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जीडीपी पर जो सबसे बड़ा आरोप लगा, वह दो अलग शृंखलाओं की तुलना पर टिका था

पूर्व वित्त सचिव ने कहा कि असली वृद्धि 2.6 फ़ीसदी है, 7.8 नहीं। जिन दो संख्याओं से उन्होंने यह निकाला, वे दो अलग आधार वर्षों की हैं। पर उनका एक दूसरा सवाल अब भी खुला है।

मुंबई का बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज भवन
तस्वीर: नियंत शेखर, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

एक सितंबर को दो चीज़ें एक साथ हुईं।

सरकार ने बताया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 फ़ीसदी की वास्तविक दर से बढ़ी।

और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने राष्ट्रीय लेखा की एक नई शृंखला जारी की, जिसका आधार वर्ष 2022-23 है।

अगले कुछ दिनों में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह वृद्धि दर सही नहीं है। उनके मुताबिक़ मौजूदा क़ीमतों पर वृद्धि 2.6 फ़ीसदी थी और वास्तविक रूप में लगभग शून्य।

उन्होंने पूछा कि छह लाख करोड़ रुपये कहाँ गए।

यह आरोप गंभीर है और जाँचा जा सकता है। इस लेख में वही किया गया है।

नतीजा दो हिस्सों में है। उनका एक दावा जाँच में नहीं टिकता। उनका दूसरा सवाल जाँच में टिकता है और उसका जवाब अभी किसी ने नहीं दिया।

आधार वर्ष होता क्या है

नॉर्थ ब्लॉक, जहाँ वित्त मंत्रालय बैठता है
तस्वीर: मुकुलफ़ैज़, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

पहले उस चीज़ को समझ लीजिए जिस पर यह पूरा विवाद टिका है।

अर्थव्यवस्था की वृद्धि नापने के लिए क़ीमतों का असर हटाना पड़ता है। अगर किसी साल सिर्फ़ महँगाई बढ़ी और उत्पादन उतना ही रहा, तो रुपयों में हिसाब बड़ा दिखेगा जबकि सचमुच कुछ नहीं बढ़ा।

इसलिए एक साल चुना जाता है और उस साल की क़ीमतों को आधार मानकर बाक़ी सालों का हिसाब लगाया जाता है। वही आधार वर्ष है।

आधार वर्ष समय-समय पर बदलना पड़ता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था की बनावट बदलती है। जो उद्योग दस साल पहले नहीं थे, वे अब हैं। जो चीज़ें लोग तब ख़रीदते थे, अब कुछ और ख़रीदते हैं।

भारत की शृंखला ग्यारह साल से 2011-12 के आधार पर चल रही थी। नई शृंखला का आधार 2022-23 है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सलाह यह रहती है कि आधार वर्ष हर पाँच साल में बदला जाए। ग्यारह साल उससे दोगुने से ज़्यादा हैं।

इतने लंबे अंतराल की एक क़ीमत होती है। जब आधार पुराना पड़ जाता है, तो जिन चीज़ों का वज़न बदल चुका है वे ग़लत वज़न से गिनी जाती रहती हैं। और जब आख़िरकार बदलाव होता है, तो सारा सुधार एक साथ आता है और बड़ा दिखता है।

अब वह गणित

गर्ग ने जो निष्कर्ष निकाला, वह दो संख्याओं की तुलना से निकला।

एक संख्या 86.05 लाख करोड़ रुपये की है, जो पुरानी शृंखला के हिसाब से लगाई गई थी।

दूसरी 88.27 लाख करोड़ रुपये की, जो नई शृंखला की है।

इन दोनों का अंतर निकालकर वृद्धि दर निकाली जाए तो वह छोटी आती है।

पर यह तुलना नहीं की जा सकती।

क्यों नहीं की जा सकती

क्योंकि दोनों संख्याएँ अलग-अलग तरीक़े से बनी हैं।

नई शृंखला में सिर्फ़ आधार वर्ष नहीं बदलता। आँकड़े जुटाने के स्रोत बदलते हैं, कुछ क्षेत्रों की गणना का तरीक़ा बदलता है, और कुछ ऐसी गतिविधियाँ जुड़ती या हटती हैं जो पहले शामिल नहीं थीं।

इसलिए एक ही साल की जीडीपी दोनों शृंखलाओं में अलग निकलती है। यह कोई ग़लती नहीं है, यह शृंखला बदलने का स्वाभाविक नतीजा है।

तो अगर आप पुरानी शृंखला की एक संख्या और नई शृंखला की दूसरी संख्या लेकर उनका अंतर निकालेंगे, तो जो मिलेगा वह वृद्धि नहीं होगी। वह दोनों तरीक़ों का फ़र्क़ होगा।

इसे रोज़मर्रा की मिसाल से समझिए। मान लीजिए किसी बच्चे की लंबाई पिछले साल एक तराज़ू से नापी गई और इस साल दूसरे से, और दूसरा तराज़ू पहले से थोड़ा अलग है।

अगर आप दोनों संख्याओं का अंतर निकालकर कहें कि बच्चा कितना बढ़ा, तो उसमें बच्चे की बढ़त भी होगी और तराज़ू का फ़र्क़ भी। दोनों को अलग किए बिना जवाब नहीं मिलेगा।

सही तरीक़ा यह है कि दोनों साल एक ही तराज़ू से नापे जाएँ।

एक ही शृंखला में हिसाब क्या कहता है

अब वही हिसाब सही तरीक़े से लगाइए, यानी दोनों तिमाहियों को नई शृंखला पर रखकर।

नई शृंखला में 2025-26 की जून तिमाही में मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 80.00 लाख करोड़ रुपये थी।

2026-27 की जून तिमाही में वह 88.27 लाख करोड़ रुपये है।

यह 10.3 फ़ीसदी की वृद्धि बनती है।

अब स्थिर क़ीमतों पर, यानी 2022-23 की क़ीमतों पर। पिछली जून तिमाही में 75.46 लाख करोड़, इस जून तिमाही में 81.36 लाख करोड़।

यह 7.8 फ़ीसदी बनता है, जो सरकार का बताया आँकड़ा है।

तो 7.8 वाली संख्या अपनी ही शृंखला के भीतर सही बैठती है।

पर एक सवाल बचा रहता है

अगर यहीं रुक जाएँ तो लेख अधूरा रहेगा, क्योंकि गर्ग ने एक और बात कही थी और वह अब भी खड़ी है।

नई शृंखला में 2023-24 की जीडीपी पुरानी शृंखला के मुक़ाबले क़रीब बारह लाख करोड़ रुपये कम बैठती है।

यह छोटी बात नहीं है।

गर्ग का सवाल यह है कि इतनी बड़ी कमी क्यों आई, और उसका ब्योरा क्या है।

यह सवाल पहले वाले सवाल से अलग है। पहला अंकगणित का था और वह ग़लत निकला। दूसरा पारदर्शिता का है और उसका जवाब अभी नहीं आया है।

यह सवाल जायज़ क्यों है

आधार वर्ष बदलने पर संख्याओं का बदलना अपेक्षित है। इसमें कुछ अनोखा नहीं।

अपेक्षित यह भी है कि बदलाव के साथ एक दस्तावेज़ आए जो बताए कि किस क्षेत्र में कितना अंतर आया और क्यों।

यह ब्योरा इसलिए ज़रूरी है कि पिछले सालों की सारी तुलनाएँ इसी पर टिकी हैं। सरकार का क़र्ज़ जीडीपी के अनुपात में नापा जाता है। राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के प्रतिशत में तय होता है। कर संग्रह की तुलना जीडीपी से होती है।

अगर जीडीपी की संख्या पीछे की तारीख़ से बदल जाए, तो ये सारे अनुपात बदल जाते हैं।

इसलिए यह सवाल तकनीकी नहीं है। वह इस बात का है कि पिछले बरसों का हिसाब अब किस आधार पर पढ़ा जाए।

एक और वजह से यह ज़रूरी है। भारत का जीडीपी आँकड़ा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, रेटिंग एजेंसियों और विदेशी निवेशकों के फ़ैसलों में लगता है।

जब संख्या बड़े पैमाने पर बदले और उसका ब्योरा न आए, तो उसका असर सिर्फ़ घरेलू बहस पर नहीं पड़ता। वह उस भरोसे पर पड़ता है जो किसी देश के आँकड़ों पर बाहर बनता है।

यह भरोसा बनने में बरसों लगते हैं और उसे बनाए रखने का सबसे सस्ता तरीक़ा यही है कि हर बदलाव के साथ उसका हिसाब भी छपे।

एक तीसरा संकेत, उसी दिन के अख़बार में

कोलकाता का एक बाज़ार। असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा किसी बही-खाते में दर्ज नहीं होता
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

उसी दिन के कारोबार पन्नों पर एक और ख़बर थी।

भारतीय उद्योग परिसंघ के एक सर्वेक्षण में आधे भारतीय कंपनियों ने कहा कि व्यापक स्तर की वृद्धि पूरी तरह उनके अपने कारोबार में नहीं उतर रही।

यह आँकड़ा जीडीपी की गणना पर सवाल नहीं उठाता। कंपनियाँ अपनी बिक्री के बारे में बता रही हैं, राष्ट्रीय लेखा के बारे में नहीं।

पर यह एक ऐसा संकेत है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

अर्थव्यवस्था के बारे में जो हिसाब बनता है, उसमें बहुत कुछ ऐसा है जो किसी एक कंपनी के अनुभव में नहीं आता। सरकारी ख़र्च, कृषि, असंगठित क्षेत्र, और वे सेवाएँ जिनका कोई बही-खाता नहीं होता।

फिर भी जब आधी कंपनियाँ कहें कि उन्हें वृद्धि महसूस नहीं हो रही, तो सवाल यह बनता है कि वह वृद्धि किन हिस्सों में हो रही है।

बेरोज़गारी वाला हिस्सा

उसी दिन एक और लेख था, जिसका विषय भारत के बेरोज़गारी आँकड़ों की उलझन थी।

भारत में रोज़गार नापने के एक से ज़्यादा तरीक़े हैं और वे अलग-अलग तस्वीर देते हैं।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण एक तस्वीर देता है। निजी संस्थाओं के आकलन दूसरी। और भविष्य निधि में जुड़ने वाले नए सदस्यों की संख्या तीसरी।

इनमें से हर एक कुछ अलग नाप रहा है। किसी में स्वरोज़गार शामिल है, किसी में नहीं। किसी में घर के काम में लगे लोग गिने जाते हैं, किसी में नहीं।

इसलिए तीनों में से किसी एक को उठाकर यह कहना कि रोज़गार बढ़ा या घटा, हमेशा अधूरा रहेगा।

और यहाँ भी वही दिक़्क़त लौट आती है जो जीडीपी में थी। जिन सर्वेक्षणों से रोज़गार का अनुमान निकलता है, उनका नमूना आबादी के ढाँचे पर आधारित होता है, और वह ढाँचा 2011 की जनगणना से आता है।

पंद्रह साल में लोगों का शहरों की तरफ़ जाना, उम्र का ढाँचा और परिवारों का आकार, तीनों बदले हैं। जब नमूना पुराने ढाँचे पर बना हो, तो नतीजे में वह पुरानापन चला आता है।

यह किसी सर्वेक्षण की ग़लती नहीं है। यह उस गिनती की कमी है जो होनी थी और नहीं हुई।

एक और आवाज़ उसी दिन

गाँव में एक बैंक शाखा
तस्वीर: Fredericknoronha, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

उसी दिन के कारोबार पन्ने पर एक और नाम था। पूर्व रिज़र्व बैंक गवर्नर सी रंगराजन ने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या घटाने को ग़लत दिशा का क़दम बताया।

यह विषय अलग है, पर उसका सूत्र वही है। ग्रामीण इलाक़ों में क़र्ज़ कहाँ से जा रहा है और कितना, यह भी एक ऐसा आँकड़ा है जिसका जवाब आसानी से नहीं मिलता।

एक ही दिन के कारोबार पन्नों पर चार अलग विषय थे और चारों के नीचे एक ही सवाल था: जो हो रहा है, उसे हम नाप कैसे रहे हैं।

यह संयोग नहीं है। यह किसी अर्थव्यवस्था के उस मोड़ की निशानी है जहाँ आँकड़े जुटाने का ढाँचा उस अर्थव्यवस्था की रफ़्तार से पीछे रह गया हो।

भारत की असली दिक़्क़त क्या है

इन तीनों बातों को साथ रखिए तो जो तस्वीर बनती है, वह किसी साज़िश की नहीं है।

वह यह है कि भारत के आर्थिक आँकड़ों में देरी, संशोधन और तरीक़े के बदलाव इतने ज़्यादा हैं कि उन पर बहस करना मुश्किल हो जाता है।

आधार वर्ष ग्यारह साल बाद बदला। इतने लंबे अंतराल का मतलब यह है कि जब वह बदलता है तो झटका बड़ा लगता है। अगर यह पाँच साल में होता, तो हर बार का बदलाव छोटा होता।

जनगणना पंद्रह साल से नहीं हुई, और आबादी के अनुमान उसी पुरानी गिनती पर चल रहे हैं। बहुत से आर्थिक सर्वेक्षणों का नमूना उसी जनगणना से निकलता है।

तो एक ही समय में कई बुनियादी आँकड़े या तो पुराने हैं या बदल रहे हैं।

बहस किस तरफ़ मुड़ गई

इस पूरे मामले में जो हुआ, वह भारत की सार्वजनिक बहस के बारे में भी कुछ बताता है।

गर्ग के बयान के बाद वाणिज्य मंत्री ने उनकी और एक अन्य अर्थशास्त्री की आलोचना की। जवाब में गर्ग ने अपनी बात दोहराई और कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़ बाद में उन्होंने वृद्धि दर के बारे में अलग आकलन भी रखा।

यानी बहस तकनीकी सवाल से हटकर व्यक्तियों पर आ गई।

यह दोनों तरफ़ से हुआ, और इसका नुक़सान एक ही है। जिस सवाल का जवाब एक तालिका से मिल सकता था, वह अब पक्ष चुनने का सवाल बन गया।

आँकड़ों की बहस का यही सबसे बड़ा ख़तरा है। जब वह राजनीतिक हो जाती है, तो जो लोग तकनीकी सुधार सुझा सकते हैं वे चुप हो जाते हैं, क्योंकि उनकी बात किसी न किसी खेमे में गिन ली जाएगी।

इसे कैसे पढ़ें

इस पूरे विवाद से एक पाठक के लिए तीन बातें निकलती हैं।

पहली, किसी वृद्धि दर को पढ़ते समय यह देखिए कि दोनों संख्याएँ एक ही शृंखला की हैं या नहीं। शृंखला बदलने के बाद के महीनों में यह ग़लती सबसे ज़्यादा होती है, और वह किसी की बदनीयती से नहीं, जल्दबाज़ी से होती है।

दूसरी, संशोधन होना अपने आप में गड़बड़ी नहीं है। हर देश अपने आँकड़े संशोधित करता है और यह बेहतर तरीक़ों का नतीजा होता है। जो चीज़ ज़रूरी है वह संशोधन का ब्योरा है।

तीसरी, जब कोई कहे कि आँकड़ा ग़लत है, तो उससे यह पूछा जाना चाहिए कि उसका अपना हिसाब किस शृंखला पर टिका है। और जब सरकार कोई नई शृंखला जारी करे, तो उससे यह पूछा जाना चाहिए कि पुरानी संख्याएँ कितनी और क्यों बदलीं।

दोनों सवाल एक ही ईमानदारी से पूछे जाने चाहिए।

जो अभी बाक़ी है

गर्ग की 2.6 फ़ीसदी वाली गणना जाँच में नहीं टिकती, और यह इस लेख का पहला निष्कर्ष है।

उनका बारह लाख करोड़ वाला सवाल जाँच में टिकता है, और यह दूसरा निष्कर्ष है।

इन दोनों को एक साथ छापना ज़रूरी है, क्योंकि इस बहस में ज़्यादातर लोग एक को उठाकर दूसरे को छोड़ देते हैं।

जिनका काम सरकार का बचाव है वे पहली बात दोहराते हैं। जिनका काम आलोचना है वे दूसरी।

पाठक के लिए दोनों काम की हैं।

जो एक दस्तावेज़ से ख़त्म हो जाता

अंत में वही बात, जो इस अंक के कुछ और लेखों में भी आई है।

सांख्यिकी मंत्रालय अगर नई शृंखला के साथ एक ऐसा दस्तावेज़ जारी करे जिसमें क्षेत्रवार बताया हो कि किस उद्योग में कितना अंतर आया और उसका कारण क्या है, तो यह पूरी बहस अलग शक्ल ले लेती।

तब आलोचक उस दस्तावेज़ पर बहस करते और सरकार उसी से जवाब देती।

ऐसा दस्तावेज़ बनता ज़रूर होगा, क्योंकि उसके बिना नई शृंखला बन ही नहीं सकती। सवाल उसके बनने का नहीं, उसके छपने का है।

जब तक वह नहीं छपता, हर बार यही होगा। कोई एक संख्या उठाएगा, कोई दूसरी, और पाठक के सामने दो दावे रह जाएँगे जिनमें से किसी को वह ख़ुद नहीं जाँच सकता।

इस अख़बार ने इस बार जाँच लिया, और उसमें एक दावा ग़लत निकला और एक सवाल सही। अगली बार यह काम पाठक ख़ुद कर सके, इसके लिए वह तालिका चाहिए।

स्रोतसांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, राष्ट्रीय लेखा, द हिंदू कारोबार, 7 सितंबर 2026 के अंक की रिपोर्टें, भारतीय उद्योग परिसंघ, उद्योग सर्वेक्षण

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।