कर्नाटक में हर किसान को ढाई हज़ार का ऐलान, सरकारी आदेश अभी जारी नहीं
गुरुवार रात विधानसभा में उप मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने हर सूखा-प्रभावित किसान को ढाई हज़ार रुपये और कर्ज़ पर बारह महीने की मोहलत का ऐलान किया। दो असली सरकारी आदेश मिलते हैं, दोनों ताल्लुक़ों की सूखा-घोषणा के हैं, दोनों में ढाई हज़ार रुपये का कोई ज़िक्र नहीं। उधर महाराष्ट्र सूखा घोषित करने से पहले अक्तूबर का इंतज़ार कर रहा है, क्योंकि केंद्र की नियमावली का हिसाब मॉनसून सीज़न ख़त्म हुए बिना पूरा नहीं होता।

गुरुवार रात, विधानसभा में ढाई हज़ार का ऐलान
गुरुवार रात कर्नाटक विधानसभा में सूखे पर बहस चल रही थी। उप मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर खड़े हुए। वे राजस्व मंत्री भी हैं, और उन्होंने कहा कि राज्य अब केंद्र से एनडीआरएफ़ की रक़म का इंतज़ार नहीं करेगा। हर सूखा-प्रभावित किसान को तुरंत ढाई हज़ार रुपये की इनपुट सब्सिडी दी जाएगी। इस पर राज्य के अपने ख़ज़ाने से पहले चरण में 1,250 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे। कन्नड़ अख़बार वार्ताभारती और ईटीवी भारत की कन्नड़ रिपोर्टों के मुताबिक़ इससे लगभग 40 से 50 लाख छोटे और सीमांत किसानों को फ़ायदा मिलने का अनुमान है।
हिसाब खुद जाँच लीजिए। पचास लाख किसान और ढाई हज़ार रुपये प्रति किसान का गुणा ठीक 1,250 करोड़ रुपये देता है। यह जुड़ता है। लेकिन अख़बारों की अपनी भाषा "40 से 50 लाख" है, कोई एक तय आँकड़ा नहीं। यानी जो कुल रक़म बताई गई वह पक्की संख्या है, पर उसे पाने वाले किसानों की गिनती अब भी अनुमान भर है। दोनों एक साथ सच नहीं हो सकते, जब तक कोई काग़ज़ यह न बताए कि लाभार्थियों की गिनती हुई या नहीं।
परमेश्वर का यह बयान गुरुवार, 24 सितंबर की रात का है। थेप्रिंट की रिपोर्ट रात 9:48 बजे प्रकाशित हुई, ईटीवी भारत की कन्नड़ रिपोर्ट रात 8:41 बजे। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक कर्नाटक सरकार की किसी वेबसाइट, राजस्व विभाग के काग़ज़ों, कन्नड़ या अंग्रेज़ी किसी अख़बार में इस ढाई हज़ार रुपये के लिए अलग से जारी कोई सरकारी आदेश नहीं मिला। सदन में बोला गया वाक्य एक बात है। उसे लागू करने वाला काग़ज़ अलग चीज़ है। यह फ़र्क़ इसी कहानी की धुरी है।
27 अगस्त और 17 सितंबर के दो सरकारी आदेश
सरकारी आदेश असल में मौजूद हैं। मगर वे किसी ढाई हज़ार रुपये की बात नहीं करते। पहला आदेश क्रमांक आरडी 586 टीएनआर 2026 है, बंगलूरू, तारीख़ 27 अगस्त 2026। यह कर्नाटक की राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (एसएलबीसी) की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से मौजूद है, स्कैन की हुई एक फ़ाइल के रूप में, जिसे इस रिपोर्ट के लिए अलग से पढ़ा गया। इसमें राज्य ने खरीफ़ 2026 के लिए 101 ताल्लुक़ों को सूखा-प्रभावित घोषित किया, जिनमें से 89 को गंभीर और 12 को मध्यम श्रेणी में रखा गया।
यह फ़ैसला कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र, यानी केएसएनडीएमसी की तीन चरणों वाली जाँच पर टिका है। पहला चरण बारिश की कमी और सूखे दौर का हिसाब है। दूसरा चरण फ़सल की बुवाई, उपग्रह-चित्रों, मिट्टी की नमी और भूजल का हिसाब है। तीसरा चरण ज़मीन पर जाकर पड़ताल है। यह आख़िरी चरण 25 ज़िलों के 102 ताल्लुक़ों के 1,539 गाँवों में हुआ, ई-गवर्नेंस विभाग के "क्रॉप लॉस जीटी" नाम के मोबाइल ऐप्लिकेशन से। दूसरा आदेश उसी क्रमांक का "भाग-1" है, तारीख़ 17 सितंबर 2026। इसमें 23 और ताल्लुक़े जुड़े, 21 गंभीर और 2 मध्यम, और गिनती 124 पर पहुँची।
दोनों आदेशों पर हस्ताक्षर राजस्व विभाग के सचिव मनोज कुमार मीणा के हैं, राज्यपाल के नाम से जारी। दोनों में एक ही वाक्य दोहराया गया है: संबंधित ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण "प्रचलित एसडीआरएफ़ मदों और सहायता मानकों के मुताबिक़" राहत के काम शुरू करें। यानी दोनों आदेश जो अधिकार देते हैं, वह एसडीआरएफ़ की तय दरों पर राहत का अधिकार है। ढाई हज़ार का ज़िक्र किसी आदेश में नहीं। दोनों आदेशों में घोषणा की मियाद छह महीने की लिखी है, जब तक राज्य सरकार ख़ुद न पलट दे। दोनों में यह भी दर्ज है कि केएसएनडीएमसी हर हफ़्ते हालात का जायज़ा लेता रहेगा, क्योंकि मॉनसून सीज़न ख़त्म नहीं हुआ था। दोनों को कैबिनेट की प्राकृतिक आपदा उप-समिति के सामने रखा गया था, जिसकी अध्यक्षता उप मुख्यमंत्री ख़ुद करते हैं।
गिनती यहीं नहीं रुकी।
22 और 23 सितंबर के आसपास परमेश्वर और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बताया कि 53 और ताल्लुक़े जुड़ गए हैं, कुल मिलाकर 177। यह आँकड़ा डेक्कन हेराल्ड, थेप्रिंट और द वीक की रिपोर्टों में है। लेकिन इसका अपना कोई तीसरा सरकारी आदेश, यानी कोई "भाग-2" जैसा काग़ज़, एसएलबीसी की वेबसाइट पर या कहीं और सार्वजनिक रूप से इस रिपोर्ट को नहीं मिला। कर्नाटक में कुल 240 ताल्लुक़े हैं, जैसा 17 सितंबर के आदेश में "शेष 139 ताल्लुक़ों" के ज़िक्र से पता चलता है। परमेश्वर ने ख़ुद कहा है: गिनती 200 से 220 तक जा सकती है। बाक़ी ताल्लुक़ों का मैदानी सर्वे अभी बाक़ी है।
साढ़े आठ हज़ार का हिसाब, ढाई हज़ार का ऐलान
सवाल यह है कि ढाई हज़ार रुपये की यह रक़म राष्ट्रीय मानक से ऊपर है या नीचे। केंद्रीय गृह मंत्रालय के राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ़) और राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (एनडीआरएफ़) के लिए तय मदों और मानकों के मुताबिक़, 33 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा फ़सल नुक़सान पर असिंचित ज़मीन के लिए 8,500 रुपये प्रति हेक्टेयर तय है। सुनिश्चित सिंचाई वाली ज़मीन के लिए यह 17,000 रुपये प्रति हेक्टेयर है, और बहुवर्षीय फ़सलों के लिए 22,500 रुपये प्रति हेक्टेयर। यह सहायता ज़्यादा से ज़्यादा दो हेक्टेयर प्रति किसान तक सीमित है। अगर किसान को फ़सल बीमा योजना के तहत मुआवज़ा पहले ही मिल चुका हो तो उतनी रक़म काट ली जाती है। यह मानक केंद्रीय गृह मंत्रालय के 10 अक्तूबर 2022 के पत्र से चला आ रहा है, जिसे हिमाचल प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग ने अपने 17 नवंबर 2022 के परिपत्र में ज्यों का त्यों दोहराया है।
इन मानकों में एक शर्त और है: असिंचित ज़मीन पर कम से कम 1,000 रुपये प्रति किसान, और सिंचित व बहुवर्षीय फ़सल पर कम से कम 2,000 रुपये प्रति किसान की गारंटी। बहुत छोटे खेत वाले किसान को भी यह न्यूनतम रक़म मिलनी चाहिए। यह गारंटी भी ढाई हज़ार रुपये के आसपास ही बैठती है।
अब हिसाब लगाइए। एक हेक्टेयर असिंचित ज़मीन वाले किसान को एसडीआरएफ़ मानक से 8,500 रुपये मिलने चाहिए। कर्नाटक का ऐलान इसका सिर्फ़ 29 फ़ीसदी है।

सिंचित ज़मीन पर यह फ़ासला और बड़ा हो जाता है। तो ढाई हज़ार रुपये न मानक से ऊपर हैं, न मानक की जगह लेते हैं। यह एक फ़्लैट, तुरंत मिलने वाली पेशगी रक़म है, राज्य के अपने ख़ज़ाने से। असली एसडीआरएफ़-मानक वाली रक़म खेत के सर्वे और गणना के बाद, धीरे-धीरे आएगी। दोनों सरकारी आदेशों में यह प्रक्रिया अलग से लिखी है। ढाई हज़ार रुपये उसके ऊपर की, तेज़ रफ़्तार वाली एक अलग व्यवस्था है।
17 सितंबर की एसएलबीसी बैठक में कर्ज़-राहत का फ़ैसला
कर्ज़ पर बारह महीने की मोहलत का ऐलान भी हुआ है, पर यह राज्य सरकार का सीधा हुक्म नहीं है। यह फ़ैसला 17 सितंबर 2026 को कर्नाटक की राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक में हुआ, जिसके संयोजक केनरा बैंक हैं।

डाइजीवर्ल्ड की रिपोर्ट कहती है कि बैठक की अध्यक्षता मुख्य सचिव ने की। प्रेस नेटवर्क ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि अध्यक्षता अतिरिक्त मुख्य सचिव व विकास आयुक्त उमा महादेवन ने की। दोनों रिपोर्टों में यह फ़र्क़ बना हुआ है, और यह लेख इसे सुलझाने का दावा नहीं करता। बैठक में भारतीय रिज़र्व बैंक और नाबार्ड के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
फ़ैसला यह हुआ। किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि ऋण, डेयरी, रेशम और मछलीपालन जैसी सहायक गतिविधियों के कर्ज़ों पर बारह महीने की मोहलत मिलेगी। मध्यम-प्रभावित ताल्लुक़ों में भुगतान अवधि 36 महीने तक बढ़ेगी, गंभीर-प्रभावित ताल्लुक़ों में 60 महीने तक। ज़रूरतमंद किसानों को नया कर्ज़ भी मिलेगा। आगे जो भी ताल्लुक़े जुड़ेंगे, यह पैकेज उन पर अपने आप लागू होगा, अलग बैठक की ज़रूरत नहीं। केनरा बैंक को इस बैठक का पूरा ब्योरा 26 सितंबर तक अपनी वेबसाइट पर डालना था, यानी 24 सितंबर की रात तक ख़ुद बैठक का लिखित प्रोसीडिंग भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुआ था, सिर्फ़ अख़बारों की रिपोर्टों से इसका ब्योरा मिला।
यह कवायद रिज़र्व बैंक के एक नियामक ढाँचे के तहत होती है। बैंकों के लिए प्राकृतिक आपदा राहत का पुराना मास्टर डायरेक्शन 17 अक्तूबर 2018 का था, आरबीआई/एफ़आईडीडी/2018-19/64, जिसे इस रिपोर्ट ने रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर सीधे पढ़ा। इसी दिन एक जुड़वाँ निर्देश क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लिए भी आया, आरबीआई/एफ़आईडीडी/2018-19/65। छोटे किसान अक्सर वहीं से कर्ज़ लेते हैं। यह ढाँचा अब पुराना पड़ चुका है। नियामक मामलों की कई वेबसाइटों, जैसे विनोद कोठारी कंसल्टेंट्स और ज्यूरिशऑवर, के मुताबिक़ रिज़र्व बैंक ने इस साल एक नया, एकीकृत ढाँचा जारी किया है। मसौदा जनवरी 2026 में आया, अंतिम निर्देश 29 अप्रैल 2026 को, और यह 1 जुलाई 2026 से लागू है। इसके तहत किसी राज्य में आपदा घोषित होने के 15 दिन के भीतर एसएलबीसी या ज़िला स्तर पर विशेष बैठक होनी है। 45 दिन के भीतर राहत योजना "लागू" माननी है। इसके बाद 90 दिन के भीतर, यानी घोषणा के 135 दिन के भीतर, हर किसान के खाते में असल बदलाव दिखना है। यह नया निर्देश ख़ुद रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर इस रिपोर्ट को ढूँढ़ने पर नहीं मिला। ऊपर की तारीख़ें और शर्तें नियामक विश्लेषण की वेबसाइटों से ली गई हैं, ख़ुद आरबीआई के दस्तावेज़ से नहीं, और यह फ़र्क़ पाठक को बताना ज़रूरी है।
कर्नाटक के अपने पैकेज में भी यही कैलेंडर झलकता है। 27 अगस्त की घोषणा, 17 सितंबर की एसएलबीसी बैठक, फिर बैंक शाखाओं में असल अमल 11 अक्तूबर तक, और पूरी प्रक्रिया 9 जनवरी 2027 तक। जिस किसान का कर्ज़ आज मोहलत के दायरे में गिना जा रहा है, उसके अपने खाते में यह बदलाव हफ़्तों बाद ही दिखेगा। ऐलान हुई मोहलत और लागू हुई मोहलत, दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं।
बारिश के आँकड़े, तीन स्रोत, तीन नंबर
सूखे की पूरी बुनियाद बारिश की कमी है, फिर भी इसका कोई एक पक्का आँकड़ा नहीं मिलता। मौसम विभाग के बंगलूरू केंद्र के अपने बुलेटिन में, जो 24 सितंबर 2026 को जारी हुआ, राज्य में 1 जून से 24 सितंबर तक 542.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज है, सामान्य 796.3 मिलीमीटर के मुक़ाबले 32 फ़ीसदी कम। परमेश्वर ने विधानसभा में जो आँकड़ा दिया वह अलग है: 524 मिलीमीटर बनाम 809 मिलीमीटर, यानी क़रीब 36 फ़ीसदी कम। डेक्कन हेराल्ड और द वीक की 22 सितंबर की रिपोर्टों में तीसरा आँकड़ा है: 642 मिलीमीटर बनाम 852 मिलीमीटर। यह ख़ुद अपने हिसाब से 36 फ़ीसदी नहीं बैठता। 852 में से 642 घटाने पर जो कमी निकलती है वह लगभग 25 फ़ीसदी है, 36 नहीं। तीन स्रोत, तीन अलग जोड़े नंबर, और एक रिपोर्ट का अपना जोड़ ही अपने बताए प्रतिशत से मेल नहीं खाता। 27 अगस्त के सरकारी आदेश में एक चौथा, महीना-भर पुराना आँकड़ा भी है: 21 अगस्त तक 437 मिलीमीटर बनाम सामान्य 635 मिलीमीटर, यानी 31 फ़ीसदी की कमी। बाक़ी तीन आँकड़े लगभग एक ही हफ़्ते के हैं, फिर भी आपस में नहीं मिलते। कौन सही है, यह लेख तय नहीं करता।
सूखा प्रबंधन नियमावली और 31 अक्तूबर की तारीख़
अब सवाल यह है कि महाराष्ट्र अभी सूखा घोषित क्यों नहीं कर पाया, जबकि वहाँ भी हालात ख़राब हैं। जवाब दोनों आदेशों में ही छिपा है। दोनों बार-बार एक ही दस्तावेज़ का हवाला देते हैं: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की "सूखा प्रबंधन नियमावली, 2020"। यह ज़रूरी बात है। इस रिपोर्ट के लिए तय की गई शुरुआती जानकारी में जिस नियमावली का ज़िक्र था, वह 2016 का संस्करण था, जो मंत्रालय की अपनी वेबसाइट पर आज भी मौजूद है। दोनों दस्तावेज़ इस रिपोर्ट ने पूरे पढ़े हैं। यह टाइपो नहीं है, असल फ़र्क़ है।
दोनों संस्करणों में तीन चरणों वाली वही प्रक्रिया है जो कर्नाटक के आदेशों में दिखी: अनिवार्य संकेतक, फिर प्रभाव-संकेतक, फिर ज़मीनी पड़ताल। पर 2016 के संस्करण में खरीफ़ सूखे की घोषणा "30 अक्तूबर से बाद में नहीं" करने की शर्त है। 2020 के संस्करण में यही तारीख़ एक दिन खिसककर 31 अक्तूबर हो गई है, और एक नया प्रावधान जुड़ा है: बुवाई में देरी होने पर राज्य दस्तावेज़ी सबूत के साथ तीन हफ़्ते तक की मोहलत माँग सकते हैं। "गंभीर" सूखे की परिभाषा भी बदली है। 2016 में तीनों चुने गए प्रभाव-संकेतक "गंभीर" श्रेणी में होने चाहिए थे। 2020 में दो संकेतकों का "गंभीर" होना और एक का "मध्यम" होना ही तय करता है।
इन तारीख़ों की वजह दोनों नियमावलियों की अपनी बनावट में है। मॉनसून सीज़न की पूरी बारिश का हिसाब जून से सितंबर तक के पूरे सीज़न पर बनता है। सितंबर ख़त्म हुए बिना यह हिसाब पूरा नहीं होता। इसीलिए घोषणा की खिड़की अक्तूबर के महीने में ही खुलती है, 31 तारीख़ तक बंद होने से पहले। दोनों नियमावलियों में एक "जल्दी" रास्ता भी है: अगर जून-जुलाई की बारिश सामान्य से आधी या उससे कम रह जाए और लंबे सूखे दौर पड़ें, तो राज्य अगस्त में ही सूखा घोषित कर सकते हैं। महाराष्ट्र में यह रास्ता शायद इसलिए नहीं खुला, क्योंकि जुलाई ख़ुद भारी बारिश का महीना था। मौसम विभाग के मुंबई केंद्र के अपने आँकड़ों के मुताबिक़, जुलाई 2026 में राज्य में सामान्य से 40 फ़ीसदी ज़्यादा बारिश हुई। कमी बाद में, अगस्त और सितंबर में आई। जल्दी घोषणा की शर्त पूरी नहीं हुई, और राज्य सामान्य, सीज़न-भर वाले रास्ते पर ही निर्भर रह गया।
महाराष्ट्र सरकार के कृषि विभाग के हवाले से चीनी मंडी की 22 सितंबर की रिपोर्ट में एक और तारीख़ है: औपचारिक फ़सल-नुक़सान सर्वे "5 अक्तूबर के बाद ही" शुरू होंगे। यह तारीख़ न 2016 की नियमावली में मिलती है, न 2020 की। दोनों दस्तावेज़ पूरे पढ़ने पर भी "5 अक्तूबर" कहीं नहीं मिलता। तो यह राज्य के अपने कृषि विभाग की प्रशासनिक समय-सीमा लगती है, केंद्र की नियमावली का सीधा प्रावधान नहीं। दोनों बातें अलग हैं, और इस लेख में अलग ही रहनी चाहिए।
महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल की समीक्षा, सर्वे अभी बाक़ी
महाराष्ट्र सरकार ने अभी औपचारिक सूखा घोषित नहीं किया, पर तैयारी शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 19 सितंबर को मंत्रिमंडल की बैठक में कहा कि राज्य के कई ज़िलों में "सूखे जैसे हालात" बन गए हैं। उन्होंने मंत्रियों को अपने-अपने ज़िलों में प्रारंभिक सर्वे शुरू करने को कहा। सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटील ने 22 सितंबर को कहा कि सितंबर के अंत तक राज्य को "100 फ़ीसदी सूखा-प्रभावित" घोषित किया जा सकता है, भले औपचारिक सर्वे बाद में हों। राज्य के कृषि विभाग के मुताबिक़ 20 ज़िलों के 83 ताल्लुक़ों में बीस दिन या उससे ज़्यादा से बारिश नहीं हुई। यह आँकड़ा राज्य का है, आईएमडी का नहीं।

अमरावती, सोलापुर और लातूर समेत छह ज़िलों में बारिश की कमी 40 से 50 फ़ीसदी के बीच बताई गई है।
मौसम विभाग के मुंबई केंद्र के आँकड़ों से एक बड़ी तस्वीर भी बनती है। 1 जून से 31 अगस्त तक राज्य में बारिश सामान्य से 12 फ़ीसदी कम रही। मराठवाड़ा में यह कमी 30 फ़ीसदी थी, कोंकण-गोवा में 8 फ़ीसदी। मध्य महाराष्ट्र में बारिश सामान्य से 2 फ़ीसदी ज़्यादा ही रही। पुणे में अगस्त में सिर्फ़ 24.7 मिलीमीटर बारिश हुई, जो 2015 के बाद का सबसे सूखा अगस्त था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार ने फडणवीस से 31 गंभीर-प्रभावित ज़िलों में तुरंत सूखा घोषित करने और प्रति हेक्टेयर 50,000 रुपये मुआवज़े की माँग की है। यह एक राजनीतिक माँग है, कोई सरकारी आँकड़ा नहीं।
यह पूरी तस्वीर एक बात साफ़ करती है। कर्नाटक में पैसा राज्य के अपने ख़ज़ाने से आज ही निकल सकता है, भले उसका पूरा काग़ज़ बाद में बने। महाराष्ट्र में पैसा निकलने से पहले एक कैलेंडर पूरा होना है, जो केंद्र की नियमावली ने पहले से तय कर रखा है। एक राज्य में रफ़्तार सरकार के हाथ में है। दूसरे में रफ़्तार सीज़न के हाथ में है।
स्रोतकर्नाटक सरकार, राजस्व विभाग (आपदा प्रबंधन): सरकारी आदेश क्रमांक आरडी 586 टीएनआर 2026, बंगलूरू, 27 अगस्त 2026 — कर्नाटक राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की वेबसाइट पर उपलब्ध प्रति, कर्नाटक सरकार, राजस्व विभाग (आपदा प्रबंधन): सरकारी आदेश क्रमांक आरडी 586 टीएनआर 2026 (भाग-1), बंगलूरू, 17 सितंबर 2026, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार: सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार: सूखा प्रबंधन नियमावली, 2020 (इसरो के वेदास पोर्टल पर उपलब्ध प्रति), हिमाचल प्रदेश सरकार, राजस्व विभाग का परिपत्र, 17 नवंबर 2022, केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्र क्रमांक 33-03/2020-NDM-I (खंड-2), 10 अक्तूबर 2022 का हवाला देते हुए एसडीआरएफ़/एनडीआरएफ़ मदों और मानकों की सूची, 2022-23 से 2025-26, भारत मौसम विज्ञान विभाग, बंगलूरू केंद्र: ज़िलावार बारिश सारांश, 24 सितंबर 2026, भारत मौसम विज्ञान विभाग, मुंबई केंद्र: महाराष्ट्र का मौसमी वर्षा सारांश, भारतीय रिज़र्व बैंक: मास्टर डायरेक्शन, प्राकृतिक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों की राहत उपाय, 2018 (आरबीआई/एफ़आईडीडी/2018-19/64, 17 अक्तूबर 2018), विनोद कोठारी कंसल्टेंट्स, फ़रवरी 2026: आरबीआई के मसौदा निर्देशों पर टिप्पणी, ज्यूरिशऑवर, अप्रैल 2026: आरबीआई के अंतिम निर्देशों की रिपोर्ट, द प्रिंट, 24 सितंबर 2026: उप मुख्यमंत्री परमेश्वर का ढाई हज़ार रुपये इनपुट सब्सिडी का ऐलान, ईटीवी भारत (कन्नड़), 24 सितंबर 2026, डाइजीवर्ल्ड, 17 सितंबर 2026: एसएलबीसी की कर्ज़-राहत बैठक की रिपोर्ट, प्रेस नेटवर्क ऑफ़ इंडिया, 17 सितंबर 2026, द वीक, 22 सितंबर 2026: कर्नाटक में 177 ताल्लुक़ों की गिनती, चैनल आई ऐम, 24 सितंबर 2026: मुख्यमंत्री शिवकुमार का प्रधानमंत्री को पत्र, डेक्कन क्रॉनिकल, 19 सितंबर 2026: मुख्यमंत्री फडणवीस की मंत्रिमंडल बैठक, चीनी मंडी, 22 सितंबर 2026: सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटील का बयान, द वीक, 2 सितंबर 2026: महाराष्ट्र के मॉनसून का हिसाब