हर सोमवार
क़लम
हर सोमवार एक लेखक या कवि — वे जिन्हें हिंदी का पाठक आधा याद रखता है।
6 कड़ियाँ · इत्मीनान में छपती है- हतभाग्य, असंयमी, पापिष्ठदेवदास के अंत में शरतचंद्र ने अपने नायक के लिए ख़ुद यही बांग्ला शब्द रखे थे; अंग्रेज़ी अनुवाद और मूल बांग्ला दोनों द डेली स्टार में माधुरिमा सेन के लेख (21 सितंबर 2026) में उद्धृत मिले शरतचंद्र ने हिंदी में कभी कुछ नहीं लिखा, और हिंदी के पाठकों ने उन्हें अपना बना लियापंद्रह सितंबर को उनकी डेढ़ सौवीं जयंती पर प्रधानमंत्री ने श्रद्धांजलि दी। देवदास और श्रीकांत के जिन हिंदी अनुवादों ने बंगाल के बाहर उनका पाठक बनाया, उनके प्रकाशक या अनुवादक का नाम किसी पुष्ट स्रोत में दर्ज नहीं मिला।
- भाषा की यह अनस्थिरता बहुत ही हानिकारिणी है'सरस्वती', पुस्तक 6, 1905, लेख 'भाषा और व्याकरण'; लेखक का नाम नहीं, सिर्फ़ 'सम्पादक' झाँसी के एक तार बाबू ने इलाहाबाद के दफ़्तर से तय किया कि हिंदी गद्य किस शक्ल में लिखा जाएगामहावीर प्रसाद द्विवेदी ने जनवरी 1903 से दिसंबर 1920 तक 'सरस्वती' का संपादन किया। भेजी हुई रचनाएँ वे बिना पूछे सुधार देते थे। नवंबर 1905 के एक लेख में उनका लिखा एक शब्द डेढ़ साल की सार्वजनिक लड़ाई की जड़ बना।
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सुभद्रा कुमारी चौहान की आठ पंक्तियाँ सब जानते हैं, और उनकी कहानियाँ कोई नहीं
झाँसी वाली कविता ने अपनी लेखिका को खा लिया। पीछे जो रह गया वह दो कहानी-संग्रह हैं, जेल की दो सज़ाएँ, और 43 की उम्र में एक सड़क दुर्घटना।
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भंग पीने वाले एक काल्पनिक आदमी ने वायसराय को चिट्ठियाँ लिखीं, और वह आज ग्यारहवीं में पढ़ाई जाती हैं
बालमुकुंद गुप्त ने 1903 से 1905 के बीच भारतमित्र में लॉर्ड कर्जन के नाम खुली चिट्ठियाँ छापीं। लिखने वाला वे नहीं थे, शिवशंभु नाम का एक किरदार था। यह चतुराई मज़ाक़ की भी थी और बचाव की भी।
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नवाब राय की किताब जलाई गई, और धनपत राय को नया नाम लेना पड़ा
प्रेमचंद ने पहले उर्दू में लिखा, फिर हिंदी में। एक ही उपन्यास के दोनों रूपों को साथ रखकर पढ़िए तो पता चलता है कि बदलाव सिर्फ़ लिपि का नहीं था।
- कबीर जाति जुलाहा किआ करै हिरदै बसे गुपालगुरु ग्रंथ साहिब के 243 कबीर-सलोकों में से एक, संकलन 1604 कबीर तीन जगह बचे हैं, और सबसे नई पोथी उसी पंथ की है जो उनके नाम से चलता हैगुरु ग्रंथ साहिब 1604 का है और उसकी मूल प्रति आज भी मौजूद है। बीजक की कोई पांडुलिपि 1800 से पहले की नहीं मिली। कबीरपंथ का अपना ग्रंथ तीनों में सबसे देर का लिखा हुआ है।
आगे किसकी बारी
तय है, बदल भी सकता है। हर सोमवार को एक।
- 1मीराबाई
- 2सूरदास
- 3तुलसीदास
- 4रैदास
यह सिलसिला इत्मीनान डेस्क से आता है। बाक़ी सिलसिले यहाँ।