इस बार वृद्धि 7.8 फ़ीसदी है, और पिछले साल इसी तिमाही के लिए भी यही आँकड़ा छपा था
सांख्यिकी मंत्रालय की आज की विज्ञप्ति में लिखा है कि पिछले साल की पहली तिमाही 6.9 फ़ीसदी बढ़ी थी। नवंबर 2025 की विज्ञप्ति में उसी तिमाही के लिए 7.8 दर्ज है। बीच में आधार वर्ष बदल गया।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने रविवार शाम चार बजे बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 7.8 फ़ीसदी बढ़ी है।
पिछले साल भी पहली तिमाही की वृद्धि 7.8 फ़ीसदी बताई गई थी।
मंत्रालय के 28 नवंबर 2025 वाले प्रेस नोट की पहली सारणी में, 2025-26 की पहली तिमाही के नीचे, यही अंक दर्ज है। उस तिमाही की जीडीपी वहाँ 47,88,623 करोड़ रुपये लिखी है और उसके आगे वृद्धि 7.8।
आज की विज्ञप्ति में उसी तिमाही की वृद्धि 6.9 है।
एक ही तिमाही, दो आँकड़े
आज के प्रेस नोट के मुख्य बिंदुओं में पहली ही पंक्ति यह है कि 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 7.8 फ़ीसदी बढ़ी, "जबकि 2025-26 की पहली तिमाही में यह वृद्धि 6.9 फ़ीसदी रही थी"।
यह बात छिपाई नहीं गई है। वह विज्ञप्ति के पहले पन्ने पर है।
जो कहीं नहीं लिखा, वह यह है कि उसी तिमाही के लिए पहले 7.8 छप चुका है।
बीच में क्या हुआ
आज का प्रेस नोट ख़ुद इसका जवाब देता है। उसमें लिखा है कि मंत्रालय ने 27 फ़रवरी 2026 को जीडीपी अनुमानों की नई श्रृंखला जारी की, जिसका आधार वर्ष 2022-23 है।
आधार वर्ष बदलने का मतलब है कि जिन क़ीमतों पर अर्थव्यवस्था नापी जाती है वे बदल गईं, स्रोत बदल गए, और पूरी पुरानी श्रृंखला दोबारा नापी गई। यह हर कुछ साल में होता है और दुनिया भर में होता है। इससे पहले भारत में आधार वर्ष 2011-12 था।
तो 7.8 से 6.9 पर आना आज नहीं हुआ। वह फ़रवरी 2026 के इस बदलाव के साथ हुआ।
5 जून 2026 के प्रेस नोट में, जो नई श्रृंखला पर ही है, उसी तिमाही की वृद्धि 6.8 दर्ज है। आज वह 6.9 हो गई। यह आख़िरी वाला फ़र्क़ छोटा है और सामान्य संशोधन है।
बड़ा फ़र्क़ पहले वाला है, और वह लगभग एक प्रतिशत अंक का है।
जो संख्या दोनों जगह छपी है
वास्तविक जीडीपी स्थिर क़ीमतों पर नापी जाती है, इसलिए पुरानी और नई श्रृंखला के रुपये आपस में नहीं जुड़ते। 47,88,623 करोड़ 2011-12 की क़ीमतों में है और 75,46,230 करोड़ 2022-23 की क़ीमतों में। ये दो अलग पैमाने हैं, और इन्हें घटाकर कोई नतीजा निकालना ग़लत होगा।
नॉमिनल जीडीपी चालू क़ीमतों पर होती है, यानी उस वक़्त के असली रुपयों में।
नवंबर 2025 के प्रेस नोट में अप्रैल-जून 2025 की नॉमिनल जीडीपी 86,05,365 करोड़ रुपये दर्ज है।
आज की विज्ञप्ति में वही तिमाही 80,00,192 करोड़ रुपये है।
इन दोनों को घटाकर भी कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता, और यह बात साफ़ लिख देनी चाहिए। आधार वर्ष बदलना सिर्फ़ क़ीमतों का पैमाना बदलना नहीं होता। उसके साथ आँकड़ों के स्रोत बदलते हैं, दायरा बदलता है और नापने का तरीक़ा बदलता है। इसलिए नॉमिनल स्तर भी दोबारा नापा जाता है। ये दो संख्याएँ एक ही तिमाही के दो अलग आकलन हैं, एक ही आकलन के दो पड़ाव नहीं।
जो तुलना बचती है वह वृद्धि दर की है, और वह भी यह कहकर कि कौन-सी किस श्रृंखला की है। पुरानी श्रृंखला में उस तिमाही की नॉमिनल वृद्धि 8.8 दर्ज थी। नई श्रृंखला में वह 8.1 है।
विनिर्माण का नया हिसाब
नई श्रृंखला में एक तकनीकी बदलाव हुआ है जिसका ज़िक्र प्रेस नोट ख़ुद करता है।
पहले विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और कच्चे माल, दोनों की क़ीमतें एक ही सूचकांक से हटाई जाती थीं। अब दोनों अलग-अलग हटाई जाती हैं। इसे डबल डिफ़्लेशन कहते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे बेहतर तरीक़ा माना जाता है।
प्रेस नोट इसके ठीक बाद अपनी ही चेतावनी छापता है। उसमें लिखा है कि इस तरीक़े में उत्पादन और कच्चे माल दोनों की क़ीमतें बढ़ने पर भी विनिर्माण का निहित मूल्य डिफ़्लेटर गिर सकता है, या ऋणात्मक वृद्धि दिखा सकता है। वजह यह कि अगर कच्चा माल उत्पाद से तेज़ महँगा हो, तो जो मूल्य जुड़ता है वह घट जाता है।
यह विज्ञप्ति का अपना पैराग्राफ़ है, किसी आलोचक का नहीं।
तरीक़े वाली किताब अभी नहीं छपी
उसी हिस्से में एक और वाक्य है।
प्रेस नोट कहता है कि संकलन में इस्तेमाल हुई कार्यप्रणाली और डेटा स्रोतों को "सोर्सेस एंड मेथड्स" नाम के प्रकाशन में विस्तार से रखा जाएगा, जो सितंबर 2026 तक आना है।
नई श्रृंखला पर यह तीसरी बड़ी रिलीज़ है। पूरा तरीक़ा बताने वाला प्रकाशन अभी बाक़ी है।
आज का आँकड़ा भी बदलेगा
प्रेस नोट के दूसरे हिस्से के आख़िर में यह लिखा है कि स्रोत एजेंसियों के बेहतर आँकड़े और उनमें होने वाले सुधार आगे के संशोधनों पर असर डालेंगे, इसलिए अनुमानों में संशोधन होते रहने की गुंजाइश बनी रहती है। मंत्रालय पाठकों से कहता है कि आँकड़े पढ़ते वक़्त इसे ध्यान में रखें।
दूसरी तिमाही के अनुमान 30 नवंबर 2026 को आएँगे।
यानी आज की 7.8 भी उसी तरह का पहला अनुमान है जैसी पिछले साल की 7.8 थी।
जो आँकड़े के भीतर है
तिमाही में सकल मूल्य वर्धन 8.2 फ़ीसदी बढ़ा, पर जीडीपी 7.8 फ़ीसदी। जीडीपी इन दोनों का जोड़ है, मूल्य वर्धन और उस पर लगने वाले शुद्ध कर का। शुद्ध कर सिर्फ़ 3.9 फ़ीसदी बढ़ा, इसलिए जोड़ नीचे रह गया।
चालू क़ीमतों पर शुद्ध कर बढ़ा ही नहीं। वह 7,76,644 करोड़ से घटकर 7,73,502 करोड़ रुपये रह गया, यानी 0.4 फ़ीसदी कम। शुद्ध कर का मतलब है उत्पादों पर लगे कर, उन पर दी गई सब्सिडी घटाकर।
खनन और उत्खनन इकलौता उप-क्षेत्र है जो सिकुड़ा, 2.4 फ़ीसदी। सकल स्थिर पूँजी निर्माण 11.9 फ़ीसदी बढ़ा, जो पिछले साल की इसी तिमाही में 5.8 था।
और आयात 1.1 फ़ीसदी घटे। ख़र्च के हिसाब में आयात घटाया जाता है, इसलिए उनका गिरना जीडीपी को ऊपर उठाता है।
तो पढ़ें कैसे
7.8 फ़ीसदी एक असली आँकड़ा है और सरकार के अपने दस्तावेज़ में दर्ज है। सवाल उस पर नहीं है।
सवाल तुलना पर है। जिस पिछली तिमाही से यह नापा जा रहा है, उसका आँकड़ा वह नहीं रहा जो पिछले साल छपा था। पूरी श्रृंखला दोबारा नापी जा चुकी है, और यह बदलाव किसी ने छिपाया नहीं है।
बस उसे साथ में लिखा नहीं जा रहा।
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