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बेरोज़गारी की दो दरें, एक ही सर्वेक्षण: 3.2 फ़ीसदी 365 दिन गिनती है, 5.0 सात दिन

शनिवार, 19 सितंबर की शाम चेन्नई में केंद्रीय राज्य मंत्री एल. मुरुगन ने कहा कि बेरोज़गारी दर 6 फ़ीसदी से घटकर 3.2 फ़ीसदी हो गई है। चार दिन पहले उसी सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय ने अगस्त 2026 की दर 5.0 फ़ीसदी छापी थी। दोनों आँकड़े एक ही सर्वेक्षण से आते हैं और दोनों सही हैं, क्योंकि वे एक ही आबादी से दो अलग सवाल पूछते हैं।

यह तस्वीर 2017 में सिलवासा के एक रोज़गार मेले की है, चेन्नई की शनिवार वाली नहीं; नियुक्ति पत्र सौंपने का वही मंच हर मेले में दोहराया जाता है।
तस्वीर: Prime Minister's Office, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

शनिवार, 19 सितंबर की शाम चेन्नई के डी. जी. वैष्णव कॉलेज में केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने 285 नए चुने गए लोगों को नियुक्ति पत्र सौंपे। पत्र सूचना कार्यालय ने उसी शाम 8 बजकर 2 मिनट पर जो विज्ञप्ति जारी की, उसका शीर्षक ख़ुद एक आँकड़ा है। "सरकार की प्रमुख योजनाओं के कारण बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हुई।"

चार दिन पहले, 15 सितंबर को दोपहर 4 बजे, उसी सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने इसी चीज़ का दूसरा आँकड़ा छापा था। अगस्त 2026 में बेरोज़गारी दर 5.0 फ़ीसदी।

दोनों आँकड़े असली हैं। दोनों सरकार के अपने हैं। और दोनों एक ही सर्वेक्षण से निकलते हैं, जिसे आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण कहते हैं और जिसका छोटा नाम पीएलएफ़एस है।

अंतर संख्याओं का नहीं है। अंतर उस सवाल का है जो सर्वेक्षक ने घर पर पूछा।

चेन्नई का वाक्य और 15 सितंबर का प्रेस नोट

मुरुगन सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं। विज्ञप्ति के मुताबिक़ उन्होंने चेन्नई में जिन 285 लोगों को नियुक्ति पत्र दिए, वे आयकर विभाग, कर्मचारी राज्य बीमा निगम, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, रक्षा मंत्रालय, डाक विभाग, जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान और दक्षिण रेलवे में जा रहे हैं।

बेरोज़गारी वाला वाक्य विज्ञप्ति में सीधे उद्धरण में नहीं है। वह अप्रत्यक्ष कथन में है, यानी विज्ञप्ति मंत्री के शब्द नहीं, उनकी बात दर्ज करती है। पूरा वाक्य यह है: "उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों के परिणामस्वरूप बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत हो गई है।" इसी वाक्य के आसपास दो और संख्याएँ हैं। देश में स्टार्टअप 2014 में क़रीब 400 थे और अब 2.5 लाख से ज़्यादा हैं। और रोज़गार मेलों से अब तक 12.75 लाख से ज़्यादा नियुक्ति पत्र बाँटे जा चुके हैं।

विज्ञप्ति में यह कहीं नहीं लिखा कि 6 और 3.2 किस अवधि के आँकड़े हैं। किस उम्र वर्ग के हैं, यह भी नहीं लिखा। और किस माप से निकले हैं, यह भी नहीं। 2014 में क़रीब 400 स्टार्टअप वाले आँकड़े का स्रोत भी विज्ञप्ति में दर्ज नहीं है।

उसी दिन का दूसरा दस्तावेज़ बड़ा आयोजन बताता है। प्रधानमंत्री कार्यालय की दोपहर 2 बजकर 30 मिनट की विज्ञप्ति के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ़्रेंस से 51,000 से ज़्यादा नियुक्ति पत्र सौंपे। मुरुगन वाली विज्ञप्ति बताती है कि बीसवाँ रोज़गार मेला देश की 45 जगहों पर हुआ। इन 51,000 में किस मंत्रालय के कितने पद हैं और किस श्रेणी के हैं, यह दोनों में से किसी विज्ञप्ति में नहीं है।

15 सितंबर का दस्तावेज़ इस मामले में उलटा है। वह प्रेस नोट पीएलएफ़एस के मासिक बुलेटिन पर है और उसमें अवधि, उम्र और माप तीनों दर्ज हैं। 15 साल और उससे ऊपर के लोग। अगस्त 2026 का महीना। और वर्तमान साप्ताहिक स्थिति का तरीक़ा। प्रेस नोट यह भी बताता है कि यह इस शृंखला का सत्रहवाँ मासिक बुलेटिन है और शृंखला अप्रैल 2025 से चल रही है।

365 दिन का सवाल और सात दिन का सवाल

पीएलएफ़एस एक ही आदमी की गतिविधि तीन अलग-अलग अवधियों के लिए दर्ज करता है। सालाना रिपोर्ट के परिशिष्ट सी में यह साफ़ लिखा है: सर्वेक्षण के दिन से पिछले 365 दिन, पिछले सात दिन, और उन सात दिनों में से हर एक दिन। पहली अवधि से सामान्य स्थिति निकलती है, दूसरी से वर्तमान साप्ताहिक स्थिति, तीसरी से वर्तमान दैनिक स्थिति।

यह तस्वीर गुजरात के एक गाँव में हुए स्वच्छता सर्वेक्षण की है, पीएलएफ़एस की नहीं; घर-घर जाकर सवाल पूछने का वही तरीक़ा है जिससे रोज़गार का आँकड़ा भी जुटता है।
तस्वीर: Oertherdb, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सामान्य स्थिति का नियम समय की मात्रा पर चलता है। रिपोर्ट इसे मेजर टाइम क्राइटेरियन कहती है। सर्वेक्षक पहले तय करता है कि आदमी उन 365 दिनों में ज़्यादातर वक़्त श्रम बल में था या नहीं, यानी काम कर रहा था या काम ढूँढ़ रहा था। अगर वह श्रम बल में था, तो दूसरे क़दम पर तय होता है कि उसने ज़्यादा वक़्त काम किया या ज़्यादा वक़्त काम तलाशा। इसी को मुख्य गतिविधि यानी प्रिंसिपल स्टेटस कहते हैं।

इसके ऊपर एक और परत है, और वही इस माप को नरम बनाती है। अगर किसी ने उन्हीं 365 दिनों में अपनी मुख्य गतिविधि के अलावा 30 दिन या उससे ज़्यादा कोई आर्थिक काम किया, तो वह उसकी सहायक गतिविधि यानी सब्सिडियरी स्टेटस मानी जाती है। सामान्य स्थिति की गिनती दोनों को जोड़कर होती है। रिपोर्ट इसे "usual status (ps+ss)" लिखती है। हिंदी में कहें तो साल भर में 30 दिन का काम भी आदमी को पूरे साल के लिए रोज़गार वाले ख़ाने में ले जाता है।

साप्ताहिक स्थिति का नियम दूसरा है। वहाँ समय की मात्रा नहीं, प्राथमिकता चलती है। परिशिष्ट सी के शब्दों में काम करने का दर्जा काम ढूँढ़ने के दर्जे से ऊपर है, और काम ढूँढ़ने का दर्जा श्रम बल से बाहर होने के दर्जे से ऊपर। आदमी को रोज़गारशुदा तब माना जाता है जब उसने पिछले सात दिनों में किसी एक दिन कम से कम एक घंटा काम किया हो, या उसके पास एक घंटे का काम रहा हो और उसने वह न किया हो। और उसे बेरोज़गार तब माना जाता है जब उसने उस हफ़्ते कोई आर्थिक काम न किया हो, लेकिन काम पाने की कोशिश की हो या किसी दिन एक घंटे के लिए भी काम के लिए उपलब्ध रहा हो।

बेरोज़गारी दर की परिभाषा दोनों जगह एक ही है। श्रम बल में शामिल लोगों में से कितने बेरोज़गार हैं, उसका फ़ीसदी। लेकिन श्रम बल कौन है, यह अवधि बदलते ही बदल जाता है। ऊपर का हिस्सा भी बदलता है और नीचे का भी।

इसका असर एक बनावटी मिसाल से समझा जा सकता है, जो सिर्फ़ नियम से निकाली गई है और किसी असली व्यक्ति का ब्योरा नहीं है। मान लीजिए किसी ने पिछले साल कुल 40 दिन मज़दूरी की और बाक़ी साल काम नहीं मिला। सामान्य स्थिति में वह रोज़गारशुदा है, क्योंकि 30 दिन की शर्त पूरी हो गई। अब मान लीजिए कोई साल भर नौकरी में रहा, पर सर्वेक्षण वाले हफ़्ते में नौकरी छूटी हुई थी और वह नई तलाश रहा था। साप्ताहिक स्थिति में वह बेरोज़गार है। दोनों गिनतियाँ सही हैं। वे एक ही आदमी के बारे में अलग-अलग सवाल का जवाब हैं।

पाठक के लिए सीधा तराज़ू यही है। 365 दिन वाली दर बताती है कि साल कैसा बीता। सात दिन वाली दर बताती है कि हफ़्ता कैसा बीता। जिनका काम मौसमी है, टुकड़ों में है, या दिहाड़ी का है, उनके लिए ये दोनों जवाब बहुत अलग हो सकते हैं।

एक ही रिपोर्ट में दो तालिकाएँ, दोनों का नाम टेबल 3

पीएलएफ़एस की 2023-24 की सालाना रिपोर्ट राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय ने निकाली है। उसकी शुरुआत में हाइलाइट्स का हिस्सा है, और उसमें दो अलग-अलग समय-शृंखलाएँ हैं। खंड डी सामान्य स्थिति की है, खंड ई साप्ताहिक स्थिति की। दोनों खंडों में बेरोज़गारी दर की तालिका का शीर्षक "टेबल 3" है। पहली हाइलाइट्स के रोमन पन्ने आठ पर है और दूसरी पन्ने ग्यारह पर।

दोनों में अखिल भारतीय, ग्रामीण और शहरी मिलाकर, 15 साल और उससे ऊपर के लोगों की दर यह है:

पीएलएफ़एस दौरसामान्य स्थिति (365 दिन)साप्ताहिक स्थिति (7 दिन)
2017-186.08.7
2018-195.88.7
2019-204.88.8
2020-214.27.5
2021-224.16.6
2022-233.25.1
2023-243.24.9

रिपोर्ट अपनी तालिकाओं के नीचे यह भी लिख देती है कि 2023-24 का मतलब जुलाई 2023 से जून 2024 है, और बाक़ी दौरों का भी यही हिसाब है।

मंत्री की विज्ञप्ति में जो दो संख्याएँ हैं, वे इस तालिका के बाएँ खाने में मौजूद हैं। 6.0 फ़ीसदी 2017-18 के सामने है और 3.2 फ़ीसदी 2023-24 के सामने। इस डेस्क को कोई और सरकारी जोड़ी नहीं मिली जिससे ठीक 6 और 3.2 निकलते हों। पर विज्ञप्ति यह नहीं कहती। इसलिए यह लिखना कि मंत्री का मतलब 2017-18 और 2023-24 था, विज्ञप्ति का वाक्य उनकी तरफ़ से पूरा करना होगा।

एक और बात इसी तालिका में है। 3.2 फ़ीसदी सिर्फ़ 2023-24 का आँकड़ा नहीं है। 2022-23 का भी वही है। सामान्य स्थिति की दर उस साल भी 3.2 थी और अगले साल भी 3.2 रही।

दाएँ खाने में उन्हीं दो सालों की दर 8.7 और 4.9 फ़ीसदी है। यही वह माप है जिस पर सरकार अब हर महीने आँकड़ा छापती है।

दोनों मापों का फ़ासला हर जगह बराबर नहीं है, और यह अपने आप में पढ़ने लायक़ है। 2023-24 में सामान्य स्थिति की दर गाँवों में 2.5 फ़ीसदी थी और शहरों में 5.1। उन्हीं इलाक़ों में साप्ताहिक स्थिति की दर 4.2 और 6.7 फ़ीसदी थी। यानी गाँवों में दोनों मापों के बीच 1.7 अंक का फ़ासला है और शहरों में 1.6 अंक का। स्तर सबसे ऊँचा शहरी महिलाओं का है, सामान्य स्थिति में 7.1 फ़ीसदी और साप्ताहिक स्थिति में 8.7। और दोनों मापों के बीच सबसे चौड़ा फ़ासला ग्रामीण महिलाओं का है, 2.1 से 3.9 फ़ीसदी, यानी 1.8 अंक का।

उम्र वाली बात भी छोटी नहीं है। रिपोर्ट हर तालिका में दो पंक्तियाँ रखती है, एक 15 साल और उससे ऊपर के लिए और एक सब उम्र वालों के लिए। सामान्य स्थिति में 2017-18 की दर 15 साल और ऊपर के लिए 6.0 फ़ीसदी है, पर सब उम्र मिलाकर 6.1 फ़ीसदी। 2023-24 में दोनों पंक्तियाँ 3.2 फ़ीसदी हैं। चेन्नई वाली विज्ञप्ति में उम्र का ज़िक्र नहीं है, इसलिए यह भी दस्तावेज़ से तय नहीं होता कि कौन सी पंक्ति बोली गई।

जनवरी 2025 में सर्वेक्षण का ढाँचा बदला

14 मई 2025 की विज्ञप्ति में सांख्यिकी मंत्रालय ने बताया था कि जनवरी 2025 से पीएलएफ़एस का नमूना-ढाँचा नए सिरे से बनाया गया है। तीन मक़सद गिनाए गए थे। हर महीने अखिल भारतीय स्तर पर ग्रामीण और शहरी, दोनों के लिए साप्ताहिक स्थिति में श्रम संकेतक निकालना। तिमाही नतीजों को शहरों से बढ़ाकर गाँवों तक ले जाना। और साल में एक बार सामान्य स्थिति तथा साप्ताहिक स्थिति, दोनों के आँकड़े देना।

27 मार्च 2026 की विज्ञप्ति के अंत में जुड़े नोट में इस बदलाव का ब्योरा है। सर्वेक्षण का साल जुलाई-जून से बदलकर जनवरी-दिसंबर कर दिया गया, ताकि वह बाक़ी दुनिया के चलन से मिल जाए। नमूने में घुमाव वाली पैनल व्यवस्था आई, जिसमें हर चुने हुए इलाक़े में लगातार चार महीने जाया जाता है। इससे लगातार दो महीनों के नमूनों में 75 फ़ीसदी और लगातार दो तिमाहियों में 50 फ़ीसदी मेल बना रहता है।

आकार भी बदला। दिसंबर 2024 तक सर्वेक्षण औसतन 12,800 प्रथम चरण इकाइयों में होता था, हर इकाई में आठ घर, यानी क़रीब 1.02 लाख घर। जनवरी 2025 से यह 22,692 इकाइयाँ और हर इकाई में बारह घर हो गया, यानी क़रीब 2.72 लाख घर। विज्ञप्ति ख़ुद कहती है कि यह पहले से क़रीब 2.65 गुना है।

और इसी नोट में मंत्रालय की अपनी चेतावनी है, जो इस पूरी कहानी की सबसे काम की पंक्ति है। नोट कहता है कि नमूना-ढाँचे और आकलन की प्रक्रिया में बदलाव से अनुमानों का स्तर प्रभावित हो सकता है, इसलिए 2025 के सालाना अनुमान पीएलएफ़एस की पिछली सालाना रिपोर्टों के अनुमानों से पूरी तरह तुलनीय नहीं भी हो सकते। परिभाषाएँ नहीं बदलीं। गिनती का ढाँचा बदला।

इस डेस्क ने 8 सितंबर के अंक में जीडीपी की दो शृंखलाओं की तुलना पर लिखा था। वह मामला अलग था। वहाँ एक आरोप दो अलग शृंखलाओं को जोड़कर खड़ा किया गया था। यहाँ सरकार अपनी ही दो माप रखती है और मंच पर उनमें से एक बोली जाती है।

अगस्त 2026 की 5.0 फ़ीसदी और उससे पहले की मासिक शृंखला

15 सितंबर का प्रेस नोट सत्रहवें मासिक बुलेटिन का है। उसके मुताबिक़ 15 साल और उससे ऊपर के लोगों की कुल बेरोज़गारी दर जुलाई 2026 में 5.1 फ़ीसदी थी और अगस्त 2026 में 5.0 फ़ीसदी रही। गाँवों में यह 4.5 से घटकर 4.1 फ़ीसदी हुई, जो जनवरी 2026 के बाद का सबसे नीचे का स्तर है। शहरों में 6.7 से बढ़कर 6.8 फ़ीसदी।

कोलकाता का एक दिहाड़ी रंगाई मज़दूर, फ़रवरी 2011; शहरी दिहाड़ी मज़दूरी की वही श्रेणी है जिसकी बेरोज़गारी दर हफ़्ते-दर-हफ़्ते साप्ताहिक स्थिति में दर्ज होती है।
तस्वीर: Indrajit Das, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

प्रेस नोट के ऊपर वाले संक्षिप्त विवरण में लिखा है कि दर "5.0 प्रतिशत पर स्थिर रही", और नीचे के हिस्से में लिखा है कि वह 5.1 से घटकर 5.0 हुई। दोनों बातें एक ही हैं, बस पैमाने अलग हैं: ऊपर वाली तुलना पिछले साल अगस्त से है और नीचे वाली पिछले महीने से।

उसी प्रेस नोट में बाक़ी संकेतक भी हैं। श्रम बल भागीदारी दर 55.4 से बढ़कर 55.6 फ़ीसदी, गाँवों में 58.2 और शहरों में 50.4। महिलाओं की भागीदारी दर 34.8 फ़ीसदी, जो अगस्त 2025 से 1.1 अंक ऊपर है। कामगार-जनसंख्या अनुपात 52.8 फ़ीसदी। पुरुषों की बेरोज़गारी दर 4.9 फ़ीसदी और महिलाओं की 5.1 फ़ीसदी।

नोट यह भी बताता है कि यह सब कितने लोगों से पूछकर निकला है। अगस्त का अनुमान 3,70,160 लोगों के सर्वेक्षण पर टिका है, जिनमें 2,11,353 गाँवों में और 1,58,807 शहरों में थे।

अकेला महीना ज़्यादा नहीं कहता, इसलिए पूरी शृंखला देखनी चाहिए। फ़रवरी 2026 के मासिक प्रेस नोट में अप्रैल 2025 से फ़रवरी 2026 तक का ग्राफ़ छपा है। कुल दर वहाँ इस तरह चलती है: 5.1, 5.6, 5.6, 5.2, 5.1, 5.2, 5.2, 4.7, 4.8, 5.0 और 4.9 फ़ीसदी। सबसे नीचे का महीना नवंबर 2025 था, 4.7 फ़ीसदी।

एक बात इस पूरी शृंखला के बारे में साफ़ रहनी चाहिए। मासिक बुलेटिन सामान्य स्थिति की दर छापता ही नहीं। वह सिर्फ़ साप्ताहिक स्थिति देता है, और प्रेस नोट यह अपने परिचय में ख़ुद लिखता है।

इसी से एक तुलना अपने आप सामने आ जाती है। साप्ताहिक स्थिति वाली दर 2023-24 की सालाना रिपोर्ट में 4.9 फ़ीसदी है, और 9 अप्रैल 2025 की विज्ञप्ति में कैलेंडर साल 2024 के लिए भी 4.9 फ़ीसदी। अगस्त 2026 की दर 5.0 फ़ीसदी है। यानी जिस माप पर सरकार जनवरी 2025 से हर महीने आँकड़ा छापती है, उस पर पिछला महीना 2023-24 वाली सालाना पढ़त से 0.1 अंक ऊपर बैठता है।

यह अंतर छोटा है और इसे बड़ा बनाकर पढ़ना ग़लत होगा। दो बातें इसके साथ चलनी चाहिए। पहली, सालाना आँकड़ा बारह महीनों का औसत है और मासिक आँकड़ा एक महीने का, इसलिए महीनों का उतार-चढ़ाव उसमें दिखता है जो साल भर के औसत में घुल जाता है। दूसरी, 2023-24 की पढ़त पुराने नमूना-ढाँचे से आई है और अगस्त 2026 की नए से, और मंत्रालय ख़ुद कह चुका है कि इस वजह से स्तर प्रभावित हो सकता है। पर एक बात दोनों चेतावनियों के बाद भी बची रहती है। जिन तेरह महीनों के आँकड़े इस डेस्क ने सरकारी प्रेस नोटों में पढ़े, उनमें साप्ताहिक स्थिति वाली दर 4.7 से 5.6 फ़ीसदी के बीच रही है। तेरह में से सिर्फ़ दो महीने 4.9 फ़ीसदी से नीचे थे, नवंबर और दिसंबर 2025।

उसी माप का सबसे नया सालाना आँकड़ा मार्च में छप चुका था

सामान्य स्थिति की दर साल में एक बार आती है, और 2023-24 वाली रिपोर्ट अब आख़िरी नहीं है। 27 मार्च 2026 को सांख्यिकी मंत्रालय ने पीएलएफ़एस की सालाना रिपोर्ट 2025 निकाली, जो जनवरी से दिसंबर 2025 की अवधि पर है। यह कैलेंडर साल पर बनी पहली पूरी सालाना रिपोर्ट है।

उसकी विज्ञप्ति के मुताबिक़ 15 साल और उससे ऊपर के लोगों की सामान्य स्थिति वाली बेरोज़गारी दर 2025 में पुरुषों के लिए 3.1 फ़ीसदी और महिलाओं के लिए भी 3.1 फ़ीसदी थी। पुरुषों की दर 2024 में 3.3 फ़ीसदी थी। महिलाओं की दर 2024 में भी 3.1 फ़ीसदी थी। गाँवों में कुल दर 2.4 फ़ीसदी और शहरों में 4.8 फ़ीसदी। शहरी पुरुषों की 4.2 और शहरी महिलाओं की 6.4 फ़ीसदी।

विज्ञप्ति गाँव-शहर मिलाकर एक जोड़ा हुआ आँकड़ा नहीं छापती, इसलिए यहाँ भी वही लिखा जा रहा है जो दस्तावेज़ में है।

यह रिपोर्ट किस आकार पर टिकी है, यह भी उसी विज्ञप्ति में है। जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच 22,594 प्रथम चरण इकाइयों में सर्वेक्षण हुआ, 2,70,472 घरों में, और 11,48,634 लोगों से। इनमें 15 साल और उससे ऊपर के लोग 8,91,266 थे। एक महीने के बुलेटिन का नमूना इससे बहुत छोटा होता है, जैसा अगस्त 2026 के 3,70,160 लोगों से दिखता है। रिपोर्ट में रोज़गार की बनावट पर भी आँकड़े हैं: नियमित वेतन वाली नौकरी में कामगारों का हिस्सा 2024 के 22.4 फ़ीसदी से बढ़कर 2025 में 23.6 फ़ीसदी हुआ, और अपना काम करने वालों का हिस्सा 57.5 से घटकर 56.2 फ़ीसदी।

पीछे की तरफ़ देखें तो यह रेखा कई साल से लगभग सपाट है। 9 अप्रैल 2025 की विज्ञप्ति में कैलेंडर सालों के आँकड़े हैं। सामान्य स्थिति में 15 साल और उससे ऊपर की दर जनवरी-दिसंबर 2023 में 3.1 फ़ीसदी और जनवरी-दिसंबर 2024 में 3.2 फ़ीसदी थी। उसी विज्ञप्ति में साप्ताहिक स्थिति वाली दर 2023 के लिए 5.0 और 2024 के लिए 4.9 फ़ीसदी है।

तो सामान्य स्थिति वाली दर 2022-23, 2023-24 और कैलेंडर साल 2024 में 3.2 फ़ीसदी रही, और कैलेंडर साल 2023 में 3.1। 2025 में पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए 3.1 फ़ीसदी। चार बरस से यह रेखा 3.1 और 3.2 के बीच है। बीच में सर्वेक्षण का ढाँचा भी बदला, और मंत्रालय ख़ुद कह चुका है कि इस वजह से पुराने और नए आँकड़े पूरी तरह तुलनीय नहीं भी हो सकते।

औसत के नीचे तीन आँकड़े

रिपोर्ट औसत के साथ उसके टुकड़े भी छापती है। वे अलग तस्वीर दिखाते हैं। 2023-24 की रिपोर्ट में, सामान्य स्थिति में, 15 से 29 साल के युवाओं की बेरोज़गारी दर 10.2 फ़ीसदी है। गाँवों में यह युवकों के लिए 8.7 फ़ीसदी है और युवतियों के लिए 8.2। शहरों में युवकों के लिए 12.8 फ़ीसदी। और शहरी युवतियों के लिए 20.1 फ़ीसदी, जो युवाओं के अपने औसत का क़रीब दोगुना है।

दूसरा टुकड़ा पढ़ाई का है। माध्यमिक और उससे ऊपर पढ़े-लिखे लोगों की दर, उम्र 15 साल और ऊपर, 7.1 फ़ीसदी है। गाँवों में 6.5 और शहरों में 7.9।

2025 की रिपोर्ट में ये आँकड़े थोड़ा नीचे आए हैं। युवाओं की दर 2024 के 10.3 से घटकर 9.9 फ़ीसदी हुई। शहरी युवाओं की 14.3 से 13.6 फ़ीसदी। ग्रामीण युवाओं की कुल दर 8.7 से 8.3 फ़ीसदी। पढ़े-लिखों की 7.0 से 6.5 फ़ीसदी। और शहरी महिलाओं की कुल दर 6.7 से 6.4 फ़ीसदी। ये सब सामान्य स्थिति के आँकड़े हैं, यानी 365 दिन वाली गिनती के। मासिक बुलेटिन इनमें से कोई टुकड़ा नहीं छापता।

रोज़गार मेला, और 12.75 लाख नियुक्ति पत्र किसके सामने

रोज़गार मेला 22 अक्टूबर 2022 को शुरू हुआ था। उस दिन की विज्ञप्ति में इसे दस लाख कर्मियों की भर्ती मुहिम कहा गया और 75,000 नियुक्ति पत्र बाँटे गए। उसी विज्ञप्ति में मेले का तरीक़ा भी लिखा है। भर्ती मंत्रालय और विभाग ख़ुद करते हैं, या संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग और रेलवे भर्ती बोर्ड जैसी भर्ती संस्थाओं के ज़रिए। मेला चयन नहीं करता। वह उन पदों के नियुक्ति पत्र एक साथ सौंपने का आयोजन है जिनकी परीक्षा और चयन पहले हो चुका होता है। उस दिन के चुने हुए लोग 38 मंत्रालयों और विभागों में गए थे, और ग्रुप ए से ग्रुप सी तक के पदों पर।

यह तस्वीर एक स्कूली परीक्षा की है, किसी भर्ती परीक्षा केंद्र की नहीं; परीक्षा में बैठने वालों की गिनती वही है जिसके बाद चयन और नियुक्ति पत्र, दो अलग पड़ाव आते हैं।
तस्वीर: Raju Aluka, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

उसी विज्ञप्ति का एक वाक्य आगे के हिसाब के लिए ज़रूरी है। उसमें लिखा है कि प्रधानमंत्री के निर्देश पर सभी मंत्रालय और विभाग स्वीकृत पदों के मुक़ाबले ख़ाली पड़ी जगहों को मिशन मोड में भर रहे हैं। यानी मेला नए पद नहीं बनाता। वह पहले से स्वीकृत पदों की ख़ाली कुर्सियाँ भरता है।

19 सितंबर को बीसवाँ मेला था। प्रधानमंत्री ने दोपहर 2 बजकर 30 मिनट पर वीडियो कॉन्फ़्रेंस से 51,000 से ज़्यादा नियुक्ति पत्र सौंपे, और आयोजन देश की 45 जगहों पर हुआ। मुरुगन की विज्ञप्ति के मुताबिक़ बीस मेलों को मिलाकर अब तक 12.75 लाख से ज़्यादा पत्र बँट चुके हैं।

इस संख्या को किसी और संख्या के सामने रखना ज़रूरी है। व्यय विभाग हर साल केंद्र सरकार के असैनिक कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर रिपोर्ट निकालता है। विभाग के अपने पन्ने पर सबसे नई रिपोर्ट 2023-24 की है। उसके मुख्य बिंदुओं में लिखा है कि केंद्रीय सरकार के नियमित असैनिक कर्मचारी, केंद्र शासित प्रदेशों समेत, 30.62 लाख थे, जबकि स्वीकृत पद 40.40 लाख हैं और क़रीब 24.21 फ़ीसदी पद ख़ाली थे। यानी क़रीब 9.78 लाख पद।

इस आँकड़े के साथ एक सावधानी है। रिपोर्ट का यह पैराग्राफ़ तारीख़ 1 मार्च 2023 देता है, जबकि उसी रिपोर्ट की विषय-सूची चौथे अध्याय को 1 मार्च 2024 की स्थिति बताती है। उन अध्यायों के पन्ने स्कैन की गई तस्वीरें हैं और उनमें पढ़ने लायक़ पाठ नहीं है, इसलिए यह डेस्क दोनों में से किसी तारीख़ की पुष्टि नहीं कर सकी। दूसरी सावधानी दायरे की है। रोज़गार मेले के पत्र उन संगठनों के भी हैं जो इस नियमित असैनिक गिनती में नहीं आते, इसलिए दोनों संख्याओं को सीधे घटाया-जोड़ा नहीं जा सकता।

पैमाना फिर भी काम का है। 2025 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़ जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच देश में सामान्य स्थिति में औसतन 61.6 करोड़ लोग रोज़गार में थे, जिनमें 41.6 करोड़ पुरुष और 20.0 करोड़ महिलाएँ। केंद्र सरकार के नियमित असैनिक कर्मचारी उसका आधा फ़ीसदी भी नहीं हैं। नियुक्ति पत्रों की गिनती और बेरोज़गारी दर दो अलग चीज़ें नापती हैं, और एक से दूसरी नहीं निकलती।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, शाम 8:02: चेन्नई के डी. जी. वैष्णव कॉलेज में 20वें रोज़गार मेले पर डॉ. एल. मुरुगन, पत्र सूचना कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 15 सितंबर 2026, दोपहर 4:00: पीएलएफ़एस के अगस्त 2026 के मासिक बुलेटिन पर प्रेस नोट, राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की सालाना रिपोर्ट 2023-24, हाइलाइट्स की टेबल 3 और परिशिष्ट सी, पत्र सूचना कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 27 मार्च 2026, शाम 4:00: पीएलएफ़एस की सालाना रिपोर्ट 2025, जनवरी से दिसंबर 2025, पत्र सूचना कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 9 अप्रैल 2025: कैलेंडर साल 2024 के रोज़गार-बेरोज़गारी संकेतक, अनुलग्नक एक, पत्र सूचना कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 14 मई 2025: 2025 से पीएलएफ़एस में हुए बदलाव, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय: पीएलएफ़एस के फ़रवरी 2026 के मासिक बुलेटिन पर प्रेस नोट, 16 मार्च 2026, अप्रैल 2025 से फ़रवरी 2026 तक की मासिक शृंखला के ग्राफ़ सहित, पत्र सूचना कार्यालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, 22 अक्टूबर 2022, दोपहर 1:10: रोज़गार मेले की शुरुआत और दस लाख की भर्ती मुहिम, व्यय विभाग, वित्त मंत्रालय: केंद्र सरकार के असैनिक कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर सालाना रिपोर्ट 2023-24, स्वीकृत पद और भरे हुए पद, पत्र सूचना कार्यालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, 19 सितंबर 2026, दोपहर 2:30: 20वें रोज़गार मेले में 51,000 से ज़्यादा नियुक्ति पत्र

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।