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केन्या ने टाटा को झील छोड़ने को कहा है, और वह कारख़ाना 1911 से चल रहा है

राष्ट्रपति विलियम रुतो ने इसे सौ साल पुरानी दोहन की व्यवस्था कहा। टाटा केमिकल्स वहाँ 2005 में आई थी, एक ब्रिटिश कंपनी ख़रीदकर। खनन 1911 में शुरू हुआ था।

केन्या की मगदी झील। बाईं ओर सोडा ऐश का संयंत्र दिखता है
तस्वीर: Ninara, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

केन्या की रिफ़्ट घाटी में एक झील है जिसका पानी सफ़ेद दिखता है।

मगदी झील का यह रंग नमक का है। सतह पर ट्रोना नाम का खनिज जमा होता है, जिससे सोडा ऐश बनती है, और सोडा ऐश से काँच, साबुन और कई रसायन।

इस झील से व्यावसायिक खनन 1911 में शुरू हुआ था।

तीन सितंबर को केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुतो ने कहा कि टाटा केमिकल्स को यह काम बंद करना होगा।

भारत में यह ख़बर इस तरह छपी कि केन्या ने एक भारतीय कंपनी को निकाल दिया। यह सही है, पर पूरा नहीं है।

पूरी कहानी में एक ब्रिटिश कंपनी है, एक औपनिवेशिक रियायत है, और एक भारतीय कंपनी है जो उस रियायत पर बाद में आकर बैठी।

रुतो ने क्या कहा

राष्ट्रपति का तर्क दो हिस्सों में था।

पहला, केन्या को इस कंपनी की मौजूदगी से पर्याप्त ठोस लाभ नहीं मिला।

दूसरा, काजियाडो के निवासियों को मगदी झील के विशाल सोडा भंडार से उनका उचित हिस्सा नहीं मिला।

उन्होंने इसे लगभग एक सदी पुरानी दोहन की व्यवस्था का अंत बताया।

घोषणा में तीन ठोस बातें थीं। चौबीस हज़ार एकड़ के पट्टे में से सत्तर फ़ीसदी स्थानीय समुदाय को लौटाया जाएगा। मगदी का ठेका दोबारा खुली प्रतिस्पर्धी बोली से दिया जाएगा। और नए निवेशकों से यह अपेक्षा होगी कि वे काजियाडो में काँच का कारख़ाना और रसायन प्रसंस्करण की इकाई लगाएँ।

एक सदी वाली बात पर रुकिए

रुतो ने जो शब्द इस्तेमाल किया, वह सदी का है, और वही इस कहानी की सबसे दिलचस्प परत खोलता है।

टाटा केमिकल्स इस कारोबार में 2005 में आई। उसने ब्रिटेन की रसायन कंपनी ब्रूनर मॉन्ड को ख़रीदा, और मगदी का काम उसी सौदे के साथ आया।

यानी टाटा ने यह रियायत ख़ुद हासिल नहीं की थी। वह उसे विरासत में मिली।

और वह विरासत कहाँ से शुरू होती है, यह पूछें तो जवाब 1911 में जाता है, जब केन्या ब्रिटिश शासन के अधीन था।

तो जिस व्यवस्था को अब औपनिवेशिक कहकर ख़त्म किया जा रहा है, उसका असली मूल भारत में नहीं है। भारतीय कंपनी उस पर बाद में आकर बैठी।

इस बात के दो पाठ हैं

यह तथ्य दो अलग तरह से पढ़ा जा सकता है, और दोनों वाजिब हैं।

एक पाठ यह है कि टाटा के साथ अन्याय हो रहा है। उसने 2005 में एक चालू कारोबार ख़रीदा, बाज़ार भाव पर, और उसके बाद के बीस साल उसने वहाँ निवेश किया और लोगों को रोज़गार दिया। जो व्यवस्था औपनिवेशिक दौर में बनी, उसका दोष उस कंपनी पर नहीं डाला जा सकता जिसने उसे बहुत बाद में ख़रीदा।

दूसरा पाठ यह है कि रियायत की शर्तें उसी दौर की हैं, और उन्हें बदलने का हक़ उस देश को है जो अब आज़ाद है। मालिक बदलने से शर्तें नई नहीं हो जातीं।

दोनों बातें एक साथ सच हैं, और यही ऐसे विवादों को उलझाता है।

अंतरराष्ट्रीय क़ानून में इसका एक नाम है। जब कोई सरकार किसी विदेशी निवेशक का अधिकार समाप्त करती है, तो सवाल यह होता है कि यह लोक हित में उचित प्रक्रिया से हुआ या नहीं, और मुआवज़ा दिया गया या नहीं।

इन सवालों का जवाब निवेश संधियों में लिखा होता है, और भारत तथा केन्या के बीच ऐसी कोई संधि है या नहीं, यह इस मामले के आगे बढ़ने पर मायने रखेगा।

कंपनी के पास मध्यस्थता का रास्ता है, अगर वह उसे चुने। ऐसे मुक़दमे बरसों चलते हैं और उनका नतीजा दोनों तरफ़ गया है।

काजियाडो किसकी ज़मीन है

काजियाडो मासाई समुदाय का इलाक़ा है, और उनकी ज़मीन को लेकर केन्या में लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

औपनिवेशिक दौर में मासाई को उनकी चरागाह भूमि से हटाया गया था, और उसकी टीस वहाँ की राजनीति में आज भी है।

इसलिए जब कोई सरकार यह कहती है कि चौबीस हज़ार एकड़ में से सत्तर फ़ीसदी समुदाय को लौटाई जाएगी, तो वह सिर्फ़ आर्थिक बात नहीं कर रही होती।

यह भी ध्यान देने लायक़ है कि यह घोषणा ज़मीन लौटाने की है, कारख़ाना ज़ब्त करने की नहीं। पट्टे की ज़मीन और उस पर लगी मशीनें अलग चीज़ें हैं, और उनका हिसाब अलग होता है।

झील का अपना सवाल

इस पूरे विवाद में एक पहलू ऐसा है जिस पर कम बात होती है।

मगदी झील एक सोडा झील है और उसका पारिस्थितिक तंत्र ख़ास है। ऐसी झीलों पर बड़ी संख्या में राजहंस आते हैं, और पूर्वी अफ़्रीका की सोडा झीलें उनके लिए दुनिया की सबसे अहम जगहों में हैं।

खनन का असर पानी के स्तर और नमक की मात्रा पर पड़ता है, और उसका असर उन पक्षियों पर पड़ता है जो उसी नमकीन पानी में उगने वाले सूक्ष्म जीव खाते हैं।

तो अगर कोई नया ठेका दिया जाता है और उसके साथ काँच के कारख़ाने की शर्त जुड़ती है, तो पानी और ऊर्जा की माँग बढ़ेगी।

नई व्यवस्था पुरानी से बेहतर होगी या नहीं, यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उसमें ये शर्तें कैसी रखी जाती हैं।

ट्रोना कैसे बनता है

मगदी झील का किनारा। झील का कोई निकास नहीं है, इसलिए पानी भाप बनकर उड़ता है और नमक पीछे रह जाता है
तस्वीर: Lawrence Kinuthia Njoroge, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

झील का सफ़ेद रंग किसी रसायन के डाले जाने से नहीं है। वह वहाँ की भूगर्भीय बनावट का नतीजा है।

रिफ़्ट घाटी में ज्वालामुखीय चट्टानें हैं और उनमें सोडियम की मात्रा ज़्यादा होती है। बारिश का पानी इन चट्टानों से बहकर झील में आता है और सोडियम अपने साथ लाता है।

झील का कोई निकास नहीं है, इसलिए पानी सिर्फ़ भाप बनकर उड़ता है और नमक पीछे रह जाता है।

यह सिलसिला हज़ारों साल से चल रहा है, इसलिए वहाँ नमक की मोटी परत जमी है। ऊपर की परत निकाल ली जाए तो नीचे से घोल आकर उसकी जगह भर देता है।

इसी वजह से यह भंडार इतना टिकाऊ माना जाता है। सौ साल से खनन चल रहा है और झील अब भी भर रही है।

पर यह भरना पानी की आवक पर निर्भर है, और वह बारिश पर। जलवायु बदलने के साथ इस इलाक़े में बारिश का ढर्रा बदला है, और इसका असर लंबे समय में इस चक्र पर पड़ सकता है।

सोडा ऐश का काम क्या है

यह समझ लेना ज़रूरी है कि इस झील से जो निकलता है, वह क्यों क़ीमती है।

सोडा ऐश काँच बनाने का बुनियादी कच्चा माल है। खिड़की का काँच, बोतल, सौर पैनल का काँच, सबमें यही लगती है।

वह डिटर्जेंट, काग़ज़ और कई रसायनों में भी काम आती है।

दुनिया में सोडा ऐश दो तरह से मिलती है। एक, प्राकृतिक भंडारों से, जहाँ ट्रोना ज़मीन या झील में जमा हो। दो, कारख़ाने में नमक और चूना पत्थर से बनाकर।

प्राकृतिक भंडार से मिलने वाली सस्ती पड़ती है, क्योंकि उसमें बनाने का ख़र्च नहीं लगता।

ऐसे प्राकृतिक भंडार दुनिया में गिने-चुने हैं। अमेरिका में वायोमिंग सबसे बड़ा है। तुर्की में एक है। और अफ़्रीका में मगदी।

इसीलिए यह झील अपने आकार से कहीं ज़्यादा महत्व रखती है।

भारत के लिए इसका मतलब

एक कंटेनर बंदरगाह
तस्वीर: Bharat S Raj, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

टाटा केमिकल्स के लिए मगदी उसके कई ठिकानों में से एक है। कंपनी भारत, अमेरिका और ब्रिटेन में भी काम करती है, और गुजरात के मीठापुर में उसका बड़ा संयंत्र है।

इसलिए यह कंपनी के लिए बड़ा झटका है, पर अस्तित्व का सवाल नहीं।

बड़ा सवाल अलग है, और वह भारतीय कंपनियों के अफ़्रीका में कारोबार से जुड़ा है।

पिछले दो दशकों में भारतीय कंपनियों ने अफ़्रीका में बड़ा निवेश किया है, ख़ासकर दूरसंचार, दवा, खनन और कृषि में।

इनमें से कुछ निवेश ऐसे ही रास्तों से आए हैं, यानी किसी पुरानी यूरोपीय कंपनी को ख़रीदकर।

जब उन देशों में संसाधनों के बँटवारे पर राजनीति गरम होती है, तो जो कंपनी सामने खड़ी होती है वह भारतीय होती है, चाहे व्यवस्था उसने न बनाई हो।

पूर्वी अफ़्रीका में भारतीय मूल के लोगों का इतिहास इस बात को और उलझा देता है।

रेलवे बनाने के लिए उन्नीसवीं सदी के आख़िर में भारत से मज़दूर लाए गए थे, और बाद में व्यापारी भी बसे। इस समुदाय की मौजूदगी वहाँ सौ साल से ज़्यादा पुरानी है।

1972 में युगांडा से भारतीय मूल के लोगों को निकाला गया था, और उस याद का असर आज तक इस इलाक़े की राजनीति में है।

इसलिए जब कोई भारतीय कंपनी वहाँ विवाद में आती है, तो उस पर सिर्फ़ कारोबार की बहस नहीं होती। उसमें एक पुराना इतिहास भी घुल जाता है, जिससे उस कंपनी का कोई लेना-देना नहीं होता।

एक क़स्बा जो कारख़ाने ने बनाया

एक खुली खदान। खनन के इर्द-गिर्द बसे क़स्बे एक ही मालिक पर निर्भर हो जाते हैं
तस्वीर: Adityamadhav83, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

मगदी एक ऐसी जगह है जो कारख़ाने की वजह से बसी।

ऐसे क़स्बे दुनिया भर में मिलते हैं और उनकी बनावट एक जैसी होती है। कंपनी घर बनवाती है, स्कूल चलाती है, अस्पताल रखती है, पानी और बिजली देती है, और रेल की पटरी बिछाती है ताकि माल बंदरगाह तक जाए।

इसका एक चेहरा यह है कि लोगों को वे सुविधाएँ मिलीं जो आसपास नहीं थीं।

दूसरा चेहरा यह है कि पूरा क़स्बा एक ही मालिक पर निर्भर हो गया, और उस पर कोई सार्वजनिक नियंत्रण नहीं रहा।

भारत में भी ऐसे क़स्बे हैं, जमशेदपुर से लेकर कई खनन बस्तियों तक, और उन पर यही बहस होती रही है।

इसलिए जब वहाँ का कारोबार बदलता है, तो सवाल सिर्फ़ नौकरियों का नहीं होता। स्कूल कौन चलाएगा, पानी कौन देगा, और अस्पताल किसका होगा, ये सब उसी फ़ैसले से जुड़े होते हैं।

रुतो की घोषणा में इनका ज़िक्र नहीं था।

घोषणा के बाद क्या हुआ

पहली घोषणा के बाद केन्या में इस पर हंगामा हुआ, और उसके कई कारण थे।

एक कारण रोज़गार का था। मगदी में काम करने वाले लोग और उस पर निर्भर बस्तियाँ इस फ़ैसले से सीधे प्रभावित होतीं।

दूसरा कारण निवेश के माहौल का था। किसी चालू कारोबार को इस तरह बंद कराने का संदेश दूसरे विदेशी निवेशकों तक भी जाता है।

रिपोर्टों के मुताबिक़ इसके बाद राष्ट्रपति ने अपने रुख़ में कुछ नरमी दिखाई और नए ठेके की प्रक्रिया की बात रखी।

यानी अभी यह मामला उस जगह पर है जहाँ घोषणा हो चुकी है और उसका ब्योरा तय होना बाक़ी है।

जो सवाल अभी अनुत्तरित हैं

कई चीज़ें अभी साफ़ नहीं हैं और उन्हें दर्ज करना चाहिए।

पट्टा किस तारीख़ तक का था और उसमें समय से पहले समाप्ति की क्या शर्तें थीं, यह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है।

कंपनी ने वहाँ जो निवेश किया, उसका क्या होगा, यह भी तय नहीं है।

नई बोली में क्या शर्तें होंगी और उसमें मौजूदा कंपनी भाग ले सकेगी या नहीं, यह भी नहीं बताया गया।

और सबसे अहम, सत्तर फ़ीसदी ज़मीन समुदाय को लौटाने का तरीक़ा क्या होगा। ज़मीन किसके नाम होगी, उसका प्रबंधन कौन करेगा, और उससे होने वाली आमदनी कैसे बँटेगी।

ये सवाल इसलिए अहम हैं कि अफ़्रीका में समुदाय को ज़मीन लौटाने की घोषणाएँ पहले भी हुई हैं, और उनका नतीजा हमेशा एक जैसा नहीं रहा।

एक पुरानी बहस, नए रूप में

इस पूरे मामले में जो बहस है, वह नई नहीं है।

खनिज उस देश के होते हैं जिसकी ज़मीन में हैं। उन्हें निकालने के लिए पूँजी और तकनीक चाहिए, जो अक्सर बाहर से आती है। बदले में निकालने वाला मुनाफ़ा ले जाता है और देश को रॉयल्टी तथा रोज़गार मिलता है।

यह सौदा उचित है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि रॉयल्टी कितनी है और वह किस दौर में तय हुई थी।

जो शर्तें एक सदी पहले तय हुई हों, वे आज उचित लगेंगी, यह मानने की कोई वजह नहीं।

इसलिए रुतो के फ़ैसले पर बहस उसके अधिकार को लेकर नहीं होनी चाहिए। वह अधिकार उनके पास है।

बहस उस तरीक़े पर हो सकती है जिससे यह किया जा रहा है, और उन शर्तों पर जो आगे तय होंगी। क्योंकि आख़िर में काजियाडो के लोगों को फ़ायदा तभी होगा जब नई व्यवस्था पुरानी से सचमुच बेहतर हो।

अभी सिर्फ़ इतना तय है कि पुरानी ख़त्म हो रही है।

काँच के कारख़ाने वाली शर्त

नई शर्तों में जो बात सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है, वह काँच के कारख़ाने की है।

इसका तर्क साफ़ है। अभी सोडा ऐश निकालकर बाहर भेज दी जाती है और उससे काँच कहीं और बनता है। मूल्यवर्धन उस देश में होता है जहाँ कारख़ाना है, न कि उस देश में जहाँ खनिज है।

अफ़्रीका के कई देश यही शिकायत दोहराते रहे हैं। खनिज उनका, मुनाफ़ा किसी और का।

इसीलिए कई सरकारों ने कच्चे खनिज के निर्यात पर शर्तें लगाई हैं और प्रसंस्करण देश के भीतर कराने पर ज़ोर दिया है। इंडोनेशिया ने निकल में यही किया, और उसका असर वैश्विक बाज़ार पर पड़ा।

यह नीति काम करती है, पर उसकी शर्त यह है कि बिजली सस्ती हो, ढाँचा तैयार हो, और बाज़ार पास हो।

काँच भारी होता है और उसे दूर ले जाना महँगा पड़ता है। इसलिए काजियाडो में बना काँच किसे बेचा जाएगा, यह सवाल उस शर्त की सफलता तय करेगा।

घोषणा में यह सवाल नहीं उठाया गया, और वह उन ब्योरों में है जो अभी आने बाक़ी हैं।

स्रोतडेली नेशन, नैरोबी, रुतो के रुख़ पर रिपोर्ट, पीपल डेली, नैरोबी, नए ठेके की घोषणा पर, टाटा केमिकल्स, कंपनी की जानकारी

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