बजट के हर सौ रुपये में ब्याज का हिस्सा बीस है या छब्बीस, दोनों आंकड़े एक ही दस्तावेज़ में छपे हैं
बजट के सार 2026-2027 के पहले पन्ने की तालिका से ब्याज भुगतान 2026-27 के बजट अनुमान में कुल ख़र्च का 26.3 फ़ीसदी बैठता है। उसी दस्तावेज़ के तीसरे पन्ने के चार्ट में यही रक़म 20 लिखी है। फ़र्क़ राज्यों का हिस्सा जोड़ने-घटाने का है, और दस्तावेज़ ख़ुद यह अपनी टिप्पणी में बताता है।

केंद्र सरकार अपने कुल ख़र्च का कितना हिस्सा सिर्फ़ ब्याज चुकाने में लगाती है?
जवाब की जगह दो जवाब मिलते हैं, और दोनों वित्त मंत्रालय के अपने काग़ज़ों से आते हैं। बजट अनुमान 2026-27 में ब्याज भुगतान की तय रक़म 14,03,972 करोड़ रुपये है। यह रक़म बदलती नहीं। बदलता है वह आधार जिससे इसे बाँटा जाता है।
बजट का सार 2026-2027 के पहले पन्ने की तालिका से यह रक़म कुल ख़र्च का 26.3 फ़ीसदी बैठती है। उसी दस्तावेज़ के तीसरे पन्ने पर छपे चार्ट में यही रक़म 20 लिखी है। दोनों पन्ने एक ही पीडीएफ़ में हैं, एक ही साल के लिए, एक ही रक़म के लिए।
फ़र्क़ झूठ का नहीं है। फ़र्क़ इतना है कि सौ रुपया किसे मान लिया गया है।
बजट सार का पहला पन्ना, चार साल के आँकड़े
वित्त मंत्रालय हर साल जो बजट का सार दस्तावेज़ छापता है, वह सिर्फ़ पाँच पन्नों का है। दस्तावेज़ ख़ुद अपना मक़सद लिखता है, बजट के भारी-भरकम आँकड़ों को इतने सरल रूप में रखना कि आसानी से समझा जा सके। पहला पन्ना एक तालिका है, चार साल के कॉलम में। 2024-25 का वास्तविक आँकड़ा, 2025-26 का बजट अनुमान, 2025-26 का संशोधित अनुमान, और 2026-27 का बजट अनुमान। हर रक़म करोड़ रुपये में है।

तालिका की ग्यारहवीं पंक्ति में ब्याज भुगतान दर्ज है। 2024-25 में यह 11,15,575 करोड़ रुपये था। 2025-26 के बजट अनुमान में 12,76,338 करोड़, संशोधित अनुमान में थोड़ा कम, 12,74,338 करोड़। 2026-27 के बजट अनुमान में यह बढ़कर 14,03,972 करोड़ रुपये हो गया। यही रक़म इस पूरे लेख का केंद्र है।
तालिका की आठवीं और नौवीं पंक्ति एक और बात दिखाती है। कुल प्राप्तियां और कुल व्यय, दोनों 2026-27 के बजट अनुमान में बराबर हैं, 53,47,315 करोड़ रुपये। यह इत्तिफ़ाक़ नहीं है। बजट की बनावट ही ऐसी है कि सरकार जितना ख़र्च करती है, उतना ही जुटाती भी है, उधार को मिलाकर। पंक्ति सात में यही उधार दर्ज है, "उधार और अन्य देयताएं", और इसे जोड़ने पर कुल प्राप्तियां ठीक कुल ख़र्च के बराबर बैठ जाती हैं।
दस्तावेज़ की शुरुआत में, तालिका से पहले, छह नंबर वाले पैराग्राफ़ हैं। तीसरा पैराग्राफ़ इस पूरे लेख की जड़ है। उसमें लिखा है कि इस दस्तावेज़ में दिखाई गई प्राप्तियां और व्यय, प्राप्ति बजट यानी अनुबंध-3, और व्यय की रूपरेखा दस्तावेज़ यानी विवरण संख्या 17, में दिए गए मिलान के हिसाब से निवल हैं। निवल यानी घटाकर निकाला गया।
किसमें से क्या घटाया गया है, यह अगले हिस्सों में खुलता है।
पहला भाग: चौदह लाख को तिरपन लाख से बाँटिए
सीधा हिसाब यही है। 14,03,972 को 53,47,315 से भाग दीजिए। जवाब आता है 0.2625, यानी 26.3 फ़ीसदी।
यह वही हिसाब है जो कोई भी पाठक कैलकुलेटर लेकर ख़ुद कर सकता है, दस्तावेज़ के पहले पन्ने की सिर्फ़ दो पंक्तियां लेकर। इसमें कोई ग़लती नहीं है। ब्याज भुगतान की रक़म सही है, कुल ख़र्च की रक़म सही है, भाग देने का तरीक़ा भी सही है।
सवाल यह नहीं है कि यह हिसाब ग़लत है। सवाल यह है कि यह अकेला हिसाब नहीं है। "कुल ख़र्च" कोई तटस्थ शब्द नहीं है। यह ख़ुद एक चुनाव है कि सौ रुपया किसे माना जाए। वित्त मंत्रालय के अपने अगले पन्नों पर यह चुनाव बदल जाता है।
एक बात यहीं साफ़ कर देनी चाहिए। "कुल प्राप्तियां" को आधार मानकर भी यही 26.3 फ़ीसदी मिलेगा, क्योंकि तालिका की पंक्ति आठ और पंक्ति नौ बराबर हैं, कुल प्राप्तियां और कुल व्यय। तो "प्राप्तियां" शब्द अकेले कोई तीसरा जवाब नहीं देता, जब तक उसका मतलब सिर्फ़ राजस्व प्राप्तियां न लिया जाए। वह तीसरा जवाब आगे आता है।
उसी दस्तावेज़ के तीसरे पन्ने पर बीस लिखा है
बजट का सार दस्तावेज़ के दूसरे पन्ने पर एक चार्ट है, "रुपया कहां से आता है", और तीसरे पन्ने पर दूसरा, "रुपया कहां जाता है"। दोनों चार्ट सौ पैसे में बँटे हैं, दोनों 2026-27 के बजट अनुमान के लिए।
तीसरे पन्ने के चार्ट में नौ हिस्से हैं। राज्यों का हिस्सा 22 पैसे, ब्याज भुगतान 20 पैसे, केंद्रीय क्षेत्र की योजनाएं 17 पैसे, रक्षा 11 पैसे, केंद्र प्रायोजित योजनाएं 8 पैसे, वित्त आयोग और अन्य हस्तांतरण 7 पैसे, अन्य ख़र्च 7 पैसे, प्रमुख सब्सिडी 6 पैसे, सिविल पेंशन 2 पैसे। जोड़िए तो पूरे सौ बनते हैं।
यहां ब्याज भुगतान के आगे लिखा 20 वही रक़म है, 14,03,972 करोड़ रुपये।
रक़म नहीं बदली।
बदला है हर पन्ने पर छपा हुआ सौ रुपया।
चार्ट के नीचे एक टिप्पणी है, और यह टिप्पणी बताती है कि माजरा क्या है। लिखा है कि कुल व्यय में करों और शुल्कों में राज्यों का हिस्सा शामिल है, जिसे पहले पन्ने की तालिका में प्राप्तियों में से घटा दिया गया है। यानी पहले पन्ने की तालिका, और तीसरे पन्ने के चार्ट का, "कुल व्यय" एक जैसा नहीं है। एक में राज्यों का हिस्सा घटाया गया है, दूसरे में जोड़ा हुआ है।
फ़र्क़ की जड़: राज्यों का हिस्सा जोड़ने-घटाने का हिसाब
यह हिस्सा वह जगह है जहां दोनों नंबर आपस में मिलते हैं। पहले पन्ने की तालिका का कुल ख़र्च राज्यों का हिस्सा घटाकर बना है। तीसरे पन्ने का चार्ट उसी हिस्से को वापस जोड़कर बना है। दोनों तालिकाएं एक ही अंतर्निहित रक़म से निकली हैं, बस एक ने घटाया है और दूसरे ने जोड़ा है।
आसान भाषा में कहें तो फ़र्क़ इतना है, एक थाली में जितना खाना परोसा गया वह गिनें, या रसोई में जितना बना उतना गिनें। पहला पन्ना परोसी गई थाली गिनता है, राज्यों को दिया हिस्सा पहले ही अलग करके। तीसरा पन्ना पूरी रसोई गिनता है, बाँटने से पहले की मात्रा। ब्याज भुगतान की एक ही रक़म, दो अलग नाप में, दो अलग हिस्सेदारी देती है।
इसे हिसाब में उतारते हैं। मान लीजिए चार्ट का पूरा "सौ रुपया" G है। चार्ट के मुताबिक़ राज्यों का हिस्सा इस G का 22 फ़ीसदी है। पहले पन्ने की तालिका का कुल ख़र्च, जो राज्यों का हिस्सा घटाकर बना है, दरअसल G में से वही 22 फ़ीसदी हटाने पर बचा हुआ हिस्सा है। यानी G का 78 फ़ीसदी।
तो 53,47,315 करोड़ रुपये, G का 78 फ़ीसदी है। इससे G निकालना हो तो 53,47,315 को 0.78 से भाग दीजिए। जवाब आता है लगभग 68,55,532 करोड़ रुपये। यह G है, चार्ट का पूरा "सौ रुपया"।
अब ब्याज भुगतान को इसी G से बाँटिए। 14,03,972 को 68,55,532 से भाग दीजिए। जवाब आता है 0.2048, यानी क़रीब 20.5 फ़ीसदी। पूर्णांकित करने पर 20। चार्ट में छपा नंबर यहां से आता है। यह अब किसी अनुमान का सहारा नहीं लेता। यह दस्तावेज़ की अपनी तालिका और अपने चार्ट से सीधे निकाला हिसाब है।
यह जांचने का एक और तरीक़ा है दोनों चार्ट के नोट को साथ पढ़ना। दूसरे पन्ने के "रुपया कहां से आता है" चार्ट के नीचे भी लगभग यही टिप्पणी छपी है, बस "व्यय" की जगह "प्राप्तियां" शब्द के साथ। दोनों जगह दस्तावेज़ ख़ुद बता रहा है कि चार्ट का आधार पहले पन्ने की तालिका से बड़ा है।
इसे उल्टा भी जाँचा जा सकता है। अगर G सचमुच 68,55,532 करोड़ रुपये है, तो उसका 20 फ़ीसदी 13,71,106 करोड़ रुपये बनता है। असली ब्याज भुगतान 14,03,972 करोड़ है। फ़र्क़ महज़ 32,866 करोड़ का, यानी G के आधे फ़ीसदी से भी कम।
एक सावधानी ज़रूरी है। चार्ट का 22 फ़ीसदी ख़ुद पूर्णांकित है, बिल्कुल ठीक 22.000 नहीं। दस्तावेज़ की अपनी टिप्पणी कहती है कि आंकड़े पूर्णांकित किए गए हैं। तो 68,55,532 करोड़ रुपये का यह G भी अनुमानित है, ठीक-ठीक करोड़ों तक भरोसे लायक़ नहीं। भरोसे लायक़ यह है कि 78 फ़ीसदी वाला हिसाब लगाने पर जवाब 20 के आसपास ही आता है, चार्ट में छपे नंबर से मेल खाता हुआ। राज्यों के हिस्से की असल करोड़ रुपये वाली रक़म प्राप्ति बजट के अनुबंध-3 में होगी, इस पांच पन्नों के सार दस्तावेज़ में नहीं।
चार सवाल, चार जवाब, एक तालिका
अब तक दो जवाब मिल चुके हैं, 26.3 और 20 फ़ीसदी। दोनों सही हैं, बस अलग आधार से। दो और जवाब बचे हैं, और दोनों उसी पहले पन्ने की तालिका से निकलते हैं, बस दो अलग पंक्तियों से, बिना राज्यों के हिस्से का कोई हिसाब लगाए।
नीचे की तालिका चारों आधार एक साथ रखती है, ताकि हर पंक्ति ख़ुद जाँची जा सके।
| आधार (सौ रुपया किसे माना) | रक़म, बजट अनुमान 2026-27 (₹ करोड़) | ब्याज का हिस्सा |
|---|---|---|
| कुल ख़र्च, पहले पन्ने की तालिका | 53,47,315 | 26.3% |
| राजस्व लेखा पर ख़र्च, पंक्ति 10 | 41,25,494 | 34.0% |
| राजस्व प्राप्तियां, पंक्ति 1 | 35,33,150 | 39.7% |
| तीसरे पन्ने का चार्ट, राज्यों का हिस्सा जोड़कर (हिसाब से निकाला) | लगभग 68,55,532 | लगभग 20.5%, चार्ट में 20 |
चारों पंक्ति में ब्याज भुगतान की रक़म एक ही है, 14,03,972 करोड़ रुपये। बदलने वाला हिस्सा हर है। अंश कभी नहीं बदलता। पहली और चौथी पंक्ति का हिसाब ऊपर आ चुका है। बीच की दो पंक्तियां बची हैं, राजस्व लेखा और राजस्व प्राप्तियां, और यह दोनों शब्द बजट की भाषा में एक ख़ास मतलब रखते हैं।
यह तालिका किसी एक जवाब को सही और बाक़ी को ग़लत नहीं ठहराती। चारों हिसाब बजट के उसी एक दस्तावेज़ से निकले हैं, उसी एक साल के लिए, उसी एक रक़म के लिए। फ़र्क़ सिर्फ़ यह तय करने का है कि पाठक किस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है, सरकार जो ख़र्च करती है उसमें से कितना ब्याज में जाता है, या सरकार जो कमाती है उसमें से कितना।
राजस्व लेखा और राजस्व प्राप्तियां, दो और आधार
बजट में हर ख़र्च दो खातों में बँटा है। राजस्व लेखा उस ख़र्च का है जिससे कोई टिकाऊ संपत्ति नहीं बनती, तनख़्वाह, पेंशन, सब्सिडी, ब्याज। पूंजी लेखा उस ख़र्च का है जिससे सड़क, इमारत या मशीन जैसी संपत्ति बनती है। तालिका की पंक्ति दस राजस्व लेखे का कुल ख़र्च देती है, 41,25,494 करोड़ रुपये, 2026-27 के बजट अनुमान में। ब्याज भुगतान ख़ुद राजस्व लेखे के भीतर की एक मद है, तो इसे राजस्व ख़र्च से बाँटना भी उतना ही जायज़ है जितना कुल ख़र्च से बाँटना।
14,03,972 को 41,25,494 से भाग दीजिए। जवाब आता है 34.0 फ़ीसदी। यानी सरकार जो रोज़मर्रा का ख़र्च चलाती है, उसका हर तीसरा रुपया लगभग ब्याज में जाता है।
राजस्व प्राप्तियां एक अलग चीज़ हैं। यह वह पैसा है जो सरकार टैक्स और गैर-टैक्स कमाई से असल में जुटाती है, उधार गिने बिना। पंक्ति एक में यह रक़म 35,33,150 करोड़ रुपये है। इसे आधार मानने का तर्क सीधा है, उधार का पैसा सरकार का अपना नहीं है, वह लौटाना है। तो असल कमाई से ब्याज का हिस्सा नापना एक तीसरा, कड़ा सवाल पूछता है।
14,03,972 को 35,33,150 से भाग दीजिए। जवाब आता है 39.7 फ़ीसदी, लगभग चालीस। यह चारों में सबसे ऊंचा आँकड़ा है, क्योंकि हर सबसे छोटा है। सरकार जो कमाती है, उसका हर ढाई रुपये में से एक रुपया ब्याज में जाता है।
ब्याज पहले चुकता है, बाक़ी बजट बाद में तय होता है
दस्तावेज़ की शुरुआत के परिभाषा-पैराग्राफ़ में एक और रिश्ता लिखा है। राजकोषीय घाटा वह रक़म है जो सरकार को उधार लेनी पड़ती है, कुल ख़र्च और उधार-रहित प्राप्तियों का फ़र्क़। प्राथमिक घाटा उसी राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान घटाकर निकाला जाता है, यह परिभाषा दस्तावेज़ की अपनी है।
यानी ब्याज भुगतान और प्राथमिक घाटा जोड़ने पर राजकोषीय घाटा बनता है। 2026-27 के बजट अनुमान में राजकोषीय घाटा 16,95,768 करोड़ रुपये है, जीडीपी का 4.3 फ़ीसदी। इसमें से प्राथमिक घाटा सिर्फ़ 2,91,796 करोड़ है। बाक़ी 14,03,972 करोड़, यानी 82.8 फ़ीसदी हिस्सा, ब्याज भुगतान है।
सरकार इस साल जो कुल उधार लेगी, उसका बड़ा हिस्सा किसी नई योजना के लिए नहीं जा रहा। वह पुराने उधार पर ब्याज चुकाने में जा रहा है। नया उधार, यानी प्राथमिक घाटा, कुल उधार का बचा हुआ छोटा हिस्सा भर है।
यह अनुपात स्थिर नहीं रहा।

2024-25 के वास्तविक आँकड़ों में राजकोषीय घाटा 15,74,431 करोड़ रुपये था, ब्याज भुगतान 11,15,575 करोड़, यानी 70.9 फ़ीसदी। 2025-26 के बजट अनुमान में यह हिस्सा 81.4 फ़ीसदी हुआ, संशोधित अनुमान में 81.8, और 2026-27 के बजट अनुमान में 82.8। दो बरस में यह अनुपात बारह फ़ीसदी अंक बढ़ा है।
| वर्ष | ब्याज भुगतान (₹ करोड़) | राजकोषीय घाटा (₹ करोड़) | घाटे में ब्याज का हिस्सा |
|---|---|---|---|
| 2024-25 वास्तविक | 11,15,575 | 15,74,431 | 70.9% |
| 2025-26 बजट अनुमान | 12,76,338 | 15,68,936 | 81.4% |
| 2025-26 संशोधित अनुमान | 12,74,338 | 15,58,492 | 81.8% |
| 2026-27 बजट अनुमान | 14,03,972 | 16,95,768 | 82.8% |
राजकोषीय घाटा जीडीपी के अनुपात में घट रहा है, 4.8 से 4.3 फ़ीसदी। उसी घटते घाटे के भीतर ब्याज का हिस्सा बढ़ रहा है। दोनों बातें तालिका की पंक्तियों में हैं, और दोनों सच हैं।
उधार अकेला सबसे बड़ा हिस्सा है, चौबीस पैसे
दूसरे पन्ने का चार्ट बताता है कि सरकार का पैसा आता कहां से है। आठ हिस्से हैं, और सबसे बड़ा हिस्सा टैक्स का नहीं है।
उधार और अन्य देयताएं 24 पैसे, निगम कर 18 पैसे, आयकर 21 पैसे, जिसमें प्रतिभूति संव्यवहार कर भी शामिल है, जीएसटी और अन्य कर 15 पैसे, कर-भिन्न राजस्व 10 पैसे, केंद्रीय उत्पाद शुल्क 6 पैसे, सीमा शुल्क 4 पैसे, ऋणों से इतर पूंजीगत प्राप्तियां 2 पैसे। जोड़ पूरे सौ बनता है।
निगम कर और आयकर जोड़ दें तो 39 पैसे बनते हैं, जीएसटी के 15 पैसे से ढाई गुने से ज़्यादा। पर अकेले हिस्से में सबसे बड़ा उधार ही है। हर सौ रुपये में से चौबीस रुपये वह पैसा है जो सरकार के पास पहले से नहीं था।

प्रत्यक्ष कर, यानी निगम कर और आयकर मिलाकर, और अप्रत्यक्ष कर, यानी जीएसटी, उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क मिलाकर, दोनों की तुलना भी इसी चार्ट से निकलती है। प्रत्यक्ष कर 39 पैसे, अप्रत्यक्ष कर 25 पैसे। कर-भिन्न राजस्व, यानी लाभांश, ब्याज और फ़ीस जैसी कमाई, सिर्फ़ 10 पैसे है।
वह उधार वाला हिस्सा अगले साल की ब्याज-तालिका में लौटकर आएगा।
चार्ट अगले बरस फिर बनेगा, इसी ढांचे में
बजट का सार दस्तावेज़ अपने मक़सद में यही लिखता है, कि यह हर साल बनने वाला दस्तावेज़ है। पन्ना एक की तालिका, पन्ना दो और तीन के चार्ट, दोनों का ढांचा हर साल दोहराया जाता है, बस चार कॉलम की तारीख़ें बदल जाती हैं।
यही ढांचा अगले फ़रवरी में फिर छपेगा। 2026-27 का बजट अनुमान तब 2026-27 का संशोधित अनुमान बन चुका होगा, और एक नया बजट अनुमान 2027-28 का जुड़ जाएगा। ब्याज भुगतान की रक़म बदलेगी। कुल ख़र्च की रक़म बदलेगी। हिसाब लगाने का तरीक़ा वही रहेगा, चार पंक्ति एक ही तालिका में, दो चार्ट एक ही नोट के साथ।
जो पाठक आज यह हिसाब ख़ुद लगा चुका है, वह अगले साल भी वही चार भाग ख़ुद कर सकता है, बिना किसी और की व्याख्या पर भरोसा किए। पहले पन्ने की तालिका से, तीसरे पन्ने के चार्ट से, राजस्व लेखे से, राजस्व प्राप्तियों से। चार जवाब, हर बार, एक ही दस्तावेज़ से।
यह दोहराव ही बजट का सार दस्तावेज़ का पूरा मक़सद है, हर साल की जटिल तालिकाओं को पाँच पन्नों में इस तरह बाँधना कि तुलना और हिसाब दोनों बिना किसी और मदद के हो सकें।