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महाराष्ट्र में 265 तालुकों में सूखे जैसी स्थिति घोषित, गंभीर या सामान्य की श्रेणी अभी तय नहीं

शनिवार को जारी सरकारी आदेश पर तारीख़ 25 सितंबर लिखी है, पर उस पर चढ़ा डिजिटल दस्तख़त 26 सितंबर की सुबह का है। द हिंदू ने लिखा 265 तालुके, इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा राज्य का 75 फ़ीसदी हिस्सा, बिज़नेस स्टैंडर्ड ने आदेश के हवाले से 74 फ़ीसदी। आदेश ख़ुद न कोई प्रतिशत लिखता है, न राज्य के कुल तालुकों की गिनती। वह सिर्फ़ इतना कहता है कि 'Trigger-1' नाम की पहली जाँच पास हुई है, सूखे की तीव्रता अभी तय नहीं हुई है, और फ़सल के नुक़सान का मुआवज़ा एक अलग आदेश से बाद में आएगा।

मुंबई में मंत्रालय भवन, नज़दीकी सड़क से ली गई जून 2012 की तस्वीर; महाराष्ट्र सरकार का यही मुख्यालय है, जहाँ मदत व पुनर्वसन विभाग से 26 सितंबर का सूखा-आदेश जारी हुआ
तस्वीर: Udaykumar PR, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

एक सरकारी आदेश, दो तारीख़ें, 265 तालुके

शनिवार, 26 सितंबर की सुबह ग्यारह बजकर इक्कीस मिनट पर एक डिजिटल दस्तख़त हुआ। महाराष्ट्र सरकार के मदत व पुनर्वसन विभाग के सह सचिव संजय इंगळे ने आदेश क्रमांक समिति-2026/प्र.क्र.82/मदत-2 पर हस्ताक्षर किए। यही वह काग़ज़ है जिसे अख़बारों ने "महाराष्ट्र में सूखा घोषित" के तौर पर छापा। आदेश ख़ुद अपने पहले पन्ने पर तारीख़ लिखता है: 25 सितंबर, 2026। दस्तख़त अगले दिन का है।

यह टाइपो लगकर भी टाइपो नहीं है। द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस, दोनों ने लिखा कि यह आदेश शनिवार को जारी हुआ। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पीटीआई के हवाले से लिखा कि आदेश "शुक्रवार देर रात" जारी हुआ। तीनों रिपोर्टें 26 सितंबर की शाम तक छप चुकी थीं। कोई अख़बार ग़लत नहीं है। आदेश का लेटरहेड शुक्रवार बोलता है, उस पर चढ़ा डिजिटल दस्तख़त शनिवार सुबह का है, और सरकार के अपने जीआर पोर्टल पर दर्ज तारीख़ भी 26-09-2026 ही है। यह रिपोर्ट आगे 26 सितंबर को ही आदेश की तारीख़ मानती है, क्योंकि दस्तख़त और पोर्टल, दोनों उसी दिन के हैं।

आदेश का मजमून सीधा है। राज्य के 265 तालुकों में दुष्काळी, यानी सूखे जैसी स्थिति घोषित की गई है, कृषि आयुक्त की 24 सितंबर की रिपोर्ट के आधार पर। ज़िलाधिकारियों को तुरंत पंचनामे शुरू करने का निर्देश है। बारह ग़ैर-नक़दी रियायतें लागू हुई हैं। फ़सल नुक़सान का मुआवज़ा अलग आदेश से आएगा, बाद में। इतना ही आदेश कहता है, इससे ज़्यादा नहीं।

रिपोर्टिंग में एक और फ़र्क़ दिखता है, संख्या का। द हिंदू का शीर्षक कहता है "265 तालुकों में सूखा", इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक कहता है "राज्य के 75 फ़ीसदी हिस्से में सूखा"। दो अलग दावे लगते हैं। असल में दोनों एक ही तथ्य की दो भाषाएँ हैं, और आदेश ख़ुद इस हिसाब में कहीं शामिल नहीं है।

358 में से 265, छह विभागों का हिसाब

265 तालुकों की पूरी सूची आदेश के परिशिष्ट-1 में है, छह राजस्व विभागों में बँटी हुई। सबसे ज़्यादा तालुके छत्रपति संभाजीनगर विभाग में हैं, 74। अमरावती विभाग में 56, नाशिक विभाग में 49, नागपुर विभाग में 39, पुणे विभाग में 35, और ठाणे विभाग में सिर्फ़ 12। यह बँटवारा इंडियन एक्सप्रेस की 26 सितंबर की रिपोर्ट में भी अंक-दर-अंक वही है। ज़िलावार सबसे ज़्यादा मार यवतमाळ पर पड़ी है, 16 तालुके। जळगाव में 15, अहिल्यानगर, नागपुर, अमरावती और नांदेड़ में 14-14, द हिंदू की 26 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़, और आदेश की अपनी सूची इसकी पुष्टि करती है।

जळगाव ज़िले के चिनावल गाँव में कपास और केले का खेत, सितंबर 2014 की तस्वीर; यह गाँव रावेर तालुके में है, जो आदेश की सूची में शामिल जळगाव के 15 तालुकों में से एक है
तस्वीर: ABHIJEET, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

ठाणे विभाग का आँकड़ा एक अजीब बात बताता है। इसके 12 तालुकों में एक भी ठाणे या पालघर ज़िले का नहीं है। सूची में रायगड का श्रीवर्धन है, रत्नागिरी ज़िले के तीन तालुके हैं, और सिंधुदुर्ग ज़िले के आठ तालुके हैं। ठाणे और पालघर, दोनों ज़िले आदेश की सूची में शून्य पर हैं। तटीय कोंकण का उत्तरी हिस्सा इस सूखे से बाहर है। दक्षिणी हिस्सा भीतर है।

आदेश की सूची में कुल 34 ज़िले नाम से दर्ज हैं। इनमें ठाणे और पालघर शून्य पर हैं। बाक़ी 32 ज़िलों में कम-से-कम एक तालुका सूची में है, ठीक उतना जितना बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पीटीआई के हवाले से लिखा। मुंबई शहर और मुंबई उपनगर, दोनों सूची में हैं ही नहीं, क्योंकि वहाँ राजस्व तालुका ढाँचा लागू नहीं होता। शरद पवार ने अपने 16 सितंबर के पत्र में राज्य के कुल ज़िलों की गिनती 36 बताई थी, द हिंदू की 19 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़। 34 और 2 जोड़ने पर वही 36 बनता है।

अब असली सवाल: राज्य में तालुके कुल कितने हैं। द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस और बिज़नेस स्टैंडर्ड, तीनों ने एक ही आँकड़ा लिखा है, 358। तीनों अख़बारों की रिपोर्टों में इस गिनती का अपना कोई स्रोत नहीं मिलता, और यह रिपोर्ट किसी सरकारी दस्तावेज़ में यह कुल गिनती ख़ुद पढ़कर पुष्टि नहीं कर सकी। आदेश अपने छह पन्नों में कहीं भी 358 का ज़िक्र नहीं करता, न कोई फ़ीसदी लिखता है। 265 को 358 से भाग देने पर 74.02 फ़ीसदी बनता है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने यही आँकड़ा "74 फ़ीसदी" लिखा, आदेश के हवाले से। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक में यही आँकड़ा पचहत्तर फ़ीसदी बन गया, और भीतर की कॉपी में इसे "तीन-चौथाई" लिखा गया। तो 265 तालुके और 75 फ़ीसदी, दो अलग गिनतियाँ नहीं हैं। एक ही भिन्न को दो अख़बारों ने अलग ढंग से गोल किया है। यह हिसाब अख़बारों का अपना है, आदेश का नहीं।

Trigger-1 का मतलब, तीन पड़ावों में पहला

"Trigger-1" अख़बारों की अपनी भाषा नहीं है। यह केंद्र सरकार की सूखा प्रबंधन नियमावली से सीधे उठा हुआ शब्द है। नियमावली सूखे की घोषणा के लिए तीन पड़ावों की प्रक्रिया तय करती है, और यह प्रक्रिया नियमावली के 2016 और 2020, दोनों संस्करणों में एक जैसी है, यह रिपोर्ट दोनों दस्तावेज़ ख़ुद पढ़कर बता रही है।

पहला पड़ाव अनिवार्य संकेतकों का है: बारिश का विचलन या एसपीआई, और सूखा दौर, एक तालिका के आधार पर जाँचे जाते हैं। यही तालिका पहला ट्रिगर तय करती है, जिसे नियमावली ख़ुद "Trigger-1" कहती है। नियमावली सूखा दौर की अपनी परिभाषा भी देती है: आमतौर पर चार हफ़्ते, हल्की मिट्टी वाले इलाक़ों में तीन हफ़्ते तक, जिसमें हर हफ़्ते बारिश सामान्य के आधे से कम रहे। तीन हफ़्ते यानी इक्कीस दिन, ठीक वही आँकड़ा है जो द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस दोनों ने 26 सितंबर की रिपोर्टों में "लगातार 21 दिन का सूखा दौर" लिखा। पहला ट्रिगर लगे, तभी दूसरा पड़ाव आता है।

दूसरा पड़ाव प्रभाव-संकेतकों का है: खेती, सैटेलाइट-चित्र, मिट्टी की नमी और जलस्तर, चार में से कोई तीन चुने जाते हैं। इन्हीं तीन के नतीजों से नियमावली तय करती है कि सूखा "गंभीर" है या "सामान्य"। यही वह पड़ाव है जिस पर 2016 और 2020 के संस्करण अलग पड़ते हैं, जैसा इसी डेस्क की 25 सितंबर की रिपोर्ट (कर्नाटक की सूखा-घोषणा पर) पहले ही बता चुकी है: 2016 में तीनों संकेतक "गंभीर" होने पर ही सूखा "गंभीर" माना जाता था, 2020 में दो संकेतकों का "गंभीर" और एक का "सामान्य" होना ही तय करता है। दूसरा पड़ाव पार होने पर तीसरा और आख़िरी पड़ाव आता है: ज़मीन पर जाकर पड़ताल, यानी पंचनामा, जिसका नतीजा ही सूखे की अंतिम श्रेणी तय करता है। 2020 के संस्करण में एक और शर्त जुड़ी है, जो अब तक किसी रिपोर्ट में नहीं आई: अगर 80 फ़ीसदी पंचनामों में फ़सल का नुक़सान 50 फ़ीसदी से ज़्यादा निकले, तो राज्य सूखे की श्रेणी को "सामान्य" से बढ़ाकर "गंभीर" कर सकता है।

महाराष्ट्र का आदेश इस सीढ़ी पर कहाँ खड़ा है। सिर्फ़ पहले पड़ाव पर। आदेश का परिशिष्ट सिर्फ़ इतना कहता है: इन 265 तालुकों में Trigger-1 लागू है। दूसरे पड़ाव, यानी प्रभाव-संकेतकों की जाँच, का कोई ज़िक्र आदेश में नहीं। कोई तालुका "गंभीर" या "सामान्य" किसी सूची में नहीं रखा गया, पूरे छह पन्नों में कहीं नहीं। इसके बजाय आदेश सीधे तीसरे पड़ाव का हुक्म देता है: ज़िलाधिकारी अभी पंचनामे शुरू करें। नियमावली की धारा 3.4 साफ़ कहती है कि सूखे की अधिसूचना में तीव्रता दर्ज होनी चाहिए, "सामान्य" या "गंभीर"। महाराष्ट्र की यह अधिसूचना वह दर्ज नहीं करती, क्योंकि वह पड़ाव अभी आया ही नहीं है।

एक और जाँच ज़रूरी थी: यह घोषणा नियमावली की "जल्दी घोषणा" वाली ख़ास व्यवस्था के तहत आई या सामान्य प्रक्रिया के तहत। नियमावली में ऐसी विशेष व्यवस्था है, पर सिर्फ़ अगस्त महीने के लिए, और सिर्फ़ तब जब जून-जुलाई की बारिश ख़ुद बहुत कम रही हो। महाराष्ट्र का आदेश सितंबर का है, अगस्त का नहीं। जुलाई ख़ुद भारी बारिश का महीना था, जैसा इसी डेस्क की 25 सितंबर की रिपोर्ट में मुंबई मौसम केंद्र के हवाले से दर्ज है। तो यह घोषणा नियमावली की किसी "जल्दी" या विशेष धारा से होकर नहीं आई। यह सामान्य प्रक्रिया का पहला क़दम भर है, समय से कुछ पहले उठाया गया।

आदेश ख़ुद जिस दस्तावेज़ का नाम लेता है, वह "2016 की दुष्काळ व्यवस्थापन संहिता" है। कोई 2020 का ज़िक्र आदेश में नहीं। द हिंदू ने भी यही लिखा, बिज़नेस स्टैंडर्ड ने "2016 (2020 में संशोधित)" लिखा। कर्नाटक के अपने आदेश उसी राष्ट्रीय दस्तावेज़ को 2020 के नाम से बुलाते हैं, इसी डेस्क की पिछली रिपोर्ट के मुताबिक़। पहले पड़ाव की तालिका दोनों संस्करणों में शब्द-दर-शब्द एक जैसी है, इसलिए आज के नतीजे पर इस नाम का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ तभी पड़ेगा जब महाराष्ट्र दूसरे पड़ाव पर पहुँचेगा, और गंभीर-सामान्य की सीमा तय करनी होगी।

अब तक न कोई श्रेणी, न कोई रुपया

26 सितंबर के आदेश से अभी तीन बातें साफ़ नहीं हुई हैं। किसी तालुके की तीव्रता तय नहीं हुई। किसान को मिलने वाली रक़म तय नहीं हुई। यह कब मिलेगी, यह भी तय नहीं। आदेश का बिंदु तीन साफ़ लिखता है: फ़सल नुक़सान की मदद निर्धारित कार्यपद्धति पूरी करके, स्वतंत्र शासन निर्णय से जारी होगी। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने भी यही दोहराया, द हिंदू की 26 सितंबर की रिपोर्ट में: असली मदद ज़मीनी सर्वे के बाद तय होगी।

अभी सिर्फ़ काग़ज़ी प्रक्रिया शुरू हुई है।

पंचनामे कब पूरे होंगे, आदेश इसकी कोई समय-सीमा नहीं देता। खरीफ़ सूखे की घोषणा नियमावली के तहत 31 अक्तूबर तक पूरी करनी होती है, यह सीमा इसी डेस्क की 25 सितंबर की रिपोर्ट में दर्ज है। यानी पंचनामों, दूसरे पड़ाव और अंतिम श्रेणी के लिए अभी एक महीने से कुछ ही ज़्यादा वक़्त बचा है।

महाराष्ट्र के धुळे ज़िले में ज़िलाधिकारी कार्यालय की इमारत, मई 2015 की तस्वीर; धुळे भी आदेश की सूची में शामिल है, और ऐसे ही दफ़्तरों से पंचनामे की कार्यवाही शुरू होनी है
तस्वीर: jainpankaj009, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटील ने 22 सितंबर को कहा था कि महीने के अंत तक राज्य को "सौ फ़ीसदी सूखा-प्रभावित" घोषित किया जा सकता है, एनडीआरएफ़ के मानकों के आधार पर, द हिंदू की उसी दिन की रिपोर्ट के मुताबिक़। 26 सितंबर को जो आया, वह सौ फ़ीसदी नहीं है। यह सिर्फ़ 265 तालुकों भर का पहला पड़ाव है।

बारिश का हिसाब: राज्य में अठारह, मराठवाड़ा में अड़तीस फ़ीसदी कमी

सूखे की पूरी बुनियाद बारिश की कमी है, फिर भी इसका एक पक्का आँकड़ा नहीं मिलता। इंडियन एक्सप्रेस ने 26 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में राज्य का आँकड़ा दिया: 1 जून से 26 सितंबर तक 798.2 मिलीमीटर बारिश, सामान्य 970.9 मिलीमीटर के मुक़ाबले 18 फ़ीसदी कम। द हिंदू और बिज़नेस स्टैंडर्ड ने "राज्य सरकार के आँकड़ों" के हवाले से एक क़रीबी मगर अलग नंबर लिखा: 755.9 मिलीमीटर बनाम 932.3 मिलीमीटर, यानी 18.8 फ़ीसदी कमी, पर यह गिनती 18 सितंबर तक की है, आठ दिन पुरानी। दोनों नंबर एक-दूसरे के क़रीब हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि बीच के आठ दिनों में कुछ और बारिश हुई, और कमी थोड़ी घट गई।

राज्य का औसत भ्रामक है। इंडियन एक्सप्रेस की एक अलग, 26 सितंबर रात की रिपोर्ट, लेखक अमिताभ सिन्हा और हरीश दामोदरन, मराठवाड़ा के आठ ज़िलों की कुल कमी 38 फ़ीसदी बताती है, छत्रपति संभाजीनगर के 16 फ़ीसदी से हिंगोली के 48 फ़ीसदी तक फैली हुई। विदर्भ के ग्यारह ज़िलों में औसत कमी 27 फ़ीसदी है, यवतमाळ के 26 फ़ीसदी से अमरावती के 42 फ़ीसदी तक। सात ज़िले ऐसे हैं जहाँ बारिश सामान्य की क़रीब आधी ही रही: सोलापुर, धाराशिव, लातूर, हिंगोली, जालना, बीड और नांदेड़ का एक हिस्सा। सोलापुर को छोड़कर बाक़ी सभी मराठवाड़ा में हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ नाशिक ज़िले में उलटा हिसाब है, सामान्य से 37 फ़ीसदी ज़्यादा बारिश। पाँच ज़िलों में बारिश बची रही: मुंबई शहर, मुंबई उपनगर, पुणे, नाशिक और सातारा। देश भर की औसत कमी 13 फ़ीसदी है, महाराष्ट्र की 18, इसी रिपोर्ट के मुताबिक़।

यह रिपोर्ट मौसम विभाग की अपनी वेबसाइट से सितंबर का सीधा आँकड़ा लाने की कोशिश में रही। मुंबई मौसम केंद्र का जो बुलेटिन 27 सितंबर को पढ़ा गया, वह जुलाई महीने और 21 अगस्त तक का ही निकला। सितंबर का कोई अपडेट उसमें नहीं मिला। इसलिए ऊपर के सभी सितंबर के आँकड़े अख़बारों की रिपोर्टों से हैं, मौसम विभाग के किसी सीधे दस्तावेज़ से नहीं, और यह फ़र्क़ पाठक को बताना ज़रूरी है।

एक तीसरा हिसाब भी है, जो ऊपर के दोनों से मेल नहीं खाता। राकांपा (शरदचंद्र पवार) के नेता शरद पवार ने 16 सितंबर को फडणवीस को जो पत्र लिखा, उसमें जून से अगस्त की कमी मराठवाड़ा में 69 फ़ीसदी, विदर्भ में 61 फ़ीसदी और कोंकण में 33 फ़ीसदी बताई गई है, द हिंदू की 19 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़। पवार का राज्य-स्तर का आँकड़ा भी अलग है: 15 सितंबर तक सिर्फ़ 748 मिलीमीटर, यानी 19 फ़ीसदी की कमी। यह पत्र में लिखा पवार का अपना आँकड़ा है, सरकार का नहीं। सरकारी आँकड़ों से इसका बड़ा फ़ासला बना हुआ है। कौन सही है, यह रिपोर्ट तय नहीं करती।

बारह रियायतें अभी, फ़सल का मुआवज़ा बाद में

आदेश की गिनती के मुताबिक़ बारह रियायतें अभी लागू हैं, और सभी ग़ैर-नक़दी हैं। ज़मीन महसूल में छूट। फ़सल क़र्ज़ का पुनर्गठन। खेती से जुड़े क़र्ज़ की वसूली पर रोक। साढ़े सात अश्वशक्ति से ऊपर के कृषि पंपों के बिजली बिल में छूट, क्योंकि उससे नीचे के पंपों का बिल पहले ही माफ़ है। स्कूल-कॉलेज के छात्रों की परीक्षा फ़ीस माफ़। रोज़गार हमी योजना के काम के नियमों में ढील, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा काम शुरू हो सकें। ज़रूरत पड़ने पर पानी के टैंकर। सूखा-प्रभावित गाँवों में खेत के पंपों की बिजली न काटना। किसान-मज़दूरों को अनाज की कमी न होने देना। जानवरों के लिए चारे का इंतज़ाम। जल संवर्धन के काम। और पहले से जारी निर्देशों के मुताबिक़ पीने के पानी की योजना। यह पूरी सूची आदेश के दूसरे बिंदु में दर्ज है, और अख़बारों की रिपोर्टों में इसका बड़ा हिस्सा नहीं छपा।

रुपये की बात इस सूची में कहीं नहीं है। आदेश का तीसरा बिंदु इसे साफ़ कर देता है: फ़सल नुक़सान की नक़दी मदद तय प्रक्रिया पूरी होने के बाद, एक अलग शासन निर्णय से आएगी। कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को दिए बयान में कहा, "किसानों की आँखों के सामने खड़ी फ़सल बर्बाद होते देखना बहुत तकलीफ़देह है। इसलिए हम सिर्फ़ सूखा घोषित करके नहीं रुकना चाहते, असली मदद किसानों तक पहुँचाना चाहते हैं।"

नक़दी मदद आने पर उसकी दर क्या होगी, इसका कोई संकेत आदेश में नहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय की जो प्रति-हेक्टेयर दरें इसी डेस्क की 25 सितंबर की रिपोर्ट में दर्ज हैं, असिंचित ज़मीन पर 8,500 रुपये, सिंचित पर 17,000, बहुवर्षीय फ़सल पर 22,500, उन्हीं दरों को हिमाचल प्रदेश सरकार के जिस परिपत्र से इस रिपोर्ट ने दोबारा पढ़ा, वह ख़ुद अपने पाठ में लिखता है कि यह दरें सिर्फ़ 2022-23 से 2025-26 तक के लिए हैं। महाराष्ट्र की मुआवज़ा-राशि तय होगी 2026-27 में, इस साल के लिए। इन दरों का कोई नया, 2026-27 का संस्करण केंद्रीय गृह मंत्रालय या राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की वेबसाइट पर खोजने पर नहीं मिला। पुरानी दर आगे भी चलेगी या बदलेगी, यह इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक अनुत्तरित है।

विपक्ष के सवाल, और आगे रबी की चिंता

विपक्ष का सवाल एक ही है: पैसा कब और कितना। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाळ ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "असली सवाल यही है कि किसान को मुआवज़ा कब मिलेगा। पहले बैंक खातों में नक़दी मदद डालिए, पंचनामे और सर्वे की औपचारिकता बाद में पूरी कीजिए।" सपकाळ ने प्रति हेक्टेयर एक लाख रुपये, रबी सीज़न के लिए मुफ़्त बीज-खाद और चारे-पानी का तुरंत इंतज़ाम माँगा है, बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक़, और मौजूदा सूखे को 1972 से भी ज़्यादा गंभीर बताया है।

राकांपा (शरदचंद्र पवार) के महासचिव महेश तपासे ने भी वही निशाना साधा: मुआवज़ा काग़ज़ी कार्रवाई और सर्वे के बाद ही आएगा, यह ख़ुद सरकार कह रही है। उन्होंने शरद पवार के 16 सितंबर के पत्र का हवाला दिया, जिसमें कम-से-कम 50,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की तुरंत मदद माँगी गई थी। यह रक़म अब तक कहीं नहीं आई है। शिवसेना (उद्धव बाळासाहेब ठाकरे) के नेता आदित्य ठाकरे ने कहा कि उनकी पार्टी सूखा घोषित करने की माँग बहुत पहले से कर रही थी, और यह फ़ैसला पहले आना चाहिए था। ठाकरे ने शनिवार को ही सोलापुर से सूखा-प्रभावित इलाक़ों का दो-दिवसीय दौरा शुरू किया, धाराशिव और लातूर होते हुए। किसान सभा ने कहा कि आदेश में सीधी मदद का कोई ठोस इंतज़ाम नहीं है, और दो लगातार ख़रीफ़ सीज़न की मार झेल चुके किसानों के लिए क़र्ज़-माफ़ी और बीमा-आधारित मुआवज़े की माँग की। किसान नेता अजित नवले ने द हिंदू से कहा, "मुख्यमंत्री बार-बार एनडीआरएफ़ के तहत मदद की बात कहते रहे हैं, पर यह पर्याप्त नहीं। किसानों ने दो ख़रीफ़ सीज़न का नुक़सान झेला है, आजीविका पर यह बहुत बड़ी मार है।"

खेत का असर अभी से बाज़ार में दिख रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ सोयाबीन की उपज मराठवाड़ा में सामान्य की 40 से 50 फ़ीसदी और विदर्भ में 60 से 70 फ़ीसदी रहने का अंदाज़ा है। लातूर मंडी में सोयाबीन का भाव 5,600-5,700 रुपये प्रति क्विंटल है, समर्थन मूल्य 5,705 के बहुत क़रीब।

महाराष्ट्र के हिंगोली ज़िले में सोयाबीन का खेत, अगस्त 2019 की तस्वीर; हिंगोली मराठवाड़ा के उन ज़िलों में है जहाँ बारिश की कमी सबसे ज़्यादा, 48 फ़ीसदी दर्ज हुई
तस्वीर: Albert Deccan, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

तुअर की फ़सल लंबी है, 160 से 180 दिन की, और नवंबर की शुरुआत में जब उसकी फली भरेगी, ठीक उसी वक़्त मिट्टी में नमी सबसे कम रहने का अंदेशा है। लातूर में तुअर का भाव अभी से समर्थन मूल्य से ऊपर है, 9,000-9,200 रुपये बनाम 8,450। बाज़ार को कमी का अंदाज़ा पहले से है। रबी की बुवाई इसी नमी पर टिकी है, और वह अभी मिट्टी में नहीं है।

स्रोतमहाराष्ट्र शासन, मदत व पुनर्वसन विभाग: शासन निर्णय क्रमांक समिति-2026/प्र.क्र.82/मदत-2, मुंबई, आदेश पर दिनांक 25 सितंबर 2026 अंकित, डिजिटल हस्ताक्षर 26 सितंबर 2026 सुबह 11:21 बजे, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार: सूखा प्रबंधन नियमावली (Manual for Drought Management), 2016, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार: सूखा प्रबंधन नियमावली, 2020 (इसरो के वेदास पोर्टल पर उपलब्ध प्रति), द हिंदू, 26 सितंबर 2026, दोपहर 1:19 बजे: महाराष्ट्र सरकार द्वारा 265 तालुकों में सूखा घोषित, द हिंदू, 22 सितंबर 2026, शाम 6:27 बजे: राज्य में 18.8 फ़ीसदी बारिश की कमी, छह ज़िलों में 40-50 फ़ीसदी, द हिंदू, 22 सितंबर 2026, रात 1:43 बजे: सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटील का बयान, महीने के अंत तक 100 फ़ीसदी सूखा घोषित होने की बात, द हिंदू, 23 सितंबर 2026, दोपहर 1:54 बजे: 29 ज़िलों में येलो अलर्ट, राज्य में 17 फ़ीसदी बारिश की कमी, द हिंदू, 19 सितंबर 2026, सुबह 6:51 बजे: शरद पवार का फडणवीस को पत्र, प्रति हेक्टेयर 50,000 रुपये की माँग, द इंडियन एक्सप्रेस, 26 सितंबर 2026, सुबह 11:41 बजे (आलोक देशपांडे व शुभांगी खापरे): राज्य के 75 फ़ीसदी हिस्से में सूखा घोषित, द इंडियन एक्सप्रेस, 26 सितंबर 2026, रात 8:52 बजे (अमिताभ सिन्हा व हरीश दामोदरन): बारिश में क्षेत्रीय असमानता और फ़सल पर असर, बिज़नेस स्टैंडर्ड (पीटीआई), 26 सितंबर 2026, शाम 6:25 बजे: 265 तालुकों में सूखा घोषित, राहत उपायों का ऐलान, भारत मौसम विज्ञान विभाग, मुंबई केंद्र: महाराष्ट्र का मौसमी वर्षा सारांश — 27 सितंबर 2026 को पढ़ी गई प्रति में जुलाई और अगस्त तक का ही आँकड़ा मिला, सितंबर का अपडेट नहीं, हिमाचल प्रदेश सरकार, राजस्व विभाग का परिपत्र, 17 नवंबर 2022, केंद्रीय गृह मंत्रालय के पत्र क्रमांक 33-03/2020-NDM-I के हवाले से एसडीआरएफ़/एनडीआरएफ़ दरें, वैधता 2022-23 से 2025-26 तक अंकित

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।