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भारत ने अप्रैल से जुलाई में उतना ही तेल ख़रीदा जितना पिछले साल, और 22.9 अरब डॉलर ज़्यादा चुकाए

शुक्रवार को हूती लड़ाकों ने बाब अल-मंदेब के बीच बसे पेरिम द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया। यही वह रास्ता है जिससे रूस का तेल भारत आता है, और फ़रवरी के बाद से सऊदी अरब का भी। ब्रेंट उसी दिन 104 डॉलर के आसपास बंद हुआ, रुपया 95.57 पर।

बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में पेरिम द्वीप का उत्तरी सिरा और पीछे यमन के तट के पहाड़, फ़रवरी 2007 की तस्वीर; शुक्रवार को हूती लड़ाकों ने इसी द्वीप पर क़ब्ज़ा किया
तस्वीर: Michael Kleiner (photo taken 19.02.2007, uploaded 25.06.2007), विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

अप्रैल से जुलाई के बीच भारत ने पिछले साल के इन्हीं चार महीनों जितना ही कच्चा तेल ख़रीदा। मात्रा 8.15 करोड़ टन से बढ़कर 8.19 करोड़ टन हुई, यानी आधे फ़ीसदी से भी कम। बिल 40.5 अरब डॉलर से बढ़कर 63.4 अरब डॉलर हो गया।

अंतर 22.9 अरब डॉलर का है। यह पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल का अपना आँकड़ा है, जुलाई तक का, और इसमें सितंबर अभी जुड़ा नहीं है।

शुक्रवार, 11 सितंबर को यमन के हूती लड़ाकों ने लाल सागर के दक्षिणी मुहाने पर बसे पेरिम द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसी शाम ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बंद हुआ और रुपया 95.57 पर।

पेरिम द्वीप, मोखा बंदरगाह और यानबू की पाइपलाइन

गुरुवार को हूती लड़ाकों ने लाल सागर के तट पर बसे मोखा बंदरगाह पर क़ब्ज़ा किया। शुक्रवार को पेरिम पर, जिसे मय्युन भी कहते हैं। यह द्वीप बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य को दो हिस्सों में बाँटता है और एशिया से यूरोप जाने वाले समुद्री रास्ते का दक्षिणी दरवाज़ा है।

समाचार एजेंसी एएफ़पी ने प्रत्यक्षदर्शियों और एक स्थानीय सरकारी अधिकारी के हवाले से क़ब्ज़े की पुष्टि की। उस अधिकारी ने एजेंसी को बताया, "सरकारी बलों के कल मय्युन द्वीप से पीछे हटने के बाद, सशस्त्र हूती लड़ाकों की नावें वहाँ पहुँच गईं।"

हूतियों ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा, "सभी कंपनियों के लिए समुद्री आवाजाही सुरक्षित है, सिवाय सऊदी जहाज़ों के।" समूह के मुताबिक़ सऊदी जहाज़ "नाकाबंदी के दायरे में" हैं। अपने बयान में समूह ने यमन के पश्चिमी तट से सऊदी समर्थित बलों को खदेड़ने का दावा किया, पर पेरिम का नाम नहीं लिया। सैन्य प्रवक्ता ने ताइज़ और होदेदा के छह ज़िलों से सऊदी सैनिकों को हटाने, सात सैन्य टुकड़ियों को निशाना बनाने, वर्षों से बंद क़ैदियों को छुड़ाने और 32 अभियानों में नौ विमान गिराने का दावा किया। सऊदी अरब की प्रतिक्रिया शुक्रवार देर शाम तक नहीं आई थी।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर माइग्रेशन के मुताबिक़ पिछले हफ़्ते लड़ाई तेज़ होने के बाद से यमन में कम से कम 46,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं।

इसी बीच गुरुवार शाम सऊदी अरब की अबक़ैक-यानबू तेल पाइपलाइन के 109 किलोमीटर लंबे हिस्से में कई जगह आग लगी। बीबीसी वेरिफ़ाई ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की तस्वीरें जाँचीं, जिनमें मदीना से क़रीब 72 किलोमीटर दक्षिण के पंपिंग स्टेशन के आसपास काले धुएँ का गुबार दिखता है। नासा के आग पहचानने वाले सॉफ़्टवेयर फ़र्म्स के आँकड़ों में उसी शाम पाइपलाइन की आठ जगहों पर गर्मी की असामान्य हरकत दर्ज हुई। सैटेलाइट तस्वीरों से आग की वजह या नुक़सान का पैमाना तय नहीं किया जा सकता।

यह पाइपलाइन खाड़ी को लाल सागर से जोड़ती है, और इस वक़्त सऊदी अरब के तेल निर्यात की सबसे अहम कड़ी है। फ़रवरी में अमेरिका-इसराइल और ईरान का युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आवाजाही बुरी तरह बाधित है। सऊदी अरब ने अपना निर्यात इसी पाइपलाइन से लाल सागर के यानबू बंदरगाह की ओर मोड़ा। बीबीसी के मुताबिक़ इस साल की शुरुआत में वह अपने कच्चे तेल के निर्यात का 70 फ़ीसदी तक हिस्सा इसी रास्ते भेज रहा था। यानबू से एशिया जाने वाला हर जहाज़ बाब अल-मंदेब से होकर, यानी पेरिम के पास से निकलता है।

बाब अल-मंदेब से गुज़रने वाला तेल आधा रह चुका है

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन ने अक्टूबर 2024 में वोर्टेक्सा के जहाज़-ट्रैकिंग आँकड़ों के आधार पर बताया था कि बाब अल-मंदेब से गुज़रने वाला कच्चा तेल और उत्पाद 2023 में औसतन 87 लाख बैरल रोज़ाना था। 2024 के पहले आठ महीनों में यह घटकर 40 लाख बैरल रह गया। गिरावट आधे से ज़्यादा की है।

वजह नवंबर 2023 से शुरू हुए हूती हमले थे। जहाज़ों ने लाल सागर छोड़कर अफ़्रीका के दक्षिणी सिरे, केप ऑफ़ गुड होप का लंबा और महँगा रास्ता पकड़ लिया। उसी ईआईए आँकड़े में केप से गुज़रने वाला तेल 2023 के 60 लाख बैरल रोज़ाना से बढ़कर 2024 के पहले आठ महीनों में 92 लाख बैरल हो गया।

कच्चा तेल ढोने वाला टैंकर ईगल सैन डिएगो, दिसंबर 2024 में अमेरिका के पोर्ट एंजेलिस में ली गई तस्वीर; लाल सागर छोड़ने वाले ऐसे ही जहाज़ों ने अफ़्रीका के दक्षिणी सिरे का चक्कर लगाना शुरू किया
तस्वीर: Jordanroderick, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

पैमाना समझने के लिए: ईआईए के दिसंबर 2023 के विश्लेषण में स्वेज़ नहर, सुमेद पाइपलाइन और बाब अल-मंदेब, तीनों मिलकर 2023 की पहली छमाही में समुद्र से होने वाले कुल तेल व्यापार का क़रीब 12 फ़ीसदी और दुनिया के एलएनजी व्यापार का क़रीब 8 फ़ीसदी ढो रहे थे। सुमेद पाइपलाइन की क्षमता 25 लाख बैरल रोज़ाना है।

इसके मुक़ाबले होर्मुज़ बहुत बड़ा है। 2023 में वहाँ से 2.09 करोड़ बैरल रोज़ाना गुज़रा, जो दुनिया की कुल पेट्रोलियम खपत का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है। दुनिया के एलएनजी व्यापार का भी क़रीब पाँचवाँ हिस्सा उसी रास्ते जाता था।

तो शुक्रवार को जो बदला, वह मात्रा नहीं थी। बाब अल-मंदेब से गुज़रने वाला तेल पहले ही आधा हो चुका था। जो बदला वह यह है कि अब उस रास्ते पर किसका पहरा है, और यह उस वक़्त बदला जब होर्मुज़ बंद होने की वजह से बचा हुआ रास्ता यही था।

रूस का तेल इसी रास्ते से भारत आता है

आम धारणा यह है कि भारत का खाड़ी वाला तेल बाब अल-मंदेब से आता है। ऐसा नहीं है। होर्मुज़ से निकलकर खाड़ी का तेल सीधे पूरब की ओर अरब सागर पार करता है और लाल सागर में घुसता ही नहीं। लाल सागर का रास्ता यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाले तेल का है।

भारत की असल कड़ी दूसरी दिशा से बनती है। ईआईए के दिसंबर 2023 के उसी विश्लेषण में 2023 की पहली छमाही में स्वेज़ नहर से दक्षिण की ओर जाने वाले तेल का 74 फ़ीसदी रूस का था, जो 2021 में 30 फ़ीसदी था। और उस तेल का बड़ा हिस्सा भारत तथा चीन के लिए था। बाल्टिक और काला सागर के बंदरगाहों से चला रूसी तेल स्वेज़ से लाल सागर में उतरता है और पेरिम के पास से निकलकर भारत पहुँचता है।

वह तेल अब भारत की सबसे बड़ी आपूर्ति है। समुद्री ख़ुफ़िया फ़र्म कप्लर के आँकड़ों के आधार पर बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 27 अगस्त को बताया कि अगस्त में रूस से आयात क़रीब 21 लाख बैरल रोज़ाना रहने का अनुमान है, जो जून और जुलाई के रिकॉर्ड 26 लाख बैरल से कम है। गिरावट के बावजूद रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना रहा, कुल आयात के 40 फ़ीसदी से ज़्यादा के साथ। उसके बाद संयुक्त अरब अमीरात 6.11 लाख बैरल रोज़ाना, सऊदी अरब 3.85 लाख, वेनेज़ुएला 3.83 लाख, नाइजीरिया 1.29 लाख और ब्राज़ील 1.20 लाख बैरल पर रहे।

कप्लर के वरिष्ठ प्रबंधक सुमित रितोलिया ने इस गिरावट को माँग की कमज़ोरी मानने से इनकार किया। उनके मुताबिक़ इसमें रिफ़ाइनरी की मरम्मत, पिछले महीनों की तेज़ ख़रीद के बाद का सामान्यीकरण, रूस के पास निर्यात के लिए कम उपलब्धता और चीन की बढ़ती बोली, चारों शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रूसी कच्चा तेल अब प्रीमियम पर बिकते देखा गया है। जिस छूट के भरोसे यह निर्भरता बनी थी, वह फ़िलहाल नहीं है।

पीपीएसी के रेडी रेकनर में खपत के आधार पर कच्चे तेल की आयात निर्भरता 2025-26 में 88.7 फ़ीसदी दर्ज है। 2020-21 में यह 84.4 फ़ीसदी थी। छह साल में निर्भरता घटी नहीं, बढ़ी है।

ब्रेंट 104 डॉलर पर बंद हुआ, और अप्रैल में 138 पर था

बिज़नेस स्टैंडर्ड की जिस रिपोर्ट से "100 डॉलर के पार" वाला वाक्य चला, उसमें 100 डॉलर भाव नहीं, इक्वाइरस सिक्योरिटीज़ के परिदृश्य की दहलीज़ है। असल भाव उससे ऊपर है।

शुक्रवार शाम पीटीआई ने ब्रेंट को वायदा कारोबार में 3.28 फ़ीसदी गिरकर 104.10 डॉलर प्रति बैरल पर बताया। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स की तालिका में उसी दिन का भाव 104.09 डॉलर और गिरावट 3.29 फ़ीसदी दर्ज है। दोनों आँकड़े गुरुवार के बंद भाव को क़रीब 107.63 डॉलर पर रखते हैं। उसी शुक्रवार की सुबह द हिंदू ने ब्रेंट को 108.45 डॉलर पर बताया था, यानी दिन भर में भाव चार डॉलर से ज़्यादा टूटा। अमेरिकी डब्ल्यूटीआई 99.40 डॉलर पर आकर सौ के नीचे लौट आया।

गिरावट के बावजूद हफ़्ता तेज़ी का रहा। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के मुताबिक़ ब्रेंट लगातार दूसरे हफ़्ते चढ़ा, महीने भर में 17 फ़ीसदी से ज़्यादा और साल भर में क़रीब 55 फ़ीसदी।

सौ डॉलर की दहलीज़ इस साल पहले ही कई बार पार हो चुकी है। ईआईए की दैनिक शृंखला, जो सेंट लुइस फ़ेड की फ़्रेड सेवा पर मई 1987 से उपलब्ध है, उसमें ब्रेंट 3 सितंबर को 100.52 डॉलर दर्ज हुआ और बुधवार 9 सितंबर को 109.51 डॉलर। यह कोई नई ऊँचाई नहीं थी। उसी शृंखला में 12 मार्च से 3 जून 2026 के बीच ब्रेंट पचास कारोबारी दिन सौ डॉलर या उससे ऊपर रहा और 7 अप्रैल को 138.21 डॉलर पर पहुँचा। 1987 के बाद का इससे ऊँचा भाव सिर्फ़ एक बार दर्ज है, 3 जुलाई 2008 को 143.95 डॉलर। जुलाई में भी दो दिन, 23 और 24 तारीख़ को, भाव सौ के पार गया था।

इक्रा के प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक़ फ़रवरी के आख़िर में युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट 70 से 75 डॉलर के बीच था, और 9 सितंबर को भारतीय क्रूड बास्केट क़रीब 109 डॉलर पर।

यह तेज़ी माँग से नहीं आई। ओपेक ने 10 सितंबर की मासिक रिपोर्ट में 2026 के लिए वैश्विक माँग वृद्धि का अनुमान घटाकर क़रीब 4 लाख बैरल रोज़ाना कर दिया, और 2027 के लिए 24 लाख बैरल रखा। भारत के लिए अनुमान 2026 में 60,000 बैरल रोज़ाना की बढ़त का है, औसत 57 लाख बैरल, और 2027 में 4 लाख बैरल की बढ़त के साथ क़रीब 61 लाख बैरल। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के मुताबिक़ यह लगातार पाँचवीं बार है जब ओपेक ने 2026 का अनुमान घटाया। दाम आपूर्ति के डर से चढ़ रहा है, खपत के ज़ोर से नहीं।

वही तेल, 22.9 अरब डॉलर ज़्यादा

पीपीएसी के जुलाई 2026 के सार में अप्रैल से जुलाई का हिसाब इस तरह है। कच्चे तेल का आयात 8.15 करोड़ टन से बढ़कर 8.19 करोड़ टन हुआ, और उसका बिल 40.5 अरब डॉलर से 63.4 अरब डॉलर। मात्रा में बढ़त आधे फ़ीसदी की, दाम में 56.5 फ़ीसदी की।

कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद दोनों जोड़ लें तो तस्वीर और साफ़ होती है। कुल आयात 9.80 करोड़ टन से घटकर 9.09 करोड़ टन रह गया, यानी मात्रा 7.2 फ़ीसदी कम हुई। बिल 48.2 अरब डॉलर से बढ़कर 69.0 अरब डॉलर हो गया, यानी 43.2 फ़ीसदी ज़्यादा। कम तेल, ज़्यादा पैसा।

निर्यात घटाकर बचा शुद्ध तेल और गैस का बिल इन्हीं चार महीनों में 40.3 अरब डॉलर से 57.8 अरब डॉलर हुआ। यह 43.4 फ़ीसदी की बढ़त है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 9 सितंबर को इसे "40.3 फ़ीसदी की बढ़त" लिखा, पर 40.3 पिछले साल का आँकड़ा है, बढ़त की दर नहीं।

इसका असर पूरे व्यापार खाते पर दिखता है। भारत के कुल आयात में पेट्रोलियम का हिस्सा मूल्य के हिसाब से अप्रैल-जुलाई 2025 में 19.7 फ़ीसदी था, इस साल उन्हीं महीनों में 23.6 फ़ीसदी। वस्तु व्यापार घाटा 96.7 अरब डॉलर से बढ़कर 118.6 अरब डॉलर हुआ, यानी 21.9 अरब डॉलर ज़्यादा। शुद्ध तेल और गैस बिल में बढ़त 17.5 अरब डॉलर की रही। घाटा जितना चौड़ा हुआ, उसका क़रीब 80 फ़ीसदी अकेले तेल और गैस से आया।

अकेले जुलाई में कच्चे तेल का आयात 1.89 करोड़ टन से बढ़कर 2.14 करोड़ टन हुआ और बिल 9.7 अरब डॉलर से 13.7 अरब डॉलर।

पिछले पूरे वित्त वर्ष का पैमाना इससे बड़ा है। 2025-26 में भारत ने 24.58 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जिस पर 123.4 अरब डॉलर ख़र्च हुए। पीपीएसी के रेडी रेकनर में उसी का रुपया आँकड़ा 10,92,248 करोड़ रुपये है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 जुलाई 2026 को 692.9 अरब डॉलर था।

ये सारे आँकड़े जुलाई तक के हैं। जिस महीने ब्रेंट 109 डॉलर छू रहा है, वह अभी किसी सरकारी तालिका में दर्ज नहीं हुआ।

रुपया 95.57 पर बंद हुआ, 95.79 पर नहीं

शुक्रवार को रुपया 95.70 पर खुला, दिन में गिरकर 95.79 तक गया, फिर सँभलकर 95.51 तक लौटा और आख़िर में 5 पैसे की गिरावट के साथ 95.57 पर बंद हुआ। यह अस्थायी आँकड़ा है और लगातार पाँचवें सत्र की गिरावट। 95.79 दिन का निचला स्तर था, बंद भाव नहीं। गुरुवार को रुपया 44 पैसे टूटकर 95.52 पर बंद हुआ था।

एचडीएफ़सी सिक्योरिटीज़ के वरिष्ठ शोध विश्लेषक दिलीप परमार के मुताबिक़ यह 15 मई के बाद का सबसे बड़ा साप्ताहिक नुक़सान था। द हिंदू से बात करते हुए कोटक सिक्योरिटीज़ के अनिंद्य बनर्जी ने कहा कि रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार, रिज़र्व बैंक की सक्रियता और 7.8 फ़ीसदी की घरेलू वृद्धि सहारा तो देती हैं, पर महँगे तेल और चढ़ते वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल के बीच आयात बिल ही निकट भविष्य में सबसे भारी ताक़त है। डॉलर सूचकांक शुक्रवार को 99.13 पर था।

गुणा यहाँ होता है। पीपीएसी के अपने आँकड़े में 2025-26 के 123.4 अरब डॉलर के आयात पर 10,92,248 करोड़ रुपये चुकाए गए, जिससे उस पूरे साल का औसत भाव क़रीब 88.5 रुपये प्रति डॉलर बैठता है। 95.57 पर वही बैरल आठ फ़ीसदी ज़्यादा रुपये माँगता है, इससे पहले कि उसका डॉलर भाव एक पैसा हिले।

पंप का दाम 109 दिन से जमा है, मई में चार बार हिला था

पीपीएसी की 10 सितंबर को जारी दैनिक तालिका में दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीज़ल 95.20 रुपये प्रति लीटर है। मुंबई में 111.21 और 97.83, चेन्नई में 107.77 और 99.55, कोलकाता में 113.51 और 99.82। यही चारों आँकड़े तालिका में 25 मई 2026 से हर एक दिन दोहराए गए हैं। शुक्रवार तक उस बदलाव को 109 दिन हो चुके थे।

सिक्किम के रंगपो में इंडियन ऑयल का पेट्रोल पंप, जहाँ टैंकर से तेल उतारा जा रहा है, मई 2018 की तस्वीर; चारों महानगरों के पंपों पर छपे दाम 25 मई 2026 के बाद एक बार भी नहीं बदले
तस्वीर: Bernard Gagnon, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पर यह ठहराव मार्च 2024 से नहीं है। उसी तालिका में मई 2026 के ग्यारह दिन के भीतर चार बढ़ोतरी दर्ज हैं। 14 मई को दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये और डीज़ल 87.67 रुपये था। 15 मई को दोनों तीन रुपये चढ़े। 19 मई को पेट्रोल 98.64 और डीज़ल 91.58 हुआ। 23 मई को 99.51 और 92.49। 25 मई को सबसे बड़ी छलाँग लगी, पेट्रोल 2.61 रुपये और डीज़ल 2.71 रुपये चढ़कर 102.12 और 95.20 पर पहुँचा।

ग्यारह दिन का कुल जोड़ दिल्ली में पेट्रोल पर 7.35 रुपये और डीज़ल पर 7.53 रुपये बैठता है। मुंबई में 7.67 और 7.80 रुपये, चेन्नई में 6.93 और 7.16, कोलकाता में 8.06 और 7.80। 25 मई वह दिन था जब दिल्ली में पेट्रोल पहली बार सौ रुपये के ऊपर छपा।

उससे पहले का रिकॉर्ड सचमुच लंबे ठहराव का है। दिल्ली में पेट्रोल 22 मई 2022 से 14 मार्च 2024 तक 96.72 रुपये पर टिका रहा। 15 मार्च 2024 को, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, दो रुपये की कटौती हुई और भाव 94.72 पर आया। 30 अक्टूबर 2024 को पाँच पैसे की मामूली हलचल के बाद 94.77 हुआ और फिर मई 2026 तक वहीं जमा रहा।

पूरी तस्वीर इस तरह बनती है: चार साल की क़रीब-क़रीब निश्चलता, फिर मई के ग्यारह दिन, फिर 109 दिन की दूसरी निश्चलता। पिछली बार जब कच्चा तेल इसी तरह चढ़ा था, अप्रैल में 138.21 डॉलर तक, तब पंप का दाम हिला था। इस बार अब तक नहीं हिला। तेल कंपनियों की परंपरा छोटे उतार-चढ़ाव को ख़ुद सोख लेने की रही है, ताकि दाम रोज़ न बदलना पड़े, और मई की चार क़िस्तें बताती हैं कि वह सोखना असीमित नहीं है।

कंपनियों का घाटा और सरकार के पास बची गुंजाइश

रेटिंग एजेंसी इक्रा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सह-समूह प्रमुख प्रशांत वशिष्ठ ने 9 सितंबर को सितंबर के औसत भाव पर हिसाब लगाया। उनके मुताबिक़ पेट्रोल पर विपणन मार्जिन ऋणात्मक 5 रुपये प्रति लीटर है और डीज़ल पर ऋणात्मक 23 रुपये, जबकि घरेलू एलपीजी पर अंडर-रिकवरी 200 रुपये प्रति सिलेंडर।

इक्वाइरस सिक्योरिटीज़ के शोध प्रमुख मौलिक पटेल ने 11 सितंबर को इसी ख़तरे की सूची गिनाई। उनके शब्दों में, अगर कच्चा तेल सौ डॉलर के ऊपर रहा और खुदरा दाम बढ़ाने पर रोक बनी रही, तो कंपनियों को पेट्रोल और डीज़ल पर ऋणात्मक विपणन मार्जिन, एलपीजी पर ज़्यादा अंडर-रिकवरी, कच्चे तेल की ऊँची लैंडिंग लागत, भाड़ा और बीमा, कार्यशील पूँजी और कर्ज़ का बोझ, और तेल के अचानक टूटने पर भंडार का नुक़सान झेलना पड़ सकता है। पटेल के आकलन में एचपीसीएल सबसे कमज़ोर स्थिति में है, क्योंकि उसका रिफ़ाइनिंग और मार्केटिंग अनुपात सिर्फ़ 51 फ़ीसदी है, जबकि बीपीसीएल का 74 और आईओसीएल का 80 फ़ीसदी। एचपीसीएल की डिस्टिलेट यील्ड भी 76 फ़ीसदी है, आईओसीएल की 80 और बीपीसीएल की 85।

विशाखापत्तनम में एचपीसीएल की रिफ़ाइनरी के आधुनिकीकरण के दौरान अवशेष उन्नयन इकाई का रिएक्टर क्रेन से चढ़ाया जाता हुआ, नवंबर 2021 की तस्वीर; ऐसी ही इकाइयाँ तय करती हैं कि एक बैरल कच्चे तेल से कितना डीज़ल और पेट्रोल निकलेगा
तस्वीर: Rajiv Nair EIL, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

कंपनियों के पास सहने की गुंजाइश पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है। पीपीएसी के सार के मुताबिक़ सार्वजनिक क्षेत्र की डाउनस्ट्रीम कंपनियों का शुद्ध मुनाफ़ा 2024-25 के 33,602 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 77,281 करोड़ रुपये हुआ। उसी दौरान तीनों का कर्ज़ घटा। आईओसीएल का कर्ज़ मार्च 2025 के 1,34,466 करोड़ से मार्च 2026 में 1,10,668 करोड़ रुपये पर आया, बीपीसीएल का 23,278 से 10,480 करोड़ पर और एचपीसीएल का 63,323 से 47,599 करोड़ पर।

सरकार के पास टैक्स घटाने की गुंजाइश पहले ही ख़र्च हो चुकी है। 27 मार्च 2026 को पेट्रोल और डीज़ल, दोनों पर उत्पाद शुल्क दस रुपये प्रति लीटर घटाया गया था। पीपीएसी की उसी तारीख़ को जारी तालिका में अब पेट्रोल पर कुल केंद्रीय उत्पाद शुल्क 11.90 रुपये प्रति लीटर है, जिसमें मूल शुल्क 1.40, विशेष अतिरिक्त शुल्क 3.00, कृषि अवसंरचना उपकर 2.50 और सड़क व अवसंरचना उपकर 5.00 रुपये शामिल हैं। डीज़ल पर कुल 7.80 रुपये है, यानी मूल शुल्क 1.80, कृषि उपकर 4.00 और सड़क उपकर 2.00। दिल्ली के 102.12 रुपये के पेट्रोल में केंद्र का शुल्क अब क़रीब 11.7 फ़ीसदी है।

यह कटौती सस्ती नहीं पड़ी। पीपीएसी के आँकड़े में पेट्रोलियम क्षेत्र ने 2025-26 में केंद्रीय राजकोष को 4,75,739 करोड़ रुपये दिए, जो केंद्र की कुल राजस्व प्राप्तियों का 14 फ़ीसदी है, और राज्यों को 3,41,821 करोड़ रुपये, जो उनकी प्राप्तियों का 7 फ़ीसदी।

भंडार वाला विकल्प छोटा है। पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने मार्च 2026 में संसद को लिखित जवाब में बताया कि भारत के पास विशाखापत्तनम में 13.3 लाख टन, मंगलुरु में 15 लाख टन और पादुर में 25 लाख टन, कुल 53.3 लाख टन के रणनीतिक भंडार की क्षमता है, और उस वक़्त उनमें क़रीब 33.7 लाख टन कच्चा तेल था। तेल कंपनियाँ अपने व्यावसायिक भंडार में इससे अलग 64.5 दिन का तेल रखती हैं। पेट्रोलियम संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने मार्च 2026 की अपनी रिपोर्ट में सरकार से भंडार बढ़ाकर 90 दिन की ज़रूरत के बराबर करने को कहा था।

तीसरा सहारा रूसी छूट थी, और कप्लर के रितोलिया के मुताबिक़ रूसी तेल अब प्रीमियम पर बिक रहा है।

आगे का हिसाब इस पर टिका है कि सऊदी अरब से कितना तेल निकल रहा है, और इस पर दो संस्थाएँ आपस में सहमत नहीं हैं। बीबीसी के मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का आँकड़ा सऊदी उत्पादन को जुलाई के 82.4 लाख बैरल रोज़ाना से घटकर अगस्त में 59.7 लाख बैरल पर रखता है। ओपेक, जो यह आँकड़ा सऊदी सरकार से सीधे लेता है, उसे 81.4 लाख से 62.4 लाख बैरल पर बताता है। अगस्त के आँकड़े में दोनों के बीच क़रीब 2.7 लाख बैरल रोज़ाना का फ़र्क़ है। यह फ़र्क़ अभी सुलझा नहीं है। दोनों आँकड़ों में गिरावट बड़ी है।

स्रोतपेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय: चार महानगरों में पेट्रोल और डीज़ल के खुदरा दाम, 16 जून 2017 से 10 सितंबर 2026 तक हर दिन की तालिका, पीपीएसी: भारत के तेल और गैस आँकड़ों का सार, जुलाई 2026 (आयात, निर्यात, आयात निर्भरता, राजकोष में योगदान, ओएमसी का कर्ज़ और मुनाफ़ा), पीपीएसी: केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क तालिका, 27 मार्च 2026 को जारी, पीपीएसी रेडी रेकनर, वित्त वर्ष 2025-26: कच्चे तेल का सालाना आयात मात्रा, डॉलर और रुपये में, और आयात निर्भरता का दशक भर का आँकड़ा, फ़ेडरल रिज़र्व बैंक ऑफ़ सेंट लुइस (FRED), स्रोत अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन: ब्रेंट यूरोप हाज़िर भाव की दैनिक शृंखला, 20 मई 1987 से, अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए), 11 अक्टूबर 2024: बाब अल-मंदेब और केप ऑफ़ गुड होप से गुज़रने वाले तेल के आँकड़े, स्रोत वोर्टेक्सा, ईआईए, 4 दिसंबर 2023: स्वेज़, सुमेद और बाब अल-मंदेब की हिस्सेदारी, और स्वेज़ से दक्षिण जाने वाले तेल में रूस का हिस्सा, बीबीसी हिंदी, 11 सितंबर 2026: पेरिम द्वीप पर क़ब्ज़ा, हूती बयान, अबक़ैक-यानबू पाइपलाइन पर बीबीसी वेरिफ़ाई की सैटेलाइट जाँच, सऊदी उत्पादन पर आईईए और ओपेक के अलग आँकड़े, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 11 सितंबर 2026: इक्वाइरस सिक्योरिटीज़ की रिपोर्ट पर मौलिक पटेल के हवाले से एचपीसीएल, बीपीसीएल और आईओसीएल की तुलना, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 9 सितंबर 2026: इक्रा के प्रशांत वशिष्ठ के हवाले से विपणन मार्जिन और एलपीजी अंडर-रिकवरी के आँकड़े, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 27 अगस्त 2026: कप्लर के आँकड़ों पर सुमित रितोलिया के हवाले से भारत का देशवार कच्चा तेल आयात, बिज़नेस स्टैंडर्ड (पीटीआई), 11 सितंबर 2026: रुपये का दिन भर का दायरा और बंद भाव, एचडीएफ़सी सिक्योरिटीज़ के दिलीप परमार का बयान, द हिंदू, 11 सितंबर 2026: शुरुआती कारोबार में रुपया 95.79, कोटक सिक्योरिटीज़ के अनिंद्य बनर्जी का बयान, गुरुवार का बंद भाव, द हिंदू, 10 सितंबर 2026: ओपेक की मासिक तेल बाज़ार रिपोर्ट में भारत और दुनिया की माँग का अनुमान, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 27 मार्च 2026: पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती, द प्रिंट: पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी का मार्च 2026 में संसद को लिखित जवाब, और पेट्रोलियम संबंधी संसदीय स्थायी समिति की मार्च 2026 की सिफ़ारिश

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।