मंत्रालय ने बताया कि वही तिमाही चार बार अलग-अलग छपी है, और हमारा एक हिसाब ग़लत निकला
सांख्यिकी मंत्रालय ने जीडीपी अनुमानों पर अतिरिक्त जानकारी जारी की है। उसमें अप्रैल-जून 2025 की नॉमिनल जीडीपी के चारों आँकड़े एक जगह हैं। उसी जवाब से हमारे 1 सितंबर वाले लेख की एक गणना ग़लत साबित होती है।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने मंगलवार को जीडीपी के अनुमानों पर अतिरिक्त जानकारी जारी की। वह छह सवालों और उनके जवाबों की शक्ल में है।
दूसरा सवाल सबसे सीधा है। उसमें पूछा गया है कि क्या चालू साल की जीडीपी बेहतर दिखाने के लिए पिछले साल की जीडीपी 86 लाख करोड़ से घटाकर 80 लाख करोड़ कर दी गई।
जवाब में मंत्रालय ने पहली बार एक जगह वह पूरी सूची रखी है जो अब तक बिखरी हुई थी।
एक तिमाही, चार आँकड़े
अप्रैल से जून 2025 की नॉमिनल जीडीपी अब तक चार बार छप चुकी है।
29 अगस्त 2025 को, पुरानी 2011-12 आधार वाली श्रृंखला में, वह 86.05 लाख करोड़ रुपये थी।
फ़रवरी 2026 में नई 2022-23 आधार वाली श्रृंखला आई और उसमें वही तिमाही 80.32 लाख करोड़ हो गई।
5 जून 2026 को, अनंतिम अनुमानों के साथ, वह 80.44 लाख करोड़ हो गई।
और 31 अगस्त 2026 को, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तथा उत्पादक मूल्य सूचकांक की नई श्रृंखलाएँ शामिल होने के बाद, वह 80 लाख करोड़ रह गई।
मंत्रालय का तर्क
मंत्रालय कहता है कि इस अंतर को पिछले साल की जीडीपी में जानबूझकर की गई कमी मानना ग़लत है, जिसका मक़सद चालू साल की वृद्धि दर को यांत्रिक रूप से बढ़ाना हो।
और उससे ज़्यादा अहम बात यह लिखी है कि पुरानी 2011-12 श्रृंखला के 86.05 लाख करोड़ की तुलना नई 2022-23 श्रृंखला के मौजूदा अनुमान से सीधे नहीं की जा सकती।
वजह यह बताई गई है कि आधार वर्ष बदलने के साथ आँकड़ों के स्रोत बदले, कार्यप्रणाली बदली और दायरा बदला, इसलिए पूरी समय-श्रृंखला दोबारा नापी गई।
और यहीं हमारी अपनी ग़लती है
1 सितंबर के अंक में हमने इसी विषय पर लिखा था।
उस लेख में एक वाक्य था कि नॉमिनल जीडीपी के साथ यह अड़चन नहीं है, क्योंकि वह चालू क़ीमतों पर होती है। उसी आधार पर हमने 86,05,365 करोड़ में से 80,00,192 करोड़ घटाकर 6,05,173 करोड़ का फ़र्क़ निकाला और उसे उस तिमाही के नॉमिनल आकार का लगभग सात फ़ीसदी बताया।
वह गणना ग़लत थी।
आधार वर्ष बदलना सिर्फ़ क़ीमतों का पैमाना बदलना नहीं होता। उसके साथ स्रोत, दायरा और नापने का तरीक़ा भी बदलता है, इसलिए नॉमिनल स्तर भी दोबारा नापा जाता है। वे दो संख्याएँ एक ही तिमाही के दो अलग आकलन हैं, एक ही आकलन के दो पड़ाव नहीं। उन्हें घटाकर "अर्थव्यवस्था सात फ़ीसदी छोटी हो गई" निकालना उसी तरह ग़लत है जिस तरह स्थिर क़ीमतों वाले दो आँकड़ों को घटाना, और स्थिर क़ीमतों वाली चेतावनी हमने उसी लेख में ख़ुद दी थी।
लेख का वह हिस्सा बदल दिया गया है और सुधार दर्ज कर दिया गया है।
जो उस लेख में सही था
बाक़ी लेख अपनी जगह है, और उसे वापस लेने की कोई वजह नहीं है।
उसी तिमाही की वास्तविक वृद्धि नवंबर 2025 के प्रेस नोट में 7.8 दर्ज थी और आज की श्रृंखला में 6.9 है। दोनों आँकड़े मंत्रालय के अपने दस्तावेज़ों से जाँचे गए थे।
वह बदलाव फ़रवरी 2026 के आधार-वर्ष संशोधन के साथ हुआ, 31 अगस्त को नहीं। यह हमने उसी लेख में लिखा था।
हमने यह भी नहीं लिखा था कि सरकार ने जानबूझकर आँकड़ा घटाया। हमने उल्टा लिखा था कि यह एक तकनीकी काम है जो हर कुछ साल में होता है और दुनिया भर में होता है।
और मंत्रालय की अपनी वह चेतावनी भी वहीं दर्ज थी कि आज का आँकड़ा भी आगे बदलेगा। मंगलवार की यह सूची उसी बात का सबूत है। नई श्रृंखला के भीतर ही वह तिमाही तीन बार बदल चुकी है।
बाक़ी जवाबों में क्या है
तीसरा सवाल विनिर्माण के ऋणात्मक डिफ़्लेटर पर है।
मंत्रालय बताता है कि 2026-27 की पहली तिमाही में विनिर्माण की नॉमिनल जीवीए वृद्धि 7.7 फ़ीसदी रही और वास्तविक 9.2 फ़ीसदी, जिससे निहित डिफ़्लेटर ऋण 1.5 फ़ीसदी निकला। उसका कहना है कि इसका मतलब यह नहीं कि विनिर्माण की क़ीमतें गिरीं, बल्कि यह कि कच्चे माल की क़ीमतें उत्पाद से तेज़ बढ़ीं।
जिन गतिविधियों में ऐसा मिला, उनके नाम भी दिए गए हैं। वस्त्र और कपास की ओटाई, बुनियादी धातुओं का विनिर्माण, रबर और प्लास्टिक उत्पाद।
एक सवाल जीडीपी डिफ़्लेटर और उपभोक्ता तथा थोक मुद्रास्फीति के फ़ासले पर है। मंत्रालय का जवाब यह है कि तीनों अलग चीज़ें नापते हैं, और जीडीपी डिफ़्लेटर कोई सीधा माप नहीं बल्कि तीन सौ से ज़्यादा अलग-अलग मूल्य डिफ़्लेटरों से निकली एक व्युत्पन्न संख्या है।
आख़िरी सवाल विसंगति पर है, यानी उत्पादन की तरफ़ से और ख़र्च की तरफ़ से निकाले गए जीडीपी अनुमानों के बीच के अंतर पर।
मंत्रालय उसे सांख्यिकीय संतुलन कारक कहता है और लिखता है कि उसके घटने-बढ़ने को अपने आप में इस बात का सबूत नहीं मानना चाहिए कि जीडीपी कम या ज़्यादा बताई गई है। वह यह भी कहता है कि अंतिम अनुमान आने तक यह विसंगति बहुत कम या शून्य हो जाती है, जैसा 2022-23 और 2023-24 में हुआ।
जो अब भी खुला है
मंत्रालय की बात पद्धति के बारे में है और उस हद तक वह सही है। दो श्रृंखलाओं के आँकड़े घटाए नहीं जा सकते।
पर इससे वह सवाल ख़त्म नहीं होता जो 1 सितंबर के लेख का असली सवाल था। जब सरकार यह कहती है कि इस तिमाही की वृद्धि 7.8 फ़ीसदी है, तो पिछले साल इसी तिमाही के लिए भी 7.8 छपा था, और वह अब 6.9 है। यह तुलना पाठक के सामने रखी जानी चाहिए, और वह अपने आप नहीं रखी जाती।
एक और बात दर्ज करने लायक़ है। मंत्रालय का जवाब कहता है कि 2026-27 की पहली तिमाही के 88.27 लाख करोड़ की तुलना 80.32 लाख करोड़ से होनी चाहिए थी। 31 अगस्त का प्रेस नोट वह तुलना 80 लाख करोड़ से करता है, और उसी से 10.3 फ़ीसदी की वृद्धि निकलती है।
हमारी अपनी गणना में 80.32 से तुलना करने पर वह 9.9 फ़ीसदी बैठती है।
दोनों आँकड़े नई श्रृंखला के हैं और 80 लाख करोड़ उनमें नवीनतम है, इसलिए प्रेस नोट का हिसाब अपनी जगह ठीक है। बस जवाब में जो अंक लिखा गया, वह प्रेस नोट में इस्तेमाल हुए अंक से अलग है।
स्रोतसांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, अतिरिक्त जानकारी, एमओएसपीआई, प्रेस नोट, अनंतिम अनुमान 2025-26, एमओएसपीआई, पहली तिमाही 2026-27 की विज्ञप्ति