कोयला गैसीकरण योजना को पहले दौर में सात आवेदन मिले, तीन एक ही समूह के; सरकार के अपने दस्तावेज़ 25 परियोजनाएँ गिनते हैं
कोयला मंत्रालय ने 37,500 करोड़ रुपये की योजना के पहले दौर को 'जबरदस्त प्रतिक्रिया' कहा है। सात आवेदनों में तीन अदानी एंटरप्राइजेज के हैं और दो सरकारी कंपनियों के। कैबिनेट की विज्ञप्ति 25 परियोजनाओं का अनुमान देती है, और तीन दिन पहले मंत्रालय उन ख़बरों का खंडन कर रहा था कि किसी ने आवेदन ही नहीं किया।

कोयला मंत्रालय ने तीन दिन में दो विज्ञप्तियाँ जारी कीं, और दोनों एक ही योजना पर थीं।
5 सितंबर की विज्ञप्ति एक खंडन थी। "प्रेस के एक वर्ग" में छपी ख़बरों ने लिखा था कि सतही कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण की 37,500 करोड़ रुपये की योजना को कोई आवेदन नहीं मिला। मंत्रालय ने ऐसी रिपोर्टों को "समय से पहले" कहा और बताया कि तालचर फ़र्टिलाइज़र्स और एनटीपीसी अपने आवेदन जमा कर चुके हैं। 8 सितंबर की विज्ञप्ति का शीर्षक था: पहला चरण "जबरदस्त प्रतिक्रिया के साथ संपन्न", सात आवेदन प्राप्त।
सात आवेदन, पाँच कंपनियाँ; तीन आवेदन अकेले अदानी एंटरप्राइजेज के।
दोनों विज्ञप्तियों के बीच एक सवाल खड़ा है: सरकार ने माँगा क्या था, मिला क्या, और सात आवेदन ज़्यादा हैं या कम। इसका जवाब सरकार के अपने काग़ज़ों में है, बस उन्हें एक साथ रखकर पढ़ना पड़ता है।
सात आवेदन, पाँच नाम
8 सितंबर की विज्ञप्ति में एक तालिका है। उसमें आवेदक और उसका "अंतिम उत्पाद" दर्ज है, और कुछ नहीं: न जगह, न क्षमता, न लागत।
अदानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड की तीन अलग-अलग परियोजनाएँ हैं, तीनों का उत्पाद यूरिया। गैलेंट इस्पात लिमिटेड डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन यानी स्पंज आयरन और सिनगैस बनाना चाहती है। एनटीपीसी लिमिटेड सिंथेटिक प्राकृतिक गैस के लिए आई है। श्याम सेल एंड पावर लिमिटेड का उत्पाद सिनगैस है, और तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड का यूरिया।
पाँच कंपनियों में दो सार्वजनिक क्षेत्र की हैं: एनटीपीसी, और तालचर फ़र्टिलाइज़र्स, जो गेल, कोल इंडिया, आरसीएफ़ और एफ़सीआईएल का संयुक्त उद्यम है। विज्ञप्ति इन्हें "भारत के कुछ सबसे बड़े कॉरपोरेटों और प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों" के रूप में गिनाती है। सात आवेदनों में चार का उत्पाद यूरिया है।
'जबरदस्त' किसका शब्द है
विज्ञप्ति में कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का बयान है, नाम के बिना। उनके शब्द हैं कि "हमें पूर्ण भरोसा था कि इस पर उद्योग जगत की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिलेगी और उसने निर्णायक रूप से प्रतिक्रिया दी है।" बयान का आख़िरी वाक्य है: "बाजार ने अपना निर्णय बहुत ही स्पष्ट रूप से दिया है।"
विज्ञप्ति यह भी समझाती है कि सात आवेदन उसकी नज़र में कम क्यों नहीं हैं। कोयला गैसीकरण की परियोजनाएँ "बड़े पैमाने पर, पूंजी-गहन निवेश" हैं; आवेदन से पहले पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन, प्रौद्योगिकी का मूल्यांकन, पर्यावरण से जुड़े पहलू और विस्तृत वित्तीय योजना बनानी पड़ती है। प्रस्ताव के लिए अनुरोध, यानी आरएफ़पी, 7 जुलाई 2026 को जारी हुआ था; दो महीने में सात आवेदन आना मंत्रालय के लिए उद्योग की "गंभीरता" का प्रमाण है।
'जबरदस्त' मंत्रालय का शब्द है। उसे परखने का पैमाना भी मंत्रालय के ही काग़ज़ों में है।
25 का आँकड़ा किस काग़ज़ में है
13 मई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने योजना को मंज़ूरी दी। उस दिन की पीआईबी विज्ञप्ति में रोज़गार का अनुमान इस वाक्य में है: "इस योजना के अंतर्गत कोयला उत्पादन क्षेत्रों में स्थित 25 परियोजनाओं में लगभग 50 हजार (प्रत्यक्ष + अप्रत्यक्ष) रोजगार उत्पन्न होने का अनुमान।"
5 सितंबर के खंडन में यही संख्या दोबारा आती है: "लगभग 25 परियोजनाओं में 2.5 लाख करोड़ रुपये से 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश।"
तो सरकार का अपना पैमाना 25 परियोजनाएँ हैं, और पहले दौर में सात आई हैं। यह पैमाना पूरी योजना की अवधि के लिए है, किसी एक दौर के लिए नहीं; किसी दस्तावेज़ में पहले दौर का अलग लक्ष्य लिखा नहीं है। इसलिए सात को नाकामी कहने का आधार दस्तावेज़ों में नहीं मिलता, और 'जबरदस्त' कहने का आधार भी उन्हीं दस्तावेज़ों से आगे नहीं जाता। सीधा हिसाब इतना है कि 25 में से 7 पहले दौर में आ गई हैं, और आगे हर दो महीने एक नया दौर है।
तीन दिन में क्या बदला
5 सितंबर की विज्ञप्ति में मंत्रालय ने योजना का पूरा कैलेंडर गिनाया था। मंज़ूरी के बाद 28 मई को नई दिल्ली, 11 जून को हैदराबाद और 18 जून को मुंबई में रोड शो हुए, जिनमें राज्य सरकारें, कंपनियाँ, प्रौद्योगिकी देने वाले, निवेशक और वित्तीय संस्थान बुलाए गए। 7 जुलाई को आरएफ़पी जारी हुआ और आवेदन के लिए ऑनलाइन पोर्टल खुला। 20 जुलाई को पूर्व-आवेदन सम्मेलन हुआ, जहाँ संभावित आवेदकों ने पात्रता और प्रक्रिया पर सवाल पूछे।
उस दिन मंत्रालय दो ही नाम ले सका था: तालचर फ़र्टिलाइज़र्स और एनटीपीसी। बाक़ी के बारे में वाक्य यह था कि मंत्रालय "अन्य संभावित आवेदकों के साथ भी संपर्क में है जो परियोजना की तैयारी और आवेदन को अंतिम रूप देने के विभिन्न चरणों में हैं।"
खिड़की 7 सितंबर को बंद हुई। 8 सितंबर की सूची में पाँच नाम हैं और सात आवेदन। किस आवेदन की तारीख़ क्या थी, यह किसी विज्ञप्ति में नहीं है।
एक समूह के तीन आवेदन और 12 हज़ार करोड़ की दीवार
योजना में प्रोत्साहन पर तीन तरह की सीमाएँ हैं, और तीनों 13 मई की विज्ञप्ति के एक ही वाक्य में हैं। किसी एक परियोजना के लिए अधिकतम 5,000 करोड़ रुपये। किसी एक उत्पाद के लिए अधिकतम 9,000 करोड़ रुपये, पर इस सीमा से सिंथेटिक प्राकृतिक गैस और यूरिया को बाहर रखा गया है। और "किसी एक इकाई समूह के लिए सभी परियोजनाओं की अधिकतम सीमा 12 हजार करोड़ रुपये।"
अदानी एंटरप्राइजेज की तीनों परियोजनाएँ यूरिया की हैं, इसलिए उन पर उत्पाद वाली सीमा लागू नहीं होती। परियोजना वाली और समूह वाली सीमाएँ लागू होती हैं। इसे एक काल्पनिक हिसाब से समझें: अगर तीनों परियोजनाएँ अपनी-अपनी 5,000 करोड़ की ऊपरी सीमा तक पहुँचें तो जोड़ 15,000 करोड़ बनता है, लेकिन समूह की दीवार 12,000 करोड़ पर है। तीन आवेदन देकर भी एक समूह उतना ही ले सकता है जितना समूह-सीमा देती है।
यह हिसाब नियम समझाने के लिए है। तीनों परियोजनाओं की लागत विज्ञप्ति में नहीं है, इसलिए असल रक़म का कोई अनुमान यहाँ नहीं किया गया।
20 फ़ीसदी, चार बराबर किस्तों में
प्रोत्साहन की दर संयंत्र और मशीनरी की लागत का अधिकतम 20 फ़ीसदी है। यह पूरी परियोजना की लागत पर नहीं, सिर्फ़ "संयंत्र और मशीनरी की लागत" पर है; बाक़ी मदों का ज़िक्र विज्ञप्ति नहीं करती। इंडियन पीएसयू की 20 जुलाई की रिपोर्ट के मुताबिक़ जनवरी 2024 की पुरानी योजना में यह दर पूँजीगत खर्च का 15 फ़ीसदी थी।
रक़म एक साथ नहीं मिलती। विज्ञप्ति के शब्दों में, "परियोजना के लक्ष्यों से जुड़ी चार समान किस्तों में प्रोत्साहन राशि वितरित की जाएगी।" कंपनी का चयन "पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया" से होगा, जिसके लिए परियोजना की लागत, कोयले की खपत और सिनगैस उत्पादन के मानकीकृत मूल्यांकन ढाँचे का ज़िक्र है।
दो और शर्तें हैं। योजना "तकनीक-स्वतंत्र" है, किसी एक प्रौद्योगिकी से बँधी नहीं, पर स्वदेशी तकनीक अपनाने को प्रोत्साहित करने की बात उसमें है। और यह प्रोत्साहन वाणिज्यिक कोयला खनन या दूसरे केंद्रीय-राज्य मंत्रालयों की योजनाओं के प्रोत्साहनों के "अतिरिक्त" है, उनकी जगह नहीं।
37,500 करोड़ का पूरा हिसाब
योजना का कुल परिव्यय 37,500 करोड़ रुपये है और लक्ष्य लगभग 75 मिलियन टन कोयला/लिग्नाइट का गैसीकरण। राष्ट्रीय लक्ष्य इससे बड़ा है: 2030 तक 100 मिलियन टन, जिसका तीन-चौथाई इस योजना से आना है।
सरकार के अनुमान इस तरह हैं: 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश; 25 परियोजनाओं में लगभग 50 हज़ार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार; और 75 मिलियन टन कोयले-लिग्नाइट के इस्तेमाल से सरकारों को सालाना 6,300 करोड़ रुपये का राजस्व, जीएसटी अलग से।
एक और काल्पनिक हिसाब। 37,500 करोड़ को 25 परियोजनाओं में बराबर बाँटें तो औसत 1,500 करोड़ रुपये प्रति परियोजना बैठता है, जबकि प्रति परियोजना ऊपरी सीमा 5,000 करोड़ है। सीमा तक पहुँचने वाली आठ परियोजनाएँ ही 40,000 करोड़ माँग लेंगी, जो पूरे परिव्यय से ज़्यादा है। दस्तावेज़ यह नहीं बताते कि 25 का अनुमान किस औसत आकार पर टिका है, और न यह कि परिव्यय ख़त्म होने पर क्या होगा।
जिस आयात को घटाना है
13 मई की विज्ञप्ति में आयात का हिसाब उत्पाद-दर-उत्पाद है। एलएनजी में 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आयात, यूरिया में 20 फ़ीसदी, अमोनिया में 100 फ़ीसदी और मेथनॉल में 80 से 90 फ़ीसदी। वित्त वर्ष 2024-25 में एलएनजी, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोल, मेथनॉल, डीएमई और ऐसे ही "प्रतिस्थापन योग्य" उत्पादों का आयात बिल लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये रहा।
विज्ञप्ति इस कमज़ोरी को "पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक स्थिति" से जोड़ती है। तर्क यह है कि ये सारे उत्पाद सिनगैस से बन सकते हैं, और सिनगैस घरेलू कोयले से।
2.77 लाख करोड़ के सामने 37,500 करोड़ की योजना को रखें तो अनुपात समझ आता है: यह एक साल के आयात बिल का लगभग सातवाँ हिस्सा है, और यह रक़म कई सालों में, चार-चार किस्तों में जाएगी। योजना आयात पूरी तरह ख़त्म करने का दावा नहीं करती; उसका शब्द "निर्भरता कम करना" है।
ज़मीन के नीचे 401 अरब टन

पृष्ठभूमि वाले हिस्से में विज्ञप्ति भंडार गिनाती है: कोयले का लगभग 401 अरब टन और लिग्नाइट का लगभग 47 अरब टन, और देश के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की 55 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सेदारी। योजना के नाम में "सतही" शब्द है; पीआईबी की हिंदी विज्ञप्ति इसे "पृथ्वी की सतह के निकट पाये जाने वाले कोयला/लिग्नाइट" लिखती है।
कोयले की आपूर्ति के लिए एक नियम भी बदला गया है। गैर-विनियमित क्षेत्र की लिंकेज नीलामी में कोयले से सिनगैस बनाने वाले उप-क्षेत्र के लिए कोयला लिंकेज, यानी खदान कंपनी और उपभोक्ता के बीच दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते, की अवधि बढ़ाकर 30 साल कर दी गई है। विज्ञप्ति इसे निवेश के लिए "दीर्घकालिक नीतिगत निश्चितता" कहती है।
तालचर की परियोजना इस आपूर्ति का एक नमूना है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक़ उसे तालचर की खदानों से सालाना लगभग 25 लाख टन कोयला चाहिए, और 25 फ़ीसदी तक पेटकोक मिलाने की व्यवस्था है, जो 2019 की विज्ञप्ति के अनुसार पारादीप रिफ़ाइनरी से आना है।
गैसीकरण क्या है, आसान शब्दों में

बिजलीघर कोयले को जलाकर उसकी गर्मी लेता है। गैसीकरण में कोयला जलाया नहीं जाता, बदला जाता है। बंद बर्तन में ऊँचे तापमान पर कोयले पर ऑक्सीजन और भाप डाली जाती है, अक्सर दबाव के साथ, और कोयला एक गैस-मिश्रण में टूट जाता है। इस मिश्रण को सिनगैस कहते हैं।
सिनगैस में मुख्यतः कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और जलवाष्प होते हैं। यह अपने आप में अंतिम उत्पाद नहीं है; यह कच्चा माल है, जिससे आगे अलग-अलग संयंत्रों में अलग-अलग चीज़ें बनती हैं। कैबिनेट की विज्ञप्ति इसीलिए इसे "ईंधन और रसायनों के उत्पादन के लिए बहुउपयोगी कच्चा माल" कहती है।
इस प्रक्रिया की दो क़ीमतें भी दर्ज हैं। संयंत्र बहुत पानी खींचते हैं, और मिश्रण में कार्बन डाइऑक्साइड शुरू से मौजूद है। इसका एक तकनीकी पहलू यह गिनाया जाता है कि दबाव वाली और नाइट्रोजन से पतली न हुई सिनगैस से कार्बन डाइऑक्साइड को अलग करना, कोयला जलाने वाले बिजलीघर के धुएँ से अलग करने के मुक़ाबले आसान और सस्ता है।
केम्पर: एक संयंत्र जो गैसीकरण छोड़ बैठा
अमेरिका के मिसिसिपी राज्य के केम्पर काउंटी में एक संयंत्र इसी तकनीक पर बना था। सदर्न कंपनी की इकाई मिसिसिपी पावर ने स्थानीय लिग्नाइट को सिनगैस में बदलकर उससे 582 मेगावाट बिजली बनाने और कार्बन पकड़ने की योजना बनाई थी। निर्माण जून 2010 में शुरू हुआ और मई 2014 तक पूरा होना था; बजट 2.4 अरब डॉलर था, जो 2017 तक 6.7 से 7.5 अरब डॉलर पहुँच गया। मार्च 2017 में रिसाव मिले, और जून 2017 में कंपनी ने घोषणा की कि संयंत्र गैसीकरण छोड़कर सिर्फ़ प्राकृतिक गैस पर चलेगा। अक्टूबर 2021 में गैसीकरण वाला ढाँचा गिरा दिया गया।
यह उदाहरण भारत की योजना पर कोई फ़ैसला नहीं है; केम्पर बिजली के लिए था, यहाँ की परियोजनाएँ यूरिया, गैस और स्पंज आयरन के लिए हैं। पर मंत्रालय की विज्ञप्ति में "पूंजी-गहन" और "व्यापक तैयारी" जैसे जो शब्द हैं, उनका पैमाना समझने के लिए यह इतिहास काम आता है: एक संयंत्र, सात साल, और बजट का तीन गुना।
सिनगैस से यूरिया, गैस और स्पंज आयरन तक
सातों आवेदन सिनगैस के आगे के अलग-अलग रास्तों पर हैं।
उर्वरक का रास्ता सबसे भरा हुआ है। सिनगैस से अमोनिया बनता है और अमोनिया से यूरिया; अदानी की तीनों परियोजनाएँ और तालचर इसी रास्ते पर हैं। गैस का रास्ता एनटीपीसी का है: सिनगैस से बनी सिंथेटिक प्राकृतिक गैस, जो आयातित एलएनजी की जगह ले सकती है। लोहे का रास्ता गैलेंट इस्पात का है। लौह अयस्क को पिघलाए बिना, 800 से 1,200 डिग्री सेल्सियस पर हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड की गैस से उसकी ऑक्सीजन खींच ली जाती है; बचा हुआ छिद्रदार लोहा स्पंज जैसा दिखता है, इसीलिए स्पंज आयरन कहलाता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा स्पंज आयरन उत्पादक है।
श्याम सेल एंड पावर ने अंतिम उत्पाद में सिर्फ़ "सिनगैस" लिखा है; उससे आगे क्या बनेगा, विज्ञप्ति नहीं बताती। मेथनॉल और हाइड्रोजन भी योजना के सूचीबद्ध उत्पाद हैं, पर पहले दौर में इनका कोई आवेदन नहीं है।
जनवरी 2024 की पहली योजना
यह पहली कोशिश नहीं है। राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन 2021 में बना, और 24 जनवरी 2024 को 8,500 करोड़ रुपये की एक योजना मंज़ूर हुई। 13 मई की विज्ञप्ति के अनुसार उसके तहत "6,233 करोड़ रुपये की 8 परियोजनाएं कार्यान्वयन के अधीन हैं"; सीधा घटाव कहता है कि उस योजना का लगभग 2,270 करोड़ अभी किसी परियोजना से जुड़ा नहीं है।
इंडियन पीएसयू की 20 जुलाई की रिपोर्ट उस समय की तस्वीर यों देती है: देश में चालू या निर्माणाधीन गैसीकरण क्षमता 22.6 मिलियन टन प्रति वर्ष, जिसमें जिंदल स्टील की लगभग 8 मिलियन टन चालू क्षमता, तालचर की लगभग 2.6 मिलियन टन निर्माणाधीन क्षमता, और पुरानी योजना की आठ परियोजनाओं की लगभग 12 मिलियन टन।
इसी रिपोर्ट के मुताबिक़ पुरानी योजना पूँजीगत खर्च का 15 फ़ीसदी देती थी और नई योजना संयंत्र-मशीनरी का 20 फ़ीसदी। 100 मिलियन टन के लक्ष्य के सामने 22.6 का मतलब यह है कि 2030 तक तीन-चौथाई से ज़्यादा क्षमता उन परियोजनाओं से आनी है जिनकी अभी सिर्फ़ अर्ज़ियाँ हैं।
हर दो महीने एक नई खिड़की
आवेदन की व्यवस्था एक बार की नहीं है। 5 सितंबर के खंडन में मंत्रालय ने इसे अपनी सोची-समझी बनावट बताया: "एक चरण के लिए आवेदन प्रक्रिया समाप्त होने पर, अगला चरण अगले ही दिन से शुरू हो जाएगा और दो महीने तक चालू रहेगा।" मक़सद यह कि जिन कंपनियों को तैयारी में ज़्यादा वक़्त लगे, वे पिछला दौर छूट जाने भर से बाहर न हो जाएँ।
ऐसा ही हुआ। पहली खिड़की 7 सितंबर को बंद हुई, दूसरी 8 सितंबर से खुल गई। द हिंदू की रिपोर्ट में भी यही क्रम है, और मंत्रालय के शब्दों में "कई संभावित आवेदक वर्तमान में परियोजना की तैयारी के उन्नत चरणों में हैं।" पहले दौर के सात आवेदनों का अब योजना के दिशानिर्देशों और आरएफ़पी के हिसाब से "विस्तृत मूल्यांकन" होगा। मूल्यांकन कब पूरा होगा, इसकी कोई तारीख़ नहीं दी गई है।
इस बनावट का एक नतीजा यह है कि सात की संख्या अस्थायी है; दो महीने बाद इसी योजना की गिनती दूसरी होगी।
एनटीपीसी की गैस, और जो सूची नहीं बताती

सार्वजनिक क्षेत्र के दो आवेदकों में एनटीपीसी अकेली है जिसका उत्पाद सिंथेटिक प्राकृतिक गैस है। बिजली बनाने वाली कंपनी कोयले से गैस बनाना चाहती है, पर कहाँ, कितनी और किस लागत पर, यह आवेदन-सूची में नहीं है। 5 सितंबर की विज्ञप्ति में इतना दर्ज है कि एनटीपीसी और तालचर के आवेदन "ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से" जमा हुए।
यही कमी बाक़ी नामों पर लागू होती है। गैलेंट इस्पात का आवेदन स्पंज आयरन के लिए है, श्याम सेल एंड पावर का सिनगैस के लिए, और अदानी एंटरप्राइजेज की तीन यूरिया परियोजनाएँ किन राज्यों में हैं, यह सूची में नहीं है। सूची अभी आवेदकों की है, चुने हुओं की नहीं।
जो सूची में नहीं है, वह मूल्यांकन के बाद ही सामने आएगा: परियोजना की जगह, क्षमता, संयंत्र-मशीनरी की लागत, और उस पर 20 फ़ीसदी का असल आँकड़ा।
तालचर: 2019 का ठेका और अमेरिकी तकनीक
सात में तालचर अकेला आवेदक है जिसके संयंत्र की प्रगति सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज है। 17 सितंबर 2019 को नई दिल्ली में तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड के कोयला गैसीकरण संयंत्र का ठेका दिया गया; समारोह की अध्यक्षता तब के रसायन एवं उर्वरक मंत्री सदानंद गौड़ा और पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने की, और गौड़ा ने विश्वकर्मा जयंती के दिन हुए इस ठेके को शुभ बताया।
उस दिन की पीआईबी विज्ञप्ति परियोजना का पूरा ख़ाका देती है: ओडिशा के अंगुल ज़िले में एफ़सीआईएल की बंद पड़ी तालचर इकाई की जगह; सालाना 12.7 लाख टन यूरिया; लगभग 13,000 करोड़ रुपये का निवेश, जो कंपनी की वेबसाइट पर अब 13,277 करोड़ है; कोयला और पेटकोक का मिश्रण, कोयला तालचर क्षेत्र की उत्तरी अर्खापाल खदान के आवंटित हिस्से से और पेटकोक पारादीप रिफ़ाइनरी से; गैसीकरण की तकनीक अमेरिका की एयर प्रोडक्ट्स की; प्राकृतिक गैस के बराबर 2.38 मिलियन मानक घन मीटर प्रतिदिन सिनगैस; लगभग 4,500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार; और पूरा होने का अनुमान 2023। विज्ञप्ति ने यह भी लिखा कि दुनिया में 200 से ज़्यादा कोयला गैसीफ़ायर चल रहे हैं और भारत इस दौड़ में पीछे है।
कंपनी की वेबसाइट के अनुसार गेल, कोल इंडिया और आरसीएफ़ के पास 31.85-31.85 फ़ीसदी और एफ़सीआईएल के पास 4.45 फ़ीसदी हिस्सा है; पैसा 72 फ़ीसदी क़र्ज़ और 28 फ़ीसदी इक्विटी से आना है; लगभग 9,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ की निकासी दिसंबर 2022 में शुरू हुई; और गैसीकरण तथा अमोनिया-यूरिया पैकेज का एकमुश्त ठेका सितंबर 2019 में चीन की वुहुआन इंजीनियरिंग को मिला। तकनीक अमेरिकी, ठेकेदार चीनी, और मालिक चार भारतीय सरकारी कंपनियाँ।
2023 से दिसंबर 2027 तक
2019 की विज्ञप्ति में पूरा होने का साल 2023 था।
समाचार पोर्टल तथ्य की 25 दिसंबर 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक़ लक्ष्य सितंबर 2024 था, जो छूट गया; 31 अक्टूबर 2024 तक कुल काम 63.75 फ़ीसदी पूरा था; देरी की वजह दिसंबर 2019 से शुरू हुई कोविड महामारी और लॉकडाउन की लहरें बताई गईं, जिनसे ख़रीद, निर्माण और मशीनें खड़ी करने का काम पिछड़ा; और जुलाई 2024 से कंपनी धीमी प्रगति पर वुहुआन के बिलों से "पारस्परिक रूप से तय हर्जाना" काट रही है। अलग-अलग रिपोर्टों में पुराना लक्ष्य सितंबर 2024 और अक्टूबर 2024, दोनों लिखा मिलता है; हम दोनों दर्ज कर रहे हैं।
इंडिया व्हिस्पर्स की 18 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार ओडिशा की मुख्य सचिव अनु गर्ग ने समीक्षा बैठक में परियोजना को तेज़ रफ़्तार पर रखा और दिसंबर 2027 तक चालू करने की बात कही; अधिकारियों को सारी बाधाएँ हटाने का निर्देश मिला; बिजली पारेषण कंपनी ओपीटीसीएल ने 220 केवी लाइन साल के अंत तक पूरी करने का भरोसा दिया, और 33 केवी लाइन तथा रेलवे साइडिंग का काम तेज़ करने को कहा गया। परियोजना प्रधानमंत्री के 'प्रगति' मंच पर निगरानी में है।
यानी जो संयंत्र 2019 के ठेके के समय 2023 में पूरा होना था, वह अब 2027 के आख़िर का लक्ष्य लेकर 2026 की नई योजना का आवेदक है। इसी संयंत्र के सामने कैबिनेट की विज्ञप्ति का एक वाक्य पढ़ने लायक है: नई योजना "विदेशी ईपीसी ठेकेदारों पर निर्भरता कम" करना चाहती है, और तालचर का ठेकेदार चीन की कंपनी है।
50 से 70 लाख टन यूरिया
2019 की विज्ञप्ति में मंत्री का वाक्य था कि देश हर साल 50 से 70 लाख टन यूरिया आयात करता है, और यूरिया देश में पूल की गई गैस से बनता है, यानी घरेलू गैस और आयातित एलएनजी के मिश्रण से। 2026 की कैबिनेट विज्ञप्ति यूरिया में आयात निर्भरता 20 फ़ीसदी बताती है।
तालचर की 12.7 लाख टन सालाना क्षमता को 50-70 लाख टन के सामने रखें तो यह आयात के पाँचवें से चौथाई हिस्से के बराबर बैठती है। यह सिर्फ़ अनुपात है; आयात कितना घटेगा, यह यूरिया की माँग और बाक़ी संयंत्रों पर निर्भर करेगा। पहले दौर के चार यूरिया आवेदन, अगर चुने गए और बने, तो इसी आँकड़े पर काम करेंगे। 2019 की विज्ञप्ति ने तालचर को ओडिशा का "पहला चालू यूरिया संयंत्र" कहा था और उसे सिंदरी, बरौनी, रामागुंडम, गोरखपुर और तालचर की बंद इकाइयों को फिर से चालू करने की योजना का हिस्सा बताया था।
13 या 14 मई
कैबिनेट की मंज़ूरी की तारीख़ पर स्रोत एक नहीं हैं। पीआईबी की विज्ञप्ति 13 मई 2026 को दोपहर 3:29 बजे जारी हुई और उसी दिन की मंज़ूरी बताती है; 5 सितंबर और 8 सितंबर की विज्ञप्तियाँ भी 13 मई लिखती हैं, और द हिंदू की 8 सितंबर की रिपोर्ट भी। एनर्जेटिका इंडिया की रिपोर्ट में तारीख़ 14 मई दर्ज है। हम दोनों दर्ज कर रहे हैं; सरकारी दस्तावेज़ों में तारीख़ 13 मई है, और यह लेख उसी का इस्तेमाल करता है।
मूल्यांकन के बाद ही जो पता चलेगा
पहले दौर के दस्तावेज़ों में आवेदनों की माँगी गई रक़म नहीं है, न परियोजनाओं की जगह और क्षमता, न मूल्यांकन पूरा होने की तारीख़, न यह कि सात में से कितने चुने जाएँगे। "आवेदन" और "चयन" के बीच का यही फ़ासला तय करेगा कि 37,500 करोड़ में से पहले दौर में कितना बँटता है।
मंत्रालय ने 5 सितंबर को ख़ुद लिखा था कि योजना की "सफलता और भागीदारी के स्तर का आकलन निर्धारित आवेदन प्रक्रिया और बाद के चरणों के पूरा होने के बाद किया जाना चाहिए।" उस पैमाने पर पहला दौर एक शुरुआत है, न नाकामी, न नतीजा।
दूसरी खिड़की 8 सितंबर से दो महीने चलेगी। उसके बंद होने की तारीख़ विज्ञप्ति में नहीं लिखी है; दो महीने का सीधा हिसाब उसे नवंबर के पहले हफ़्ते के आसपास ले जाता है। तब की सूची में सात से ज़्यादा नाम होंगे या नहीं, यह मंत्रालय की अगली विज्ञप्ति बताएगी।
स्रोतकोयला मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति (हिंदी), 8 सितंबर 2026: पहले चरण में सात आवेदन, कोयला मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026: आवेदनों पर स्पष्टीकरण, मंत्रिमंडल, पीआईबी विज्ञप्ति, 13 मई 2026: योजना की मंज़ूरी और प्रोत्साहन ढाँचा, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 17 सितंबर 2019: तालचर संयंत्र का ठेका, द हिंदू, कारोबार, 8 सितंबर 2026, इंडियन पीएसयू, सात आवेदकों पर रिपोर्ट, 8 सितंबर 2026, इंडियन पीएसयू, कैबिनेट मंज़ूरी पर रिपोर्ट, 13 मई 2026, इंडियन पीएसयू, मौजूदा गैसीकरण क्षमता और पुरानी योजना पर रिपोर्ट, 20 जुलाई 2026, इंडियन पीएसयू, तालचर और एनटीपीसी के आवेदन पर रिपोर्ट, 6 सितंबर 2026, एनर्जेटिका इंडिया, कैबिनेट मंज़ूरी पर रिपोर्ट, मई 2026, तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड, कंपनी की वेबसाइट, तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड, परियोजना विवरण पृष्ठ, तालचर फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड, परियोजना स्थिति पृष्ठ, इंडिया व्हिस्पर्स, ओडिशा मुख्य सचिव की समीक्षा बैठक पर रिपोर्ट, 18 अप्रैल 2026, तथ्य, समाचार पोर्टल, तालचर की प्रगति पर रिपोर्ट, 25 दिसंबर 2024, विकिपीडिया (अंग्रेज़ी), कोयला गैसीकरण की प्रक्रिया, विकिपीडिया (अंग्रेज़ी), केम्पर परियोजना, मिसिसिपी, अमेरिका, विकिपीडिया (अंग्रेज़ी), डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (स्पंज आयरन)