माँ के दूसरे विवाह से बेटी का पिता की संपत्ति पर हक़ नहीं जाता, मद्रास हाई कोर्ट ने पुरानी धारा 24 का दायरा खोलकर रख दिया
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की जो धारा 2005 में हटाई जा चुकी है, वह अब भी उन बँटवारों में उठती है जहाँ मृत्यु उससे पहले हुई थी। मद्रास हाई कोर्ट ने कोयंबटूर के एक पुराने मुक़दमे में तय किया कि उस धारा की रोक विधवा तक सीमित थी। पिता का हिस्सा उसकी बेटी तक पहुँचने से नहीं रुकता।

कोयंबटूर की अधीनस्थ न्यायाधीश की अदालत में 2017 में एक निष्पादन अर्ज़ी दाख़िल हुई। मांग यह थी कि परिवार के एक मृत सदस्य का हिस्सा उसकी इकलौती बेटी के पास से हटाकर बाक़ी सहदायिकों में जोड़ दिया जाए। तर्क बेटी से जुड़ा नहीं था। तर्क यह था कि उसकी माँ ने पति की मृत्यु के बाद दूसरी शादी कर ली थी।
अदालत ने 26 फ़रवरी 2018 को वह अर्ज़ी लौटा दी। मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुँचा और वहाँ से आठ पन्नों का एक आदेश बनकर लौटा।
माँ के दूसरे विवाह से पिता की संपत्ति पर बेटी का हक़ ख़त्म नहीं होता।
न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी ने यह आदेश 25 अगस्त 2026 को सुनाया। उसकी सबसे सीधी पंक्ति यह है: रोक सिर्फ़ विधवा पर है, बाक़ी क़ानूनी वारिसों पर नहीं।
जिस नियम के तहत हक़ छीना गया था
आदेश में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की उस धारा 24 का पाठ ज्यों का त्यों दर्ज है जो 2005 के संशोधन अधिनियम 39 से हटाई जाने तक लागू थी। शीर्षक था, कुछ विधवाएँ पुनर्विवाह करने पर विधवा के रूप में उत्तराधिकार नहीं पा सकतीं। पाठ में तीन ही श्रेणियाँ गिनाई गई थीं: पूर्व-मृत पुत्र की विधवा, पूर्व-मृत पुत्र के पूर्व-मृत पुत्र की विधवा, और भाई की विधवा। शर्त थी कि उत्तराधिकार खुलने की तारीख़ को उसने दूसरा विवाह कर लिया हो। इस सूची में किसी पुरुष की अपनी विधवा कभी थी ही नहीं।
कोयंबटूर की फ़ाइल में तारीख़ें क्या बताती हैं
मूल बँटवारा वाद 1993 का है, संख्या ओ.एस. 91/1993। उस पर डिक्री हुई, फिर 2017 में निष्पादन याचिका 618/2017 दायर हुई, और उस पर 26 फ़रवरी 2018 का डॉकेट आदेश आया। हाई कोर्ट में याचिका 2023 में पहुँची, सुनवाई 11 अगस्त 2026 को पूरी हुई। याचिकाकर्ता की ओर से एस. नटराजन पेश हुए, पाँचवीं प्रतिवादी की ओर से एन. इश्तियाक़ अहमद। बाक़ी प्रतिवादियों की स्थिति फ़ाइल में इस तरह दर्ज है: पहली प्रतिवादी की मृत्यु हो चुकी, तीसरी का पता ग़ायब, तेरहवें का पता अधूरा, चौदहवें का पता ढूँढ़ा नहीं जा सका।
आदेश की वह पंक्ति जिस पर सब टिका है
आदेश के बारहवें पैराग्राफ़ में न्यायमूर्ति बालाजी लिखते हैं कि पूर्व-मृत पुत्र का सहदायिकी हित धारा 25 की तरह समाप्त नहीं होता, वह दूसरे अधिमानी वर्ग-1 वारिसों के लिए उपलब्ध बना रहता है, जैसे पूर्व-मृत पुत्र की माँ या उसके बच्चे। वेंकटेशन की विधवा ने पहले पति की संपत्ति में कभी कोई दावा किया ही नहीं। उनकी इकलौती बेटी वर्ग-1 वारिस के नाते पूरा हिस्सा ले चुकी थीं और संपत्ति बेच भी चुकी थीं, यानी उसमें तीसरे पक्ष के हित बन चुके थे।
वेल्लिकन्नु का फ़ैसला यहाँ क्यों नहीं चला
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के दो फ़ैसलों का सहारा लिया: वासुदेव धनजीभाई मोदी बनाम राजाभाई अब्दुल रहमान, 1970 एआईआर 1475, और वेल्लिकन्नु बनाम आर. सिंगापेरुमल, 2005 INSC 267। मद्रास हाई कोर्ट ने वेल्लिकन्नु को अलग कर दिया। उस मामले में अयोग्यता का कारण यह था कि बेटे ने अपने ही पिता की हत्या की थी, और वहाँ धारा 25 तथा 27 पर विचार हुआ था। बेटा ख़ुद हिस्से से वंचित हो गया तो उसे अस्तित्वहीन इकाई माना गया, इसलिए उसके ज़रिये कोई दावा नहीं कर सकता था।
धारा 27 का पेच: अयोग्य वारिस को मरा हुआ मान लिया जाता है
अधिनियम की धारा 27 एक वाक्य की है। अगर कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन किसी संपत्ति के उत्तराधिकार से अयोग्य है, तो संपत्ति इस तरह हस्तांतरित होगी मानो वह निर्वसीयत मरने वाले से पहले ही मर चुका हो। असर व्यावहारिक है। अयोग्यता किसी एक व्यक्ति को क़तार से बाहर करती है, संपत्ति को हवा में नहीं घोल देती। यह धारा प्रस्तुत आदेश में सिर्फ़ वेल्लिकन्नु के विवरण के भीतर आती है; वेंकटेशन के तथ्यों पर लागू करके नतीजा इससे नहीं निकाला गया।
धारा 8 और अनुसूची की वर्ग-1 सूची

धारा 8 पुरुष हिंदू की निर्वसीयत संपत्ति का क्रम तय करती है: पहले अनुसूची के वर्ग-1 के रिश्तेदार, वर्ग-1 में कोई न हो तो वर्ग-2, फिर सपिंड, अंत में बंधु। धारा 9 जोड़ती है कि वर्ग-1 के वारिस एक साथ लेते हैं और बाक़ी सबको बाहर कर देते हैं। अनुसूची की वर्ग-1 सूची में सोलह प्रविष्टियाँ हैं: पुत्र; पुत्री; विधवा; माता; पूर्व-मृत पुत्र का पुत्र; पूर्व-मृत पुत्र की पुत्री; पूर्व-मृत पुत्री का पुत्र; पूर्व-मृत पुत्री की पुत्री; पूर्व-मृत पुत्र की विधवा; पूर्व-मृत पुत्र के पूर्व-मृत पुत्र का पुत्र; पूर्व-मृत पुत्र के पूर्व-मृत पुत्र की पुत्री; पूर्व-मृत पुत्र के पूर्व-मृत पुत्र की विधवा; पूर्व-मृत पुत्री की पूर्व-मृत पुत्री का पुत्र; पूर्व-मृत पुत्री की पूर्व-मृत पुत्री की पुत्री; पूर्व-मृत पुत्री के पूर्व-मृत पुत्र की पुत्री; और पूर्व-मृत पुत्र की पूर्व-मृत पुत्री की पुत्री। पुत्र और पुत्री एक ही दर्जे पर हैं।
धारा 10 बताती है कि किसका हिस्सा कितना बड़ा होगा
सूची में नाम होना और हिस्सा कितना बड़ा होगा, ये दो अलग सवाल हैं। धारा 10 चार नियमों में इसका उत्तर देती है। विधवा एक हिस्सा लेगी, और एक से ज़्यादा विधवाएँ हों तो सब मिलकर एक हिस्सा। जीवित पुत्र, जीवित पुत्रियाँ और माता, हर एक को एक-एक हिस्सा। हर पूर्व-मृत पुत्र या पुत्री की शाखा के वारिस आपस में मिलकर एक हिस्सा लेंगे। चौथा नियम उस शाखा के भीतर बँटवारा तय करता है, जहाँ पूर्व-मृत पुत्र की विधवा और उसके जीवित बच्चे बराबर भाग पाते हैं।
धारा 15 और 16: औरत की संपत्ति अलग नियम से चलती है
पुरुष के लिए धारा 8, स्त्री के लिए धारा 15। किसी स्त्री की अपनी निर्वसीयत संपत्ति सबसे पहले उसके बेटों-बेटियों और पति के पास जाती है, फिर पति के वारिसों के पास, फिर माता-पिता, फिर पिता के वारिस, और अंत में माता के वारिस। इस पहली पंक्ति में जो पति खड़ा है, वह मृत्यु के समय का पति है। उपधारा 2 दो अपवाद बनाती है: पिता या माता से विरासत में मिली संपत्ति, संतान न होने पर, पिता के वारिसों के पास जाएगी; और पति या ससुर से मिली विरासत, संतान न होने पर, पति के वारिसों के पास लौटेगी।
धारा 14: विधवा का सीमित हक़ पूरा मालिकाना कब बना
धारा 14 की उपधारा 1 कहती है कि किसी हिंदू स्त्री के क़ब्ज़े में जो भी संपत्ति है, चाहे इस अधिनियम से पहले मिली हो या बाद में, वह उसे पूर्ण स्वामी के रूप में रखेगी, सीमित स्वामी के रूप में नहीं। स्पष्टीकरण में गिनाया गया है कि इसमें विरासत, वसीयत, बँटवारे में मिला हिस्सा, भरण-पोषण के बदले मिली संपत्ति, विवाह से पहले या बाद में मिला उपहार, और अपने श्रम से कमाई चीज़ शामिल है। उपधारा 2 अपवाद है: जहाँ उपहार, वसीयत, डिक्री या अवार्ड की शर्तें ही सीमित संपदा तय कर दें।
2005 का संशोधन: बेटी सहदायिक कब बनी
प्रतिस्थापित धारा 6 की भाषा तीन खंडों में है। मिताक्षरा विधि से चलने वाले संयुक्त हिंदू परिवार में सहदायिक की पुत्री जन्म से ही, पुत्र की तरह, अपने अधिकार से सहदायिक होगी; उसे सहदायिकी संपत्ति में वही अधिकार मिलेंगे जो पुत्र होने पर मिलते; और वही दायित्व भी। परंतुक 20 दिसंबर 2004 से पहले हुए किसी हस्तांतरण, विक्रय, बँटवारे या वसीयती व्ययन को बचा लेता है। उपधारा 5 का स्पष्टीकरण बँटवारे की परिभाषा कसता है: पंजीकरण अधिनियम, 1908 के तहत पंजीकृत विलेख, या अदालत की डिक्री।
धारा 6 का वह पुराना परंतुक जो इस मुक़दमे में चुपचाप मौजूद है
2005 से पहले की धारा 6 का पाठ विनीता शर्मा के फ़ैसले में ज्यों का त्यों उद्धृत है। मूल नियम यह था कि मिताक्षरा सहदायिकी संपत्ति में मृतक का हित उत्तरजीविता से बाक़ी सहदायिकों को मिलेगा। परंतुक इसमें एक बड़ा छेद करता था: यदि मृतक अपने पीछे अनुसूची के वर्ग-1 में गिनाई कोई महिला रिश्तेदार छोड़ गया हो, तो वह हित उत्तरजीविता से नहीं, निर्वसीयत उत्तराधिकार से जाएगा। वेंकटेशन अपने पीछे एक बेटी छोड़कर गए थे। यह परंतुक प्रस्तुत आदेश में केवल वेल्लिकन्नु के विवरण में आता है।
सुप्रीम कोर्ट का जवाब: विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा
11 अगस्त 2020 को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर और न्यायमूर्ति एम.आर. शाह की पीठ ने यह संदर्भ तय किया। फ़ैसला सिविल अपील डायरी संख्या 32601/2018 में आया, समतुल्य उद्धरण एआईआर 2020 एससी 3717। पैराग्राफ़ 129 में पाँच उत्तर दर्ज हैं। पहला, प्रतिस्थापित धारा 6 संशोधन से पहले या बाद जन्मी बेटी को पुत्र के समान सहदायिक का दर्जा देती है। तीसरा उत्तर सबसे ज़्यादा दोहराया जाता है: सहदायिकी का अधिकार जन्म से है, इसलिए 9 सितंबर 2005 को पिता का जीवित होना आवश्यक नहीं।
विनीता शर्मा से पहले फ़ैसले आपस में भिड़ रहे थे
प्रकाश बनाम फुलवती, (2016) 2 एससीसी 36 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अधिकार 9 सितंबर 2005 को जीवित सहदायिकों की जीवित बेटियों को मिलेगा। 1 फ़रवरी 2018 को दानम्मा उर्फ़ सुमन सुरपुर बनाम अमर में पीठ ने 2001 में मरे पिता की बेटियों को हिस्सा दे दिया। 19 अप्रैल 2018 को मंगम्मल बनाम टी.बी. राजू में फुलवती को ही आगे बढ़ाया गया। विनीता शर्मा में फुलवती और मंगम्मल के विपरीत मत उलट दिए गए, और दानम्मा का मत उस हद तक उलटा गया जहाँ तक वह इस फ़ैसले के विरुद्ध था। अपीलकर्ता ख़ुद दिल्ली हाई कोर्ट में हार चुकी थीं: न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने 15 मई 2018 को उनकी अपील ख़ारिज करते हुए उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाने का प्रमाणपत्र दे दिया था।
पुरानी डिक्री के बाद भी बेटी का हिस्सा बनता है
पैराग्राफ़ 129 का चौथा उत्तर सबसे ज़्यादा फ़ाइलों को छूता है। मूल धारा 6 के परंतुक से बना बँटवारे का काल्पनिक विभाजन असली बँटवारा नहीं था और उससे सहदायिकी टूटती नहीं थी; वह कल्पना केवल मृत सहदायिक का हिस्सा नापने के लिए थी। इसलिए प्रारंभिक डिक्री पास हो जाने के बावजूद, अंतिम डिक्री की लंबित कार्यवाही में या अपील में, बेटियों को पुत्र के बराबर हिस्सा देना होगा। पाँचवाँ उत्तर मौखिक बँटवारे के दावे को सिरे से ख़ारिज करता है।
1856 के क़ानून की वह धारा जो पुनर्विवाह पर हक़ छीन लेती थी
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 की धारा 2 का शीर्षक ही इसका सार है: विवाह पर मृत पति की संपत्ति में विधवा के अधिकारों का समाप्त होना। पाठ में वे ज़रिये गिनाए गए हैं जिनसे मिले अधिकार ख़त्म होंगे, यानी भरण-पोषण, पति या उसके वंशजों से उत्तराधिकार, और ऐसी वसीयत जो पुनर्विवाह की अनुमति दिए बिना सीमित हित दे। धारा कहती है कि पुनर्विवाह पर ये अधिकार इस तरह समाप्त हो जाएँगे मानो वह उसी दिन मर गई हो, और मृत पति के अगले वारिस उसमें उत्तराधिकार पा लेंगे।
1983 का निरसन, और विधि आयोग की इक्यासीवीं रिपोर्ट
1856 का वह अधिनियम हिंदू विधवा पुनर्विवाह (निरसन) अधिनियम, 1983 से हटा। निरसन विधेयक का उद्देश्य-कथन मद्रास हाई कोर्ट के एक फ़ैसले में पूरा उद्धृत है। उसमें ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयास से 1856 में बने क़ानून का ज़िक्र है, फिर 1955 और 1956 के चार अधिनियमों का, और फिर यह वाक्य: अब यह न्यायिक रूप से तय है कि विधवा एक बार संपत्ति पा ले और 1956 के अधिनियम के तहत पूर्ण अधिकार अर्जित कर ले, तो पुनर्विवाह पर उससे वह अधिकार नहीं छीना जा सकता। उद्देश्य-कथन विधि आयोग की उस इक्यासीवीं रिपोर्ट का हवाला देता है जिसमें 1856 के क़ानून को अप्रचलित बताया गया था।
धारा 4: 1956 का क़ानून पुराने रिवाजों पर भारी पड़ता है
धारा 4 दो हिस्सों में यह तय करती है। पहला, इस अधिनियम के लागू होने से ठीक पहले प्रचलित हिंदू विधि का कोई पाठ, नियम या व्याख्या, और कोई रूढ़ि या प्रथा, उन विषयों पर प्रभावी नहीं रहेगी जिन पर इस अधिनियम में प्रावधान है। दूसरा, पहले से लागू कोई भी दूसरा क़ानून हिंदुओं पर उस हद तक लागू नहीं होगा जिस हद तक वह इससे असंगत है। दि प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 18 दिसंबर 2024 को इसी आधार पर तय किया कि उत्तराधिकार मालिक की मृत्यु पर खुलता है।
पारिवारिक पेंशन का हिसाब विरासत से अलग चलता है

पेंशन के काग़ज़ों में नियम दूसरा है। केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2021 के नियम 50(8) के अनुसार पारिवारिक पेंशन विधवा या विधुर को मृत्यु या पुनर्विवाह, जो पहले हो, उस तारीख़ तक मिलती है, और दूसरे स्रोतों से उनकी आमदनी कितनी है, इससे पात्रता पर असर नहीं पड़ता। निःसंतान विधवा के लिए छूट है: पुनर्विवाह के बाद भी पेंशन चलती रहेगी, बशर्ते बाक़ी स्रोतों से उसकी आमदनी न्यूनतम पारिवारिक पेंशन, यानी 9,000 रुपये महीना, और उस पर देय महँगाई राहत से कम हो। इससे ऊपर जाते ही पेंशन रुककर परिवार के दूसरे पात्र सदस्य को मिलने लगेगी। पेंशन विभाग का ज्ञापन 26 अक्टूबर 2022 को जारी हुआ।
अनुकंपा नियुक्ति रियायत है, विरासत नहीं
केनरा बैंक बनाम अजितकुमार जी.के. में 11 फ़रवरी 2025 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अनुकंपा नियुक्ति के सिद्धांत एक जगह इकट्ठे किए। उनमें ये हैं: यह सार्वजनिक रोज़गार में समानता के नियम का अपवाद है; नियमों के अभाव में यह दी नहीं जा सकती; चूँकि ये नियम पिछले दरवाज़े से प्रवेश देते हैं, इसलिए इनकी व्याख्या सख़्त होगी; यह रियायत है, अधिकार नहीं; और कोई भी अनुकंपा नियुक्ति को विरासत के रूप में नहीं माँग सकता। मामले के तथ्य भी दर्ज हैं: प्रतिवादी के पिता की मृत्यु 20 दिसंबर 2001 को सेवा में हुई, सेवानिवृत्ति में चार महीने बचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करके नियुक्ति के बजाय ढाई लाख रुपये देने का आदेश दिया।
जिस काग़ज़ पर यह लड़ाई हर बार होती है

ज़्यादातर परिवारों के पास जो पहला काग़ज़ होता है, वह तहसीलदार का जारी किया क़ानूनी वारिस प्रमाणपत्र है। बैंक और पेंशन दफ़्तर इसी को माँगते हैं। मदुरै पीठ में न्यायमूर्ति आर.एस. रामनाथन ने 23 अप्रैल 2010 के फ़ैसले में दर्ज किया कि मद्रास हाई कोर्ट पहले भी कह चुका है कि राजस्व अधिकारियों के पास ऐसा प्रमाणपत्र जारी करने का क़ानूनी अधिकार नहीं है और इसके लिए अदालत ही सक्षम प्राधिकारी है। उसी फ़ैसले में यह भी है कि ऐसा प्रमाणपत्र साक्ष्य की एक परिस्थिति के तौर पर देखा जा सकता है। यह काग़ज़ खाता खुलवा देता है, मालिकाना तय नहीं करता।
उत्तराधिकार प्रमाणपत्र सिर्फ़ क़र्ज़ और प्रतिभूतियों के लिए है
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के भाग दस का उत्तराधिकार प्रमाणपत्र आम धारणा से बहुत छोटी चीज़ है। धारा 370 की उपधारा 2 में प्रतिभूति की परिभाषा है: सरकारी वचन-पत्र और स्टॉक, कंपनी के शेयर या डिबेंचर, स्थानीय निकाय की जारी प्रतिभूति, और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित कोई अन्य प्रतिभूति। धारा 372 के तहत ज़िला न्यायाधीश के सामने अर्ज़ी लगती है जिसमें मृत्यु का समय, मृतक का सामान्य निवास, नज़दीकी रिश्तेदार, तथा वे क़र्ज़ और प्रतिभूतियाँ बतानी होती हैं जिनके लिए प्रमाणपत्र चाहिए। धारा 214 के अनुसार मृतक के देनदार से वसूली की डिक्री इसी काग़ज़ के बिना नहीं होती। अचल संपत्ति इसके दायरे में आती ही नहीं।
दावा कहाँ करना है और कितने समय में
ज़मीन या मकान में हिस्सा माँगने का रास्ता उस दीवानी अदालत में बँटवारे का वाद है जिसके क्षेत्र में संपत्ति है। समय की सीमा परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची के अनुच्छेद 110 में है, जिसका पाठ बंबई हाई कोर्ट के एक फ़ैसले में ज्यों का त्यों उद्धृत है: संयुक्त परिवार की संपत्ति से बाहर कर दिए गए व्यक्ति द्वारा उसमें हिस्से का अधिकार लागू कराने के लिए, बारह वर्ष, जो तब से गिने जाएँगे जब वादी को बाहर किए जाने का पता चले। घड़ी मृत्यु की तारीख़ से नहीं, बहिष्करण की जानकारी से चलती है।
मुस्लिम, ईसाई और पारसी वारिसों पर यह अधिनियम लागू नहीं
यह पूरा ढाँचा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम का है, और धारा 2 इसका दायरा तय करती है। यह हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के लोगों पर लागू होता है, तथा ऐसे हर व्यक्ति पर जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है। मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 निर्वसीयत उत्तराधिकार में शरीयत को निर्णय का नियम बनाती है, कृषि भूमि के सवालों को छोड़कर। धारा 2 की उपधारा 2 में एक अपवाद और है: संविधान के अनुच्छेद 366(25) के अर्थ में अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर यह अधिनियम तब तक लागू नहीं होता जब तक केंद्र सरकार अधिसूचना जारी करके अन्यथा निर्देश न दे।
इस आदेश से आगे क्या बदलता है
आदेश के अंतिम पैराग्राफ़ में कहा गया है कि अधीनस्थ अदालत ने निष्पादन याचिका पर विचार करने से इनकार करके कोई ग़लती नहीं की, और पुनरीक्षण याचिका में कोई दम नहीं। याचिका तथा उससे जुड़ी विविध याचिका, दोनों ख़ारिज हुईं, ख़र्चे का कोई आदेश नहीं। पन्ने के नीचे तीन प्रविष्टियाँ दर्ज हैं: सूचकांक हाँ, वाचिक आदेश, तटस्थ उद्धरण हाँ। धारा 24 अब क़ानून की किताब में नहीं है, इसलिए यह सवाल केवल उन मामलों में उठता है जहाँ उत्तराधिकार 2005 के संशोधन से पहले खुला था। आदेश की प्रति कोयंबटूर के अधीनस्थ न्यायाधीश को भेजी गई है।
स्रोतमद्रास हाई कोर्ट, के. दुरैसामी बनाम धनलक्ष्मी (मृत) व अन्य, सी.आर.पी. संख्या 3576/2023, न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी का आदेश, 25 अगस्त 2026 का पूरा पाठ, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 का पूरा पाठ, 2005 के संशोधन अधिनियम 39 के बाद का संस्करण, सुप्रीम कोर्ट, विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा व अन्य, 11 अगस्त 2020 का फ़ैसला, तीन न्यायाधीशों की पीठ, दिल्ली हाई कोर्ट, विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा, आर.एफ़.ए. 301/2017, 15 मई 2018 का फ़ैसला, हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 की धारा 2 का पाठ, मद्रास हाई कोर्ट, मुरुगेसा गौंडर बनाम बृंदावती अम्मल, 17 फ़रवरी 2011, जिसमें 1983 के निरसन अधिनियम का उद्देश्य-कथन उद्धृत है, सुप्रीम कोर्ट, केनरा बैंक बनाम अजितकुमार जी.के., 2025 INSC 184, 11 फ़रवरी 2025 का फ़ैसला, मूल पीडीएफ़, पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग का कार्यालय ज्ञापन संख्या 1/1(1))/2022-P&PW(E), 26 अक्टूबर 2022, पूरा पाठ, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 का पूरा पाठ, भाग दस और धारा 214, बंबई हाई कोर्ट, सजनबीर सिंह आनंद बनाम रमिंदर कौर आनंद, 4 मई 2018, जिसमें परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 110 ज्यों का त्यों उद्धृत है, मद्रास हाई कोर्ट, मदुरै पीठ, इरुदयराज बनाम के. इंदिरा, 23 अप्रैल 2010, क़ानूनी वारिस प्रमाणपत्र पर, दि प्रिंट, मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ के 18 दिसंबर 2024 के फ़ैसले की रिपोर्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 का पाठ