रिज़र्व बैंक एक लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकों से नक़दी वापस खींच रहा है
11 सितंबर की शाम तीन नीलामियों का ऐलान हुआ: 17 सितंबर को 50 हज़ार करोड़, फिर 21 और 28 सितंबर को 25-25 हज़ार करोड़। उसी सुबह 26 दिन की नीलामी में रिज़र्व बैंक ने पाँच लाख करोड़ माँगे थे और बैंकों ने 60,449 करोड़ दिए। रिवर्स रेपो का पैसा कुछ दिन बाद लौट आता है; बॉन्ड बेचकर निकाली गई रक़म 2029 से पहले नहीं लौटेगी।

बैंकों के पास इस समय ज़रूरत से दस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा पड़े हैं। जिस बैंक की तिजोरी भरी हो उसे आपकी जमा की उतनी ज़रूरत नहीं रहती, और यह असर आँकड़ों में दिखने लगा है। रिज़र्व बैंक की 31 अगस्त की विज्ञप्ति के मुताबिक़ नई सावधि जमा पर बैंकों की औसत ब्याज दर जून के 5.99 फ़ीसदी से घटकर जुलाई में 5.90 फ़ीसदी रह गई। यह आँकड़ा उस रक़म के पहुँचने से पहले का है जो अगस्त के आख़िरी पखवाड़े में आई।
शुक्रवार, 11 सितंबर की शाम रिज़र्व बैंक ने विज्ञप्ति जारी कर बताया कि वह सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग तंत्र से एक लाख करोड़ रुपये वापस खींचेगा। बिक्री तीन क़िस्तों में होगी: 17 सितंबर को 50 हज़ार करोड़, 21 सितंबर को 25 हज़ार करोड़ और 28 सितंबर को 25 हज़ार करोड़।
यह वही पैसा है जो रिज़र्व बैंक ने ख़ुद तीन महीने पहले तंत्र में डलवाया था।
एक लाख करोड़ की बिक्री, तीन क़िस्तों में
विज्ञप्ति संख्या 2026-2027/1106 में लिखा है कि मौजूदा और उभरती नक़दी स्थिति की समीक्षा के बाद कुल एक लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियाँ, यानी वे बॉन्ड जिन पर सरकार तय ब्याज देती है, तीन क़िस्तों में बेची जाएँगी। तीनों तारीख़ें विज्ञप्ति में ही दर्ज हैं और तीनों सितंबर के भीतर हैं।
17 सितंबर वाली पहली नीलामी में छह प्रतिभूतियाँ रखी गई हैं: 7.59% जीएस 2029, जो 20 मार्च 2029 को परिपक्व होती है; 6.79% जीएस 2029 (26 दिसंबर 2029); 7.61% जीएस 2030 (9 मई 2030); 5.77% जीएस 2030 (3 अगस्त 2030); 6.68% जीएस 2031 (17 सितंबर 2031); और 8.28% जीएस 2032 (15 फ़रवरी 2032)। विज्ञप्ति में कोष्ठक में यह भी लिखा है कि किसी एक प्रतिभूति के लिए अलग से रक़म तय नहीं की गई है। कौन-सा बॉन्ड कितना बिकेगा, यह रिज़र्व बैंक बोलियाँ देखकर तय करेगा, और उसने अपने पास यह अधिकार भी रखा है कि घोषित रक़म से कम स्वीकार करे या सारी बोलियाँ बिना कारण बताए ख़ारिज कर दे।
छहों बॉन्ड 2029 और 2032 के बीच परिपक्व होते हैं। यह आज से ढाई से साढ़े पाँच साल के बीच का हिस्सा है, और यही वह जगह है जहाँ बैंकों की अपनी लागत और कंपनियों के मियादी क़र्ज़ की दरें बनती हैं। तीस या चालीस साल की परिपक्वता वाला कोई बॉन्ड इस सूची में नहीं है, जबकि उसी शुक्रवार सुबह सरकार ने 2056 में पकने वाला नया बॉन्ड बेचा था।

नीलामी बहु-प्रतिभूति होगी और बहु-मूल्य पद्धति से। हर सफल बोलीदाता को अपनी ही बोली वाला भाव मिलेगा, सबको एक साझा भाव नहीं। बोलियाँ 17 सितंबर की सुबह 9:30 से 10:30 के बीच ई-कुबेर पर लगेंगी, नतीजा उसी दिन आ जाएगा, और सफल बैंकों को 18 सितंबर की दोपहर 12 बजे तक अपने चालू खाते में पैसा रखना होगा। विज्ञप्ति पर मुख्य महाप्रबंधक ब्रिज राज के हस्ताक्षर हैं।
एक लाख करोड़ रुपये और एक ट्रिलियन रुपया एक ही संख्या है। अंग्रेज़ी अख़बारों में यही रक़म "₹1 trillion" लिखी मिलेगी, और ब्लूमबर्ग ने इसे 10.5 अरब डॉलर के बराबर बताया। दो अलग आँकड़े नहीं हैं, एक ही रक़म की दो लिखावटें हैं।
बैंकों ने 26 दिन के लिए पैसा नहीं दिया
बिक्री का फ़ैसला उसी दिन की दो नीलामियों के बाद आया, और दोनों के नतीजे रिज़र्व बैंक की अपनी विज्ञप्तियों में दर्ज हैं।
शुक्रवार सुबह 26 दिन की वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो नीलामी रखी गई, जिसमें बैंक अपना अतिरिक्त पैसा रिज़र्व बैंक के पास रखकर ब्याज कमा सकते थे। घोषित रक़म पाँच लाख करोड़ रुपये थी। बोलियाँ आईं 60,449 करोड़ की, यानी जितना माँगा गया उसका आठवाँ हिस्सा भी नहीं। उसी दिन चार दिन की एक और नीलामी हुई, फिर पाँच लाख करोड़ की, और उसमें 3,44,864 करोड़ रुपये आ गए। दोनों में कटऑफ़ दर एक ही रही, 5.24 फ़ीसदी। चार दिन पहले 30 दिन की नीलामी में भी यही हुआ था, जहाँ सात लाख करोड़ के बदले 2,59,276 करोड़ मिले थे।
बैंक चार दिन के लिए पैसा ख़ुशी से दे रहे हैं और 26 दिन के लिए नहीं। दोनों बार दर एक ही थी, इसलिए यह दर का मामला नहीं है।
इस बीच बाज़ार में एक रात का पैसा उस दर से नीचे चल रहा है जिस पर रिज़र्व बैंक ख़ुद जमा लेता है। 10 सितंबर की स्थिति बताने वाली विज्ञप्ति में एक रात के पूरे खंड की भारित औसत दर 4.60 फ़ीसदी दर्ज है, ट्राइपार्टी रेपो 4.65 और बाज़ार रेपो 4.44, जबकि स्थायी जमा सुविधा की दर 5.00 फ़ीसदी है और रेपो दर 5.25। 3 सितंबर की विज्ञप्ति में यही औसत 4.46 फ़ीसदी है और उस दिन के सौदों की सीमा 0.01 से 5.35 फ़ीसदी तक दर्ज है। जिस दर को रिज़र्व बैंक फ़र्श मानता है, पैसा उससे नीचे मिल रहा है।
बॉन्ड बिक्री की विज्ञप्ति का क्रमांक 2026-2027/1106 है। उसके बाद जारी हुई विज्ञप्ति 2026-2027/1108 में 15 सितंबर के लिए पाँच लाख करोड़ की एक रात की नीलामी रखी गई है। पुराना औज़ार बंद नहीं हुआ, उसके साथ नया औज़ार जोड़ दिया गया है।
बिक्री स्थायी है, रिवर्स रेपो अस्थायी
रिवर्स रेपो में बैंक अपना पैसा रिज़र्व बैंक के पास कुछ दिन के लिए रखता है और उस पर ब्याज पाता है। तय दिन आने पर पूरी रक़म ब्याज समेत बैंक के पास लौट आती है। नक़दी तंत्र से निकलती नहीं, कुछ दिन के लिए एक खाते से दूसरे खाते में जाती है और फिर वापस आ जाती है। 7 सितंबर वाली नीलामी का 2,59,276 करोड़ 7 अक्टूबर को बैंकों के पास लौट आएगा।
खुले बाज़ार की बिक्री में ऐसा नहीं होता। बैंक रिज़र्व बैंक को रुपये देता है और बदले में सरकारी बॉन्ड लेता है। बॉन्ड बैंक की किताब में बैठ जाता है, रुपये रिज़र्व बैंक के पास चले जाते हैं, और लौटने की कोई तारीख़ तय नहीं होती। 17 सितंबर वाली नीलामी का सबसे पहले पकने वाला बॉन्ड मार्च 2029 में परिपक्व होता है। नीति की भाषा में इसी फ़र्क़ को टिकाऊ और क्षणिक नक़दी कहते हैं। 10 सितंबर की विज्ञप्ति में उस दिन का कुल अवशोषण 10,43,432.89 करोड़ रुपये दर्ज है, और उसी पन्ने पर टिकाऊ नक़दी का अलग ख़ाना है जिसमें 15 अगस्त 2026 की स्थिति लिखी है, 8,05,736 करोड़ रुपये का अधिशेष; एक महीने पहले, 15 जुलाई को, यही आँकड़ा 5,36,080 करोड़ था।
दूसरा फ़र्क़ बॉन्ड की क़ीमत पर पड़ता है, और यही वह जगह है जहाँ आम कर्ज़दार तक असर पहुँचता है। रिवर्स रेपो में कोई बॉन्ड हाथ नहीं बदलता, इसलिए बाज़ार में बॉन्ड की आपूर्ति नहीं बढ़ती। बिक्री में एक लाख करोड़ के बॉन्ड बाज़ार में और आ जाएँगे। आपूर्ति बढ़े तो बॉन्ड का भाव गिरता है, और बॉन्ड का भाव गिरने का मतलब उस पर मिलने वाला प्रतिफल बढ़ना है। प्रतिफल वह सालाना कमाई है जो बॉन्ड आज के भाव पर ख़रीदने वाले को मिलेगी।
रिज़र्व बैंक ने बेचने के लिए जो छह बॉन्ड चुने हैं वे ढाई से साढ़े पाँच साल वाले हिस्से के हैं। यानी दबाव उसी हिस्से पर पड़ेगा जहाँ बैंक अपने मियादी क़र्ज़ की क़ीमत तय करते हैं, न कि तीस साल वाले हिस्से पर जहाँ बीमा कंपनियाँ और पेंशन कोष ख़रीदते हैं।
पाँच साल की जमा, और निकासी की समस्या
यह अधिशेष कहाँ से आया, यह ख़बर पुरानी है। 8 जून को रिज़र्व बैंक ने प्रवासी भारतीयों की विदेशी मुद्रा जमा, यानी एफ़सीएनआर(बी), के लिए विशेष डॉलर-रुपया स्वैप खिड़की खोली थी। बैंकों ने डॉलर जुटाकर रिज़र्व बैंक को दिए और बदले में रुपये लिए। 31 अगस्त तक इस रास्ते से 127.23 अरब डॉलर की जमा आई, खिड़की समय से महीना भर पहले बंद करनी पड़ी, और वे रुपये बैंकों की तिजोरी में पड़े हैं।
इस कहानी का नया हिस्सा अवधि का है, और वही तय करता है कि पैसा कब तक पड़ा रहेगा। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को सीएनबीसी-टीवी18 से कहा कि इन जमाओं में 48.50 फ़ीसदी पाँच साल की हैं, क़रीब 42 फ़ीसदी तीन साल से लेकर चार साल से कम अवधि की, और बाक़ी क़रीब 9 फ़ीसदी चार से पाँच साल के बीच की।
एक भी रुपया 2029 से पहले वापस नहीं जाना है।
रिज़र्व बैंक ने यह भी कहा है कि कुछ नक़दी समय के साथ अपने आप निकल जाएगी। जब जमा की सबसे छोटी अवधि तीन साल हो, वह अपने आप निकलना 2029 से पहले शुरू नहीं होगा। इसीलिए एक रात या चार दिन की नीलामी इस समस्या का नाप नहीं है: तीन साल के लिए आई रक़म को चार दिन के औज़ार से सँभालने का मतलब है वही नीलामी हर चौथे दिन दोहराना।
बैंक इसे जानते हैं और अपने हिसाब से चल रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष सी एस सेट्टी ने 10 सितंबर को मुंबई में कहा कि पूरी रक़म लगाने में तीन से चार महीने लगेंगे और इससे कोई असामान्य कर्ज़दारी नहीं होगी। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने बैंकवार आँकड़े भी छापे: आईसीआईसीआई बैंक 17.9 अरब डॉलर, बैंक ऑफ़ बड़ौदा लगभग 8 अरब, आईडीएफ़सी फ़र्स्ट 3.5 अरब, आरबीएल 3.4 अरब, बैंक ऑफ़ इंडिया 2.33 अरब (उसी अख़बार की शीर्षक पंक्ति में यह 2.4 अरब है), इंडियन बैंक 2.3 अरब और सेंट्रल बैंक 92.5 करोड़ डॉलर।
स्वैप की क़ीमत और सीआरआर की छूट
8 जून के परिपत्र (क्रमांक FMOD.MAOG.No.S-56) में स्वैप की शर्तें एक-एक कर लिखी हैं। बैंक रिज़र्व बैंक को दस लाख डॉलर के गुणकों में डॉलर बेचेगा, भाव एफ़बीआईएल संदर्भ दर वाला होगा, और तीन से पाँच साल बाद वही डॉलर वापस ख़रीदेगा। परिपत्र का वाक्य है कि दूसरा चरण पहले चरण वाली दर पर ही होगा और स्वैप सममूल्य पर किया जाएगा।
इस एक वाक्य में पूरी रियायत रखी है। आम तौर पर कोई बैंक तीन साल बाद डॉलर वापस ख़रीदने का सौदा आज करता है तो उसे आगे का प्रीमियम चुकाना पड़ता है, क्योंकि रुपया आम तौर पर कमज़ोर होता है। यहाँ प्रीमियम शून्य है। रुपया पाँच साल में जहाँ भी पहुँचे, बैंक को डॉलर उसी भाव पर मिलेंगे जिस भाव पर उसने बेचे थे।
उसी 8 जून को उसी विभाग ने एक और परिपत्र निकाला (क्रमांक S-57), जिसमें सरकारी कंपनियों के विदेशी क़र्ज़ और बैंकों की विदेशी उधारी के लिए ठीक यही सुविधा दी गई। उसमें दर लिखी है: 1.5 फ़ीसदी सालाना, छमाही आधार पर चक्रवृद्धि। एक ही दिन, एक ही तरह का सौदा, दो अलग क़ीमतें। एफ़सीएनआर(बी) वाली मुफ़्त।
रियायत यहीं ख़त्म नहीं होती। 17 जून के परिपत्र से तीन से पाँच साल की नई एफ़सीएनआर(बी) जमा पर ब्याज दर की ऊपरी सीमा 30 सितंबर तक के लिए हटा दी गई। सामान्य नियम में यह सीमा संबंधित मुद्रा की ओवरनाइट दर से 350 आधार अंक ऊपर तक है। सीमा हटते ही बैंक जो चाहें दे सकते थे, और बिज़नेस स्टैंडर्ड के मुताबिक़ कुछ बैंकों ने पाँच साल की जमा पर 7 फ़ीसदी से ऊपर की दर दी।
तीसरी रियायत सबसे कम चर्चा में आई। 8 जून के ही एक और परिपत्र (क्रमांक DOR.RET.REC.84) से तय हुआ कि 8 जून और 30 सितंबर के बीच जुटाई गई तीन से पाँच साल की एफ़सीएनआर(बी) जमा पर न नक़दी आरक्षित अनुपात लगेगा, न सांविधिक तरलता अनुपात। सीआरआर वह हिस्सा है जो बैंक को रिज़र्व बैंक के पास बिना ब्याज रखना होता है; एसएलआर वह हिस्सा जिससे बैंक को सरकारी प्रतिभूतियाँ ख़रीदनी होती हैं। रिज़र्व बैंक के अपने डेटा पृष्ठ पर इस समय सीआरआर 3 फ़ीसदी है और एसएलआर 18 फ़ीसदी।
11 सितंबर के बंद भाव 95.57 रुपये प्रति डॉलर पर गिनें तो 127.23 अरब डॉलर क़रीब 12.16 लाख करोड़ रुपये बैठते हैं। छूट न होती तो इस पर क़रीब 36,500 करोड़ सीआरआर में बँध जाते और क़रीब 2.19 लाख करोड़ की सरकारी प्रतिभूतियाँ बैंकों को ख़रीदनी पड़तीं। यह गणना मौजूदा अनुपातों पर है और समझाने के लिए है, क्योंकि डॉलर तीन महीने में अलग-अलग भावों पर आए। इतना भर देखने के लिए कि रिज़र्व बैंक जो एक लाख करोड़ अब बेचने जा रहा है, अकेली एसएलआर की छूट ने उससे दोगुने से ज़्यादा की ख़रीद अपने आप रुकवा दी थी।
जमा दरें किधर जाएँगी
रिज़र्व बैंक हर महीने बैंकों की जमा और ऋण दरें छापता है। 31 अगस्त की विज्ञप्ति में जुलाई के आँकड़े हैं।
| दर | किस महीने की | कितनी |
|---|---|---|
| नई सावधि जमा पर भारित औसत | जुलाई 2026 | 5.90 फ़ीसदी |
| नई सावधि जमा पर भारित औसत | जून 2026 | 5.99 फ़ीसदी |
| चल रही सावधि जमा पर भारित औसत | जुलाई 2026 | 6.58 फ़ीसदी |
| नए रुपया क़र्ज़ पर भारित औसत | जुलाई 2026 | 8.52 फ़ीसदी |
| चल रहे रुपया क़र्ज़ पर भारित औसत | जुलाई 2026 | 8.97 फ़ीसदी |
| एक साल का माध्य एमसीएलआर | अगस्त 2026 | 8.70 फ़ीसदी |
| एक साल का माध्य एमसीएलआर | जुलाई 2026 | 8.60 फ़ीसदी |
| एक साल का माध्य एमसीएलआर | जून 2026 | 8.50 फ़ीसदी |
नई जमा वाली पंक्ति जमाकर्ता के लिए है। मई में यह दर 5.83 फ़ीसदी थी, जून में 5.99 हुई और जुलाई में 5.90 पर आ गई। पुरानी चल रही जमा पर औसत 6.58 फ़ीसदी पर टिकी रही, क्योंकि पुरानी जमा पर दर तय हो चुकी होती है और परिपक्वता तक नहीं बदलती।
यह आँकड़ा जुलाई तक का है। एफ़सीएनआर(बी) का सबसे बड़ा रेला अगस्त के दूसरे पखवाड़े में आया, और साप्ताहिक सांख्यिकीय पूरक के मुताबिक़ उसी पखवाड़े में बैंकों की कुल जमा 10,88,214 करोड़ रुपये बढ़ी, जबकि उससे पिछले पखवाड़े में वह 6,534 करोड़ घटी थी। साल भर पहले से तुलना का आँकड़ा 14.7 फ़ीसदी से उछलकर 17.8 फ़ीसदी हो गया। इसका असर सितंबर और अक्टूबर की दर-विज्ञप्तियों में दिखेगा, जो अभी छपी नहीं हैं।

बैंक इस पैसे का क्या करेंगे, यह उन्होंने ख़ुद बताया है। बैंक ऑफ़ इंडिया से जुड़े सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को कहा कि रक़म क़र्ज़ देने और महँगी देनदारियाँ बदलने में लगेगी, और बैंक अगले कुछ महीनों में जमा प्रमाणपत्र बाज़ार में शायद न जाए। इंडियन बैंक के बारे में उसी रिपोर्ट में लिखा है कि पैसा रुपया नक़दी की ज़रूरत पूरी करने, क़र्ज़ देने और थोक जमा का बोझ घटाने में जा रहा है। थोक जमा आम बचतकर्ता की जमा नहीं होती, वह कंपनियों और संस्थाओं की बड़ी रक़म होती है। पर बैंक की कुल लागत जब गिरती है तो उसे छोटी जमा पर ऊँची दर देने की ज़रूरत भी घटती है।
ऋण-जमा अनुपात में यह दिखने लगा है। रिज़र्व बैंक के डेटा पृष्ठ के मुताबिक़ 15 अगस्त को समाप्त पखवाड़े में यह अनुपात 81.72 था और 31 अगस्त को 80.32 रह गया। वृद्धिशील ऋण-जमा अनुपात, जो सिर्फ़ नई जमा और नए क़र्ज़ का हिसाब रखता है, 92.22 से गिरकर 62.56 पर आ गया। बचत खाते की दर इस पूरे दौर में 2.50 फ़ीसदी पर जमी रही है, और एक साल से ऊपर की सावधि जमा पर बड़े बैंकों की दरों का दायरा 6.00 से 6.75 फ़ीसदी दर्ज है।
ईएमआई पर असर और बॉन्ड बाज़ार का संदेश
क़र्ज़ वाली पंक्तियाँ उल्टी दिशा में चल रही हैं। नए रुपया क़र्ज़ पर भारित औसत ब्याज दर जुलाई में 8.52 फ़ीसदी रही, जून में 8.53 थी, यानी एक आधार अंक की हलचल। एक साल के एमसीएलआर का माध्य, जो बैंकों की अपनी लागत पर बनता है और जिससे बहुत सारे पुराने होम लोन जुड़े हैं, जून में 8.50 फ़ीसदी था, जुलाई में 8.60 और अगस्त में 8.70 पर पहुँच गया। तीन महीने में लगातार चढ़ाई, उस दौर में जब बैंकों के पास पैसा फ़ालतू था।
यहाँ दो तरह के क़र्ज़ अलग करके देखने होंगे। रेपो से जुड़े क़र्ज़ तब तक नहीं हिलते जब तक मौद्रिक नीति समिति रेपो दर न बदले, और रेपो दर 5.25 फ़ीसदी पर चार बैठकों से टिकी है। एमसीएलआर से जुड़े क़र्ज़ बैंक की अपनी लागत के साथ चलते हैं और तय अंतराल पर दोबारा तय होते हैं, इसलिए अगस्त की बढ़ोतरी उन ग्राहकों तक उनकी अगली रीसेट तारीख़ पर पहुँचेगी। अधिशेष नक़दी से ईएमआई घटने का कोई रास्ता इन दोनों में नहीं निकलता।
बॉन्ड बाज़ार का संदेश भी नरमी का नहीं है। बिज़नेस स्टैंडर्ड के मुताबिक़ शुक्रवार को दस साल के सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल 5 आधार अंक चढ़कर 7.01 फ़ीसदी पर बंद हुआ, जो 3 जून के बाद पहली बार 7 फ़ीसदी के पार गया; पाँच साल का प्रतिफल 7 अंक चढ़कर 6.59 फ़ीसदी रहा।
शुक्रवार सुबह की सरकारी नीलामी का नतीजा इसी दबाव को दूसरी तरफ़ से दिखाता है। सरकार ने 6.20% जीएस 2029 के 11 हज़ार करोड़ रुपये बेचने रखे थे। कटऑफ़ प्रतिफल 6.4031 फ़ीसदी पर बैठा और स्वीकार सिर्फ़ 4,505.529 करोड़ रुपये किए गए, यानी घोषित रक़म का 41 फ़ीसदी। यही बॉन्ड 14 अगस्त को 6.2000 फ़ीसदी पर जारी हुआ था। चार हफ़्ते में उसी काग़ज़ पर बाज़ार 20 आधार अंक ज़्यादा माँग रहा था, और सरकार ने उस भाव पर पूरा माल बेचने से इनकार कर दिया।
उसी शाम रिज़र्व बैंक ने 2029 से 2032 तक के 50 हज़ार करोड़ के बॉन्ड 17 सितंबर को बेचने की घोषणा कर दी।
मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक
समिति की 62वीं बैठक 3 से 5 अगस्त को हुई थी। छहों सदस्यों ने सर्वसम्मति से रेपो दर 5.25 फ़ीसदी पर बनाए रखी, रुख़ तटस्थ रखा, और 2026-27 के लिए उपभोक्ता महँगाई का अनुमान 5.0 फ़ीसदी रखा जिसमें तीसरी तिमाही का 5.9 फ़ीसदी सबसे ऊँचा है। प्रस्ताव की आख़िरी पंक्ति में अगली बैठक की तारीख़ है: 5 से 7 अक्टूबर 2026।
गवर्नर ने शुक्रवार को कहा कि समिति उस बैठक में विकास और महँगाई के समीकरण का नया आकलन करेगी, और अपनी राय देने से इनकार कर दिया। कच्चे तेल पर उन्होंने कहा कि इंडियन बास्केट का औसत जुलाई में 82 डॉलर प्रति बैरल था और अगस्त में 90 डॉलर। उसी दिन की दूसरी रिपोर्टों में कच्चा तेल 100 डॉलर से ऊपर बताया गया है; वह आज का हाज़िर भाव है, गवर्नर वाला आँकड़ा महीने का औसत।
भारतीय स्टेट बैंक के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने अपने नोट में लिखा कि अक्टूबर की बैठक में 0.25 फ़ीसदी की बढ़ोतरी होनी चाहिए और दिसंबर में उतनी ही और।
रुपया और मुद्रा जोखिम का बँटवारा
रुपया शुक्रवार को 95.57 पर बंद हुआ, 5 पैसे नीचे, और यह लगातार पाँचवाँ सत्र था जिसमें वह गिरा। एक दिन पहले वह 38 पैसे गिरकर 95.46 पर बंद हुआ था। 127 अरब डॉलर आने के बाद भी भाव वहीं है। जो चीज़ बदली वह भंडार है।
दबाव कहाँ से आ रहा है, यह रिज़र्व बैंक के भुगतान संतुलन के आँकड़े में लिखा है। अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों ने शुद्ध रूप से 9.6 अरब डॉलर निकाले, जबकि पिछले साल इसी तिमाही में 1.6 अरब डॉलर आए थे। व्यापार घाटा 68.9 अरब डॉलर से बढ़कर 86.1 अरब हो गया, जिसमें अकेले पेट्रोलियम का आयात 60.6 अरब डॉलर का था।

मुद्रा का जोखिम दो हिस्सों में बँटा है। मूलधन पर रिज़र्व बैंक ने ले लिया है, क्योंकि डॉलर उसी भाव पर लौटाने का वादा उसका है। ब्याज पर नहीं। द हिंदू की 10 सितंबर की व्याख्या के मुताबिक़, जो रॉयटर्स के हवाले से लिखी गई है, जमा पर ब्याज डॉलर में देना है और वे डॉलर बैंकों को ख़ुद जुटाने हैं। विदेशी बैंक इस जोखिम की हेजिंग कर रहे हैं, जबकि ज़्यादातर सरकारी और कई निजी भारतीय बैंकों ने इसे खुला छोड़ा है, क्योंकि हेजिंग की लागत क़रीब 3 फ़ीसदी सालाना बैठती है। मान लीजिए किसी बैंक को दस लाख डॉलर ब्याज देना है। 95 रुपये के भाव पर यह 9.5 करोड़ रुपये है, 100 रुपये पर 10 करोड़।
रिज़र्व बैंक की अपनी लागत कितनी है, इस पर दो पक्ष आमने-सामने हैं। बोफ़ा सिक्योरिटीज़ रिसर्च और एसबीआई रिसर्च, दोनों ने हेजिंग की लागत क़रीब 3 फ़ीसदी सालाना मानकर हिसाब लगाया। एसबीआई रिसर्च ने 65 से 70 अरब डॉलर की जुटान मानते हुए सालाना लागत 2.1 अरब डॉलर और पाँच साल में 10.5 अरब डॉलर निकाली थी; असल जुटान 127.23 अरब डॉलर निकली, यानी उस मान्यता से लगभग दोगुनी। गवर्नर इस तरीक़े से असहमत हैं। उन्होंने कहा कि तीन साल के बेंचमार्क फ़ॉरवर्ड प्रीमियम से तुलना सही तरीक़ा नहीं है, वह बाज़ार पतला है और साल भर में गिने-चुने सौदे होते हैं, और यह क़ीमत उचित थी। उन्होंने यह भी कहा कि डॉलर विदेश में सरकारी प्रतिभूतियों में लगेंगे और शुद्ध हिसाब में रिज़र्व बैंक की आमदनी बढ़ेगी। बोफ़ा के अनुमान में भी भंडार पर 4.5 से 5 फ़ीसदी की कमाई दिखाई गई है।
8 जून के परिपत्र में एक शर्त और है, जिसका वक़्त अगले साल से शुरू होगा। जमा पर एक साल का लॉक-इन है, यानी 2027 की गर्मियों से बैंक चाहे तो समय से पहले निकासी दे सकता है, पर रिज़र्व बैंक के साथ किया गया स्वैप रद्द नहीं हो सकता। जिस बैंक की जमा जल्दी निकल जाए, उसका स्वैप अपनी पूरी अवधि तक चलता रहेगा।
स्रोतरिज़र्व बैंक, 11 सितंबर 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/1106: खुले बाज़ार की कार्रवाई में बिक्री की घोषणा, तीनों क़िस्तें, छहों प्रतिभूतियाँ और नीलामी की प्रक्रिया, रिज़र्व बैंक, 11 सितंबर 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/1096: 26 दिन की वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो नीलामी का नतीजा, रिज़र्व बैंक, 11 सितंबर 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/1099: चार दिन की नीलामी का नतीजा, रिज़र्व बैंक, 11 सितंबर 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/1108: 15 सितंबर की एक रात की नीलामी की घोषणा, रिज़र्व बैंक, मुद्रा बाज़ार की कार्रवाइयाँ, 10 सितंबर 2026 की स्थिति, विज्ञप्ति 2026-2027/1094: एलएएफ़ का शुद्ध अवशोषण, एक रात की दरें, टिकाऊ नक़दी का आँकड़ा, रिज़र्व बैंक परिपत्र RBI/2026-27/99, FMOD.MAOG.No.S-56/01.06.016/2026-27, 8 जून 2026: एफ़सीएनआर(बी) जमा के लिए स्वैप सुविधा, सममूल्य वाली शर्त, एक साल का लॉक-इन, स्वैप रद्द न होने का नियम, रिज़र्व बैंक परिपत्र RBI/2026-27/100, FMOD.MAOG.No.S-57/01.06.016/2026-27, 8 जून 2026: ईसीबी और ओएफ़सीबी के लिए वही स्वैप, 1.5 फ़ीसदी सालाना की दर पर, रिज़र्व बैंक परिपत्र RBI/2026-27/102, DOR.RET.REC.84/12.01.001/2026-27, 8 जून 2026: सीआरआर और एसएलआर से छूट, रिज़र्व बैंक परिपत्र RBI/2026-27/138, DOR.SOG(SPE).REC.117/13.03.00/2026-27, 17 जून 2026: तीन से पाँच साल की एफ़सीएनआर(बी) जमा पर ब्याज दर की सीमा का अस्थायी हटना, रिज़र्व बैंक, गवर्नर का वक्तव्य, 5 जून 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/386: हेजिंग लागत उठाने की घोषणा और नीतिगत दरें, रिज़र्व बैंक, मौद्रिक नीति समिति का प्रस्ताव, 3 से 5 अगस्त 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/809: रेपो 5.25 फ़ीसदी, तटस्थ रुख़, महँगाई के अनुमान, अगली बैठक की तारीख़, रिज़र्व बैंक, 31 अगस्त 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/1003: अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की जमा और ऋण दरें, जुलाई 2026 के आँकड़े और अगस्त का एमसीएलआर, रिज़र्व बैंक, साप्ताहिक सांख्यिकीय पूरक, 11 सितंबर 2026: 31 अगस्त तक बैंकों की कुल जमा और ऋण, रिज़र्व बैंक, साप्ताहिक सांख्यिकीय पूरक, 28 अगस्त 2026: 15 अगस्त तक की तुलना वाली स्थिति, रिज़र्व बैंक, राष्ट्रीय सारांश डेटा पृष्ठ, 11 सितंबर 2026: सीआरआर, एसएलआर, नीतिगत दरें, बचत और सावधि जमा दरों का दायरा, ऋण-जमा अनुपात, रिज़र्व बैंक, 11 सितंबर 2026, विज्ञप्ति 2026-2027/1101: सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी का पूरा नतीजा और आंशिक स्वीकृति, रिज़र्व बैंक, 14 अगस्त 2026: नई जीएस 2029 के जारी होने का प्रतिफल, रिज़र्व बैंक, 1 सितंबर 2026: अप्रैल से जून 2026 का भुगतान संतुलन, एफ़पीआई की निकासी, व्यापार घाटा और पेट्रोलियम आयात, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 11 सितंबर 2026: दस साल का प्रतिफल 7.01 फ़ीसदी, पाँच साल का 6.59 फ़ीसदी, गवर्नर के इंटरव्यू की बातें और एसबीआई के मुख्य आर्थिक सलाहकार का आकलन, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 11 सितंबर 2026: गवर्नर संजय मल्होत्रा का सीएनबीसी-टीवी18 को इंटरव्यू, अवधि का बँटवारा, क़ीमत पर उनका जवाब और बैंकवार आँकड़े, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 11 सितंबर 2026: बैंक ऑफ़ इंडिया, इंडियन बैंक और सेंट्रल बैंक ने कितना जुटाया और पैसा कहाँ लगाएँगे, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 10 सितंबर 2026: एसबीआई के अध्यक्ष सी एस सेट्टी का बयान कि पैसा लगाने में तीन से चार महीने लगेंगे, द हिंदू, 10 सितंबर 2026: मुद्रा जोखिम किसके खाते में है, बोफ़ा सिक्योरिटीज़ और एसबीआई रिसर्च के अनुमान, रॉयटर्स के हवाले से हेजिंग की स्थिति, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 11 सितंबर 2026: रुपये का बंद भाव 95.57 और लगातार पाँचवें सत्र की गिरावट, पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड में 11 सितंबर 2026: गवर्नर का कच्चे तेल और अगली बैठक पर बयान