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कर वसूली सवा ग्यारह फ़ीसदी बढ़ी, राज्यों के खाते में तेरह फ़ीसदी कम पहुँचा

वित्त मंत्रालय की अपनी विज्ञप्ति कहती है कि अप्रैल से जुलाई तक राज्यों को पिछले साल से 56,190 करोड़ रुपये कम मिले। महालेखा नियंत्रक के उन्हीं महीनों के खाते बताते हैं कि कुल वसूली इस बीच बढ़ी है।

कर वसूली सवा ग्यारह फ़ीसदी बढ़ी, राज्यों के खाते में तेरह फ़ीसदी कम पहुँचा

वित्त मंत्रालय ने रविवार को जुलाई 2026 तक के मासिक खाते जारी किए। उसकी विज्ञप्ति में एक वाक्य ऐसा है जिसका आगे कोई हिसाब नहीं दिया गया।

उसमें लिखा है कि इस अवधि में राज्य सरकारों को करों के हिस्से के रूप में 3,72,354 करोड़ रुपये दिए गए, "जो पिछले वर्ष की तुलना में 56,190 करोड़ रुपये कम है"।

यानी पिछले साल इन्हीं चार महीनों में राज्यों को 4,28,544 करोड़ रुपये मिले थे। इस बार तेरह फ़ीसदी कम।

उसी अवधि में वसूली बढ़ी है

महालेखा नियंत्रक अपने पन्नों पर हर मद का महीनेवार आँकड़ा रखता है, पिछले साल के साथ।

सकल कर राजस्व वाले पन्ने पर जुलाई तक की पंक्ति में इस साल 12,18,029 करोड़ रुपये दर्ज हैं। पिछले साल इन्हीं महीनों में 10,92,910 करोड़ थे।

हमारी अपनी गणना में यह 11.4 फ़ीसदी की बढ़त है।

11.4% बनाम −13.1%अप्रैल-जुलाई में कुल कर वसूली की बढ़त, और राज्यों के हिस्से की गिरावट

और केंद्र के पास जो बचा

शुद्ध कर राजस्व वह है जो हस्तांतरण के बाद केंद्र के पास रह जाता है। उसी दस्तावेज़ में जुलाई तक यह 8,44,560 करोड़ रुपये है। पिछले साल 6,61,812 करोड़ था।

हमारी अपनी गणना में 27.6 फ़ीसदी ज़्यादा।

तीनों आँकड़े आपस में जुड़ जाते हैं। सकल वसूली में से राज्यों का हिस्सा घटाइए तो 8,45,675 करोड़ बचते हैं, और दर्ज शुद्ध कर 8,44,560 है। बचा हुआ 1,115 करोड़ उन निधियों में जाता है जो न केंद्र की आय हैं न राज्यों की। पिछले साल यही अंतर 2,554 करोड़ था। दोनों बार यह सकल वसूली के एक चौथाई फ़ीसदी से भी कम है।

एक शर्त जो साथ चलनी चाहिए

राज्यों को पैसा हर महीने बराबर नहीं जाता। वह किश्तों में जाता है, और केंद्र कभी कोई किश्त आगे या पीछे कर देता है। इसलिए चार महीने की तुलना अपने आप ऊपर-नीचे दिख सकती है।

इससे यह नहीं निकलता कि पूरे साल राज्यों को कम मिलेगा।

महालेखा नियंत्रक अपनी ही तालिका के नीचे यही चेतावनी छापता है, राजकोषीय घाटे के बारे में। उसका कहना है कि साल के बीच के महीनों का आँकड़ा पूरे साल का संकेत नहीं होता, क्योंकि प्राप्ति और ख़र्च का समय आपस में मेल नहीं खाता। यही बात हस्तांतरण पर लागू होती है।

हम यह भी नहीं जाँच सके कि पिछले साल इन्हीं महीनों में कोई अतिरिक्त किश्त गई थी या नहीं। इसलिए यह पक्का नहीं कहा जा रहा कि पिछले साल का आँकड़ा असामान्य था।

जो पक्का है वह इतना है कि चार महीने बीतने पर राज्यों के खाते में 56,190 करोड़ रुपये कम पहुँचे हैं, और यह रक़म वित्त मंत्रालय ने ख़ुद छापी है।

बाक़ी खाता

बजट अनुमान के मुक़ाबले शुद्ध कर राजस्व 29.5 फ़ीसदी आ चुका है। साल के चार महीने बीते हैं, यानी 33.3 फ़ीसदी। इस लिहाज़ से कर थोड़ा पीछे है।

पर पिछले साल इसी वक़्त यह 23.3 फ़ीसदी था। दोनों बातें एक साथ सही हैं।

ग़ैर-कर राजस्व बजट का 63.5 फ़ीसदी आ चुका है। यह हर साल पहली तिमाही में भारी रहता है।

राजकोषीय घाटा 4,55,144 करोड़ रुपये है, जो साल के अनुमान का 26.8 फ़ीसदी है। पिछले साल इसी वक़्त 29.9 फ़ीसदी था।

ब्याज भुगतान पर 4,26,566 करोड़ जा चुके हैं। पूँजीगत व्यय 4,50,635 करोड़ रहा। यानी सरकार ने इन चार महीनों में पुराने क़र्ज़ के ब्याज पर लगभग उतना ही ख़र्च किया जितना नई सड़कों, पटरियों और इमारतों पर।

यूरिया की सब्सिडी

सीजीए की सब्सिडी वाली तालिका में यूरिया के आगे 66,058.60 करोड़ रुपये दर्ज हैं। साल का पूरा बजट अनुमान 1,16,799 करोड़ है।

चार महीनों में साल का 57 फ़ीसदी।

पिछले साल इन्हीं महीनों में यह 41,927.11 करोड़ था। सारी बड़ी सब्सिडी मिलाकर अब तक 1,53,513 करोड़ रुपये जा चुके हैं, पिछले साल के 1,13,592 करोड़ के मुक़ाबले।

सीजीए अपने हर पन्ने पर लिखता है कि ये आँकड़े अनंतिम हैं और उनका ऑडिट नहीं हुआ है।

स्रोतवित्त मंत्रालय, विज्ञप्ति, महालेखा नियंत्रक, संघ सरकार के मासिक खाते, जुलाई 2026

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