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पैसा

जगुआर लैंड रोवर चार हज़ार नौकरियाँ काट रहा है, और वह कंपनी टाटा की है

कटौती दो साल में होगी और उसका बड़ा हिस्सा ब्रिटेन में पड़ेगा, जहाँ कंपनी के क़रीब चौंतीस हज़ार कर्मचारी हैं। ब्रिटिश सरकार ने मदद देने से मना कर दिया है।

जगुआर लैंड रोवर का सोलीहल संयंत्र, 2015 की एक तस्वीर
तस्वीर: प्रधानमंत्री कार्यालय, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

जगुआर लैंड रोवर ने कहा है कि वह अगले दो साल में दुनिया भर में चार हज़ार नौकरियाँ कम करेगी।

यह ख़बर भारत में विदेश के पन्ने पर छपी, और ज़्यादातर जगह ब्रिटेन की ख़बर की तरह छपी।

वह अधूरा है। जगुआर लैंड रोवर टाटा मोटर्स की कंपनी है, और 2008 से टाटा मोटर्स की सबसे बड़ी आमदनी इसी से आती रही है।

यानी यह ब्रिटेन में नौकरियों की ख़बर है और भारत में एक बही-खाते की।

और इन दोनों को जोड़ने वाली कहानी अठारह साल पुरानी है, जब एक भारतीय कंपनी ने दो अंग्रेज़ी ब्रांड ख़रीदे थे और लोगों ने पूछा था कि वह ऐसा क्यों कर रही है।

घोषणा में क्या है

कंपनी ने जो कहा, उसमें तीन हिस्से हैं और तीनों साथ पढ़े जाने चाहिए।

पहला, चार हज़ार पदों की कटौती, दो साल में। कंपनी के ब्रिटेन में क़रीब चौंतीस हज़ार कर्मचारी हैं और कटौती का बड़ा हिस्सा उसी देश में पड़ने की उम्मीद है।

दूसरा, यह कटौती स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के ज़रिए शुरू हो रही है, और वह वेतनभोगी तथा प्रबंधन स्तर के कर्मचारियों के लिए है। यानी पहला निशाना कारख़ाने की लाइन पर नहीं, दफ़्तरों पर है।

तीसरा, और यही सबसे अहम है, कंपनी ने साथ में यह भी कहा कि वह अगले पाँच साल में पंद्रह से अठारह अरब पाउंड का निवेश करेगी।

तीसरे हिस्से पर रुकिए

मशीन का भीतरी हिस्सा। बिजली की मोटर में चलने वाले पुर्ज़े पेट्रोल इंजन से बहुत कम होते हैं
तस्वीर: Olivier Cleynen, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

नौकरी काटना और निवेश बढ़ाना, ये दोनों एक साथ हो रहे हैं।

यह विरोधाभास जैसा दिखता है और है नहीं। यही आज की मोटर उद्योग की तस्वीर है।

निवेश किस चीज़ में जा रहा है, यह कंपनी ने बताया है: बिजली से चलने वाली गाड़ियाँ, डिजिटल तकनीक, उन्नत विनिर्माण और ग्राहक अनुभव।

अब सोचिए कि इनमें से किसी में भी उतने लोग नहीं लगते जितने पुरानी तरह की गाड़ी बनाने में लगते थे।

बिजली की गाड़ी में इंजन नहीं होता। गियरबॉक्स नहीं होता, या बहुत सरल होता है। निकास प्रणाली नहीं होती। ईंधन इंजेक्शन नहीं होता।

पेट्रोल या डीज़ल इंजन में सैकड़ों चलने वाले पुर्ज़े होते हैं। बिजली की मोटर में उनकी संख्या बहुत कम है।

इसका मतलब यह है कि उन्हें बनाने, जोड़ने और उनकी जाँच करने वाले लोगों की ज़रूरत भी कम है।

तो यह किसकी कटौती है

इस बदलाव में नौकरियाँ दो तरह से जाती हैं।

एक, वे लोग जिनका काम अब उस चीज़ पर था जो बन ही नहीं रही।

दो, वे लोग जिनका काम प्रबंधन और प्रक्रिया का था, और जिसे कंपनी ढाँचा सरल करके घटाना चाहती है।

कंपनी ने कहा है कि वह संगठन को सरल बनाना चाहती है। यह उद्योग की भाषा में प्रबंधन की परतें घटाने के लिए इस्तेमाल होता है।

बचत का लक्ष्य दो साल में क़रीब 1.7 अरब पाउंड बताया गया है।

इस रक़म को उस निवेश के साथ रखकर देखिए जो कंपनी करने जा रही है। पाँच साल में पंद्रह से अठारह अरब पाउंड।

यानी जो बचाया जा रहा है, वह उस निवेश का दसवाँ हिस्सा भी नहीं है।

इससे एक बात साफ़ होती है। यह कटौती अकेले पैसे के लिए नहीं है। अगर सिर्फ़ पैसे की बात होती तो यह रक़म कहीं और से भी आ सकती थी।

यह ढाँचे का बदलाव है। कंपनी उन कामों के लिए लोग रख रही है जो आगे चाहिए, और उन कामों से हट रही है जो पीछे छूट रहे हैं।

चीन वाला हिस्सा

कंपनी ने अपनी वजह में जो बात कही है, वह सीधी है: लागत घटानी है और चीनी निर्माताओं से मुक़ाबला करना है।

पिछले कुछ बरसों में चीन की गाड़ी कंपनियों ने बिजली की गाड़ियों में जो पैमाना और क़ीमत हासिल की है, उसने पूरे उद्योग का गणित बदल दिया है।

इसकी वजह सिर्फ़ मज़दूरी नहीं है। बैटरी, जो बिजली की गाड़ी का सबसे महँगा हिस्सा है, उसकी आपूर्ति शृंखला का बड़ा हिस्सा चीन में है। कच्चे माल के प्रसंस्करण से लेकर सेल बनाने तक।

जिसके पास सबसे सस्ती बैटरी है, उसके पास सबसे सस्ती गाड़ी है।

यूरोपीय और ब्रिटिश कंपनियाँ इस दौड़ में पीछे से शुरू कर रही हैं, और उन्हें एक साथ दो काम करने हैं। पुरानी गाड़ियों से कमाई जारी रखनी है, और उसी कमाई से नई तकनीक में निवेश करना है।

चार हज़ार नौकरियाँ इसी दूसरी चीज़ के लिए पैसा निकालने की क़ीमत हैं।

टाटा वाला हिस्सा

रेंज रोवर इवोक। लैंड रोवर की महँगी गाड़ियाँ ही वह कमाई देती हैं जिससे बाक़ी बदलाव का ख़र्च निकलता है
तस्वीर: DeFacto, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अब भारत की तरफ़।

टाटा मोटर्स ने जगुआर और लैंड रोवर, दोनों ब्रांड 2008 में फ़ोर्ड से ख़रीदे थे। उस समय यह सौदा बहुत बड़ा माना गया था, और उस पर सवाल भी उठे थे कि एक भारतीय कंपनी दो घाटे में चल रहे विदेशी ब्रांड क्यों ख़रीद रही है।

अगले बरसों में वह सौदा टाटा मोटर्स के लिए फ़ायदे का साबित हुआ। लैंड रोवर की महँगी गाड़ियों की माँग बढ़ी, ख़ासकर चीन में, और कंपनी की आमदनी का बड़ा हिस्सा इसी से आने लगा।

इसका उल्टा असर भी होता है। जब जगुआर लैंड रोवर पर दबाव आता है, तो वह टाटा मोटर्स के नतीजों में दिखता है।

इसीलिए यह ख़बर भारतीय निवेशकों के लिए विदेश की ख़बर नहीं है।

एक बात और है जो इस रिश्ते को समझने में मदद करती है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी बी बालाजी हैं, जो इससे पहले टाटा मोटर्स में वित्त का काम देखते थे।

यानी जो व्यक्ति यह फ़ैसला ले रहा है, वह भारतीय मूल कंपनी से आया है। यह अपने आप में बताता है कि टाटा इस कारोबार को कितने क़रीब से चला रहा है।

2008 में जब यह सौदा हुआ था, तब भारतीय कंपनी ने विदेशी प्रबंधन को बड़ी छूट दी थी और यही उस सौदे की सफलता की एक वजह मानी गई। अब वह दूरी घटी है।

बिजली की गाड़ियों में यूरोप कहाँ अटका

यह समझने लायक़ है कि यह दबाव बना कैसे, क्योंकि वह अपने आप नहीं बना।

यूरोप और ब्रिटेन ने पेट्रोल-डीज़ल की गाड़ियों की बिक्री बंद करने की तारीख़ें तय कीं। कंपनियों को इसी वजह से बिजली की गाड़ियों में निवेश करना पड़ा, चाहे बाज़ार तैयार हो या न हो।

फिर दो चीज़ें एक साथ हुईं।

पहली, बिजली की गाड़ियों की माँग उम्मीद से धीमी बढ़ी। चार्जिंग की सुविधा, क़ीमत और बैटरी की उम्र को लेकर ख़रीदारों की झिझक बनी रही।

दूसरी, चीनी कंपनियाँ उसी दौरान सस्ती और अच्छी गाड़ियाँ लेकर आ गईं।

यानी यूरोपीय कंपनियों को उस बाज़ार में निवेश करना पड़ा जो धीरे बढ़ रहा था, और उसी बाज़ार में उन्हें ऐसे मुक़ाबले का सामना करना पड़ा जिसकी लागत कम थी।

इस दोहरे दबाव का नतीजा वही है जो सोमवार की घोषणा में दिखा।

ब्रिटिश सरकार ने क्या कहा

ब्रिटेन में इस घोषणा का राजनीतिक असर भी है, क्योंकि मोटर उद्योग वहाँ रोज़गार का बड़ा स्रोत रहा है।

सरकार ने साफ़ किया है कि वह कंपनी को उबारने के लिए पैसा नहीं देगी।

व्यापार मंत्री ने कहा है कि वे कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से इस हफ़्ते मिलेंगे।

यह रुख़ अपने आप में एक ख़बर है। दो दशक पहले तक ब्रिटेन में बड़े कारख़ानों को सरकारी सहारा मिलना आम था। अब वह अपेक्षा नहीं रही।

स्वैच्छिक शब्द पर ध्यान दीजिए

घोषणा में जो शब्द इस्तेमाल हुआ है, वह स्वैच्छिक है, और उसका मतलब समझ लेना चाहिए।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति में कंपनी एक पैकेज घोषित करती है और कर्मचारी ख़ुद तय करता है कि उसे लेना है या नहीं। जो लेते हैं उन्हें एकमुश्त रक़म मिलती है, जो उनकी सेवा की अवधि पर निर्भर करती है।

कंपनी के लिए इसका फ़ायदा यह है कि विवाद कम होता है और श्रमिक संगठनों के साथ टकराव टलता है।

नुक़सान यह है कि जाने वाले लोग कंपनी नहीं चुनती। अक्सर वही लोग पहले जाते हैं जिनके पास कहीं और जाने का विकल्प है, यानी सबसे अनुभवी और सबसे कुशल।

इसीलिए ऐसे कार्यक्रमों में कंपनियाँ यह शर्त रखती हैं कि आवेदन मंज़ूर करना उनके हाथ में रहेगा।

जो अभी साफ़ नहीं है

घोषणा में कुछ चीज़ें नहीं हैं और उन्हें दर्ज करना चाहिए।

कौन से संयंत्र प्रभावित होंगे, यह नहीं बताया गया। ब्रिटेन में कंपनी के कई ठिकाने हैं और हर एक का काम अलग है।

भारत में कंपनी का कोई असर होगा या नहीं, यह भी नहीं बताया गया। टाटा मोटर्स के भारतीय कारोबार और जगुआर लैंड रोवर के कारोबार अलग-अलग चलते हैं, पर तकनीक और डिज़ाइन के कुछ काम भारत में होते हैं।

और यह भी नहीं बताया गया कि चार हज़ार में से कितने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से जाएँगे और कितने उसके बाद।

यह आख़िरी बात मज़दूर संगठनों के लिए सबसे अहम है। स्वैच्छिक कार्यक्रम में शर्तें बेहतर होती हैं। उसके बाद जो होता है, वह अलग बात है।

पाँच नई गाड़ियाँ

घोषणा में एक और बात है जो नौकरी की ख़बर के नीचे दब गई।

कंपनी ने कहा है कि वह अगले बारह महीनों में पाँच नए उत्पाद उतारेगी।

यह उस कंपनी की बात है जो एक साथ सिकुड़ भी रही है। और यही आज के मोटर उद्योग की सबसे साफ़ तस्वीर है।

लोग कम, उत्पाद ज़्यादा, निवेश ज़्यादा।

बीसवीं सदी में गाड़ी बनाना श्रम-प्रधान काम था और उसी वजह से वह मध्यवर्ग बनाने वाला उद्योग था। डेट्रॉयट, बर्मिंघम, तूरिन और बाद में पुणे तथा चेन्नई, इन सब शहरों में जो मध्यवर्ग बना, उसकी जड़ इसी में थी।

इक्कीसवीं सदी में यह पूँजी-प्रधान होता जा रहा है। उतनी ही गाड़ियाँ कम लोगों से बनती हैं।

जगुआर और लैंड रोवर एक जैसे नहीं हैं

दोनों ब्रांड एक कंपनी में हैं, पर उनका हाल एक जैसा नहीं रहा।

लैंड रोवर की गाड़ियाँ, ख़ासकर रेंज रोवर और डिफ़ेंडर, लगातार बिकती रही हैं और उनसे कमाई अच्छी होती है। ये महँगी गाड़ियाँ हैं और इनका ख़रीदार क़ीमत को लेकर उतना संवेदनशील नहीं होता।

जगुआर की कहानी अलग रही है। वह ब्रांड लंबे समय से अपनी जगह तलाश रहा है और उसकी बिक्री लैंड रोवर के मुक़ाबले कम रही है।

कंपनी ने जगुआर को पूरी तरह बिजली की गाड़ियों वाला ब्रांड बनाने का फ़ैसला किया है, और उसकी नई पहचान गढ़ने की कोशिश पर लंबी बहस हुई है।

यानी एक ही कंपनी में एक ब्रांड कमा रहा है और दूसरा ख़ुद को दोबारा गढ़ रहा है। और दोनों का ख़र्च एक ही बही-खाते से निकलता है।

यह कहानी अकेली नहीं है

यह किसी एक कंपनी की या किसी एक देश की समस्या नहीं है।

यूरोप की कई बड़ी गाड़ी कंपनियों ने पिछले दो साल में इसी तरह की कटौती की घोषणाएँ की हैं, और सबके कारण मिलते-जुलते हैं। बिजली की गाड़ियों की तरफ़ बदलाव, चीन से मुक़ाबला, और यूरोप में गाड़ियों की माँग का ठंडा पड़ना।

भारत के लिए इसमें एक सबक़ है जो अभी दूर लगता है पर दूर नहीं है।

भारत में भी बिजली की गाड़ियों की तरफ़ बदलाव शुरू हो चुका है। भारत का मोटर उद्योग और उससे जुड़ा कल-पुर्ज़ों का उद्योग लाखों लोगों को रोज़गार देता है, और उसका बड़ा हिस्सा उन्हीं पुर्ज़ों पर टिका है जो बिजली की गाड़ी में नहीं लगते।

यह बदलाव भारत में धीमा रहेगा, क्योंकि यहाँ पुरानी गाड़ियों का बाज़ार बड़ा है और सस्ता। पर वह होगा।

जिन्हें यह चिट्ठी मिलेगी

आख़िर में उन लोगों की बात, जो इस पूरी ख़बर का असली विषय हैं।

चार हज़ार में से ज़्यादातर लोग ऐसे होंगे जिन्होंने अपनी पूरी नौकरी इसी उद्योग में की है। गाड़ी बनाने का काम एक ख़ास तरह का कौशल है और वह दूसरी जगह उतनी आसानी से नहीं चलता।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की शर्तें अच्छी हों तो कुछ लोग ख़ुद जाना चुनेंगे, ख़ासकर वे जो सेवानिवृत्ति के क़रीब हैं।

बाक़ी के लिए यह एक ऐसे उद्योग से निकलना है जो पूरे यूरोप में सिकुड़ रहा है।

कंपनी की विज्ञप्ति में यह सब आर्थिक भाषा में लिखा है, और वह ग़लत नहीं है। संगठन सरल करना और लागत घटाना असली ज़रूरतें हैं।

पर चार हज़ार एक संख्या नहीं है। वह चार हज़ार घर हैं, और उनमें से ज़्यादातर एक ही इलाक़े में हैं।

एक तुलना जो भारत के काम की है

एक कारख़ाने का भीतरी दृश्य
तस्वीर: एरिक चार्ल्टन, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

इस पूरी कहानी में भारतीय पाठक के लिए सबसे सीधा सबक़ यह है कि कोई उद्योग रातों-रात नहीं बदलता, पर जब बदलता है तो उसकी क़ीमत एक साथ चुकानी पड़ती है।

ब्रिटेन में गाड़ी बनाने का काम सौ साल से ज़्यादा पुराना है। उसके इर्द-गिर्द शहर बसे, कौशल विकसित हुआ, और पीढ़ियाँ उसी काम में गईं।

भारत में यह उद्योग उतना पुराना नहीं है, पर उसका पैमाना बड़ा है। पुणे, चेन्नई, गुड़गाँव और साणंद के आसपास जो औद्योगिक पट्टियाँ बनी हैं, उनमें लाखों लोग काम करते हैं, और उनका बड़ा हिस्सा कल-पुर्ज़े बनाने वाली छोटी इकाइयों में है।

वे इकाइयाँ इंजन, गियरबॉक्स, क्लच और निकास प्रणाली के पुर्ज़े बनाती हैं।

जिस दिन भारत में बिजली की गाड़ियों का हिस्सा बड़ा होगा, उस दिन इन इकाइयों के सामने वही सवाल होगा जो आज ब्रिटेन में है।

फ़र्क़ यह है कि भारत के पास अभी वक़्त है। ब्रिटेन के पास वह वक़्त नहीं बचा, और सोमवार की घोषणा उसी का हिसाब है।

स्रोतसीएनबीसी, जेएलआर की घोषणा पर रिपोर्ट, 7 सितंबर 2026, जगुआर लैंड रोवर, कंपनी की विज्ञप्तियाँ, टाटा मोटर्स, निवेशक जानकारी

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