अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अंतिम तथ्य-पत्र में भारत के लिए तीन आँकड़े हैं: 123.04, 107.17 और 126.09
शुक्रवार, 11 सितंबर को अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले क्रिस्टलीय सिलिकॉन सौर सेल और मॉड्यूल पर डंपिंग-रोधी और प्रतिकारी शुल्क की जाँच का अंतिम फ़ैसला सुनाया। भारत के लिए डंपिंग मार्जिन 123.04 फ़ीसदी और सब्सिडी की दर 126.09 फ़ीसदी दर्ज है। दोनों जोड़ने पर 249.13 बनता है, पर अमेरिकी सीमा पर हर खेप से जो नक़द जमा माँगा जाएगा वह 233.26 फ़ीसदी है, क्योंकि विभाग डंपिंग मार्जिन में से निर्यात-सब्सिडी वाला हिस्सा घटा देता है।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने शुक्रवार, 11 सितंबर को अपना अंतिम तथ्य-पत्र जारी किया। भारत के हिस्से में उसमें दो तालिकाएँ हैं, और उन दो तालिकाओं में तीन आँकड़े।
पहली तालिका डंपिंग की है। उसमें मुंद्रा सोलर पीवी लिमिटेड, मुंद्रा सोलर एनर्जी लिमिटेड, कोवा कंपनी लिमिटेड, प्रीमियर एनर्जीज़ फ़ोटोवोल्टेइक प्राइवेट लिमिटेड और 'अन्य सभी' के सामने एक ही आँकड़ा है: 123.04 फ़ीसदी। दूसरी तालिका सब्सिडी की है, और उसमें तीनों पंक्तियों के सामने 126.09 फ़ीसदी।
तीसरा आँकड़ा पहली तालिका के दूसरे कॉलम में है। उसका शीर्षक है, "कैश डिपॉज़िट रेट (सब्सिडी ऑफ़सेट के लिए समायोजित)", और उसमें लिखा है 107.17।
अमेरिकी सीमा पर पैसा उसी तीसरे आँकड़े से जमा होता है।
डंपिंग मार्जिन, प्रतिकारी शुल्क और सीमा पर जमा होने वाली दर
123.04 और 107.17 के बीच 15.87 अंक का फ़र्क़ है। यह घटाव कहीं छिपा हुआ नहीं है, वाणिज्य विभाग ने उसे अपनी अधिसूचना में शब्दों में लिखा है। 28 अप्रैल 2026 की डंपिंग-रोधी प्रारंभिक अधिसूचना (91 FR 22798) के 'निलंबन' खंड में वाक्य यह है कि विभाग डंपिंग-रोधी शुल्क की अनुमानित नक़द जमा राशि में से उतनी रक़म सामान्यतः घटा देता है जितनी निर्यात-सब्सिडी पर साथ चल रही प्रतिकारी शुल्क जाँच में शुल्क लग चुका हो, बशर्ते उस जाँच के अस्थायी उपाय उस वक़्त लागू हों।
निर्यात-सब्सिडी वह सब्सिडी है जो निर्यात करने पर ही मिलती है। उसे दो बार वसूलना दोहरी गिनती होगी, इसलिए प्रतिकारी शुल्क में तो वह पूरी रहती है और डंपिंग मार्जिन में से निकाल दी जाती है। भारत के मामले में उस हिस्से का नाप 15.87 अंक बैठा।
इसलिए सीमा पर जमा होने वाली कुल दर 107.17 और 126.09 का जोड़ है, यानी 233.26 फ़ीसदी। 123.04 और 126.09 का जोड़ 249.13 होता है, पर वह जोड़ किसी काग़ज़ पर कहीं दर्ज नहीं है। वह दो अलग-अलग निष्कर्षों का योग है, वसूली की दर नहीं।
प्रारंभिक निर्धारण में यही समायोजित दर 107.77 थी और घटाव 15.27 अंक का। अंतिम में घटाव थोड़ा बढ़कर 15.87 हो गया और जमा दर 107.17 पर आ गई। पीवी मैगज़ीन यूएसए ने 11 सितंबर को लिखा कि भारत के लिए संयुक्त मार्जिन "अधिकतम 234 फ़ीसदी" तक जाता है। अंतिम तथ्य-पत्र के अपने आँकड़ों से 233.26 निकलता है; प्रारंभिक जोड़ी 107.77 और 126.09 से 233.86 निकलता है, जो पूर्णांक में 234 है।
रॉयटर्स ने 12 सितंबर की अपनी ख़बर में दोनों आँकड़े अलग-अलग छापे और कोई जोड़ नहीं दिया।
तालिकाओं में एक और बारीकी है। डंपिंग वाली तालिका में 'अन्य सभी' की पंक्ति पर भी तारांकन लगा है, और नीचे की टिप्पणी बताती है कि वह दर प्रतिकूल निष्कर्ष के साथ उपलब्ध तथ्यों पर टिकी है। सब्सिडी वाली तालिका में मुंद्रा की दोनों पंक्तियों पर तारांकन है, 'अन्य सभी' की पंक्ति पर नहीं। दोनों जगह आँकड़ा एक ही है, पर उस तक पहुँचने का रास्ता अलग दर्ज किया गया है।
अप्रैल की अधिसूचना में एक शर्त और दर्ज है, जो आने वाले हफ़्तों में मायने रखेगी। अगर प्रतिकारी शुल्क जाँच के अस्थायी उपाय डंपिंग जाँच के अस्थायी उपायों से पहले ख़त्म हो जाएँ, तो विभाग सीमा शुल्क एवं सीमा सुरक्षा को निर्देश देगा कि वह उसी घड़ी से डंपिंग-रोधी जमा बिना समायोजन के, यानी पूरे 123.04 फ़ीसदी पर वसूलना शुरू कर दे। भारत की प्रतिकारी जाँच की प्रारंभिक अधिसूचना 26 फ़रवरी 2026 को छपी थी और डंपिंग वाली 28 अप्रैल को।
इंडोनेशिया और लाओस की तालिकाओं का फ़र्क़
इंडोनेशिया की डंपिंग तालिका में समायोजित जमा दर का कॉलम है ही नहीं। पीटी ब्लू स्काई सोलर इंडोनेशिया, पीटी आरईसी सोलर एनर्जी इंडोनेशिया और 'अन्य सभी', तीनों के सामने सिर्फ़ 94.36 फ़ीसदी है। सब्सिडी की तालिका में ब्लू स्काई के लिए 173.70 और आरईसी तथा 'अन्य सभी' के लिए 73.20 है। जोड़ने पर आम इंडोनेशियाई निर्यातक के लिए 167.56 और ब्लू स्काई के लिए 268.06 बैठता है।
लाओस में घटाव है, पर नाममात्र का। मार्जिन 65.43 और समायोजित जमा दर 65.03, यानी 0.40 अंक। सोलरस्पेस टेक्नोलॉजी (लाओस) के लिए सब्सिडी की दर 82.03 है और वियतनाम सनर्जी ज्वाइंट स्टॉक कंपनी के लिए 153.67। जमा दर क्रमशः 147.06 और 218.70 बनती है।
लाओस की तालिका पढ़ने लायक़ इसलिए भी है कि उसमें उत्पादक और निर्यातक के अलग-अलग कॉलम हैं। उत्पादक हर पंक्ति में सोलरस्पेस टेक्नोलॉजी (लाओस) है, और निर्यातक के ख़ाने में सोलरस्पेस टेक्नोलॉजी (हांगकांग), जेए सोलर वियतनाम, ट्राइना सोलर एनर्जी डेवलपमेंट (सिंगापुर) और ट्राइना सोलर साइंस एंड टेक्नोलॉजी (थाईलैंड) के नाम हैं। एक देश में बना सेल कितने पतों से होकर अमेरिका पहुँचता है, यह उसी कॉलम में दर्ज है।
तीनों देशों को एक साथ रखने पर यही असली फ़र्क़ दिखता है। भारत के लिए जिन सब्सिडियों पर शुल्क बैठा, उनमें निर्यात से जुड़ा हिस्सा 15.87 अंक का है। लाओस में वह 0.40 अंक का है, और इंडोनेशिया में विभाग को ऐसा कोई हिस्सा मिला ही नहीं।
पीवी मैगज़ीन ने इंडोनेशिया के लिए 178 और लाओस के लिए 103 फ़ीसदी छापा है। वाणिज्य विभाग की इन तालिकाओं से ये दोनों आँकड़े नहीं निकलते, न किसी कंपनी के लिए, न 'अन्य सभी' के लिए।
एक और बदलाव तालिकाओं में दर्ज है। अप्रैल के प्रारंभिक निर्धारण में इंडोनेशिया का डंपिंग मार्जिन 35.17 फ़ीसदी था और लाओस का 22.46। अंतिम में वे बढ़कर 94.36 और 65.43 हो गए। भारत का 123.04 दोनों बार एक ही रहा।
प्रतिकूल उपलब्ध तथ्य: भारत का मार्जिन याचिका से उठाया गया है
अप्रैल की अधिसूचना का 'कार्यप्रणाली' खंड यह बताता है कि 123.04 का आँकड़ा आया कैसे। विभाग लिखता है कि उसने मुंद्रा सोलर पीवी, मुंद्रा सोलर एनर्जी, कोवा और प्रीमियर एनर्जीज़ फ़ोटोवोल्टेइक, इन चारों मुख्य उत्तरदाताओं के लिए उपलब्ध तथ्यों का सहारा लिया, क्योंकि चारों कंपनियों ने डंपिंग मार्जिन निकालने के लिए ज़रूरी जानकारी जमा ही नहीं की। आगे लिखा है कि चारों ने अपनी पूरी क्षमता से सहयोग नहीं किया, इसलिए क़ानून की धारा 776(b) के तहत उपलब्ध तथ्यों में से चुनते हुए प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला गया।
इसके बाद 'अन्य सभी' की दर तय करने की बारी आई। नियम कहता है कि जब सारे जाँचे गए उत्तरदाताओं की दर पूरी तरह उपलब्ध तथ्यों पर टिकी हो, तो विभाग कोई भी उचित तरीक़ा अपना सकता है। याचिका में एक ही मार्जिन का आरोप लगाया गया था, 123.04 फ़ीसदी, और विभाग ने वही सबके लिए रख दिया।
'प्रकटीकरण' खंड में एक वाक्य है जो पूरे मामले का सार है। विभाग सामान्यतः पाँच दिन के भीतर अपनी गणनाएँ पक्षों को दिखाता है, पर यहाँ उसने लिखा कि प्रतिकूल उपलब्ध तथ्यों वाली दर सिर्फ़ याचिका पर टिकी है, इसलिए दिखाने लायक़ कोई गणना है ही नहीं।
प्रतिकारी शुल्क वाली 26 फ़रवरी की अधिसूचना में भी यही ढर्रा है। उसके 'सत्यापन' खंड में लिखा है कि जाँचे गए उत्तरदाताओं ने माँगी गई जानकारी नहीं दी और उन्हें असहयोगी पाया गया, इसलिए विभाग सत्यापन करेगा ही नहीं।
तथ्य-पत्र के अपने आयात आँकड़े इस बात को और तीखा कर देते हैं। 2024 में अमेरिका ने भारत से 2,29,73,06,441 वाट, यानी क़रीब 2.3 अरब वाट के सेल और मॉड्यूल मँगाए, जिनका मूल्य 79.26 करोड़ डॉलर था। यानी औसतन 34.5 सेंट प्रति वाट। उसी साल इंडोनेशिया का औसत 23 सेंट और लाओस का 17.6 सेंट प्रति वाट बैठता है। सबसे ऊँचे दाम पर बिकने वाले पैनल भारत के थे, और सबसे ऊँचा डंपिंग मार्जिन भी भारत का है।
जाँच की अवधियाँ भी दोनों मामलों में अलग हैं। डंपिंग की जाँच 1 जुलाई 2024 से 30 जून 2025 तक की है, और सब्सिडी की 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 तक, यानी भारत के अपने वित्त वर्ष पर।
भारत का पैनल-निर्यात और उसमें अमेरिका का हिस्सा
भारत सरकार के वाणिज्य विभाग के अपने निर्यात-आयात डेटा बैंक में एचएस 854143 का ब्योरा है, यानी उन फ़ोटोवोल्टेइक सेलों का जो मॉड्यूल या पैनल में जुड़े हुए हैं। 13 सितंबर को पढ़े गए आँकड़ों के मुताबिक़ 2024-25 में भारत ने इस मद में अमेरिका को 1.02 अरब डॉलर का माल भेजा। उसी साल इस मद का भारत का कुल निर्यात 1.05 अरब डॉलर था।
अनुपात 96.97 फ़ीसदी बैठता है।
यह कोई एक साल का उतार-चढ़ाव नहीं है। 2021-22 में यह हिस्सा 96.99 फ़ीसदी था, 2022-23 में 98.52 और 2023-24 में 97.20। रक़म हर साल बदली, हिस्सा नहीं बदला। 2022-23 में अमेरिका को 1.94 अरब डॉलर के मॉड्यूल गए, जो अब तक का सबसे ऊँचा आँकड़ा है; 2023-24 में यह गिरकर 1.09 अरब डॉलर रह गया और 2024-25 में 1.02 अरब डॉलर।
बिना जुड़े सेल, यानी एचएस 854142, बहुत छोटी मद है और उसमें अमेरिका का हिस्सा स्थिर नहीं रहा। 2022-23 में 3.28 करोड़ डॉलर (59.94 फ़ीसदी), 2023-24 में 2.98 करोड़ डॉलर (92.99 फ़ीसदी), और 2024-25 में घटकर 95 लाख डॉलर (46.89 फ़ीसदी)।
दोनों मदें मिलाकर 2024-25 में अमेरिका को क़रीब 1.03 अरब डॉलर का सौर माल गया। उसी साल भारत ने अमेरिका को कुल 87.31 अरब डॉलर का सामान बेचा। यानी सौर पैनल भारत के अमेरिकी निर्यात का 1.18 फ़ीसदी हैं।
देश के लिए यह एक फ़ीसदी का मामला है। इस उद्योग के लिए यह उसकी लगभग पूरी निर्यात-बही है।

अमेरिकी आँकड़े अलग तस्वीर देते हैं, और दोनों को मिलाना ठीक नहीं होगा। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के तथ्य-पत्र में जो आयात आँकड़े हैं वे अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के हैं, कैलेंडर वर्ष के हैं, और एचटीएसयूएस उपशीर्षक 8541.42.0010 तथा 8541.43.0010 पर टिके हैं: 2022 में 8.39 करोड़ डॉलर, 2023 में 76.08 करोड़ डॉलर और 2024 में 79.26 करोड़ डॉलर। भारतीय आँकड़े वित्त वर्ष के हैं, निर्यात मूल्य पर हैं, और लगातार ऊँचे बैठते हैं। अवधि, मापने का आधार और संहिताएँ, तीनों अलग हैं, इसलिए दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे से नहीं मिलतीं। लेख में दोनों इसीलिए अलग-अलग दर्ज हैं।
उल्टी दिशा का आँकड़ा भी मौजूद है। 22 जुलाई 2026 को लोकसभा में मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि इसी भारतीय डेटा बैंक के अनुसार देश में सौर मॉड्यूल का आयात 2023-24 के क़रीब 4.35 अरब डॉलर से घटकर 2025-26 में क़रीब 99.4 करोड़ डॉलर रह गया।
चालू वर्ष का आँकड़ा इस रिपोर्ट में नहीं मिलता। डेटा बैंक के पन्ने पर लिखा है कि आँकड़े आख़िरी बार 7 अगस्त 2026 को चढ़ाए गए थे, और 2025-26 के कॉलम में दोनों मदों के सामने कुछ दर्ज नहीं है। जाँच शुरू होने के बाद के महीनों में निर्यात किस रफ़्तार से चला, यह भारतीय आँकड़ों से अभी नहीं निकाला जा सकता।
यूएसआईटीसी का चोट-निर्धारण और शुल्क वसूली की तारीख़ें
अमेरिकी वाणिज्य विभाग तय करता है कि डंपिंग हुई या नहीं और सब्सिडी मिली या नहीं। यह तय करना कि उससे अमेरिकी उद्योग को चोट पहुँची या नहीं, अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग का काम है। दोनों में से कोई एक भी 'नहीं' कहे तो मामला उसी जगह ख़त्म हो जाता है।
आयोग की जाँच संख्या 701-TA-772-774 और 731-TA-1756-1758 (अंतिम) है। 13 मई 2026 की समय-सारणी अधिसूचना के मुताबिक़ सुनवाई 9 सितंबर 2026 को सुबह 9:30 बजे हुई, यानी वाणिज्य विभाग के फ़ैसले से दो दिन पहले। आयोग के कैलेंडर में मतदान की तारीख़ बुधवार, 14 अक्टूबर 2026, सुबह 11 बजे दर्ज है। मतदान नोटेशन से होगा और नतीजा उसी दिन साढ़े ग्यारह बजे आयोग के मुखपृष्ठ पर बुलेटिन के रूप में लगेगा।

वाणिज्य विभाग के अपने प्रश्नोत्तर पन्ने में लिखा है कि आयोग अपना अंतिम चोट-निर्धारण विभाग के अंतिम निर्धारण के क़रीब 45 दिन बाद करता है, और उसके सकारात्मक होने पर विभाग शुल्क आदेश जारी करता है। रॉयटर्स के मुताबिक़ आदेश नवंबर में आने की उम्मीद है; पीवी मैगज़ीन ने 2 नवंबर की तारीख़ लिखी है। आयोग नकारात्मक फ़ैसला दे तो जाँच समाप्त हो जाएगी और अब तक जमा हुआ सारा पैसा लौटा दिया जाएगा।
वसूली पहले ही चल रही है। प्रतिकारी शुल्क के लिए 26 फ़रवरी 2026 से और डंपिंग-रोधी शुल्क के लिए 28 अप्रैल 2026 से खेपों का परिनिर्धारण रोका जा चुका है, यानी उन खेपों पर सीमा शुल्क का हिसाब अंतिम रूप से बंद नहीं किया जा रहा और असल शुल्क बाद में तय होगा। गंभीर परिस्थितियों के आंशिक निर्धारण की वजह से चारों भारतीय उत्तरदाताओं की खेपों पर यह रोक डंपिंग मामले में 90 दिन पीछे तक जाती है, और मुंद्रा की दोनों कंपनियों पर प्रतिकारी मामले में भी।
एक प्रक्रियात्मक ब्योरा अलग से दर्ज है। 22 अप्रैल 2026 को मुंद्रा सोलर एनर्जी और मुंद्रा सोलर पीवी ने अंतिम निर्धारण टालने का अनुरोध किया, और नियम 351.210(e)(2) के तहत ऐसे अनुरोध के साथ अस्थायी उपायों की अवधि चार महीने से बढ़ाकर छह महीने करने की माँग भी जोड़नी पड़ती है। विभाग ने दोनों मान लिए।
सीमा पर जमा होने वाली रक़म अंतिम शुल्क नहीं होती। वाणिज्य विभाग का प्रश्नोत्तर पन्ना बताता है कि आदेश जारी होने के बाद हर बारह महीने में कोई भी इच्छुक पक्ष प्रशासनिक समीक्षा माँग सकता है, और उस समीक्षा का काम दो तरफ़ा है: बीत चुकी खेपों पर असल में कितना शुल्क बैठेगा यह तय करना, और आगे के लिए जमा दर नए सिरे से बाँधना। पाँच साल बाद विभाग को सूर्यास्त समीक्षा करनी पड़ती है, जिसमें यह देखा जाता है कि आदेश हटा देने पर डंपिंग या सब्सिडी लौट आएगी या नहीं।
याचिका 17 जुलाई 2025 को दायर हुई थी। दायर करने वाला गठजोड़ अलायंस फ़ॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफ़ैक्चरिंग एंड ट्रेड है, जिसके सदस्य हैनवा क्यू सेल्स यूएसए (डाल्टन, जॉर्जिया), फ़र्स्ट सोलर (टेंपे, एरिज़ोना) और मिशन सोलर एनर्जी (सैन एंटोनियो, टेक्सस) हैं। जाँच 12 अगस्त 2025 को शुरू हुई, और बीच में अमेरिकी संघीय सरकार के शटडाउन की वजह से विभाग ने सारी समयसीमाएँ पहले 47 दिन और फिर 21 दिन के लिए टाल दी थीं।
पॉलीसिलिकॉन उद्घोषणा और 4 दिसंबर से लागू न्यूनतम आयात क़ीमत
इस मुक़दमे से अलग, उसी बाज़ार में एक दूसरी दीवार दिसंबर से खड़ी हो रही है। 6 अगस्त 2026 की उद्घोषणा 11052, जो 11 अगस्त को फ़ेडरल रजिस्टर में छपी, पॉलीसिलिकॉन और उससे बनने वाले उत्पादों के लिए न्यूनतम आयात क़ीमत तय करती है। यह व्यापार विस्तार अधिनियम 1962 की धारा 232 के तहत है, यानी राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर, और उसका डंपिंग या सब्सिडी से कोई लेना-देना नहीं।
क़ीमतें उद्घोषणा में गिनाई गई हैं: पॉलीसिलिकॉन के लिए 21 डॉलर प्रति किलोग्राम, इनगॉट और वेफ़र के लिए 100 डॉलर प्रति किलोग्राम, सौर सेल के लिए 22 सेंट प्रति वाट और सौर मॉड्यूल के लिए 38 सेंट प्रति वाट। ये 4 दिसंबर 2026 को पूर्वी समय के 12:01 बजे से लागू होंगी।
तरीक़ा यह है कि आयातक प्रवेश के समय काग़ज़ देकर प्रमाणित करे कि अमेरिका में पहली स्वतंत्र बिक्री न्यूनतम क़ीमत पर या उससे ऊपर होगी, या यह कि बिक्री उद्घोषणा पर दस्तख़त होने से पहले के किसी तय अनुबंध के तहत है। काग़ज़ न दिए जाएँ तो पूरी न्यूनतम क़ीमत के बराबर विशिष्ट शुल्क लगेगा। काग़ज़ दिए जाएँ पर प्रवेश मूल्य न्यूनतम क़ीमत से कम हो, तो अंतर के बराबर शुल्क लगेगा। जिस आयातक का प्रमाणन भौतिक रूप से ग़लत निकला, उस पर और उसकी सहयोगी कंपनियों पर इन सामानों का आयात हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा।
इसके ऊपर इनगॉट और व्युत्पन्न उत्पादों पर 15 फ़ीसदी का एक अतिरिक्त शुल्क भी उसी तारीख़ से लगेगा, जो माल के मूल्य पर बैठेगा। उद्घोषणा साफ़ लिखती है कि ये शुल्क बाक़ी सारे शुल्कों के ऊपर लगेंगे।
कुछ देशों के लिए उसी उद्घोषणा में रियायत लिखी है। जापान, कोरिया, ताइवान, स्विट्ज़रलैंड, लिकटेंस्टाइन और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के माल पर धारा 232 का यह शुल्क और सामान्य शुल्क मिलाकर कुल 15 फ़ीसदी से ऊपर नहीं जाएगा, और ब्रिटेन के माल पर यह दर 10 फ़ीसदी रहेगी। भारत का नाम इस सूची में नहीं है। एक अलग रास्ता उन कंपनियों के लिए रखा गया है जो अमेरिका में पॉलीसिलिकॉन, इनगॉट, वेफ़र या सेल का कारख़ाना लगाने की योजना मंज़ूर करा लें और जनवरी 2029 तक निर्माण शुरू करने का वादा करें; उन्हें निर्माण की अवधि में इन शुल्कों से छूट मिल सकती है।
2024 में भारत से अमेरिका गए सेल और मॉड्यूल का औसत 34.5 सेंट प्रति वाट था। मॉड्यूल की न्यूनतम क़ीमत 38 सेंट रखी गई है।
एएलएमएम सूची, पीएलआई और घरेलू विनिर्माण का आकार
एएलएमएम, यानी स्वीकृत मॉडल और निर्माताओं की सूची, का आदेश 2 जनवरी 2019 को निकला था। मॉड्यूल की पहली सूची 10 मार्च 2021 को छपी, जिसमें 21 निर्माता और क़रीब 8.2 गीगावाट की क्षमता दर्ज थी। 13 अगस्त 2025 तक यह सूची 100 गीगावाट पार कर गई, जिसमें 100 निर्माताओं की 123 इकाइयाँ थीं। पत्र सूचना कार्यालय की 2 अगस्त 2026 की विज्ञप्ति के मुताबिक़ देश की कुल मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता 31 मार्च 2026 तक क़रीब 172 गीगावाट थी, जो 2014 में 2.3 गीगावाट थी।
सेल के लिए अलग सूची, यानी सूची-II, 31 जुलाई 2025 को पहली बार जारी हुई और 1 जून 2026 से लागू है। मंत्रालय ने 25 मई 2026 के कार्यालय ज्ञापन में साफ़ कर दिया कि इस तारीख़ से आगे कोई सामूहिक छूट नहीं मिलेगी, सिर्फ़ पहले हो चुके निवेश को बचाने भर की गुंजाइश रहेगी। सूची-II का नौवाँ संशोधन 21 अगस्त 2026 को आया।
उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना 2021 में 4,500 करोड़ रुपये से शुरू हुई थी और 2022 में उसमें 19,500 करोड़ रुपये और जोड़े गए। 22 जुलाई 2026 को लोकसभा में दिए गए उत्तर में मंत्री ने बताया कि क़रीब 48.3 गीगावाट की पूर्ण या आंशिक रूप से एकीकृत इकाइयों के लिए स्वीकृति पत्र जारी हो चुके हैं, और 30 जून 2026 तक ज़मीन पर क़रीब 42 गीगावाट मॉड्यूल, 11.5 गीगावाट सेल और क़रीब 2 गीगावाट इनगॉट-वेफ़र की क्षमता खड़ी हो चुकी है। योजना के तहत निवेश क़रीब 73,400 करोड़ रुपये दर्ज है।
इसी अंतर पर अमेरिकी जाँच का दायरा भी टिका है, और यह बात अधिसूचना के परिशिष्ट में एक वाक्य में लिखी है। जिन देशों की जाँच हुई है, उनमें बने सेल अगर किसी तीसरे देश में जाकर मॉड्यूल में जुड़ते हैं तो वह मॉड्यूल दायरे में आता है; पर इन्हीं देशों में अगर तीसरे देश के सेल से मॉड्यूल बनाया जाए तो वह मॉड्यूल दायरे से बाहर है। शुल्क का आधार सेल का जन्मस्थान है। जो भारतीय कारख़ाना आयातित सेल से मॉड्यूल जोड़ता है, वह इस आदेश की परिभाषा में नहीं आता; जो भारत में सेल बनाकर उसे कहीं और भिजवाता है, वह आता है।
मॉड्यूल और सेल की क्षमता के बीच का यह अंतर ही वह जगह है जहाँ एएलएमएम की दूसरी सूची काम करती है। प्रीमियर एनर्जीज़ के मुख्य कारोबार अधिकारी विनय रुस्तगी ने आउटलुक बिज़नेस से 7 मार्च 2026 को कहा था कि जिस दिन मॉड्यूल वाली सूची का ऐलान हुआ, मॉड्यूल में निवेश आना शुरू हो गया, और सेल वाली नीति के बाद उद्योग में क़रीब 50,000 करोड़ रुपये सेल की तरफ़ जा रहे हैं। रुस्तगी की कंपनी की अनुषंगी प्रीमियर एनर्जीज़ फ़ोटोवोल्टेइक उन्हीं चार भारतीय उत्तरदाताओं में है जिन पर अमेरिकी जाँच टिकी थी।
घर की अपनी माँग
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़ों में 31 अगस्त 2026 तक देश की स्थापित सौर क्षमता 1,68,040.05 मेगावाट दर्ज है, यानी 168.04 गीगावाट। इसमें ज़मीन पर लगे संयंत्र 123.99 गीगावाट के हैं, छतों वाले 32.59 गीगावाट, हाइब्रिड परियोजनाओं का सौर हिस्सा 4.83 गीगावाट और ऑफ़-ग्रिड 6.63 गीगावाट।

चालू वित्त वर्ष के पहले पाँच महीनों में, अप्रैल से अगस्त के बीच, 17,779.35 मेगावाट जुड़े। अकेले अगस्त में 3,445.30 मेगावाट। पिछले पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 44.61 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ी थी, जो उससे पहले के साल के 23.83 गीगावाट से लगभग दोगुनी है। लोकसभा के उसी उत्तर में दर्ज है कि अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी की 2026 की रिपोर्ट में भारत स्थापित सौर क्षमता के हिसाब से दुनिया में तीसरे नंबर पर है।
जो बाज़ार 233.26 फ़ीसदी की जमा दर के पीछे बंद हो रहा है, वह भारतीय सौर उद्योग का लगभग अकेला विदेशी ग्राहक है। घर का ग्राहक उससे कई गुना बड़ा है, और पिछले वित्त वर्ष में उसने अपनी ख़रीद लगभग दोगुनी कर ली।
स्रोतअमेरिकी वाणिज्य विभाग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रशासन: भारत, इंडोनेशिया और लाओस से क्रिस्टलीय सिलिकॉन सौर सेल पर डंपिंग-रोधी और प्रतिकारी शुल्क जाँच के अंतिम सकारात्मक निर्धारण, 11 सितंबर 2026 का तथ्य-पत्र, फ़ेडरल रजिस्टर, 91 FR 22798, 28 अप्रैल 2026 (A-533-942): भारत से सौर सेल पर उचित मूल्य से कम पर बिक्री का प्रारंभिक सकारात्मक निर्धारण और आंशिक रूप से गंभीर परिस्थितियों का निर्धारण, फ़ेडरल रजिस्टर, 91 FR 9555, 26 फ़रवरी 2026 (C-533-943): भारत से सौर सेल पर प्रतिकारी शुल्क का प्रारंभिक सकारात्मक निर्धारण और अंतिम निर्धारण का संरेखण, फ़ेडरल रजिस्टर, 20 मई 2026: अंतिम निर्धारण का स्थगन और अस्थायी उपायों की अवधि चार से छह महीने करना, मुंद्रा सोलर के 22 अप्रैल 2026 के अनुरोध पर, फ़ेडरल रजिस्टर, 91 FR 27078, 13 मई 2026: यूएसआईटीसी की जाँच संख्या 701-TA-772-774 और 731-TA-1756-1758 (अंतिम) के अंतिम चरण की समय-सारणी, अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग का कैलेंडर: मतदान, बुधवार 14 अक्टूबर 2026, सुबह 11 बजे, नोटेशन से; नतीजा उसी दिन 11:30 बजे बुलेटिन में, अमेरिकी वाणिज्य विभाग का 23 अप्रैल 2026 का प्रारंभिक तथ्य-पत्र: प्रारंभिक डंपिंग मार्जिन और 2022-2024 के आयात आँकड़े (अमेरिकी जनगणना ब्यूरो, एस एंड पी ग्लोबल ट्रेड एटलस), फ़ेडरल रजिस्टर, 91 FR 51975, 11 अगस्त 2026: 6 अगस्त 2026 की उद्घोषणा 11052, पॉलीसिलिकॉन और उसके व्युत्पन्न उत्पादों के आयात का समायोजन, अमेरिकी वाणिज्य विभाग: अंतिम निर्धारण के बाद की प्रक्रिया पर आधिकारिक प्रश्नोत्तर, चोट-निर्धारण की क़रीब 45 दिन की समयसीमा, वाणिज्य विभाग, भारत सरकार: निर्यात-आयात डेटा बैंक (ट्रेडस्टैट), एचएस 854142 और 854143 का अमेरिका को निर्यात, 13 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, लोकसभा तारांकित प्रश्न संख्या 58, 22 जुलाई 2026, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी का उत्तर: पीएलआई के तहत बनी क्षमता, निवेश और मॉड्यूल आयात, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय: 31 अगस्त 2026 तक की संचयी भौतिक उपलब्धियाँ, सौर 1,68,040.05 मेगावाट, पत्र सूचना कार्यालय, 2 अगस्त 2026: भारत के सौर क्षेत्र पर पृष्ठभूमि विज्ञप्ति, मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता और पीएलआई का ब्योरा, पत्र सूचना कार्यालय, 13 अगस्त 2025: एएलएमएम के तहत 100 गीगावाट मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता, 100 निर्माता और 123 इकाइयाँ, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय: एएलएमएम के आदेश, सूची-I और सूची-II तथा 25 मई 2026 का कार्यालय ज्ञापन, रॉयटर्स, बिज़नेस स्टैंडर्ड में 12 सितंबर 2026: अंतिम शुल्क की ख़बर और टिम ब्राइटबिल का बयान, पीवी मैगज़ीन यूएसए, 11 सितंबर 2026: वही फ़ैसला, जिसमें भारत के लिए 'अधिकतम 234 फ़ीसदी', इंडोनेशिया 178 और लाओस 103 छपा, रॉयटर्स, 25 फ़रवरी 2026: प्रारंभिक प्रतिकारी शुल्क के बाद वारी, प्रीमियर एनर्जीज़ और विक्रम सोलर के शेयरों में गिरावट, आउटलुक बिज़नेस, 7 मार्च 2026, विकास त्रिपाठी: प्रीमियर एनर्जीज़ के मुख्य कारोबार अधिकारी विनय रुस्तगी से बातचीत