यह जुलाई के निवेश आँकड़े के साथ ही छपा। यह लेख बैंकों और वित्तीय संस्थानों से मंज़ूर परियोजनाओं की बात करता है, देशी और विदेशी दोनों तरह के निवेश की। सिर्फ़ विदेशी पैसे की बात इसमें नहीं है। दोनों आँकड़े एक ही बुलेटिन में छपे। दोनों निवेश की बात करते हैं। हैं वे अलग-अलग चीज़ें।
गवर्नर की व्याख्या, और आँकड़े जो बार-बार बदले
रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने जून 2025 में एक बात साफ़ कही थी, तब जारी हुए 2024-25 के शुद्ध एफ़डीआई आँकड़े पर। उन्होंने कहा: "यह ध्यान देने की बात है कि यह कमी बढ़ी हुई रिपैट्रिएशन और शुद्ध आउटवर्ड एफ़डीआई की वजह से है, जबकि सकल एफ़डीआई ख़ुद 14 फ़ीसदी बढ़ा है। रिपैट्रिएशन बढ़ना एक परिपक्व बाज़ार की निशानी है, जहाँ विदेशी निवेशक आसानी से आ भी सकते हैं और निकल भी सकते हैं, जबकि ऊँचा सकल एफ़डीआई बताता है कि भारत निवेश के लिए आकर्षक जगह बना हुआ है।" उस वक़्त 2024-25 का शुद्ध आँकड़ा 40 करोड़ डॉलर बताया गया था। संसद में बाद में यही आँकड़ा 96 करोड़ डॉलर बताया गया। एक ही साल का हिसाब, दो बार, दो अलग संख्याएँ।
यही पैटर्न 2025-26 में भी दिखा। उस साल का शुद्ध आँकड़ा मई 2026 में 7.65 अरब डॉलर बताया गया। 28 जुलाई 2026 को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में इसे 6.95 अरब डॉलर बताया, यह भी रिज़र्व बैंक के ही आँकड़े का हवाला देकर। चौधरी ने यह भी जोड़ा कि 2022 में उदार हुए नियमों के बाद भारतीय कंपनियों का बाहर निवेश बढ़ा है। इससे कंपनियाँ, उनके शब्दों में, "दुनिया भर में अपना कारोबार फैला पा रही हैं, जो लंबे समय में भारतीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करता है।"
इस पूरे हिसाब से एक बात साफ़ निकलती है। जुलाई का 7.3 अरब डॉलर सच्चा आँकड़ा है। यह अपने आप में पूरी कहानी नहीं है। न यह किसी भरोसे का प्रमाण-पत्र है, न किसी गिरावट का संकेत, क्योंकि दोनों में से किस वजह से यह ऊपर गया, इसका ठीक-ठीक बँटवारा किसी सार्वजनिक रिपोर्ट में नहीं मिलता। जो मिलता है, इतना है: सकल बढ़ा, कुल घटाव बीते कई महीनों से कम रहा, और आँकड़ा पाँच साल में सबसे ऊँचा बना। अगला महीना इसी लकीर पर चलेगा या नहीं, यह अभी किसी को पता नहीं, न इस रिपोर्ट को, न रिज़र्व बैंक को।
स्रोतभारतीय रिज़र्व बैंक: प्रेस विज्ञप्ति, 'आरबीआई बुलेटिन, सितंबर 2026', 25 सितंबर 2026, निफ़्टीट्रेडर, 25/26 सितंबर 2026: जुलाई के सकल व शुद्ध एफ़डीआई आँकड़े, सेक्टर व देशवार हिस्सेदारी, व्हेल्सबुक, 25 सितंबर 2026, रात 10:53: जुलाई का शुद्ध व सकल एफ़डीआई, आउटवर्ड निवेश के देश, चार्टफ़ॉरेस्ट, 26 सितंबर 2026: आरबीआई सितंबर बुलेटिन के हवाले से जुलाई का एफ़डीआई और विदेशी मुद्रा भंडार, चार्टफ़ॉरेस्ट, 26 सितंबर 2026: आरबीआई बुलेटिन के 'निजी कॉरपोरेट निवेश' लेख का पूरा ब्यौरा, राज्यवार हिस्सेदारी सहित, द ट्रिब्यून (एएनआई की रिपोर्ट), 25 सितंबर 2026: आरबीआई बुलेटिन का 'निजी कॉरपोरेट निवेश' लेख, कुल आँकड़े व उद्धरण, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 28 जुलाई 2026: वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी का राज्यसभा में लिखित जवाब, आरबीआई आँकड़ों के हवाले से, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 6 जून 2025: गवर्नर संजय मल्होत्रा का बयान, 2024-25 के एफ़डीआई आँकड़ों पर, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 22 मई 2026: 2025-26 के पूरे साल का सकल, रिपैट्रिएशन, आउटवर्ड व शुद्ध एफ़डीआई, आरबीआई की टिप्पणी सहित, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 23 मार्च 2026: जनवरी 2026 का सकल, रिपैट्रिएशन, आउटवर्ड व शुद्ध एफ़डीआई, बिज़नेस टुडे, 23 दिसंबर 2025: अक्तूबर व सितंबर 2025 के एफ़डीआई आँकड़े, दिसंबर 2025 के बुलेटिन के हवाले से, स्ट्राइवएज आईएएस: सितंबर 2025 का सकल, रिपैट्रिएशन, आउटवर्ड व शुद्ध एफ़डीआई, द वायर, 21 फ़रवरी 2026: दिसंबर 2025 का एफ़डीआई, फ़रवरी 2026 के बुलेटिन के हवाले से, इकोनीति डेली ब्रीफ़, 23 जुलाई 2026: मई 2026 का एफ़डीआई, जुलाई 2026 के बुलेटिन के हवाले से, डेक्कन क्रॉनिकल, 22 जुलाई 2026: अप्रैल-मई 2026 का एफ़डीआई, जुलाई 2026 के बुलेटिन के हवाले से, डीपीआईआईटी: तालिका संख्या 2, 'आरबीआई का एफ़डीआई प्रवाह आँकड़ा', आरबीआई बुलेटिन 20.02.2026 के हवाले से, वित्त वर्ष 2000-01 से 2025-26 (दिसंबर 2025 तक), डीपीआईआईटी: तिमाही तथ्य-पत्रिका, अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक, महीनेवार इक्विटी प्रवाह सहित, द हंस इंडिया, 26 सितंबर 2026: डीपीआईआईटी की अप्रैल-जून 2026 तिमाही रिपोर्ट, देशवार हिस्सेदारी सहित, सेटइंडियाबिज़, अगस्त 2025: जुलाई 2025 का सकल व शुद्ध एफ़डीआई, मई 2021 के 12.32 अरब डॉलर के हवाले से, भारतीय रिज़र्व बैंक बुलेटिन, मई 2021 (एफ़आईडीसी इंडिया की प्रति): तालिका संख्या 34, 'फ़ॉरेन इन्वेस्टमेंट इनफ़्लोज़़' की व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ, भारतीय रिज़र्व बैंक: 'आरबीआई बुलेटिन, जुलाई 2021' की प्रेस विज्ञप्ति (एफ़आईडीसी इंडिया की प्रति), 15 जुलाई 2021, मई 2021 के महीने का आर्थिक हाल