भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात की 71 लाइनों पर चीन का हिस्सा 80 फ़ीसदी से ऊपर पहुँच चुका है, ज़्यादातर मोटर, तार और स्विच जैसे बुनियादी पुर्ज़ों में
कोआन एडवाइज़री ग्रुप और चीन अध्ययन संस्थान की नई रिपोर्ट ने वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों को आठ अंकों वाली टैरिफ़ लाइन तक खोलकर गिना है। 2018-19 में ऐसी 44 लाइनें थीं, 2025-26 में 71 हैं। इनमें से 46 पर निर्भरता इन्हीं सात सालों में बनी, यानी ठीक उस दौर में जब भारत मोबाइल बनाने में दुनिया में दूसरे नंबर पर पहुँचा।

चीन ने 2025-26 में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात की 71 ऐसी टैरिफ़ लाइनों में कम से कम 80 फ़ीसदी माल भेजा, जिनकी गिनती आठ अंकों वाले कोड पर होती है। सात साल पहले ऐसी लाइनें 44 थीं। यह गिनती कोआन एडवाइज़री ग्रुप और चीन अध्ययन संस्थान की उस रिपोर्ट में है जिस पर सितंबर 2026 दर्ज है, जिसके जारी होने की ख़बर समाचार एजेंसियों ने 9 सितंबर को दी, और जिसका हवाला बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 11 सितंबर को छापा।
पर असल बात 71 के आँकड़े में नहीं है। रिपोर्ट जिन उत्पादों को गिनती है वे तैयार फ़ोन, लैपटॉप या टीवी नहीं हैं। वे मोटर हैं, तार हैं, स्विच हैं, सर्किट बोर्ड हैं, वे चीज़ें जो भारत की असेंबली लाइनों पर चढ़ने से पहले जहाज़ से उतरती हैं।
और यह सब उन्हीं सालों में हुआ जिनमें भारत मोबाइल बनाने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बना और स्मार्टफ़ोन उसकी सबसे बड़ी निर्यात वस्तु।
कोआन एडवाइज़री और चीन अध्ययन संस्थान की गिनती
रिपोर्ट का पूरा नाम 'Beyond Approximations: An Empirical Series on India-China Trade, Disputes and Investment' है और यह उस शृंखला की पहली कड़ी है जो हर बार एचएस वर्गीकरण का एक अध्याय उठाएगी। पहली कड़ी अध्याय 85 पर है, यानी बिजली की मशीनें, उपकरण और उनके पुर्ज़े। लिखने वाले तीन हैं, रोशेल प्रकाश, डॉ. समीरा सारा अब्राहम और डॉ. दीप पाल। आँकड़ों के चित्र सूरज पासवान ने बनाए। चीन अध्ययन संस्थान 1969 से दिल्ली में चल रहा है और चीन तथा पूर्वी एशिया पर काम करने वाली भारत की पुरानी संस्थाओं में है।
पूरी गिनती वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अपने आयात-निर्यात आँकड़ों पर टिकी है, और रिपोर्ट हर तालिका के नीचे यह तारीख़ लिखती है कि वह आँकड़ा 26 जुलाई 2026 तक का है। इसमें कोई सर्वेक्षण नहीं है, कोई उद्योग का अनुमान नहीं है। जो है, वह सरकारी सीमा शुल्क रिकॉर्ड को अलग-अलग गहराई पर काटकर देखना है।
गहराई का मतलब समझ लेना ज़रूरी है, क्योंकि रिपोर्ट का पूरा तर्क उसी पर खड़ा है। एचएस कोड के पहले दो अंक अध्याय बताते हैं, चार अंक उत्पाद समूह, छह अंक वह श्रेणी जो दुनिया भर में एक जैसी होती है। आठवाँ अंक हर देश अपने हिसाब से जोड़ता है, सीमा शुल्क वसूलने के लिए। भारत की सूची में 85011019 एक अलग लाइन है, जिसमें 37.5 वॉट तक की छोटी मोटरें आती हैं।
छह अंक पर देखने से तस्वीर नरम दिखती है। अध्याय 85 की 278 छह-अंकी लाइनों में से सिर्फ़ 27 पर चीन का हिस्सा 80 फ़ीसदी से ऊपर है। आठ अंक पर वही अध्याय 521 लाइनों में खुलता है और उनमें 71 इस दायरे में आती हैं। एक ही आँकड़ा, दो अलग जवाब, और फ़र्क़ सिर्फ़ इतना कि आप कितना पास जाकर देख रहे हैं।
71 लाइनों की भीतरी बनावट
रिपोर्ट की तालिका 3 दोनों साल आमने-सामने रखती है। 2018-19 में भारत ने चीन से अध्याय 85 की 482 आठ-अंकी लाइनों पर आयात दर्ज किया, जिनमें 44 पर चीन का हिस्सा 80 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा था, यानी कुल का 9.1 फ़ीसदी। 2025-26 में लाइनें 521 हो गईं और ऐसी लाइनें 71, यानी 13.6 फ़ीसदी। इनमें 28 लाइनें 80 से 89 फ़ीसदी के बीच हैं, 32 लाइनें 90 से 99 के बीच, और 11 लाइनों पर आयात पूरा का पूरा चीन से है।
44 से 71 तक की छलाँग को रिपोर्ट ख़ुद नहीं उछालती। वह इन 71 को तीन हिस्सों में तोड़ती है, और यही इसका सबसे काम का पन्ना है। पंद्रह लाइनें वे हैं जो 2018-19 में भी इसी दायरे में थीं। छियालीस लाइनें वे हैं जो तब 80 फ़ीसदी से नीचे थीं और अब ऊपर आ गई हैं। दस लाइनें ऐसी हैं जो 2018-19 में मौजूद ही नहीं थीं, क्योंकि वे कोड बाद में बने या पुराने कोड टूटकर बने।
इसका एक सीधा परिणाम अख़बारों की सुर्ख़ियों में नहीं आया। 2018-19 वाली 44 में से सिर्फ़ 15 आज भी सूची में हैं। बाक़ी 29 बाहर हो चुकी हैं। सूची चौड़ी भी हुई है और उसके सदस्य बड़े हिस्से में बदल भी गए हैं।
अब देखिए कि 100 फ़ीसदी वाली सूची में क्या है। 2018-19 में ऐसी आठ लाइनें थीं, अब ग्यारह। दोनों सालों में टिकी सिर्फ़ दो हैं। पहली है एचएस 85131030, यानी हाथ में पकड़ने वाले बिजली के लैंप और कुछ ख़ास सुरक्षा उपकरण, जिनका आयात 60 हज़ार डॉलर से बढ़कर 1.4 लाख डॉलर हुआ। दूसरी है एचएस 85401110, ब्लैक-एंड-व्हाइट पिक्चर ट्यूब, जिनका आयात 70 हज़ार डॉलर से घटकर 10 हज़ार डॉलर रह गया। अध्याय 85 की छह-अंकी सूची में जो अकेली लाइन पूरी तरह चीन से आती है, वह एचएस 852210 है, रिकॉर्ड प्लेयर की पिक-अप कार्ट्रिज, और उसका सालाना आयात 10 हज़ार डॉलर है। रिपोर्ट ख़ुद लिखती है कि इसका व्यापारिक महत्व सीमित है।
उलटी मिसाल भी उसी तालिका में है। एचएस 85258090 में टेलीविज़न कैमरे, डिजिटल कैमरे और वीडियो कैमरा रिकॉर्डर आते हैं। 2018-19 में इस लाइन पर 41 करोड़ डॉलर का आयात हुआ और पूरा चीन से। 2024-25 में निर्भरता तब भी 100 फ़ीसदी थी, पर आयात गिरकर 2.84 करोड़ डॉलर रह गया था। 2025-26 में आयात 80 हज़ार डॉलर बचा और चीन का हिस्सा 80 फ़ीसदी पर आ गया। सात साल में इस लाइन का आयात 99.9 फ़ीसदी गिरा, क्योंकि फ़ोन के कैमरे ने अलग कैमरे की ज़रूरत ख़त्म कर दी।
इसलिए 71 अपने आप में जोखिम का पैमाना नहीं है। जोखिम कहाँ है, यह मूल्य देखे बिना तय नहीं होता, और रिपोर्ट का अगला हिस्सा वही करता है।
घाटे के पाँच कोड
2025-26 में भारत और चीन के बीच कुल व्यापार 151.1 अरब डॉलर का रहा, जो पिछले साल से लगभग 18 फ़ीसदी ज़्यादा है। इसमें भारत का आयात 131.6 अरब डॉलर और निर्यात 19.47 अरब डॉलर था। घाटा 112.1 अरब डॉलर, जो किसी भी एक देश के साथ भारत का सबसे बड़ा व्यापार घाटा है।
दो अंकों के स्तर पर यह घाटा एक जगह ढेर हो जाता है। अध्याय 85 अकेले 43.1 अरब डॉलर का घाटा बनाता है, यानी कुल का लगभग 38 फ़ीसदी। उसके बाद अध्याय 84 है, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, 28.1 अरब डॉलर। इसी अध्याय 85 में भारत का चीन से आयात 2024-25 के 38.02 अरब डॉलर से बढ़कर 46.4 अरब डॉलर हुआ, 21.8 फ़ीसदी की छलाँग। रिपोर्ट एक जगह यही आँकड़ा 46.3 अरब डॉलर लिखती है और दूसरी जगह 46.4, फ़र्क़ गोलाई का है।
अध्याय के भीतर चार अंकों पर पाँच कोड मिलकर 28.8 अरब डॉलर का घाटा बनाते हैं। सबसे ऊपर एचएस 8517 है, टेलीफ़ोनी और संचार उपकरण, 9.36 अरब डॉलर। फिर एचएस 8542, इलेक्ट्रॉनिक इंटीग्रेटेड सर्किट, 8.91 अरब डॉलर। फिर एचएस 8507, बिजली संचायक यानी बैटरियाँ, 4.39 अरब डॉलर। एचएस 8524, फ़्लैट पैनल डिस्प्ले मॉड्यूल, 3.22 अरब डॉलर। और एचएस 8541, सेमीकंडक्टर डिवाइस, 2.97 अरब डॉलर।
इनमें से एक भी तैयार उपभोक्ता सामान नहीं है। ये सब किसी और चीज़ के भीतर जाते हैं। इंटीग्रेटेड सर्किट वाला घाटा 2018-19 के 2.8 अरब डॉलर से बढ़कर 8.9 अरब डॉलर हुआ है, लगभग 220 फ़ीसदी की बढ़ोतरी। बैटरी वाला घाटा 1.01 अरब डॉलर से 4.39 अरब डॉलर हुआ, लगभग 335 फ़ीसदी।
असेंबली बढ़ने पर पुर्ज़ों का आयात भी बढ़ता है
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2026 को लोकसभा में बड़े पैमाने के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण वाली PLI योजना का हिसाब रखा। 32 कंपनियाँ मंज़ूर हुईं। फ़रवरी 2026 तक निवेश का लक्ष्य 7,000 करोड़ रुपये था और हुआ 17,519 करोड़, यानी ढाई गुना। उत्पादन का लक्ष्य 8,12,550 करोड़ था और हुआ 11,01,813 करोड़, 136 फ़ीसदी। निर्यात का लक्ष्य 4,87,530 करोड़ था और हुआ 6,20,974 करोड़, 127 फ़ीसदी। रोज़गार का लक्ष्य दो लाख था और 1,85,175 सीधी नौकरियाँ बनीं, 92 फ़ीसदी।
चार में से तीन ख़ानों में योजना अपने लक्ष्य से आगे है। सवाल इसी तथ्य से शुरू होता है।
योजना का दायरा तैयार फ़ोन था। पुर्ज़ा उसमें नहीं था। रिपोर्ट का निष्कर्ष इसी बिंदु पर टिका है कि अध्याय 85 का घाटा तैयार इलेक्ट्रॉनिक्स से नहीं बनता, वह ऊपरी सिरे के पुर्ज़ों और मध्यवर्ती सामान से बनता है। और उसका अगला वाक्य और सीधा है: वैश्विक मूल्य शृंखला में भारत की मौजूदा जगह ज़्यादातर असेंबली के चरण पर है, इसलिए जैसे-जैसे घरेलू विनिर्माण का आधार चौड़ा होगा, सेमीकंडक्टर और इंटीग्रेटेड सर्किट का आयात उसी अनुपात में बढ़ेगा।

एचएस 8517 इसका सबसे साफ़ उदाहरण है। 2025-26 में भारत ने इस श्रेणी में चीन से 11.8 अरब डॉलर का माल मँगाया, जो इस श्रेणी के कुल आयात का 54.3 फ़ीसदी है। आयरलैंड 3.2 अरब डॉलर के साथ दूसरे नंबर पर है और हांगकांग 1.4 अरब डॉलर के साथ तीसरे। पर देश में मोबाइल की माँग अब घरेलू उत्पादन से पूरी होती है और भारत फ़ोन का निर्यातक भी है, इसलिए यह ऊँचा आयात तैयार हैंडसेट का नहीं है। वह एचएस 851779 में बैठा है, जिसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड असेंबली, एंटीना असेंबली, कैमरा मॉड्यूल, कनेक्टर, चार्जिंग पोर्ट, माइक्रोफ़ोन और स्पीकर आते हैं।
इसी अध्याय में एचएस 851762 भी है, जिसमें डेटा ट्रांसमिशन उपकरण, राउटर और नेटवर्क स्विच आते हैं। यह दूरसंचार ढाँचे के बीचोबीच बैठने वाला सामान है, और रिपोर्ट इस निर्भरता को सीधे शब्दों में कमज़ोरी कहती है। दूरसंचार और नेटवर्किंग उत्पादों के लिए अलग PLI योजना चली, घरेलू आधार चौड़ा भी हुआ, फिर भी चीन पर निर्भरता बनी रही।
उन 46 लाइनों का ब्योरा भी इसी दिशा में जाता है जहाँ निर्भरता सचमुच गहरी हुई। रिपोर्ट के मुताबिक़ वे कुछ गिनी-चुनी श्रेणियों में जमा हैं: एचएस 8501 यानी बिजली की मोटरें और जनरेटर, एचएस 8543 यानी वे बिजली मशीनें जो कहीं और वर्गीकृत नहीं हैं, एचएस 8544 यानी इंसुलेटेड तार और केबल, और एचएस 8535 से 8536 यानी स्विचिंग और नियंत्रण उपकरण। ये किसी एक उद्योग के पुर्ज़े नहीं हैं। ये बिजली के उपकरणों, दूरसंचार ढाँचे, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक मशीनरी, चारों में लगते हैं।
पैमाने का अंदाज़ा आईटी हार्डवेयर वाली PLI 2.0 से मिलता है, जो 2023 में लैपटॉप, टैबलेट और सर्वर के लिए शुरू हुई। फ़रवरी 2026 तक उसके तहत कुल उत्पादन 18,863.1 करोड़ रुपये, कुल निवेश 872.16 करोड़ और सीधी नौकरियाँ 5,039 दर्ज हुईं। प्रोत्साहन के रूप में अब तक 82 करोड़ रुपये बँटे हैं।
निर्यात के आँकड़े में भारतीय हिस्सा 18 से 20 फ़ीसदी
कैलेंडर वर्ष 2025 में भारत की सबसे बड़ी निर्यात वस्तु स्मार्टफ़ोन रही। एचएस 85171300 पर 2,62,452 करोड़ रुपये, यानी 30.13 अरब डॉलर। दूसरे नंबर पर डीज़ल था, 1,42,227 करोड़, और तीसरे पर तराशे हुए हीरे, 1,08,652 करोड़। आँकड़ा वाणिज्य मंत्रालय के DGCIS का है और इसे इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने संसद में रखा।
उसी उत्तर में मंत्रालय ने एक और वाक्य लिखा, जिस पर कम ध्यान गया। उसके शब्द हैं कि उद्योग के अनुमान बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में घरेलू मूल्यवर्धन पिछले वर्षों में बढ़ा है और इस समय 18 से 20 फ़ीसदी है। यह मंत्रालय का अपना माप नहीं है। यह उद्योग का अनुमान है, और सरकार उसे उसी नाम से पेश करती है।
इस अनुपात को निर्यात पर लगाकर देखना एक मोटा हिसाब है, पूरा माप नहीं, क्योंकि मूल्यवर्धन का यह आँकड़ा पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन के लिए है, अकेले फ़ोन के निर्यात के लिए नहीं। फिर भी पैमाना समझने के लिए: 2,62,452 करोड़ के स्मार्टफ़ोन निर्यात पर 18 से 20 फ़ीसदी का मतलब लगभग 47,000 से 52,500 करोड़ रुपये भारत में जुड़ा मूल्य होगा। बाक़ी रक़म उन पुर्ज़ों की है जो पहले आयात होकर आए।
सरकार ने यह बात ख़ुद 2024 में लिख दी थी। आर्थिक समीक्षा 2023-24 के बाह्य क्षेत्र वाले अध्याय में चीन प्लस वन पर चर्चा करते हुए वित्त मंत्रालय ने तर्क दिया कि चीनी कंपनियों का भारत में निवेश करके यहाँ से निर्यात करना उस मौजूदा तरीक़े से बेहतर होगा जिसमें चीन से आयात किया जाता है, न्यूनतम मूल्य जोड़ा जाता है, और फिर उसे आगे बेच दिया जाता है।
रिपोर्ट इसी सवाल का एक और सिरा खोलती है। 2025-26 में अध्याय 85 के तहत भारत का चीन को निर्यात अचानक 3.18 अरब डॉलर पर पहुँच गया, जबकि 2024-25 तक यह एक अरब डॉलर से नीचे था। यह उछाल लगभग पूरा एक कोड से आया। एचएस 85177910, यानी मोबाइल फ़ोन बनाने में काम आने वाले भरे हुए प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, का निर्यात 3.58 करोड़ डॉलर से बढ़कर 1.5 अरब डॉलर हो गया, और अकेले इसी ने अध्याय 85 के कुल निर्यात-वृद्धि का लगभग 85 फ़ीसदी बनाया। रिपोर्ट साथ में चेतावनी भी लिखती है कि इलेक्ट्रॉनिक्स की शृंखला टुकड़ों में बँटी होती है, पुर्ज़े तैयार होने से पहले कई बार सीमा पार करते हैं, और ऐसे में व्यापार का मूल्य घरेलू मूल्यवर्धन का पर्याय नहीं होता।
हांगकांग, सिंगापुर और वियतनाम के रास्ते
चीन से सीधा आने वाले माल का हिस्सा 2017-18 के लगभग 60 फ़ीसदी से गिरकर 2018-19 में लगभग 40 फ़ीसदी रह गया। उसी साल हांगकांग का हिस्सा 2.5 फ़ीसदी से उछलकर 16.6 फ़ीसदी हो गया। उस एक साल में अध्याय 85 का आयात हांगकांग से 616 फ़ीसदी, सिंगापुर से 158 फ़ीसदी और वियतनाम से 130 फ़ीसदी बढ़ा, जबकि चीन से 28 फ़ीसदी घटा।
2025-26 में इन तीनों से आयात हांगकांग 10.5 अरब, सिंगापुर 6.2 अरब और वियतनाम 4.9 अरब डॉलर पर है। वाणिज्य मंत्रालय के DGCIS ने मूल देश और लदान देश मिलाकर जो आख़िरी अध्ययन छापा, वह अप्रैल से फ़रवरी 2021-22 का है। उसमें चीन का 85 फ़ीसदी माल सीधे आया, 10 फ़ीसदी हांगकांग होकर और 2 फ़ीसदी सिंगापुर होकर। हांगकांग के रास्ते आए माल का 78 फ़ीसदी मूल्य इलेक्ट्रॉनिक्स का था।
इसके बाद ऐसा अध्ययन नियमित रूप से नहीं छपा। यानी 71 का आँकड़ा उस रिकॉर्ड पर बना है जो यह नहीं बताता कि हांगकांग से आई पेटी में मूल रूप से किसका बनाया माल था।

प्रेस नोट 3 की तारीख़ और जिनेवा की दो शिकायतें
प्रेस नोट 3 की तारीख़ 17 अप्रैल 2020 है। मंत्रिमंडल की 10 मार्च 2026 की विज्ञप्ति में सरकार ने उसकी पृष्ठभूमि अपने शब्दों में लिखी है: कोविड महामारी के कारण भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण रोकने के लिए नीति में संशोधन किया गया। गलवान की झड़प 15 जून 2020 को हुई, यानी उस प्रेस नोट के लगभग दो महीने बाद। 59 चीनी ऐप पर पाबंदी 29 जून 2020 को लगी। जिस क़दम को अक्सर सीमा तनाव का जवाब कहा जाता है, उसकी अपनी विज्ञप्ति में कारण दूसरा दर्ज है।
इस नियम ने निवेश पर जो असर डाला, वह आँकड़ों में दिखता है। DPIIT के देशवार आँकड़ों के मुताबिक़ चीन से इक्विटी एफ़डीआई 2020-21 में 6 करोड़ डॉलर थी, 2021-22 में घटकर 1.14 करोड़ डॉलर रह गई, 2024-25 में 26.7 लाख डॉलर और 2025-26 में 59.1 लाख डॉलर रही। द इकोनॉमिक टाइम्स ने 19 अप्रैल 2024 को छापा कि प्रेस नोट 3 के तहत आए 526 प्रस्तावों में 124 मंज़ूर हुए और 201 ख़ारिज, बाक़ी लंबित। इसी दौर में चीन से आयात दोगुना हो गया। ताला निवेश पर लगा, आयात पर नहीं।
10 मार्च 2026 के संशोधन ने ढाँचा नहीं हटाया, उसमें तीन खिड़कियाँ खोलीं। धन शोधन निवारण नियम, 2005 वाली लाभकारी स्वामित्व की परिभाषा अपनाई गई और उसे निवेशक इकाई के स्तर पर लगाया गया। जिन निवेशों में सीमावर्ती देश का ग़ैर-नियंत्रक लाभकारी स्वामित्व 10 फ़ीसदी तक है, वे स्वचालित मार्ग से आ सकेंगे। और पूँजीगत सामान, इलेक्ट्रॉनिक पूँजीगत सामान, इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़े, पॉलीसिलिकॉन तथा इंगट-वेफ़र में आए प्रस्तावों पर 60 दिन में फ़ैसला होगा। विज्ञप्ति यह भी लिखती है कि बहुमत हिस्सेदारी और नियंत्रण हर समय भारतीय निवासियों के पास रहेगा, और 60 दिन फ़ैसले की समयसीमा है, मंज़ूरी की गारंटी नहीं। जुलाई 2026 में डिक्सन टेक्नोलॉजीज़ और वीवो मोबाइल इंडिया का 51:49 का संयुक्त उद्यम मंज़ूर हुआ, और चार चीनी बिजली उपकरण कंपनियों को पारेषण परियोजनाओं की निविदाओं में हिस्सा लेने दिया गया।
उधर जिनेवा में चीन दो शिकायतें दर्ज करा चुका है, और दोनों उन्हीं योजनाओं पर हैं जो यह निर्भरता घटाने के लिए बनी थीं। 15 अक्टूबर 2025 को चीन ने भारत के ख़िलाफ़ पहली बार सीधे परामर्श माँगा, विवाद संख्या DS642, जिसमें एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी की PLI, ऑटो और ऑटो कंपोनेंट की PLI, तथा इलेक्ट्रिक यात्री कार योजना को चुनौती दी गई। उसका आरोप है कि ये सब्सिडी आयातित के बजाय घरेलू सामान इस्तेमाल करने की शर्त से बँधी हैं। विश्व व्यापार संगठन के रिकॉर्ड के मुताबिक़ 27 जनवरी 2026 को पैनल टला, 24 फ़रवरी को बना और 28 मई को उसके सदस्य तय हुए। पंद्रह सदस्यों ने तीसरे पक्ष का अधिकार सुरक्षित रखा, जिनमें यूरोपीय संघ, जापान, कोरिया और अमेरिका शामिल हैं। दूसरा विवाद DS644 सौर सेल, सौर मॉड्यूल और सूचना प्रौद्योगिकी सामान पर है। 22 मई 2026 को भारत ने पैनल की पहली माँग रोकी और 23 जून को निकाय ने पैनल बना दिया।
जापान का 1956 का क़ानून, कोरिया का 2019 का झटका
जापान ने पुर्ज़े से शुरू किया था, तैयार सामान से नहीं। 1956 में वहाँ किशिन-हो लागू हुआ, यानी मशीनरी उद्योग को बढ़ावा देने वाला अस्थायी उपाय अधिनियम। अगले ही साल 1957 में देनशिन-हो आया, इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए वैसा ही क़ानून। दोनों समयबद्ध थे, दोनों दो-दो बार बढ़ाए गए, और दोनों 1971 में ख़त्म हुए।
काम करने का तरीक़ा सीधा था। व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय की मशीन उद्योग विचार-विमर्श परिषद हर साल तय करती थी कि कौन-से पुर्ज़े अहम हैं और उनके लिए कार्यक्रम बनाती थी। मंत्रालय छोटे और मझोले उद्यमों से आवेदन बुलाता, उन्हें छाँटता, और चुने गए उद्यमों को उत्पादन योजना, मशीन के चुनाव और ख़रीद की बातचीत तक में सलाह देता। इसके बाद वही आवेदन जापान डेवलपमेंट बैंक या छोटे उद्योगों वाले जापान फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन के पास कर्ज़ के लिए जाते। तकनीकी मदद एक दरवाज़े से आती थी और पैसा दूसरे से, पर फ़ाइल एक ही थी।

अमेरिकी कांग्रेस के तकनीकी आकलन कार्यालय ने 1991 में जापानी औद्योगिक नीति का लेखा-जोखा करते हुए दर्ज किया कि 1956 वाले क़ानून में वाहन और वाहन-पुर्ज़े जोड़े गए, और वित्तीय मदद के साथ मानकीकरण तथा पुर्ज़ा उद्योग को संगठित करने की कोशिशों ने 1961 से 1965 के बीच एक यात्री कार बनाने की लागत 56 फ़ीसदी घटाने में योगदान दिया। उसी अध्याय में यह भी लिखा है कि सरकार ने जापान में मोटर उद्योग खड़ा नहीं किया, वह कंपनियों ने किया।
कोरिया का सबक़ दूसरी तरह का है। जुलाई 2019 में जापान ने तीन रसायनों के निर्यात पर लाइसेंस की शर्त लगा दी, जो अर्धचालक और डिस्प्ले बनाने में लगते हैं: हाइड्रोजन फ़्लोराइड, फ़ोटोरेज़िस्ट और फ़्लोरिनेटेड पॉलीमाइड। 2018 के आयात आँकड़े कहते हैं कि फ़ोटोरेज़िस्ट का 88 फ़ीसदी कोरिया जापान से लेता था, पर हाइड्रोजन फ़्लोराइड का 63 फ़ीसदी चीन से आता था और जापान से 32 फ़ीसदी, और फ़्लोरिनेटेड पॉलीमाइड तीन देशों में बँटा था। जिस पाबंदी का असर सबसे तेज़ पड़ा वह हाइड्रोजन फ़्लोराइड पर थी, जहाँ जापान से कोरिया का आयात 87.9 फ़ीसदी गिरा, जबकि बाक़ी दो पर आयात उस तरह नहीं गिरा। कोरिया ने बेल्जियम, अमेरिका और ताइवान से ख़रीद शुरू कर दी।
हिस्सेदारी का अकेला आँकड़ा यह नहीं बताता कि चोट कहाँ लगेगी। कोरिया की सबसे ऊँची निर्भरता वाले उत्पाद पर पाबंदी सबसे कम चुभी।
पुर्ज़ा योजना की मौजूदा हालत
भारत की पुर्ज़ा योजना 8 अप्रैल 2025 को अधिसूचित हुई, नाम इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग स्कीम, परिव्यय 22,919 करोड़ रुपये, अवधि छह साल और एक साल की वैकल्पिक गर्भावधि। निवेश का लक्ष्य 59,350 करोड़ रुपये था और दिसंबर 2025 तक उद्योग से 1,15,351 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धताएँ आ चुकी थीं। बजट 2026 में परिव्यय बढ़ाकर 40,000 करोड़ कर दिया गया। 1 अप्रैल 2026 तक 12 राज्यों में 75 आवेदन मंज़ूर हो चुके थे।
इनमें से पहली 46 मंज़ूरियों का ब्योरा तीन किश्तों में छपा है: 27 अक्टूबर 2025 को सात परियोजनाएँ, 17 नवंबर को सत्रह और 2 जनवरी 2026 को बाईस। कुल निवेश 54,567 करोड़ रुपये। यहाँ दो सरकारी विज्ञप्तियाँ एक ही किश्त पर अलग आँकड़े देती हैं। 27 अक्टूबर 2025 की विज्ञप्ति पहली सात परियोजनाओं से 44,406 करोड़ रुपये का उत्पादन बताती है, और 3 फ़रवरी 2026 की तालिका उन्हीं सात के लिए 36,559 करोड़ लिखती है। दोनों के बीच का अंतर किसी विज्ञप्ति में समझाया नहीं गया।
मंज़ूर हुई परियोजनाएँ क्या बना रही हैं, यह सूची भी छपी है। बहुपरतीय प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, एचडीआई पीसीबी, कॉपर क्लैड लैमिनेट, कैमरा मॉड्यूल, कनेक्टर, ऑसिलेटर, ऑप्टिकल ट्रांसीवर, पॉलीप्रोपिलीन फ़िल्म और मोबाइल तथा आईटी हार्डवेयर के ढाँचे। पहली किश्त में कायनेस सर्किट्स की चार परियोजनाएँ तमिलनाडु में हैं, सिर्मा स्ट्रैटेजिक की एक आंध्र प्रदेश में, असेंट सर्किट्स की एक तमिलनाडु में और एसआरएफ़ लिमिटेड की एक मध्य प्रदेश में।
इस सूची को रिपोर्ट वाली उन 46 गहरी हुई लाइनों के बगल में रखिए। वहाँ ऊपर मोटरें, तार, केबल और स्विचगियर थे। मंज़ूर परियोजनाओं की प्रकाशित सूची में ये नाम नहीं दिखते, हालाँकि योजना का दायरा पैसिव और इलेक्ट्रो-मैकेनिकल कलपुर्ज़ों तक फैला हुआ है।
रिपोर्ट का अपना सुझाव इससे आगे जाता है और वह असहज है। उसका कहना है कि आयात पर रोक लगाने से खाई नहीं भरेगी, क्योंकि निर्भरता ऊपरी सिरे पर बैठी है; और जिन हिस्सों में घरेलू या तीसरे देश का विकल्प तकनीकी रूप से या पैमाने पर मौजूद नहीं है, वहाँ चीनी पुर्ज़ा निर्माताओं को भारत में उत्पादन की सोची-समझी छूट देने पर विचार होना चाहिए। साथ में शर्त भी लिखी है: यह तभी काम करेगा जब वास्तविक घरेलू मूल्यवर्धन हो, तकनीक सचमुच फैले, और स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं का जाल बने। वरना निर्भरता ख़त्म नहीं होती, सिर्फ़ उसका रास्ता बदल जाता है।
स्रोतकोआन एडवाइज़री ग्रुप और चीन अध्ययन संस्थान (ICS): 'Beyond Approximations: An Empirical Series on India-China Trade, Disputes and Investment', रिपोर्ट 1, एचएस अध्याय 85, सितंबर 2026, पत्र सूचना कार्यालय: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद का लोकसभा में उत्तर, घरेलू मूल्यवर्धन और PLI के आँकड़े, 1 अप्रैल 2026, पत्र सूचना कार्यालय, बैकग्राउंडर: इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग स्कीम, बजट 2026-27 में परिव्यय 40,000 करोड़, 3 फ़रवरी 2026, पत्र सूचना कार्यालय, बैकग्राउंडर: ECMS की पहली सात परियोजनाएँ, आवेदकवार तालिका, 27 अक्टूबर 2025, पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई: इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री अश्विनी वैष्णव का लोकसभा में उत्तर, 11 मार्च 2026, मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति: सीमा से लगे देशों से निवेश के दिशानिर्देशों में बदलाव, प्रेस नोट 3 की पृष्ठभूमि सहित, 10 मार्च 2026, विश्व व्यापार संगठन: विवाद DS642, भारत के मोटर वाहन और अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के उपाय, चीन की शिकायत का पूरा रिकॉर्ड, विश्व व्यापार संगठन: विवाद निपटान निकाय की 23 जून 2026 की बैठक, DS644 में पैनल का गठन, आर्थिक समीक्षा 2023-24, वित्त मंत्रालय, अध्याय 4 (बाह्य क्षेत्र): चीन प्लस वन और चीनी निवेश पर सरकार का अपना तर्क, केनिची ओनो, 'Economic Development of Japan', व्याख्यान 12 (GRIPS): किशिन-हो 1956 और देनशिन-हो 1957 का ढाँचा, अमेरिकी कांग्रेस का Office of Technology Assessment, 'Competing Economies', अध्याय 6: जापानी औद्योगिक नीति का लेखा-जोखा, 1991, जापान-कोरिया निर्यात नियंत्रण विवाद पर शोध पत्र: 2018 में कोरिया के आयात की देशवार तालिकाएँ और 2019 के बाद का असर, बिज़नेस स्टैंडर्ड: 71 उत्पाद लाइनों की ख़बर, 11 सितंबर 2026