रिज़र्व बैंक ने सात लाख करोड़ माँगे, बैंकों ने ढाई लाख दिए; बैंकों के पास इतना पैसा इसलिए है कि प्रवासी भारतीयों ने तीन महीने में 127 अरब डॉलर जमा किए
बैंकिंग व्यवस्था में 11 लाख करोड़ रुपये फ़ालतू पड़े हैं। यह पैसा रुपये को बचाने की उस योजना से आया जो 8 जून को शुरू हुई और 31 अगस्त को समय से पहले बंद करनी पड़ी, क्योंकि जितना माँगा था उससे कहीं ज़्यादा आ गया। अब रिज़र्व बैंक उसी पैसे को वापस खींच रहा है, और बैंक तीस दिन के लिए देने को तैयार नहीं।

सोमवार 7 सितंबर की सुबह रिज़र्व बैंक ने बैंकों से कहा: अपना फ़ालतू पैसा तीस दिन के लिए हमारे पास रख दो, हम ब्याज देंगे। माँग सात लाख करोड़ रुपये की थी।
बैंकों ने दो लाख उनसठ हज़ार करोड़ दिए।
दोपहर से पहले रिज़र्व बैंक ने दूसरी नीलामी खोली, सिर्फ़ एक रात के लिए, पाँच लाख करोड़ की। इस बार तीन लाख तिरपन हज़ार करोड़ आए। दोनों में ब्याज एक ही था, 5.24 फ़ीसदी।
यानी बैंक पैसा देने को तैयार हैं, पर एक रात के लिए; एक महीने के लिए नहीं। इस हिचक के पीछे एक कहानी है जो 8 जून को शुरू हुई थी, और उससे पहले जनवरी में।
पहले वह पैसा, जो फ़ालतू है
बैंकिंग व्यवस्था में "अधिशेष तरलता" का मतलब है वह रक़म जो बैंकों के पास जमा है और जिसे उन्होंने किसी को कर्ज़ नहीं दिया। पीटीआई के अनुसार 6 सितंबर को यह अधिशेष 11.16 लाख करोड़ रुपये था। 3 सितंबर को रिज़र्व बैंक की अपनी विज्ञप्ति में 10.32 लाख करोड़।
तुलना के लिए: भारत सरकार का पूरा साल का पूँजीगत ख़र्च इस आकार के आसपास होता है। इतना पैसा बैंकों की तिजोरी में बेकार पड़ा है।
रिज़र्व बैंक इसे तरलता समायोजन सुविधा कहता है: वह ज़रिया जिससे केंद्रीय बैंक तंत्र में पैसा डालता है या खींचता है। उसी पन्ने का गलियारा बताता है कि दर कहाँ ठहरे, छत सीमांत स्थायी सुविधा और फ़र्श स्थायी जमा सुविधा।
पैसा आया कहाँ से

8 जून 2026 को रिज़र्व बैंक ने "विशेष डॉलर-रुपया विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा" शुरू की। तीन दरवाज़े खोले: प्रवासी भारतीयों की विदेशी मुद्रा जमा, जिसे एफ़सीएनआर(बी) कहते हैं; बैंकों का विदेश से उधार; और कंपनियों का विदेशी वाणिज्यिक उधार। बैंक ये डॉलर लाएँ और रिज़र्व बैंक से रुपये में बदल लें, बाद में वापस बदलने की गारंटी के साथ।
तारीख़ पर एक फ़र्क़ दर्ज करने लायक़ है। 2 सितंबर की विज्ञप्ति कहती है कि सुविधा 8 जून को शुरू हुई; 1 अगस्त की विज्ञप्ति में घोषणा 5 जून की है, अमल 8 जून से। 5 जून को ही जून की मौद्रिक नीति आई थी।
31 अगस्त तक, रिज़र्व बैंक की अनंतिम विज्ञप्ति के अनुसार, इस रास्ते से 136 अरब 37 करोड़ डॉलर आए: एफ़सीएनआर(बी) जमा 127 अरब 22 करोड़, बैंकों का विदेशी उधार 5 अरब 26 करोड़, कंपनियों का 3 अरब 89 करोड़।
127 अरब डॉलर, लगभग बारह लाख करोड़ रुपये, तीन महीने से भी कम में। अधिशेष का लगभग पूरा हिसाब यहीं है।
विज्ञप्ति संख्या 2026-2027/1024, नीचे मुख्य महाप्रबंधक ब्रिज राज के दस्तख़त।
स्वैप का मतलब क्या है
रिज़र्व बैंक के सवाल-जवाब पन्ने पर इसे "सादा ख़रीद/बिक्री विदेशी मुद्रा स्वैप" कहा गया है। सादा भाषा में: बैंक आज डॉलर देकर रुपये लेता है, और तय तारीख़ पर उतने ही डॉलर तय भाव पर वापस लेता है। इसलिए यह डर नहीं रहता कि तीन साल बाद डॉलर 110 रुपये का हुआ तो जमा लौटाएँगे कैसे।
उस डर की बाज़ार में क़ीमत होती है, हेजिंग लागत, जो तय करती है कि विदेशी जमा पर बैंक कितना ब्याज दे सके। एमयूएफ़जी के 8 जून के शोध-नोट के अनुसार रिज़र्व बैंक ने तीन से पाँच साल की नई जमाओं पर यह पूरी लागत ख़ुद उठाई, यानी बाज़ार की 2.8 से 3.3 फ़ीसदी की स्वैप दरों पर लगभग 3 फ़ीसदी की छूट। आउटलुक बिज़नेस के अनुसार इसी वजह से बैंक प्रवासियों को लगभग 6.5 फ़ीसदी तक दे सके।
शर्तें, जो कम पढ़ी गईं
पात्रता उसी पन्ने पर है। एफ़सीएनआर(बी) जमा की मूल अवधि कम से कम तीन साल; कंपनियों के विदेशी वाणिज्यिक उधार की औसत परिपक्वता भी तीन साल या ज़्यादा। स्वैप की अधिकतम अवधि पाँच साल, और कंपनियों के मामले में वह उधार चुकाने के कार्यक्रम से मेल खानी चाहिए।
बैंक "आवेदन-सह-घोषणा" फ़ॉर्म भरकर सुविधा लेते हैं। स्वैप की दर किस फ़ॉर्मूले से बनेगी, यह उस पन्ने पर नहीं लिखा।
तीन साल की शर्त इस योजना की सबसे अहम पंक्ति है। जो पैसा आया है, वह कम से कम 2029 तक भारत में रहेगा।
खिड़की क्यों समय से पहले बंद हुई
योजना 30 सितंबर तक थी। 13 अगस्त तक 56 अरब 85 करोड़ डॉलर आ चुके थे, गल्फ़ न्यूज़ के अनुसार, और रिज़र्व बैंक ने उसी हफ़्ते घोषणा की कि एफ़सीएनआर(बी) जमा की खिड़की 31 अगस्त को बंद होगी, एक महीना पहले; इन जमाओं के बदले स्वैप 11 सितंबर तक हो सकेंगे। कंपनियों और बैंकों के उधार वाली खिड़की 31 दिसंबर तक खुली है।
कारण रिज़र्व बैंक के शब्दों में "उत्साहजनक प्रतिक्रिया" और "बड़ी विदेशी मुद्रा आवक" थी; फ़ैसले की तारीख़ 14 अगस्त है।
13 अगस्त के बाद के अठारह दिनों में लगभग 79 अरब 53 करोड़ डॉलर और आए। घोषणा ने भीड़ बढ़ाई।
आख़िरी दस दिन
आँकड़ों की क़तार देखने लायक़ है। 31 जुलाई तक कुल आवक 40 अरब 81 करोड़ डॉलर थी, जिसमें जमा 36 अरब 72 करोड़। 13 अगस्त तक 56 अरब 85 करोड़, 21 अगस्त तक 72 अरब 85 करोड़, और 31 अगस्त तक 136 अरब 38 करोड़।
द ट्रिब्यून के हिसाब से 21 से 31 अगस्त के दस दिनों में 63 अरब 53 करोड़ डॉलर आए, 87 फ़ीसदी की उछाल; अकेली एफ़सीएनआर(बी) जमा में लगभग 61 अरब 83 करोड़। ढाई महीने की कुल आवक का आधे से ज़्यादा उन्हीं दस दिनों का है।
बंद होने की तारीख़ ख़ुद एक घड़ी बन गई।
भंडार का हिसाब
योजना का मक़सद यही था। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स पर दर्ज रिज़र्व बैंक के आँकड़ों में 28 अगस्त को ख़त्म हुए हफ़्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 740 अरब 80 करोड़ डॉलर था, अब तक का सबसे ऊँचा स्तर; पिछले हफ़्ते 729 अरब 33 करोड़। सात दिन में 11 अरब 47 करोड़ की बढ़त।
1998 से 2026 तक भारत का औसत भंडार 321 अरब डॉलर रहा है। अगस्त के आख़िरी दस दिनों में उसका लगभग पाँचवाँ हिस्सा जुट गया।
और यह योजना क्यों बनी थी
क्योंकि रुपया गिर रहा था। 21 जनवरी 2026 को रुपया 91.7 प्रति डॉलर पर पहुँचा, जो तब रिकॉर्ड निचला स्तर था, ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार; वजहें विदेशी निवेशकों की बिकवाली, जनवरी में लगभग 3 अरब डॉलर और पिछले साल लगभग 18 अरब, और अमेरिका का 50 फ़ीसदी शुल्क। रिज़र्व बैंक ने तब कम से कम 8 अरब डॉलर बेचकर रुपया थामा था।
फिर मार्च आया, होर्मुज़ बंद हुआ, कच्चा तेल 118 डॉलर पार गया, और रुपया 94 के पार। रिज़र्व बैंक के डॉलर बेचने की एक सीमा है; भंडार घटता है। डॉलर लाने का दूसरा रास्ता यह है कि प्रवासियों को उनकी बचत भारतीय बैंकों में रखने का लालच दिया जाए। यही 8 जून की योजना थी, और 2013 में रुपये के संकट में भी ऐसी ही खिड़की खुली थी।
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने 2 से 4 मार्च 2026 के बीच होर्मुज़ को बंद घोषित किया, जहाँ से दुनिया की तेल-खपत का लगभग पाँचवाँ हिस्सा गुज़रता है; ऊर्जा एजेंसी ने इसे "largest supply disruption in the history" कहा।
मंगलवार 8 सितंबर को रुपया 94.84 पर बंद हुआ। यानी डॉलर आए, पर रुपया अब भी उसी जगह है जहाँ मार्च में था। योजना ने भंडार बचाया; दर नहीं बदली।
2013 की खिड़की, और उसकी क़ीमत
सितंबर 2013 में रिज़र्व बैंक ने तीन साल या उससे लंबी नई एफ़सीएनआर(बी) जमाओं के लिए स्वैप खिड़की खोली थी, तय दर 3.5 फ़ीसदी सालाना, बाज़ार से लगभग 3 फ़ीसदी सस्ती। यह ब्योरा अनंत नारायण का है, जो तब मुद्रा बाज़ार में थे; उनका लेखा एसपीजेआईएमआर ने छापा है।
उनके हिसाब से अकेली जमा-खिड़की से 26 अरब डॉलर आए और दोनों मिलाकर 34 अरब; आउटलुक बिज़नेस भी यही देता है, 26 अरब जमा से और 8 अरब उधार से। नवंबर 2013 की बिज़नेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट का शीर्षक 22.7 अरब बताता है, जो खिड़की के बीच का आँकड़ा है। फ़र्क़ यहाँ दर्ज है।
नारायण ने यह भी लिखा कि सब्सिडी जोड़ने पर भारत ने वह पैसा असल में लगभग 5 फ़ीसदी सालाना पर उठाया, तीन साल के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड से 4.35 फ़ीसदी ऊपर, और इसे "a high (if hidden) price to pay" कहा। उन दोनों खिड़कियों से जितना आया, उससे लगभग चार गुना इस बार अकेली जमा-खिड़की ने जुटा लिया।
डॉलर से रुपये तक
यहाँ वह कड़ी है जो सुर्ख़ी में नहीं दिखती। प्रवासी ने डॉलर जमा किए। बैंक ने वे डॉलर रिज़र्व बैंक को दिए और बदले में रुपये लिए। रिज़र्व बैंक के पास डॉलर का भंडार बढ़ा, यह मक़सद था। पर बैंक के पास रुपये बढ़े, और यह नतीजा था।
127 अरब डॉलर के बदले लगभग बारह लाख करोड़ रुपये बैंकों की तिजोरी में आ गए। उन्हें कर्ज़ में बदलने की रफ़्तार इतनी नहीं है। इसलिए वे "अधिशेष" हैं, और अधिशेष का मतलब है कि बैंकों के बीच एक रात का उधार सस्ता हो जाता है, रेपो दर से नीचे।
डेक्कन क्रॉनिकल ने दूसरा पहलू दर्ज किया है: इतनी आवक बैंकों के "asset side" पर नई चुनौती है, क्योंकि इस तरलता के लिए मुनाफ़े वाली जगहें ढूँढ़नी होंगी। कर्ज़, सरकारी प्रतिभूतियाँ, या नीलामी; 7 सितंबर को छह लाख करोड़ से ज़्यादा तीसरे पर गया।
रेपो 5.25, और पैसा उससे नीचे

रिज़र्व बैंक की नीतिगत दर, रेपो, 5.25 फ़ीसदी है; 3 से 5 अगस्त की बैठक में मौद्रिक नीति समिति ने उसे लगातार चौथी बार उसी स्तर पर रखा, रुख़ तटस्थ। उसके नीचे स्थायी जमा सुविधा की दर 5.00 है, ऊपर सीमांत स्थायी सुविधा 5.50।
उस बैठक का प्रस्ताव विज्ञप्ति संख्या 2026-2027/809 में है, फ़ैसला सर्वसम्मत। समिति ने 2026-27 के लिए वास्तविक वृद्धि 6.7 फ़ीसदी और उपभोक्ता महँगाई 5.0 फ़ीसदी आँकी; खाद्य और ईंधन हटाकर मूल महँगाई 4.3। प्रस्ताव की एक पंक्ति सीधे इसी अंतर पर टिकी है: महँगाई का बढ़ना "primarily on account of supply side pressures caused by food and fuel" है, और यह "not getting broad-based"।
रेपो आख़िरी बार 5 दिसंबर 2025 को बदला, जब समिति ने उसे 5.50 से घटाकर 5.25 किया; बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार 2025 में कुल कटौती 125 आधार अंक की रही।
रिज़र्व बैंक चाहता है कि बाज़ार में एक रात का ब्याज 5.25 के आसपास रहे। बैंकों के पास फ़ालतू पैसा हो तो वह 5.00 की ओर खिसकता है, क्योंकि कोई उधार लेने वाला नहीं। दर ऊपर लाने का तरीक़ा है फ़ालतू पैसा खींच लेना। यही वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो है: नीलामी में रक़म और अवधि रिज़र्व बैंक बताता है, दर बैंक बोली लगाकर तय करते हैं।
7 सितंबर की दोनों नीलामियों में कट-ऑफ़ 5.24 था, रेपो से एक शतांश नीचे। यह वही जगह है जहाँ रिज़र्व बैंक चाहता है कि दर रहे।
चौदह दिन का ढाँचा, तीस दिन की नीलामी
रिज़र्व बैंक रिवर्स रेपो को यों परिभाषित करता है: वह दर जिस पर वह सरकारी प्रतिभूतियों की ज़मानत पर बैंकों से तरलता खींचता है। स्थायी जमा सुविधा अलग है, उसमें ज़मानत नहीं ली जाती।
उसी पन्ने पर लिखा है कि अल्पकालिक तरलता मुख्य रूप से 7 दिन की नीलामी और "overnight up to 14 days" की अवधियों से सँभाली जाएगी। 7 सितंबर की नीलामी तीस दिन की थी। केंद्रीय बैंक अपने ही बताए दायरे से बाहर जाकर पैसा बाँधना चाह रहा था, और बैंकों ने उतना नहीं दिया।
32 नीलामियाँ
पीटीआई के अनुसार अगस्त से अब तक रिज़र्व बैंक 32 ऐसी नीलामियाँ कर चुका है, एक रात से चौदह दिन तक की। 4 सितंबर को तीन दिन की सात लाख करोड़ की नीलामी हुई, जिसकी विज्ञप्ति संख्या 2026-27/1032 है। 7 सितंबर की तीस दिन की नीलामी उनमें सबसे लंबी थी।
और वही सबसे कम भरी। यह संयोग नहीं है।
4 सितंबर वाली विज्ञप्ति में ब्योरा भी है: बोली की खिड़की सुबह 9:30 से 10:00 तक, वापसी 7 सितंबर को। नियम 13 फ़रवरी 2020 की विज्ञप्ति 2019-2020/1947 से चलते हैं।
नीलामियों की यह झड़ी ख़ुद एक संकेत है। जब व्यवस्था संतुलित हो, रिज़र्व बैंक महीनों तक कोई वीआरआरआर नहीं करता; पाँच हफ़्तों में बत्तीस नीलामियों का मतलब है कि पैसा रोज़ हिसाब से बाहर है और रोज़ खींचना पड़ रहा है। अवधियाँ भी बताती हैं कि केंद्रीय बैंक टटोल रहा है: एक रात, तीन दिन, सात दिन, चौदह दिन, और अब तीस दिन। हर बार जवाब वही आया कि बैंक छोटी अवधि चाहते हैं।
बैंक तीस दिन क्यों नहीं देते
दो वजहें, दोनों बैंकरों की अपनी भाषा में पीटीआई ने दी हैं। पहली, "कम अवधि के लिए पैसा रखने में सहज": एक रात का पैसा कल वापस मिल जाता है; तीस दिन का पैसा फँस जाता है, और अगर बीच में कर्ज़ की माँग आई या कोई बड़ा भुगतान, तो बैंक को महँगा उधार लेना पड़ेगा।
दूसरी, स्वैप का वापसी-चक्र। जो डॉलर बैंकों ने रिज़र्व बैंक को दिए, वे तय अवधि के बाद वापस लेने हैं, रुपये देकर। बैंक नहीं जानते कि वह दिन कब कितनी रक़म माँगेगा। ऐसे में तीस दिन के लिए 2.59 लाख करोड़ देना उनकी हद थी।
सीडी बाज़ार का सुराग
बैंकों की लागत कहाँ गई, यह जमा-प्रमाणपत्रों में सबसे साफ़ दिखता है; ये वे काग़ज़ हैं जिन पर बैंक बड़े निवेशकों से थोक में पैसा उठाते हैं। फ़्री प्रेस जर्नल के अनुसार तीन महीने की सीडी की दर 8 जून को 7.16 फ़ीसदी थी और 3 सितंबर को 5.86, यानी 130 आधार अंक की गिरावट; एक साल की दर 50 आधार अंक गिरकर 7.02 रह गई।
अगस्त में बैंकों ने सीडी से 68,130 करोड़ रुपये उठाए, अप्रैल के 45,700 करोड़ के बाद सबसे कम। प्रवासियों का पैसा सस्ता मिले तो महँगा थोक पैसा उठाने की ज़रूरत घटती है। जेफ़रीज़ का अनुमान है कि ये जमाएँ बैंकों के लिए सालाना 10,000 से 11,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुनाफ़ा बना सकती हैं, कर-पूर्व लाभ का लगभग 2 फ़ीसदी।
आपकी ब्याज दर से रिश्ता

तीन तरह से।
जमा पर: जब बैंकों के पास फ़ालतू पैसा हो, उन्हें आपकी सावधि जमा की ज़रूरत कम होती है, और जमा की दरें नरम रहती हैं। पिछले महीनों में बैंकों की जमा-दरें घटी हैं; अधिशेष उसकी एक वजह है। अप्रैल 2026 की अपस्टॉक्स की सूची में स्टेट बैंक की दरें 3.05 से 6.40 फ़ीसदी थीं, एचडीएफ़सी और आईसीआईसीआई की 2.75 से 6.50।
कर्ज़ पर: फ़ालतू पैसा कर्ज़ सस्ता करने का दबाव बनाता है, पर बैंक तब तक नहीं बढ़ाते जब तक माँग न हो। अगस्त में कारों की खुदरा बिक्री 16 फ़ीसदी बढ़ी; वह माँग है। पर बारह लाख करोड़ खपाने के लिए इतनी माँग कम पड़ती है।
रेपो पर: मौद्रिक नीति समिति ने चार बैठकों से दर नहीं बदली। अधिशेष उसकी एक वजह है: जब बाज़ार में पैसा पहले से रेपो से नीचे मिल रहा हो, तो रेपो घटाने का असर कम दिखता है, और बढ़ाने का सवाल नहीं क्योंकि रुपया कमज़ोर है। अगली बैठक अक्टूबर में है।
जो सवाल बचे हैं
11 सितंबर को एफ़सीएनआर(बी) के स्वैप की आख़िरी तारीख़ है; उसके बाद पता चलेगा कि 127 अरब में से कितने डॉलर वास्तव में रुपये में बदले गए और कितने बैंकों ने अपने पास रखे। कंपनियों और बैंकों के उधार की खिड़की दिसंबर तक है; उससे और रुपये आएँगे।
एक हिसाब कहीं छपा नहीं है: इन जमाओं का ब्याज और हेजिंग की वह लागत जो रिज़र्व बैंक ने उठाई, दोनों का जोड़ ही योजना की असली क़ीमत है। 2013 के लिए वह हिसाब सालों बाद बाहर से लगा।
और वह सवाल जिसका जवाब किसी विज्ञप्ति में नहीं है: जब स्वैप की अवधि पूरी होगी और बैंकों को डॉलर वापस लेने होंगे, तब रुपया कहाँ होगा। 8 जून को योजना बनी तब रुपया 94 के आसपास था; 8 सितंबर को 94.84 है। बीच में 136 अरब डॉलर आए।
स्रोतपीटीआई, 7 सितंबर 2026 की दोनों नीलामियाँ, रिज़र्व बैंक, विशेष स्वैप सुविधा में 31 अगस्त तक की आवक, रिज़र्व बैंक, 4 सितंबर की 3-दिवसीय नीलामी की घोषणा, गल्फ़ न्यूज़, समय-सीमा आगे लाने का फ़ैसला, अगस्त 2026, ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स, रुपये का जनवरी 2026 का रिकॉर्ड निचला स्तर, रिज़र्व बैंक, स्वैप सुविधा पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल: पात्रता, न्यूनतम अवधि, स्वैप की अधिकतम अवधि, रिज़र्व बैंक, मौद्रिक नीति समिति का प्रस्ताव, 5 अगस्त 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/809, रिज़र्व बैंक, मौद्रिक नीति ढाँचा: रेपो, रिवर्स रेपो, एसडीएफ़, एमएसएफ़ और गलियारे की परिभाषाएँ, रिज़र्व बैंक, 1 अगस्त 2026 की विज्ञप्ति: 31 जुलाई तक की आवक, द ट्रिब्यून, 2 सितंबर 2026: 21 से 31 अगस्त के दस दिनों की उछाल, फ़्री प्रेस जर्नल, जमा-प्रमाणपत्रों की दरें और बैंकों की लागत, सितंबर 2026, अनंत नारायण का लेखा, 2013 की एफ़सीएनआर(बी) स्वैप खिड़की, एसपीजेआईएमआर, आउटलुक बिज़नेस, 2013 और 2026 की खिड़कियों की तुलना, एमयूएफ़जी रिसर्च, 8 जून 2026 का नोट: हेजिंग लागत और स्वैप दरें, ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, 28 अगस्त 2026 तक, डेक्कन क्रॉनिकल, स्वैप सुविधा की आवक और बैंकों के सामने की चुनौती, अपस्टॉक्स, अप्रैल 2026 में बड़े बैंकों की सावधि जमा दरें, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 5 दिसंबर 2025 की रेपो कटौती