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काम की बात

सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली थी, सुप्रीम कोर्ट ने 38 साल बाद वजह बताई

करनाल ज़िले के गुढ़ा गांव में इंडियन ऑयल के एलपीजी प्लांट ने 1988 में सिफ़ारिश किए गए 49 में से 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र भेजे, सुमित्रा को नहीं भेजा। निगम के अपने गवाह ने अदालत में माना कि वह सिर्फ़ इसलिए छूटीं क्योंकि वह औरत थीं, जबकि भर्ती अधिसूचना में औरतें पात्र मानी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को कहा कि उन्हें रोकने वाला कोई क़ानून रिकॉर्ड में कभी नहीं आया, और अनुच्छेद 142 के तहत बारह लाख रुपये मुआवज़ा तय किया। यह लेख उस साल के क़ानून, आज के क़ानून और आज किसी और के साथ ऐसा होने पर जाने के रास्ते बताता है।

एलपीजी सिलिंडरों की यह तस्वीर न्यूज़ीलैंड में 2005 के आसपास ली गई थी, सुमित्रा को जिस हेल्पर पद के लिए रोका गया वहां भी ऐसे ही सिलिंडर संभाले जाते थे
तस्वीर: Evil Monkey, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.5

गुढ़ा गांव के इस एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में 1988 में जब इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हेल्पर के पदों पर भर्ती निकाली, ज़िले की एक समिति ने 49 नाम सिफ़ारिश किए। सुमित्रा उनमें एक थीं। 26 अक्टूबर 1988 को उनका इंटरव्यू हुआ, बाक़ी सबकी तरह। इसके बाद निगम ने 43 लोगों को नियुक्ति पत्र भेजे। सुमित्रा को नहीं भेजा।

वजह कहीं दर्ज नहीं हुई, सिवाय इसके कि वह एक औरत थीं। यह बात ख़ुद निगम के अपने गवाह ने बरसों बाद अदालत में मान ली। सुमित्रा ने पहला मुक़दमा तभी दायर किया। उसके बाद अदालतों की एक कतार शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को आख़िरी फ़ैसला सुनाया, और अपने ही आदेश में इस पूरी अवधि को "नज़दीक 38 साल" कहा। अदालत ने नौकरी देने का आदेश नहीं दिया, क्योंकि सुमित्रा अब क़रीब 63 साल की हैं, नौकरी की उम्र पार कर चुकी हैं। इसके बदले संविधान के अनुच्छेद 142 का सहारा लेकर बारह लाख रुपये का मुआवज़ा तय किया गया।

यह मुक़दमा असल में एक दस्तावेज़ है। इसमें तीन जवाब मिलते हैं: 1988 में सुमित्रा को रोकने के लिए कौन सा क़ानून था, वह क़ानून आज कहां खड़ा है, और आज किसी और औरत के साथ यही हो तो वह कहां जाए।

भर्ती की शर्त में औरतें थीं, फिर उसे ही रोका गया

निगम ने ख़ुद जो भर्ती अधिसूचना जारी की थी, उसमें महिला उम्मीदवार पात्र मानी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह बात साफ़ दर्ज है। सुमित्रा को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, बाक़ी उम्मीदवारों जैसी ही प्रक्रिया से गुज़ारा गया। निगम की तरफ़ से अदालत में पेश गवाह डीडब्ल्यू-1 ने जिरह में यह मान लिया कि सुमित्रा हर शर्त पूरी करती थीं। उसके अपने शब्दों में अदालत के आदेश में दर्ज है: "At the time of interview, we check certificates. Except for the fact that she is a lady she fulfils the eligibility." यह एक वाक्य निर्णायक निकला। एक गवाह की यह स्वीकारोक्ति पूरे मुक़दमे की बुनियाद बनी।

निगम ने अदालत में यह दलील दी कि पद पर सिलेंडर उठाने का काम था, बेवक़्त की ड्यूटी थी, और साथ में ज़्यादातर पुरुष कर्मचारी थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से ख़ारिज किया। अदालत ने लिखा कि इनमें से कोई भी वजह किसी योग्य महिला उम्मीदवार को बाहर रखने का क़ानूनी आधार नहीं बन सकती, ख़ासकर तब जब ख़ुद निगम की भर्ती अधिसूचना महिलाओं को पात्र मानती हो। इसके ठीक बाद अदालत ने वह बात लिखी जो इस पूरे मामले की धुरी है: "No statutory provision prohibit employment of women to the post in question, has been brought on record." यानी निगम अदालत में यह साबित ही नहीं कर पाया कि किसी क़ानून ने उसे सुमित्रा को रखने से रोका था।

49 सिफ़ारिश किए गए नामों में से 43 को नियुक्ति पत्र मिले। छह को नहीं मिले, जिनमें सुमित्रा भी थीं। बाक़ी पांच को नौकरी क्यों नहीं मिली, यह जानकारी उपलब्ध फ़ैसले में दर्ज नहीं है। सुमित्रा का अपना मुक़दमा भी सिर्फ़ अपने बारे में था, और अदालत का फ़ैसला भी सिर्फ़ उन्हीं के बारे में है।

अदालत की सीढ़ियां: कौन जीता, कौन हारा, कहां अटका

सुमित्रा का मुक़दमा ज़िला अदालत में दायर हुआ। ट्रायल कोर्ट ने सुबूतों को देखने के बाद उनके पक्ष में डिक्री दी, यानी माना कि उन्हें ग़लत तरीक़े से बाहर रखा गया। निगम ने इसके ख़िलाफ़ अपील की। पहली अपीलीय अदालत ने 6 अगस्त 1993 को अपील नंबर 10/1990 और 231/1991 में यह डिक्री पलट दी, इस आधार पर कि सिर्फ़ पैनल में नाम आने से नौकरी का कोई पक्का हक़ नहीं बनता। सुमित्रा ने इसके ख़िलाफ़ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में रेगुलर सेकंड अपील दायर की, आरएसए नंबर 2162/1993।

यह अपील बत्तीस साल हाईकोर्ट में पड़ी रही। हाईकोर्ट ने तब जाकर इसे निपटाया, पहली अपीलीय अदालत का फ़ैसला बरक़रार रखते हुए सुमित्रा की अपील ख़ारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट के अपने आदेश में इस हाईकोर्ट फ़ैसले की तारीख़ दो जगह अलग-अलग लिखी है, एक जगह 4 अक्टूबर 2025 और दूसरी जगह 14 अक्टूबर 2025। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री का अपना रिकॉर्ड ऑफ़ प्रोसीडिंग्स भी 14 अक्टूबर 2025 दर्ज करता है। दो जगह एक ही तारीख़ मिलने पर यही ज़्यादा भरोसेमंद मानी जा सकती है।

बत्तीस साल की यह देरी अकेली मिसाल नहीं है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की अपनी पेंडेंसी रिपोर्ट के मुताबिक़, जनवरी 2020 में उस अदालत में 1976 में दायर एक रेगुलर सेकंड अपील अब भी लंबित थी, यानी तब तक चौवालीस साल पुरानी। उसी रिपोर्ट के मुताबिक़ हाईकोर्ट में तब कुल 5,28,340 मामले लंबित थे, जिनमें से 80,026 दस से बीस साल पुराने थे और 6,729 बीस से तीस साल पुराने। देरी यहां आम बात है। सुमित्रा की अपील इस अदालत के लिए किसी अनोखी देरी की मिसाल नहीं थी। वह उसी पैटर्न का एक और मामला थी।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट, चंडीगढ़, जनवरी 2021 की तस्वीर; सुमित्रा की रेगुलर सेकंड अपील यहीं बत्तीस साल तक लंबित रही
तस्वीर: Ishita Gupta, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0 :::

सुमित्रा ने हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी (सिविल) संख्या 19874/2026 के ज़रिए।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला और मुआवज़ा

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने सुमित्रा की अपील मंज़ूर की और 17 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में अपना आदेश सुनाया। अदालत ने पहली अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट, दोनों के तर्क को गंभीर चूक बताया। ग़लती वहीं हुई थी। दोनों निचली अदालतों ने सिर्फ़ इस सवाल पर ग़ौर किया कि पैनल में नाम आने से नौकरी का पक्का हक़ बनता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली सवाल कुछ और था: क्या एक ऐसी उम्मीदवार को, जिसे पात्र मानकर इंटरव्यू के लिए बुलाया गया और बाक़ी सबकी तरह प्रक्रिया से गुज़ारा गया, सिर्फ़ औरत होने की वजह से बाहर रखा जा सकता है।

फ़ैसले का सबसे अहम पैराग्राफ़ यह है: "The evidence on record, particularly, the recruitment requisition and the admission of DW-1, establishes that appellant's exclusion from the recruitment process was materially attributable to her being a woman. Such exclusion would not be sustained in the absence of a legal prohibition or restriction upon the employment of women to the concerned post." अदालत ने आगे लिखा कि भर्ती कराने वाली संस्था पर भी क़ानून के दायरे में रहने का दायित्व है, भले ही उम्मीदवार का नियुक्ति पर पक्का हक़ न बनता हो। मात्र पात्रता-सूची में नाम होना, अदालत के मुताबिक़, न्यायिक जांच से छूट की गारंटी नहीं देता। नाम होना पर्याप्त नहीं था।

धारा 66 जैसी पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 15(3) के तहत सामान्यतः वैध मानी जाती रही हैं, जो राज्य को औरतों के लिए ख़ास प्रावधान बनाने की छूट देता है। पर एक वाक़ई मौजूद क़ानूनी पाबंदी होने और किसी नियोक्ता की अपनी धारणा होने में फ़र्क़ है। सुमित्रा के मामले में दूसरी बात हुई, पहली नहीं, और यही फ़र्क़ पूरे फ़ैसले की बुनियाद है।

अंत में अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस निष्कर्ष को बहाल किया कि सुमित्रा को औरत होने की वजह से भर्ती प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। यह अकेला निष्कर्ष है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह बहाल किया। नौकरी बहाल नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सुमित्रा के साथ हुआ बर्ताव ग़लत था, पर नौकरी पर रखने का आदेश नहीं दिया। वजह अदालत ने ख़ुद गिनाई: सुमित्रा कभी निगम की सेवा में आईं ही नहीं, जिस पद के लिए उन्हें बुलाया गया था वह कोई स्वीकृत पद नहीं था, दिहाड़ी पर अस्थायी नियुक्ति थी, और सबसे बड़ी बात, सुमित्रा अब क़रीब 63 साल की हैं, यानी निगम की तय सेवानिवृत्ति उम्र पार कर चुकी हैं। इन हालात में नौकरी देने का आदेश व्यावहारिक नहीं रहा।

पर अदालत ने यह भी कहा कि जो देरी हुई, उसमें सुमित्रा की कोई ग़लती नहीं थी, और उन्होंने वर्षों तक अपने हक़ की लड़ाई सुबूतों के साथ लड़ी थी। इसलिए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 का सहारा लिया, जो सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए किसी भी मामले में ख़ास आदेश देने की शक्ति देता है। आदेश की भाषा में: "we mould the relief in the peculiar facts of the present case by directing the Respondent Nos. 1 and 2 to pay the appellant a sum of Rs.12,00,000/- (Rupees Twelve Lakhs), as compensation in lieu of appointment." यह रक़म आदेश की तारीख़ से आठ हफ़्ते के भीतर देनी है। तय समय में भुगतान न होने पर आठ हफ़्ते बाद से भुगतान तक की पूरी अवधि पर छह फ़ीसदी सालाना ब्याज जुड़ेगा। किसी पक्ष पर मुक़दमे का ख़र्च नहीं डाला गया।

एक बात साफ़ रहनी चाहिए। यह मुआवज़ा सुमित्रा के मामले के ख़ास हालात में तय हुआ है, अनुच्छेद 142 की उस शक्ति से जो केवल सुप्रीम कोर्ट के पास है। किसी और मामले में इतनी ही रक़म या यही राहत मिलेगी, इसकी कोई गारंटी इस फ़ैसले से नहीं निकलती।

1988 का क़ानून: धारा 66 और रात की पाली

सुमित्रा को जिस साल रोका गया, उस साल फ़ैक्ट्रीज़ ऐक्ट, 1948 की धारा 66(1)(बी) देश भर में लागू थी। इसके मुताबिक़ किसी फ़ैक्ट्री में किसी औरत को सुबह छह बजे से शाम सात बजे के अलावा काम पर नहीं रखा जा सकता था। राज्य सरकार अधिसूचना जारी करके यह सीमा बदल सकती थी, पर रात दस बजे से सुबह पांच बजे के बीच किसी हाल में नहीं। एक शिफ़्ट से दूसरी शिफ़्ट में बदलाव भी सिर्फ़ साप्ताहिक या किसी और छुट्टी के बाद ही हो सकता था।

एलपीजी बॉटलिंग प्लांट फ़ैक्ट्रीज़ ऐक्ट के दायरे में आता है। अगर निगम यह साबित करता कि हेल्पर के पद पर रात की पाली अनिवार्य थी और धारा 66 उसे रोकती थी, तो शायद उसके पास एक क़ानूनी दलील होती। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़ निगम ने ऐसी कोई दलील अदालत में पेश ही नहीं की, न कोई सुबूत। निगम की आपत्ति सिलेंडर और बेवक़्त की ड्यूटी तक सीमित रही, किसी क़ानून का हवाला कभी नहीं आया।

आज वह पाबंदी नहीं है, शर्तों वाली इजाज़त है

धारा 66 अब क़ानून की किताब में उस रूप में नहीं है। पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 ने फ़ैक्ट्रीज़ ऐक्ट, 1948 समेत तेरह पुराने श्रम क़ानूनों को एक साथ मिलाकर एक ही संहिता में समेट दिया है। यह संहिता 21 नवंबर 2025 से देश भर में लागू हो चुकी है। इसकी धारा 43 अब कहती है: "Women shall be entitled to be employed in all establishments for all types of work under this Code and they may also be employed, with their consent before 6 a.m. and beyond 7 p.m." पूर्ण पाबंदी की जगह अब सहमति और सुरक्षा-शर्तों वाली इजाज़त है।

गुजरात के जामनगर तेल शोधन संयंत्र की रात की तस्वीर; धारा 66 जिस रात की पाली को सीमित रखती थी, तेल उद्योग की फ़ैक्ट्रियां आज उसी पाली में शर्तों के साथ काम करती हैं
तस्वीर: Reliance Industries, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0 :::

यह इजाज़त बेशर्त नहीं है। संहिता ख़ुद कहती है कि यह सुरक्षा, छुट्टी और काम के घंटों से जुड़ी शर्तों के अधीन होगी, जिसे केंद्र या राज्य सरकार तय करेगी। केंद्र सरकार ने अपने दायरे की इकाइयों, यानी खदानें, बड़े बंदरगाह और इंडियन ऑयल जैसे केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के लिए यह शर्तें मई 2026 में ओएसएच केंद्रीय नियमों के ज़रिए अधिसूचित कीं। राज्य के दायरे की फ़ैक्ट्रियों के लिए हर राज्य को अपने नियम अलग से बनाने हैं, और यह काम राज्यों में अलग-अलग रफ़्तार से चल रहा है।

हरियाणा ने यह बदलाव संहिता से पहले, पुराने क़ानून के भीतर ही शुरू कर दिया था। श्रम विभाग की 8 मई 2025 की अधिसूचना संख्या 11/6/2022-4एलएबी, जो फ़ैक्ट्रीज़ ऐक्ट की धारा 66(1)(बी) के प्रोविज़ो के तहत ही जारी हुई, राज्य की फ़ैक्ट्रियों को शाम सात बजे से सुबह छह बजे के बीच औरतों से काम कराने की छूट देती है। शर्तें दस हैं। हर औरत कर्मचारी की लिखित सहमति, हर पाली में कम से कम चार औरतें, अंदर-बाहर पर्याप्त रोशनी और सीसीटीवी, महिला गार्ड वाला सुरक्षित परिवहन, और यौन उत्पीड़न रोकथाम क़ानून, 2013 का पालन इनमें शामिल हैं। यह छूट अधिसूचना जारी होने की तारीख़ से सिर्फ़ एक साल के लिए वैध थी। यह अवधि नवीनीकृत हुई या नहीं, इसका कोई दस्तावेज़ नहीं मिला। इसलिए हरियाणा की किसी फ़ैक्ट्री में आज यह छूट चल रही है या नहीं, यह पुष्टि नहीं हो सकी।

आज कोई और औरत इसी वजह से रुके, तो शिकायत कहां करें

आज अगर किसी नियोक्ता ने किसी औरत को सिर्फ़ उसके औरत होने की वजह से किसी पद पर रखने से मना किया, और वह पद किसी वाक़ई मौजूद क़ानूनी पाबंदी के दायरे में नहीं है, तो यह वेतन संहिता, 2019 की धारा 3(2) का सीधा उल्लंघन है। यह धारा कहती है कि कोई नियोक्ता किसी एक जैसे या मिलते-जुलते काम की भर्ती में सिर्फ़ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता, "except where the employment of women in such work is prohibited or restricted by or under any law for the time being in force." क़ानून यहां साफ़ है। अपवाद सिर्फ़ तभी है जब कोई वाक़ई क़ानून औरतों के उस काम पर पाबंदी लगाता हो, कंपनी की अपनी राय या परंपरा से नहीं।

शिकायत दर्ज कराने का रास्ता है इंस्पेक्टर-कम-फ़ैसिलिटेटर के पास जाना, जिसे संहिता के तहत हर राज्य या केंद्र सरकार अपने दायरे में नियुक्त करती है। व्यवहार में यह अधिकारी अक्सर उसी दफ़्तर में बैठता है जिसे पहले श्रम आयुक्त का दफ़्तर कहा जाता था। नाम बदला, दफ़्तर वही है। इंडियन ऑयल जैसे केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम के मामले में यह केंद्र सरकार का अपना अधिकारी होगा, राज्य का नहीं, क्योंकि औद्योगिक विवाद क़ानूनों में केंद्र सरकार के उपक्रमों के लिए "उपयुक्त सरकार" केंद्र ही मानी जाती है। संहिता की धारा 52 के मुताबिक़ किसी अदालत को अपराध का संज्ञान लेने के लिए उपयुक्त सरकार, अधिकृत अधिकारी, पीड़ित कर्मचारी, पंजीकृत ट्रेड यूनियन या ख़ुद इंस्पेक्टर-कम-फ़ैसिलिटेटर की शिकायत चाहिए होती है, और मामला मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में चलता है। सज़ा धारा 54 के तहत तय होती है: पहली बार में बीस हज़ार रुपये तक जुर्माना, और पांच साल के भीतर दोबारा वही अपराध होने पर एक महीने तक की क़ैद या चालीस हज़ार रुपये तक जुर्माना, या दोनों। सज़ा हल्की है, रास्ता खुला है।

औद्योगिक विवाद वाला रास्ता, जो अक्सर सुझाया जाता है, सुमित्रा जैसी स्थिति में उतना सीधा नहीं है जितना लगता है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, जिसने 1947 के पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम की जगह ली है, "औद्योगिक विवाद" की परिभाषा में नियोजन और ग़ैर-नियोजन, दोनों को शामिल करती है। भर्ती से इनकार भी इसलिए इस परिभाषा के दायरे में आ सकता है। पर एक शर्त है। किसी अकेले कर्मचारी को बिना यूनियन के सीधे औद्योगिक अधिकरण तक पहुंचने का जो रास्ता संहिता देती है, वह सिर्फ़ बर्ख़ास्तगी, निकाले जाने या छंटनी के मामलों के लिए है। भर्ती से इनकार जैसे मामले में किसी पंजीकृत ट्रेड यूनियन को यह विवाद अपना बनाकर उठाना होता है। जिस औरत को नौकरी पर रखा ही नहीं गया, उसके लिए अकेले यह रास्ता तब तक आसान नहीं, जब तक कोई यूनियन साथ न आए। यूनियन के बिना यह मुश्किल है।

रिट, सिविल मुक़दमा और मुफ़्त क़ानूनी मदद के रास्ते

इंडियन ऑयल जैसा केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" माना जाता है। इसलिए इसके ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है, अनुच्छेद 14, 15(1) और 16(2) के उल्लंघन का हवाला देते हुए। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की अपनी कोर्ट फ़ीस तालिका के मुताबिक़ एक सिविल रिट याचिका पर फ़ीस सिर्फ़ पचास रुपये प्रति याचिकाकर्ता है। फ़ीस मामूली है। रिट याचिका के लिए क़ानून में कोई तय समय-सीमा नहीं है, पर अदालतें बेवजह देरी से दायर याचिका को विलंब और शिथिलता के सिद्धांत के आधार पर ख़ारिज कर सकती हैं। देरी का जोखिम याचिकाकर्ता पर ही रहता है।

सुमित्रा ने ख़ुद जो रास्ता चुना था, वह सिविल मुक़दमा था, घोषणा की मांग वाला। परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 58 के तहत ऐसे मुक़दमे की समय-सीमा तीन साल है, और यह अवधि उस दिन से गिनी जाती है जिस दिन मुक़दमा करने का हक़ पहली बार पैदा होता है। सुमित्रा का मुक़दमा इसी समय-सीमा के भीतर, 1988 के फ़ौरन बाद दायर हुआ लगता है। तारीख़ सटीक दर्ज नहीं है। इसका संकेत यह है कि पहली अपील ख़ुद 1990 में दर्ज हुई, यानी ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला उससे पहले आ चुका था।

मोहाली, पंजाब का ज़िला अदालत परिसर, सितंबर 2016 की तस्वीर; ऐसे ही परिसरों में सिविल अदालतें और ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के दफ़्तर होते हैं
तस्वीर: Harvinder Chandigarh, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0 :::

क़ानूनी लड़ाई का ख़र्च एक बड़ी बाधा है, ख़ासकर किसी ऐसी औरत के लिए जिसे अभी नौकरी ही नहीं मिली। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12(सी) के मुताबिक़ हर मामले में जिसे अदालत में लड़ना या बचाव करना है, उसमें "a women or a child", यानी हर औरत या बच्चा, मुफ़्त क़ानूनी सहायता का हक़दार है, चाहे उसकी आमदनी कुछ भी हो। यह उन गिनी-चुनी श्रेणियों में है जिन पर आमदनी की कोई सीमा लागू नहीं होती, अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों और मानव तस्करी के शिकार लोगों की तरह। आवेदन ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के दफ़्तर में दिया जा सकता है। आमदनी की शर्त नहीं है। प्राधिकरण को सिर्फ़ यह देखना होता है कि मामले में लड़ने या बचाव करने लायक़ ठोस आधार है।

ऐसे मामलों में फ़ैसला आने में औसतन कितना समय लगता है, इस पर कोई अलग, दर्ज सरकारी आंकड़ा नहीं मिला। सुमित्रा के मामले में अकेले हाईकोर्ट में बत्तीस साल लगे, यह दर्ज तथ्य है। औसत किसी को नहीं पता। यह किसी औसत का प्रतिनिधित्व करता है या किसी असामान्य देरी का, यह बताने वाला कोई आधिकारिक आंकड़ा किसी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं मिला।

स्रोतइंडियन कानून डॉट ऑर्ग पर उपलब्ध सुप्रीम कोर्ट का आदेश: Sumitra vs Indian Oil Corporation Ltd, 17 सितंबर 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 19874/2026 से उपजी अपील), जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली, फ़ैक्ट्रीज़ ऐक्ट, 1948 की धारा 66 का मूल पाठ, इंडियन कानून डॉट ऑर्ग, पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 की धारा 43 का मूल पाठ, इंडियन कानून डॉट ऑर्ग, हरियाणा सरकार का राजपत्र (असाधारण), श्रम विभाग की अधिसूचना संख्या 11/6/2022-4एलएबी, 8 मई 2025, पत्र सूचना कार्यालय: चार श्रम संहिताओं के 21 नवंबर 2025 से प्रभावी होने की घोषणा, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: वेतन संहिता, 2019 का पूरा पाठ, धारा 3, 52, 54, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की अपनी आधिकारिक कोर्ट फ़ीस तालिका, द ट्रिब्यून, 2 जनवरी 2020: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की अपनी लंबित मामलों की रिपोर्ट, विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12(सी) का मूल पाठ, इंडियन कानून डॉट ऑर्ग, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2 में 'औद्योगिक विवाद' की परिभाषा, इंडियन कानून डॉट ऑर्ग

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