भारत पन्ना
पैसा

एक जापानी एजेंसी ने भारत को 'A-' दिया है; सुर्ख़ी कहती है 35 साल बाद, वही लेख कहता है 1988 के बाद, और 1988 से 2026 अड़तीस साल होते हैं

जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने 2 सितंबर को भारत की रेटिंग BBB+ से A- की, बिना माँगे और बिना फ़ीस के। तीन बड़ी एजेंसियाँ, एसऐंडपी, मूडीज़ और फ़िच, भारत को अब भी 'कचरा' दर्जे से एक या दो पायदान ऊपर रखती हैं। रेटिंग नापती क्या है, चौथी एजेंसी ऊपर क्यों गई, और पिछली 'A' असल में कब गई थी: दस्तावेज़ों से गिनती।

टोक्यो का मारुनौची इलाक़ा, जापान का वित्तीय ज़िला। जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी यहीं से भारत समेत देशों की साख आँकती है।
तस्वीर: Jacob Ehnmark from Tokyo, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

द हिंदू ने 8 सितंबर को एक व्याख्या छापी। उसकी सुर्ख़ी: "35 साल बाद भारत की 'A' रेटिंग में वापसी की वजह क्या है?" उसका पहला वाक्य: "1988 की शुरुआत के बाद पहली बार।"

1988 से 2026 तक 38 साल होते हैं।

यह ग़लती छोटी है, और यह लेख उस पर नहीं टिका है। पर यह उस सवाल का दरवाज़ा है जो बड़ा है: भारत की पिछली 'A' असल में कब गई, और अब लौटी है तो किसके यहाँ लौटी है।

2 सितंबर को क्या हुआ

जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी, जिसे जेसीआर कहते हैं, ने भारत की विदेशी मुद्रा और स्थानीय मुद्रा, दोनों की दीर्घकालिक जारीकर्ता रेटिंग BBB+ से बढ़ाकर A- कर दी। आउटलुक स्थिर। साथ में "कंट्री सीलिंग", यानी भारत की किसी भी संस्था को मिल सकने वाली अधिकतम विदेशी-मुद्रा रेटिंग, एक पायदान ऊपर A हुई।

विज्ञप्ति का नंबर 26-I-0062 है। उस पर दो विश्लेषकों के नाम हैं, हिरोशी तोनेगावा और शिंतारो इतो, और नीचे एक तारीख़ और: "रेटिंग असाइनमेंट डेट: 28 अगस्त 2026"। फ़ैसला अगस्त के आख़िरी हफ़्ते में हो चुका था; दुनिया को 2 सितंबर को बताया गया।

एजेंसी ने साफ़ लिखा कि यह "अनचाही" रेटिंग है: भारत सरकार ने न माँगी, न इसके लिए भुगतान किया। एजेंसी ने सार्वजनिक आँकड़ों से ख़ुद यह आकलन किया।

बिना माँगे, बिना फ़ीस: दस्तावेज़ की भाषा

"अनचाही" शब्द का एक तय मतलब है, और विज्ञप्ति के दूसरे पन्ने पर वह पूरा लिखा है। पहला वाक्य: "उक्त क्रेडिट रेटिंग अनचाही हैं।" फिर नियम: सॉवरेन को छोड़कर हर अनचाही रेटिंग के आगे एजेंसी "p" लगाती है; देशों की रेटिंग पर "p" नहीं लगता, पर लिखकर बताना होता है कि वह अनचाही है। यह जेसीआर की आचार-संहिता का अनुच्छेद 38 है, जिसके अनुसार कंपनियों की अनचाही रेटिंग जारीकर्ता की सहमति से छपती है और देशों की रेटिंग को उस सहमति से भी छूट है।

अमेरिकी नियामक एसईसी के फ़ॉर्म में, जो विज्ञप्ति के साथ नत्थी है, एजेंसी ने लिखा है कि इस रेटिंग के लिए उसे "जारीकर्ता, अंडरराइटर, जमाकर्ता या प्रायोजक" में से किसी से भुगतान नहीं मिला। आँकड़े दो जगह से आए: सरकार के छपे दस्तावेज़ और स्वतंत्र संस्थाओं की सांख्यिकी।

उसी दस्तावेज़ के अस्वीकरण में एजेंसी लिखती है कि "सिद्धांततः जेसीआर जारीकर्ताओं से रेटिंग शुल्क लेती है।" भारत उस सिद्धांत का अपवाद है।

एजेंसी की अपनी सूची क्या कहती है

जेसीआर की वेबसाइट पर भारत का रेटिंग-इतिहास है, और विज्ञप्ति के आख़िरी पन्ने पर वही तालिका छपी है। यह अकेला दस्तावेज़ है जिससे "कितने साल बाद" का सवाल हल होता है।

29 जून 1999: BBB। 2 अगस्त 2007: BBB+, स्थिर। 13 दिसंबर 2013: BBB+, आउटलुक नकारात्मक। 13 फ़रवरी 2015: BBB+, आउटलुक स्थिर। फिर 2016, 2017, 2019, 2020, 2022, 2023 और 18 अप्रैल 2025 को हर बार BBB+ की पुष्टि। 2 सितंबर 2026: A-, स्थिर।

जेसीआर के अपने खाते में भारत 1999 से निवेश-ग्रेड में था, 2007 से BBB+ पर, और 19 साल बाद अब पहली बार A में आया है। "35 साल" जेसीआर के इतिहास का आँकड़ा नहीं है; वह किसी और एजेंसी के इतिहास से आया है।

सत्रह महीने पहले वही एजेंसी

18 अप्रैल 2025 की विज्ञप्ति, नंबर 25-I-0010, में जेसीआर ने BBB+ रखी थी और यह भी गिनाया था कि ऊपर क्यों नहीं। रेटिंग "बड़े राजकोषीय घाटे, सुधार की राह पर चल रही वित्तीय प्रणाली और ढाँचागत विकास की कमी" से बँधी थी। मध्यम अवधि की वृद्धि का अनुमान "साढ़े छह फ़ीसदी के आसपास" था। अमेरिकी टैरिफ़ नीति पर "ध्यान देने" की बात थी।

उस विज्ञप्ति के आँकड़े: 2024 में सांकेतिक जीडीपी 3.9 खरब डॉलर, क्रय-शक्ति समता पर प्रति व्यक्ति 11,000 डॉलर; सरकारी बैंकों का सकल फँसा कर्ज़ सितंबर 2024 के अंत में 3.3 फ़ीसदी; सरकारी बैंकों के पास वाणिज्यिक बैंकों की 70 फ़ीसदी संपत्ति; विदेशी मुद्रा भंडार अल्पकालिक विदेशी कर्ज़ का 4.6 गुना; अप्रैल-दिसंबर 2024-25 में चालू खाता घाटा 20.9 फ़ीसदी बढ़कर 37 अरब डॉलर। और सरकार का एक घोषित लक्ष्य दर्ज था: केंद्र का कर्ज़ 2030-31 के अंत तक जीडीपी के 50 फ़ीसदी के आसपास।

अप्रैल 2025 में कंट्री सीलिंग A- पर "बरक़रार" रखी गई थी। सितंबर 2026 में वह A हुई।

सत्रह महीनों में क्या बदला

दोनों विज्ञप्तियों को साथ रखने पर बदलाव तीन अंकों में दिखता है। फँसा कर्ज़: सरकारी बैंकों में 3.3 फ़ीसदी से पूरे बैंकिंग क्षेत्र में 1.8 फ़ीसदी, मार्च 2026 के अंत में। वृद्धि: "साढ़े छह के आसपास" के अनुमान से 2025-26 में 7.7 फ़ीसदी की दर्ज वृद्धि। घाटा: 4.4 फ़ीसदी का लक्ष्य था, और 4.4 फ़ीसदी हुआ।

2026 की विज्ञप्ति में दो बातें ऐसी हैं जो 2025 में नहीं थीं। एक, दिवाला संहिता, रिज़र्व बैंक की कड़ी निगरानी और सरकार की पूँजी से सरकारी बैंकों की संपत्ति-गुणवत्ता "पर्याप्त रूप से सुधरी" है। दो, डिजिटल भुगतान और खाते में सीधे लाभ भेजने से "अनौपचारिक आर्थिक गतिविधि ज़्यादा दिखने लगी" है। विश्लेषकों में भी एक बदलाव है: 2025 में तोनेगावा के साथ शिन्या इवासाकी थे, 2026 में शिंतारो इतो।

पिछली 'A' किसकी थी

पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन.के. सिंह ने पीटीआई से कहा कि यह "35 साल से ज़्यादा" बाद 'A' की वापसी है, और पिछली 'A' मूडीज़ की A2 थी, 1988 की, जो 1990-91 के भुगतान-संतुलन संकट में गई।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने नवंबर 2017 में मूडीज़ का यही इतिहास लिखा था: 1988 में A2, 1990 में दो पायदान घटकर Baa1। मर्केटस सेंटर की "1991 प्रोजेक्ट" समय-रेखा के अनुसार अगस्त से नवंबर 1990 के बीच मूडीज़ ने भारत को "क्रेडिट वॉच" पर रखा था, और 7 मार्च 1991 को एसऐंडपी ने दीर्घकालिक रेटिंग घटाकर BBB- कर दी, अल्पकालिक A-।

गिनती: 35, 36 या 38

अब गिनती कीजिए। A2 1988 में थी, यह सही है। पर वह 1990 के डाउनग्रेड तक रही। भारत की आख़िरी 'A' 1990 में गई: 36 साल। "1988 के बाद पहली बार" कहें तो 38। "35 साल से ज़्यादा" कहें तो सही, और एन.के. सिंह ने यही कहा। सिर्फ़ "35" कहें तो किसी भी गिनती में नहीं बैठता।

एक बारीकी और। मार्च 1991 में एसऐंडपी ने जो अल्पकालिक रेटिंग दी, वह भी "A-" कहलाती है, पर वह अलग पैमाना है, महीनों के कर्ज़ का। दीर्घकालिक 'A' की बात करें तो मूडीज़ का A2 ही आख़िरी है, और उसकी विदाई 1990 की है।

रेटिंग नापती क्या है

कोलकाता में भारतीय रिज़र्व बैंक की इमारत। सरकार का ज़्यादातर कर्ज़ देश के भीतर रुपये में उठता है, जहाँ विदेशी रेटिंग सीधे नहीं चलती।
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

द हिंदू का यह वाक्य पूरी बहस की कुंजी है: सॉवरेन रेटिंग "देश की रेटिंग नहीं है; वह देश की अपना कर्ज़ चुकाने की क्षमता और इच्छा की रेटिंग है।" अख़बार ने उसकी तुलना सिबिल के व्यक्तिगत क्रेडिट स्कोर से की है। वित्त मंत्रालय की 2 सितंबर की विज्ञप्ति की परिभाषा लगभग वही है: "किसी देश की सरकार की ऋण चुकाने की क्षमता और वित्तीय साख का स्वतंत्र मूल्यांकन।"

रेटिंग यह नहीं कहती कि देश अमीर है या ग़रीब, या उसकी अर्थव्यवस्था अच्छी है या बुरी। वह कहती है कि जो पैसा इस सरकार को उधार दिया जाएगा, वह समय पर लौटने की कितनी संभावना है। और वह बताती है कि उधार देने वाला कितना ब्याज माँगेगा।

जेसीआर अपने अस्वीकरण में रेटिंग को "राय का बयान" कहती है, "तथ्य का बयान नहीं", और जोड़ती है कि यह "चूक की संभावना का अनुमान" भी नहीं है। एसईसी के फ़ॉर्म में उसके छह पैमाने गिने हैं: आर्थिक आधार, राजकोषीय आधार, बाहरी स्थिति, सामाजिक-राजनीतिक आधार और आर्थिक नीति, सहायता देने वालों का रुख़, और कर्ज़ चुकाने में वरीयता का क्रम।

जेसीआर ने कारण क्या गिनाए

विज्ञप्ति का पहला अनुच्छेद यह है: भारतीय अर्थव्यवस्था ने "लगभग 7 फ़ीसदी की ऊँची वृद्धि दर" बनाए रखी है, जिसमें मज़बूत निजी खपत और सार्वजनिक निवेश का हाथ है; सरकार ने उत्पादकता बढ़ाने वाली नीतियाँ चलाई हैं, जिनमें डिजिटल सार्वजनिक ढाँचा और जीएसटी गिनाए गए; बैंकों का फँसा कर्ज़ 2 फ़ीसदी से नीचे आ गया है, जिसमें दिवाला संहिता और रिज़र्व बैंक की निगरानी की भूमिका बताई गई है। ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की पूँजी भी मज़बूत हुई है।

आँकड़े जो विज्ञप्ति में हैं: 1.4 अरब से ज़्यादा आबादी, 3.9 खरब डॉलर का सांकेतिक जीडीपी, वित्त वर्ष 2026 में 7.7 फ़ीसदी वास्तविक वृद्धि, जिसे आयकर और जीएसटी दरों में कटौती से बढ़ी निजी खपत का सहारा मिला; 2027 में 6 फ़ीसदी से ऊपर का अनुमान। मुद्रास्फीति 2026 की शुरुआत से बढ़ी है, ख़राब मौसम से खाने की क़ीमतें और पश्चिम एशिया के तनाव से ऊर्जा, पर वह रिज़र्व बैंक के दायरे में है।

और चिंता का एक वाक्य: राजकोषीय घाटा ऊँचा है, जिसकी वजह "जटिल अंतर-सरकारी राजकोषीय संबंध", राज्यों की असमानता घटाने वाला हस्तांतरण ढाँचा, और चुनावी चक्र हैं। केंद्र और राज्यों का बँटवारा, और हर चुनाव से पहले का ख़र्च।

घाटे और कर्ज़ पर एजेंसी के अपने अंक

विज्ञप्ति के तीसरे अनुच्छेद में वे अंक हैं जिन्हें अख़बारों ने कम छापा। केंद्र का राजकोषीय घाटा 2024-25 के 4.7 फ़ीसदी से घटकर 2025-26 में जीडीपी का 4.4 फ़ीसदी रहा, और पूँजीगत ख़र्च ऊँचा बना रहा। केंद्र सरकार का कर्ज़ 2025-26 के अंत में जीडीपी का 56.1 फ़ीसदी था, और एजेंसी को उसमें "धीरे-धीरे गिरावट" की उम्मीद है।

तीसरा अंक नहीं, एक वाक्य है: "राज्यों समेत सामान्य सरकार का कर्ज़ और उससे जुड़ा ब्याज का बोझ ऊँचा बना हुआ है।" और एक शर्त, जिस पर एजेंसी नज़र रखेगी: क्या सरकारी पूँजीगत ख़र्च निजी निवेश को खींच पाता है और अर्थव्यवस्था की सरकारी ख़र्च पर निर्भरता घटाता है।

वृद्धि के अंक में एक विरोध है। जेसीआर की विज्ञप्ति 2025-26 की वास्तविक वृद्धि 7.7 फ़ीसदी लिखती है; वित्त मंत्रालय की उसी दिन की विज्ञप्ति, सांख्यिकी मंत्रालय के हवाले से, 7.8 फ़ीसदी, और 2026-27 की पहली तिमाही में भी 7.8। यह लेख दोनों अंक दर्ज करता है।

वित्त मंत्रालय ने क्या जोड़ा, क्या छोड़ा

2 सितंबर की शाम 6:37 बजे पीआईबी पर वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति आई। उसमें कंट्री सीलिंग की एक वाक्य की व्याख्या है: छत ऊपर जाने से "निजी और सरकारी कंपनियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से कम ब्याज दरों पर कर्ज़ जुटाना आसान हो जाता है।" और पिछले एक साल की सूची: मॉर्निंगस्टार डीबीआरएस मई 2025 में, एसऐंडपी अगस्त 2025 में, आरऐंडआई सितंबर 2025 में।

मंत्रालय की विज्ञप्ति में दो शब्द नहीं हैं। "अनचाही" कहीं नहीं है। "35 साल" भी नहीं है। जेसीआर की विज्ञप्ति में भी "35" नहीं है, न 1988 से कोई तुलना। वह अंक दस्तावेज़ों से नहीं, एन.के. सिंह की टिप्पणी और अख़बारों से आया है।

छत किसकी है: कंट्री सीलिंग

जेसीआर की अक्टूबर 2021 की सॉवरेन रेटिंग पद्धति में कंट्री सीलिंग की परिभाषा है। वह इस बात का आकलन है कि किसी देश के अधिकारी अपनी कंपनियों के विदेशी-मुद्रा लेन-देन पर, जैसे रुपये को डॉलर में बदलने या पैसा बाहर भेजने पर, रोक लगाएँगे या नहीं। वह "देश की किसी संस्था की विदेशी-मुद्रा रेटिंग की अधिकतम सीमा" है, और "ज़्यादातर मामलों में सॉवरेन की विदेशी-मुद्रा रेटिंग से शून्य से तीन पायदान ऊपर" रखी जाती है।

भारत के लिए वह अंतर एक पायदान है: सॉवरेन A-, छत A। छत सिर्फ़ विदेशी-मुद्रा रेटिंग पर लागू होती है, रुपये के कर्ज़ पर नहीं, क्योंकि पद्धति के शब्दों में सरकारें विदेशी मुद्रा जुटाने में "स्थानीय मुद्रा के मुक़ाबले सीमित" होती हैं।

अगले दिन चार और विज्ञप्तियाँ

3 सितंबर को जेसीआर ने चार भारतीय संस्थाओं की रेटिंग BBB+ से A- की: एक्ज़िम बैंक, इंडियन रेलवे फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन, आरईसी और हुडको। चारों विज्ञप्तियों में एक ही वाक्य है: यह उन्नयन "2 सितंबर 2026 को घोषित भारत गणराज्य के रेटिंग उन्नयन के अनुरूप" है। चारों पर वही दो विश्लेषक हैं, और चारों की असाइनमेंट तारीख़ 1 सितंबर।

एक्ज़िम बैंक सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली संस्था है; आईआरएफ़सी 1986 में रेल मंत्रालय के तहत बनी और रेल के डिब्बे-इंजन पट्टे पर देने के लिए पैसा जुटाती है; आरईसी 1969 से बिजली के ढाँचे को कर्ज़ देती है; हुडको आवास और शहरी ढाँचे को। आरईसी के बॉन्ड भी A- हुए। सॉवरेन रेटिंग का असर सबसे सीधा यहीं पड़ता है: जो सरकारी कंपनियाँ जापानी बाज़ार से उधार लेती हैं, उनका पर्चा एक ही दिन में बदल गया।

बाक़ी तीन कहाँ हैं

यहाँ द हिंदू का दूसरा वाक्य आता है: ज़्यादातर एजेंसियाँ भारत को "कचरा" दर्जे से "एक या दो पायदान ऊपर" रखती हैं।

एसऐंडपी: BBB, 14 अगस्त 2025 से, जब उसने BBB- से बढ़ाया; 18 साल में उसका पहला उन्नयन, पिछला 2007 में जब भारत निवेश-ग्रेड में आया था। फ़िच: BBB-, 2006 से लगातार; 11 अगस्त 2026 को फिर वही। मूडीज़: Baa3, जून 2020 से, जब उसने घटाया था। Baa3 और BBB- एक ही पायदान हैं, निवेश-ग्रेड का सबसे नीचे का।

पैमाने पर तस्वीर यह बनती है: फ़िच और मूडीज़ सबसे नीचे के निवेश-ग्रेड पर; एसऐंडपी एक पायदान ऊपर; जेसीआर उनसे तीन पायदान ऊपर, A- पर। दूसरी जापानी एजेंसी आरऐंडआई ने 19 सितंबर 2025 को भारत को BBB से BBB+ किया था; मॉर्निंगस्टार डीबीआरएस ने मई 2025 में BBB (low) से BBB।

एसऐंडपी का अगस्त 2025: अठारह साल बाद एक क़दम

14 अगस्त 2025 को वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति ने एसऐंडपी के फ़ैसले का ब्योरा दिया: दीर्घकालिक रेटिंग BBB- से BBB, अल्पकालिक A-3 से A-2, आउटलुक स्थिर। मई 2024 में एजेंसी ने आउटलुक "स्थिर" से "सकारात्मक" किया था; उन्नयन उसके पंद्रह महीने बाद आया।

एसऐंडपी के गिनाए कारण: "जोशीली और गतिशील" वृद्धि, राजकोषीय संतुलन के प्रति सरकार की "टिकाऊ प्रतिबद्धता", ख़र्च की बेहतर गुणवत्ता, ख़ासकर पूँजीगत ख़र्च और ढाँचे पर, और मज़बूत कॉरपोरेट, वित्तीय और बाहरी बही-खाते। मुद्रास्फीति-लक्ष्य वाली मौद्रिक नीति को श्रेय दिया गया। एजेंसी ने 2021-22 से 2023-24 के बीच औसत 8.8 फ़ीसदी वास्तविक वृद्धि दर्ज की, एशिया-प्रशांत में सबसे ऊँची, और 2025-26 के लिए 6.5 फ़ीसदी का अनुमान दिया। आगे के लिए एक शर्त: "सिकुड़ता राजकोषीय घाटा और जारी सार्वजनिक निवेश" और सकारात्मक क़दमों का आधार बन सकते हैं। अमेरिकी टैरिफ़ का असर "सीमित" बताया गया।

आरऐंडआई का सितंबर 2025

19 सितंबर 2025 को रेटिंग ऐंड इन्वेस्टमेंट इन्फ़ॉर्मेशन, जापान की दूसरी एजेंसी, ने भारत को BBB से BBB+ किया, आउटलुक स्थिर। वित्त मंत्रालय ने इसे "पाँच महीनों में तीसरा उन्नयन" कहा।

आरऐंडआई का एक वाक्य मंत्रालय की विज्ञप्ति में उद्धृत है: "सरकार पूँजीगत ख़र्च बढ़ाती रही है, फिर भी मज़बूत घरेलू माँग से बढ़े कर राजस्व और सब्सिडी में कटौती की बदौलत वह राजकोषीय घाटा घटाने में कामयाब रही है।" एजेंसी ने अमेरिकी टैरिफ़ को जोखिम माना, पर अमेरिकी निर्यात पर भारत की सीमित निर्भरता से उसे संभालने लायक़ बताया। जीएसटी दरों की कटौती से राजस्व घटेगा, पर खपत बढ़ने से उसकी कुछ भरपाई होगी, यह भी लिखा।

फ़िच का अगस्त 2026: वही BBB-, और क्यों

11 अगस्त 2026 को फ़िच ने BBB- की पुष्टि की, वह रेटिंग जो उसने 2006 से नहीं बदली। रॉयटर्स के अनुसार फ़िच का अनुमान है कि 2025-26 में सामान्य सरकार, यानी केंद्र और राज्य मिलाकर, का कर्ज़ जीडीपी का 84.4 फ़ीसदी है, जबकि BBB श्रेणी के देशों का मध्यमान 57.0 फ़ीसदी। एजेंसी को 2030-31 तक यह घटकर 79 फ़ीसदी के आसपास आने की उम्मीद है, बशर्ते सांकेतिक वृद्धि 10.5 फ़ीसदी बनी रहे।

फ़िच की इसी रिपोर्ट के और अंक प्रेस इनसाइडर ने छापे: ब्याज भुगतान सरकारी राजस्व का 23.7 फ़ीसदी, BBB मध्यमान 8.4; 2026-27 में केंद्र का घाटा लक्ष्य 4.3 फ़ीसदी, केंद्र-राज्य मिलाकर 7.3; विदेशी मुद्रा भंडार 2026-27 के अंत तक 733 अरब डॉलर। फ़िच का वाक्य: "भारत के सार्वजनिक वित्त उसकी सॉवरेन साख की मुख्य कमज़ोरी बने हुए हैं।" ऊपर जाने की शर्त: ऊँची वृद्धि के साथ स्थिरता, "ख़ासकर अगर निजी निवेश मज़बूत हो"। नीचे जाने की: राजकोषीय संतुलन का रुकना, या कर्ज़ को अचानक बढ़ा देने वाला कोई झटका।

मूडीज़: 2017 का Baa2, 2020 का Baa3

मूडीज़ ने नवंबर 2017 में भारत को Baa2 किया था; बिज़नेस स्टैंडर्ड ने तभी लिखा था कि यह 1980 के दशक के A2 से अब भी नीचे है। 2 जून 2020 को एजेंसी ने वह पायदान वापस ले लिया: Baa2 से Baa3, आउटलुक नकारात्मक। मनीलाइफ़ ने विज्ञप्ति का कारण छापा: नीति बनाने वाली संस्थाओं को "अपेक्षाकृत कम वृद्धि की लंबी अवधि" के जोखिम घटाने वाली नीतियाँ बनाने और लागू करने में चुनौती होगी।

मूडीज़ ने तब साफ़ किया था कि यह फ़ैसला महामारी की वजह से नहीं है; महामारी ने उन कमज़ोरियों को "बढ़ाया" जो पहले से थीं। उसके अंक: वास्तविक वृद्धि वित्त वर्ष 2016 के 8.3 फ़ीसदी से 2019 में 4.2 फ़ीसदी। सुधारों पर उसका वाक्य: उनका क्रियान्वयन "अपेक्षाकृत कमज़ोर" रहा और उससे "साख में ठोस सुधार नहीं" हुआ। तब से मूडीज़ की रेटिंग Baa3 पर ही है।

चार अलग जवाब क्यों

क्योंकि रेटिंग राय है, गणना नहीं। हर एजेंसी के पास एक ढाँचा है जिसमें वृद्धि, कर्ज़, घाटा, विदेशी मुद्रा भंडार, संस्थाएँ और राजनीति अलग-अलग वज़न से जुड़ते हैं। एक ही 4.4 फ़ीसदी का घाटा जेसीआर की विज्ञप्ति में "ख़र्च की बेहतर गुणवत्ता" का सबूत है और फ़िच की रिपोर्ट में 84.4 फ़ीसदी कर्ज़ के आगे एक छोटा अंक। जेसीआर ने वृद्धि और बैंकों को ज़्यादा वज़न दिया; मूडीज़ और फ़िच सरकारी कर्ज़ के अनुपात और घाटे पर टिकी हैं, जो भारत में ऊँचे हैं।

एक और फ़र्क़ है: कौन किसकी सुनता है। दुनिया के बड़े बॉन्ड फ़ंड और सूचकांक तीन अमेरिकी-यूरोपीय एजेंसियों की रेटिंग पर चलते हैं। जापानी एजेंसी की रेटिंग जापानी निवेशकों और जापानी बाज़ार में उधार लेने वालों के लिए मायने रखती है। इसीलिए जेसीआर का A- भारत के लिए अच्छी ख़बर है, पर वह उस पैसे की लागत नहीं बदलता जो न्यूयॉर्क या लंदन से आता है।

किसका पैसा बचता है

अमेरिकी डॉलर का नोट। रेटिंग का असर वहाँ है जहाँ भारतीय कंपनियाँ और सरकार विदेशी मुद्रा में उधार लेती हैं।
तस्वीर: MikeSwanson, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

सरकार अपना ज़्यादातर कर्ज़ देश के भीतर रुपये में लेती है; वहाँ विदेशी रेटिंग सीधे नहीं चलती। रेटिंग का असर तीन जगह है: भारतीय कंपनियों के विदेशी बॉन्ड, जिनकी सीमा "कंट्री सीलिंग" तय करती है; विदेशी फ़ंडों का भारत में निवेश, जिनके नियम कई बार रेटिंग से बँधे होते हैं; और सरकार के विदेशी मुद्रा में लिए कर्ज़ की दर।

द हिंदू का वाक्य: इसका "भारत के भविष्य के उधार की लागत, और इस तरह करदाता के पैसे के इस्तेमाल" से सीधा रिश्ता है। कितना, यह इस पर टिका है कि कौन-सी एजेंसी ऊपर गई। जेसीआर के मामले में जवाब 3 सितंबर की चार विज्ञप्तियों में है: एक्ज़िम बैंक, आईआरएफ़सी, आरईसी और हुडको, यानी जापान से आने वाले पैसे की लागत।

जेसीआर क्या है

जेसीआर अप्रैल 1985 से काम कर रही है। उसकी वेबसाइट के अनुसार जापान में सार्वजनिक रेटिंग वाले लगभग 1,200 जारीकर्ताओं में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा को वह रेट करती है, और वित्तीय क्षेत्र में लगभग 70 फ़ीसदी को। वह "अकेली जापानी एजेंसी" है जो अमेरिका में एनआरएसआरओ के तौर पर पंजीकृत है और यूरोपीय संघ व ब्रिटेन में प्रमाणित; तुर्की, हांगकांग, इंडोनेशिया और थाईलैंड में भी मान्यता है। 200 से ज़्यादा विदेशी जारीकर्ताओं को उसने रेटिंग दी है। विज्ञप्ति पर छपा पता: जिजी प्रेस बिल्डिंग, गिंज़ा, टोक्यो।

उसकी सॉवरेन सूची के पहले पन्ने पर 18 देश हैं। कुछ अंक: इंडोनेशिया BBB+, ब्राज़ील BBB-, चीन AA-, हंगरी A- नकारात्मक आउटलुक के साथ, फ़्रांस AAA नकारात्मक आउटलुक के साथ। भारत अब A- स्थिर, हंगरी के बराबर, इंडोनेशिया से एक पायदान ऊपर।

1991 का वह मार्च

लंदन में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड। मई 1991 में भारत का 47 टन सोना गिरवी रखने के लिए यहीं भेजा गया था।
तस्वीर: Eluveitie, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

जिस डाउनग्रेड से 'A' गई थी, उसका दृश्य याद रखने लायक़ है। आउटलुक बिज़नेस के अनुसार 1991 की शुरुआत में भारत के पास 1 से 1.2 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, "दो-तीन हफ़्ते के आयात भर"। "1991 प्रोजेक्ट" की समय-रेखा 24 मई 1991 की प्रविष्टि में लिखती है: "सिर्फ़ दो हफ़्ते का भंडार", और उसी दिन 20 टन सोना, वापस ख़रीदने के विकल्प के साथ, 23.4 करोड़ डॉलर में बेचा गया।

मई 1991 में कुल 67 टन सोना गिरवी रखा गया, 47 टन बैंक ऑफ़ इंग्लैंड और 20 टन यूनियन बैंक ऑफ़ स्विट्ज़रलैंड को, और उससे लगभग 60 करोड़ डॉलर मिले; यह काम "पूरी गोपनीयता" में हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.8 अरब डॉलर के कर्ज़ का समझौता दिसंबर 1990 में ही हो चुका था। फिर 1 से 3 जुलाई 1991 के बीच रुपये का दो बार अवमूल्यन, पहले 7 से 9 फ़ीसदी, फिर 11; और 24 जुलाई को मनमोहन सिंह का बजट।

मूडीज़ की Baa1 1990 में आई, एसऐंडपी की BBB- मार्च 1991 में। उसके बाद भारत ने दीर्घकालिक 'A' नहीं देखी; निवेश-ग्रेड का सबसे नीचे का पायदान ही तीन दशक तक छत रहा।

अगस्त 2025 से अब तक

पिछले सोलह महीनों में चार उन्नयन हुए हैं: डीबीआरएस मई 2025 में, एसऐंडपी अगस्त 2025 में, आरऐंडआई सितंबर 2025 में, जेसीआर सितंबर 2026 में; इनमें दो जापानी हैं। मूडीज़ और फ़िच ने अपनी रेटिंग नहीं बदली; फ़िच का आउटलुक स्थिर है।

यही तस्वीर है: तीन बड़ी एजेंसियों में से एक ने एक क़दम बढ़ाया, दो नहीं हिलीं। चौथी ने भी एक ही क़दम बढ़ाया, पर वह पहले से उनसे ऊपर खड़ी थी, और अख़बारों ने उसे 'A' की वापसी कहा। दोनों बातें सही हैं; उनका वज़न अलग है।

जो सवाल जेसीआर ने भी पूछा

राजकोषीय घाटा। एजेंसी ने A- देते हुए भी इसे कमज़ोरी गिनाया। केंद्र का घाटा 2025-26 में जीडीपी का 4.4 फ़ीसदी रहा, 2026-27 का लक्ष्य 4.3; राज्यों का उस पर अलग, और फ़िच के अनुमान में दोनों का जोड़ 7.3 फ़ीसदी। कर्ज़ में भी दो अंक हैं: केंद्र का 56.1 फ़ीसदी, जो जेसीआर ने लिखा; केंद्र-राज्य मिलाकर 84.4, जो फ़िच ने। जेसीआर ने कहा कि वृद्धि इस कमज़ोरी को ढँकती है; फ़िच और मूडीज़ कहती हैं कि नहीं ढँकती।

अगली परीक्षा इसी अंक की है। एसऐंडपी ने अगस्त 2025 में लिखा था कि सिकुड़ता घाटा आगे के सकारात्मक क़दमों का आधार बन सकता है; अगर मूडीज़ और फ़िच का अगला क़दम ऊपर का हुआ, तो 'A' की वापसी उस बाज़ार में होगी जहाँ उसकी क़ीमत सबसे ज़्यादा है। दो एजेंसियों ने, अलग-अलग शब्दों में, एक ही शर्त लिखी है। फ़िच: "ख़ासकर अगर निजी निवेश मज़बूत हो।" जेसीआर: वह देखती रहेगी कि सरकारी पूँजीगत ख़र्च निजी निवेश को खींच पाता है या नहीं।

स्रोतजापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी, भारत की रेटिंग-सूची और इतिहास, जेसीआर की विज्ञप्ति 26-I-0062, भारत की रेटिंग A- और अनचाही रेटिंग का खुलासा, 2 सितंबर 2026, जेसीआर की विज्ञप्ति 25-I-0010, BBB+ की पुष्टि और 1999 से रेटिंग-इतिहास, 18 अप्रैल 2025, जेसीआर की सॉवरेन रेटिंग पद्धति, कंट्री सीलिंग की परिभाषा, 1 अक्टूबर 2021, जेसीआर की आचार-संहिता, अनुच्छेद 38 अनचाही रेटिंग पर, 19 दिसंबर 2012, जेसीआर की विज्ञप्ति 26-I-0064, एक्ज़िम बैंक A-, 3 सितंबर 2026, जेसीआर की विज्ञप्ति 26-I-0065, आईआरएफ़सी A-, 3 सितंबर 2026, जेसीआर की विज्ञप्ति 26-I-0066, आरईसी A-, 3 सितंबर 2026, जेसीआर की विज्ञप्ति 26-I-0067, हुडको A-, 3 सितंबर 2026, जेसीआर का परिचय पृष्ठ: स्थापना, बाज़ार हिस्सा, पंजीकरण, जेसीआर की सॉवरेन रेटिंग-सूची, वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति (पीआईबी, हिंदी), जेसीआर के उन्नयन पर, 2 सितंबर 2026, वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति (पीआईबी), एसऐंडपी के उन्नयन पर, 14 अगस्त 2025, वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति (पीआईबी), आरऐंडआई के उन्नयन पर, 19 सितंबर 2025, द हिंदू, 8 सितंबर 2026, पीटीआई, एजेंसी के कारण, 2 सितंबर 2026, ऑर्गनाइज़र, एन.के. सिंह की टिप्पणी और जेसीआर के अंक, 3 सितंबर 2026, बिज़नेस स्टैंडर्ड, मूडीज़ की 1988-1991 की रेटिंग, नवंबर 2017, सीएनबीसी, एसऐंडपी का अगस्त 2025 का उन्नयन, रॉयटर्स (इन्वेस्टिंग.कॉम), फ़िच की BBB- की पुष्टि और कर्ज़ के अंक, 11 अगस्त 2026, प्रेस इनसाइडर, फ़िच की रिपोर्ट के ब्याज, घाटे और भंडार के अंक, मनीलाइफ़, मूडीज़ का Baa3 डाउनग्रेड, जून 2020, मर्केटस सेंटर की '1991 प्रोजेक्ट' समय-रेखा: मूडीज़, एसऐंडपी, सोना, आईएमएफ़, आउटलुक बिज़नेस, 1991 का भंडार और 67 टन सोना

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।