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ओडिशा की किताबों में 1,741 ग़लतियां मिलीं, सरकार ने तीन महीने पहले इनकार किया था

स्कूल एवं जन शिक्षा मंत्री नित्यानंद गोंड ने शुक्रवार, 25 सितंबर को विधानसभा में बताया कि कक्षा एक से आठ की नई किताबों में 1,741 ग़लतियां और सुझाव मिले हैं, जिनकी छपाई-प्रकाशन पर क़रीब 175 करोड़ रुपये ख़र्च हुए। ठीक तीन महीने पहले विभाग ने लगभग वैसी ही 1,678 की गिनती को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया दावा बताकर ख़ारिज कर दिया था।

केरल के कोट्टयम स्थित डीसी बुक्स की छपाई इकाई की पुरानी प्रिंटिंग मशीनें, मई 2023 की तस्वीर; यह ओडिशा की नहीं, प्रतीकात्मक तस्वीर है, पर बताती है कि किताब की छपाई किस तरह की मशीनों से गुज़रती है
तस्वीर: Vis M, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

शुक्रवार, 25 सितंबर की दोपहर ओडिशा विधानसभा में स्कूल एवं जन शिक्षा मंत्री नित्यानंद गोंड ने एक लिखित जवाब पढ़ा। कक्षा एक से आठ की नई किताबों में 1,741 ग़लतियां और सुझाव मिले हैं, उन्होंने बताया। इन्हीं किताबों की छपाई और प्रकाशन पर राज्य सरकार क़रीब 175 करोड़ रुपये ख़र्च कर चुकी है।

तीन महीने पहले यही सवाल पूछा गया था, और तब जवाब बिल्कुल अलग था। गुरुवार, 2 जुलाई को आयुक्त-सह-सचिव एन. थिरुमाला नायक ने जवाब दिया। लगभग वैसी ही 1,678 ग़लतियों की शिकायत को उन्होंने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया दावा बताया। असली संख्या मीडिया में बताई जा रही संख्या से कम है, उन्होंने कहा, पर वह संख्या ख़ुद नहीं बताई।

बीच के ढाई महीनों में एक जांच समिति आई, एक क्राइम ब्रांच केस दर्ज हुआ, और एक गिरफ़्तारी हुई। शुक्रवार का 1,741 का आंकड़ा उसी रास्ते से निकलकर सदन तक पहुंचा।

जुलाई का इनकार, सितंबर की स्वीकारोक्ति

जून के आख़िरी हफ़्ते में ओडिशा के सरकारी स्कूलों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू ही हुआ था। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, यानी एससीईआरटी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के हिसाब से कक्षा एक से आठ तक की 55 किताबें नए सिरे से लिखवाई थीं, पुरानी 46 किताबों की जगह। स्कूल खुलते ही शिक्षकों ने इनमें गड़बड़ियां गिननी शुरू कर दीं।

मंगलवार, 23 जून को ओडिशा टीवी और ओडिशाबाइट्स ने पाठ्यपुस्तक उत्पादन एवं विपणन निदेशालय, यानी टीबीपी एंड एम के हवाले से लिखा कि निदेशालय अपनी क्षमता से बड़ा यह ऑर्डर अकेले संभाल नहीं पाया। उसका अपना प्रेस सिर्फ़ कक्षा एक से चार तक की किताबें छाप सका, बाक़ी किताबें निजी प्रेसों को आउटसोर्स करनी पड़ीं। इस आउटसोर्सिंग पर कितना ख़र्च हुआ, उसे लेकर ख़ुद एक विवाद बना, जिसका पूरा हिसाब आगे एक अलग हिस्से में है।

कोट्टयम की उसी छपाई इकाई की एक और मशीन, अलग कोण से; टीबीपी एंड एम की तरह निजी प्रेसों में भी किताबें ऐसी ही मशीनों पर छपती हैं
तस्वीर: Vis M, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बुधवार, 24 जून को प्रगतिवादी ने विभाग के हवाले से लिखा कि तब तक क़रीब 90 फ़ीसदी किताबें छप चुकी थीं और 80 फ़ीसदी ब्लॉक दफ़्तरों तक पहुंच चुकी थीं। कुल 2,98,29,273 किताबों की ज़रूरत उस सत्र के लिए बताई गई थी। रोकना अब मुमकिन नहीं था। विभाग ने बीच का रास्ता निकाला: स्कूलों को सुधार-पर्चियां भेजी जाएं, शिक्षक ख़ुद क्लास में ग़लतियां सुधरवाएं।

गुरुवार, 18 जून को ही मुख्यमंत्री माझी ने विकास आयुक्त की अगुआई में तीन सदस्यों की एक जांच समिति बना दी थी। पहले 15 दिन का समय दिया, फिर घटाकर सात दिन कर दिया। बुधवार, 1 जुलाई को द फ़ेडरल की समीक्षा रिपोर्ट में कुछ उदाहरण सामने आए। आइज़क न्यूटन को किताब में सबसे महान पायलट बता दिया गया था। हम्पी की एक तस्वीर कोणार्क सूर्य मंदिर के नाम पर छपी थी। कर्नाटक विधानसभा की तस्वीर ओडिशा विधानसभा के नाम पर चली। नियमगिरि पहाड़ी को ओडिशा की बजाय झारखंड में दिखाया गया। गंजाम ज़िले के शहर बरहमपुर को ख़ुद एक ज़िला बता दिया गया। विषुव को भूमध्य रेखा से गड्ड-मड्ड कर दिया गया। कक्षा पांच की अंग्रेज़ी और कक्षा आठ की कला किताब "कृति" में दो हिंदी फ़िल्मी गीतों को कश्मीरी लोकगीत बताकर छापा गया।

अगले दिन, गुरुवार 2 जुलाई को आयुक्त-सह-सचिव नायक ने इस पूरी गिनती को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया।

फिर मामला पलटा।

रविवार, 12 जुलाई को मुख्यमंत्री माझी ने जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी। मंगलवार, 14 जुलाई को क्राइम ब्रांच ने केस दर्ज किया। उसी दिन एससीईआरटी के तत्कालीन निदेशक मनोज कुमार पाढ़ी गिरफ़्तार हुए। शुक्रवार, 25 सितंबर को मंत्री गोंड ने विधानसभा में जो अंतिम आंकड़ा रखा, वह 1,741 था, जुलाई के बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए 1,678 से 63 ज़्यादा।

यह जवाब किस विधायक के सवाल पर आया, इस पर रिपोर्टों में एका नहीं है। ओडिशा टीवी और कलिंगा टीवी ने बीजद विधायक गौतम बुद्ध दास के सवाल पर सदन में दिया गया जवाब बताया। ओडिशा पोस्ट और द प्रिंट हिंदी ने कांग्रेस विधायक सोफ़िया फ़िरदौस के सवाल पर लिखित जवाब बताया। ओमकॉम न्यूज़ ने कालिकेश नारायण सिंह देव का नाम लिया। उनका मौजूदा विधायक होना इस लेख के लिए पुष्टि योग्य नहीं मिला। हो सकता है एक से ज़्यादा विधायकों ने उसी विषय पर सवाल पूछे हों, पर यह अनुमान है, पुष्टि नहीं।

पांच तथ्यात्मक ग़लतियां, ग्यारह सौ पचहत्तर वर्तनी की, बाक़ी सुझाव

मंत्री गोंड ने जो 1,741 की गिनती सदन में रखी, वह तीन हिस्सों में बंटी है। सिर्फ़ पांच तथ्यात्मक या वैचारिक ग़लतियां हैं। 1,075 वर्तनी, टाइपिंग और व्याकरण की ग़लतियां हैं। बाक़ी 661 किताबों को बेहतर बनाने के सुझाव हैं, ग़लतियां नहीं। तीनों जोड़ें तो ठीक 1,741 बनता है।

यह बंटवारा अहम है। सिर्फ़ "1,741 ग़लतियां" कहना तीनों को एक तराज़ू पर तौल देता है, जबकि एक टाइपो और नियमगिरि पहाड़ी की ग़लत लोकेशन बराबर की ग़लती नहीं है। अगर सिर्फ़ ग़लतियां गिनें और सुझाव अलग रखें, तो संख्या 1,741 नहीं बैठती। यह घटकर 1,080 रह जाती है, पांच तथ्यात्मक और 1,075 भाषा से जुड़ी। सुझाव तीसरी चीज़ है: बेहतर करने की गुंजाइश, ग़लती नहीं।

मंत्री ने सदन में तीन उदाहरण गिनाए। ओडिशा विधानसभा की अपनी तस्वीर ग़लत निकली। नियमगिरि पहाड़ी की लोकेशन ग़लत थी। कोणार्क सूर्य मंदिर की पहचान ग़लत छपी।

पुरी ज़िले का कोणार्क सूर्य मंदिर; मंत्री के मुताबिक़ नई किताबों में इसी मंदिर की पहचान ग़लत छपी थी
तस्वीर: Subhrajyoti07, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

ये वही नियमगिरि और कोणार्क वाली ग़लतियां जान पड़ती हैं जिनका ज़िक्र द फ़ेडरल की जुलाई की रिपोर्ट में भी था। दोनों रिपोर्टों ने इन्हें आपस में नहीं जोड़ा है, इसलिए यह पहचान निश्चित नहीं, पर विषय एक ही है।

यह सूची कहां से बनी, इसका जवाब भी सदन के जवाब में है। विभाग ने सही जानकारी वाला एक सुधार-पत्र स्कूलों तक भेजा है, ताकि शिक्षक और छात्र मौजूदा किताबों में ही सुधार कर सकें। यानी 1,741 की गिनती किसी अदालत या ऑडिट की नहीं, बल्कि एससीईआरटी के अपने सुधार-दस्तावेज़ की है, जिसे मंत्री ने सदन में पढ़ा।

कक्षा आठ में सबसे ज़्यादा, विज्ञान की किताब में सबसे घनी

कक्षा के हिसाब से देखें तो कक्षा आठ की किताबों में सबसे ज़्यादा गड़बड़ी मिली, कुल 707। इनमें अकेली विज्ञान की किताब में 294 ग़लतियां थीं। यानी कक्षा आठ की कुल गिनती का क़रीब 42 फ़ीसदी सिर्फ़ एक किताब से आया।

बाक़ी किताबों में भाषा से जुड़ी दिक़्क़तें ज़्यादा दिखती हैं। कक्षा सात की उर्दू किताब में 121 ग़लतियां मिलीं, कक्षा आठ की संस्कृत में 114, कक्षा छह की सामाजिक विज्ञान में 98, और कक्षा सात की संस्कृत में 92। संस्कृत इस सूची में दो बार है, उर्दू एक बार। अनुवाद और भाषा-रूपांतर वाली किताबों में गड़बड़ी का एक पैटर्न यहां साफ़ दिखता है।

आठ कक्षाओं में बराबर बंटवारा होता तो हर कक्षा के हिस्से औसतन साढ़े बारह फ़ीसदी ग़लतियां आतीं। कक्षा आठ अकेले उससे क़रीब तीन गुना ज़्यादा, यानी कुल 1,741 का लगभग 41 फ़ीसदी, अपने हिस्से समेटे है।

मंत्री के जवाब में बाक़ी किताबों की अलग-अलग गिनती नहीं दी गई। कक्षा आठ के बचे हुए 299 और बाक़ी कक्षाओं का पूरा ब्योरा सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं मिलता। यह अंतर आगे भी खुला रह सकता है, जब तक विभाग पूरी सूची सार्वजनिक नहीं करता।

175 करोड़ में 55 किताबें, एक किताब की औसत क़ीमत

175 करोड़ रुपये किस मद में गए, इसका पूरा ब्योरा मंत्री के जवाब में नहीं है, पर दायरा साफ़ है: कक्षा एक से आठ तक की 55 किताबों की छपाई और प्रकाशन, 2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए। जून के आख़िरी हफ़्ते में सरकार ने बताया था कि इस सत्र के लिए 2,98,29,273 किताबों की ज़रूरत है, यानी क़रीब तीन करोड़ प्रतियां।

अगर यह मान लें कि 175 करोड़ रुपये इन्हीं क़रीब तीन करोड़ प्रतियों की छपाई-आपूर्ति में गए, तो एक किताब पर औसतन क़रीब 58 से 59 रुपये बैठते हैं। यह एक मान्यता है। कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ 175 करोड़ को इतनी बारीकी से नहीं बांटता। यह औसत भी है, हिसाब नहीं: 55 अलग-अलग किताबों में पन्ने, रंग और काग़ज़ अलग-अलग हैं, इसलिए असली क़ीमत हर किताब में इससे कम या ज़्यादा हो सकती है।

175 करोड़ की इस रक़म को 21 करोड़ रुपये से गड्ड-मड्ड नहीं करना चाहिए। यह अलग आंकड़ा है। टीबीपी एंड एम का अपना प्रेस सिर्फ़ कक्षा एक से चार तक छाप सका। बाक़ी किताबें निजी प्रेसों को आउटसोर्स करनी पड़ीं, 21 मई 2025 की एक समिति-सिफ़ारिश और सरकारी मंज़ूरी के बाद। छपाई के ऑर्डर अक्टूबर 2025 में जारी हुए, टेंडर प्रक्रिया नवंबर तक चली, और उसी आउटसोर्सिंग पर 21 करोड़ रुपये ख़र्च होने की बात 23 जून को सामने आई थी। एक ग्रिवांस पिटीशन में इसी आउटसोर्सिंग पर 165 करोड़ रुपये ख़र्च होने का दावा किया गया, जिसे निदेशालय ने ख़ारिज कर दिया। तीन अलग रक़में हैं, तीन अलग दावे। 175 करोड़ पूरी परियोजना का सरकारी आंकड़ा है। 21 करोड़ आउटसोर्स प्रिंटिंग का सरकारी आंकड़ा है। 165 करोड़ एक ख़ारिज हो चुका आरोप है।

जांच समिति का निष्कर्ष, लेखक ही समीक्षक और आख़िरी मंज़ूरी देने वाला भी

गुरुवार, 18 जून को बनी विकास आयुक्त की तीन-सदस्यीय समिति ने सिर्फ़ ग़लतियां नहीं गिनीं। उसने यह भी देखा कि वे बनीं कैसे। द वायर ने गुरुवार, 24 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में इस समिति की जांच से जुड़े दस्तावेज़ के हवाले से लिखा कि किताब बनाने की पूरी प्रक्रिया में एक ही तरह की गड़बड़ी बार-बार दिखी। एक ही व्यक्ति कई भूमिकाओं में था।

रिपोर्ट के मुताबिक़, कुछ किताबों में एक ही व्यक्ति लेखक और समीक्षक दोनों था। कुछ में समीक्षक और प्रूफ़रीडर दोनों। और कुछ में लेखक, समीक्षक, प्रूफ़रीडर और आख़िरी विषय-विशेषज्ञ, चारों भूमिकाओं में एक ही अफ़सर या शिक्षक था। समिति ने यह भी लिखा कि जब लिखने वाला ही अपनी सामग्री की समीक्षा करता था, या आख़िरी विषय-विशेषज्ञ के तौर पर उसे मंज़ूरी देता था, तब ग़लतियां पकड़ में आने की गुंजाइश सबसे कम रह जाती थी।

समयसीमा भी दबी हुई थी। लेखकों को अनुवाद और प्रसंग-रूपांतर पर कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला। विषय-विशेषज्ञों को आख़िरी समीक्षा और संपादन के लिए पहले तीन दिन मिलते थे। इस बार सिर्फ़ एक दिन मिला। समिति को किसी वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी का कोई लिखित रिकॉर्ड भी नहीं मिला।

यहीं एक फ़र्क़ भी दिखता है। द वायर की रिपोर्ट में यह जांच-दस्तावेज़ 1,731 ग़लतियों की बात करता है। अगले ही दिन विधानसभा में मंत्री गोंड ने 1,741 का आंकड़ा दिया। फ़र्क़ सिर्फ़ दस का है। कौन-सी गिनती बाद में जुड़ी, या कहां चूक हुई, यह किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ से साफ़ नहीं होता।

इस गड़बड़ी की जड़ छपाई में नहीं, किताब लिखने और जांचने के तरीक़े में है। यहीं वह जगह है जहां टीबीपी एंड एम के प्रेस या निजी प्रिंटर की भूमिका ख़त्म होती है, और एससीईआरटी व शिक्षक शिक्षा निदेशालय की भूमिका शुरू होती है।

दस अफ़सर, एक गिरफ़्तारी, धारा 316 का मामला

पहली कार्रवाई जुलाई के आख़िर में ही शुरू हो गई थी। एससीईआरटी और शिक्षक शिक्षा के तत्कालीन निदेशक मनोज कुमार पाढ़ी को तीन सहायक निदेशकों के साथ निलंबित किया गया। छह और सहायक निदेशकों के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू हुई। कुल मिलाकर दस अफ़सर इस मामले में जवाबदेह ठहराए गए, और यही संख्या मंत्री गोंड ने 25 सितंबर को सदन में दोहराई।

मंगलवार, 14 जुलाई को मामला अनुशासनात्मक कार्रवाई से आगे बढ़ गया। शिक्षक शिक्षा एवं एससीईआरटी की मौजूदा निदेशक मधुस्मिता साहू की लिखित शिकायत पर क्राइम ब्रांच ने केस संख्या 08/2026 दर्ज किया। भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5) लगी, जो पुरानी आईपीसी धारा 409 जैसी है, यानी लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यास भंग, जिसमें उम्रक़ैद तक की सज़ा हो सकती है। धारा 201 भी लगी, यानी लोक सेवक द्वारा जानबूझकर ग़लत दस्तावेज़ तैयार करना। धारा 3(5) लगी, पुरानी धारा 34 जैसी सामूहिक मंशा की ज़िम्मेदारी। और धारा 61(2) लगी, पुरानी धारा 120-बी जैसी आपराधिक षड्यंत्र।

उसी दिन क्राइम ब्रांच के डीएसपी नरेंद्र कुमार बेहरा की टीम ने पाढ़ी से क़रीब चार घंटे पूछताछ की, फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। जांचकर्ताओं के मुताबिक़, एससीईआरटी निदेशक रहते हुए पाढ़ी ने छपाई के लिए तैयार मसौदों को बिना तथ्य, विज्ञान, भूगोल, अनुवाद और तस्वीरों की पुष्टि किए मंज़ूर कर दिया। कटक की जेएमएफ़सी-तृतीय अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा। राज्य सरकार ने ज़मानत याचिका का विरोध किया।

पाढ़ी अभी आरोपी हैं, दोषी नहीं। अदालत ने अब तक सिर्फ़ हिरासत पर फ़ैसला दिया है, मामले की सुनवाई अभी बाक़ी है। जिन दस अफ़सरों पर कार्रवाई हुई, वे सब एससीईआरटी और शिक्षक शिक्षा निदेशालय से हैं, यानी किताब की सामग्री बनाने वाला महकमा। छपाई करने वाले निजी प्रेस या डीटीपी एजेंसी पर अब तक कोई केस या निलंबन दर्ज नहीं मिला। आगे के लिए उन पर जुर्माने और ब्लैकलिस्टिंग की सिफ़ारिशें ज़रूर की गई हैं।

इस साल किताबें नहीं बदलेंगी, सुधार-पर्ची स्कूलों में पहुंच चुकी है

मंत्री गोंड ने सदन को बताया कि सही जानकारी वाला सुधार-पत्र स्कूलों को भेजा जा चुका है, ताकि शिक्षक और छात्र इसका इस्तेमाल कर सकें। जून के आख़िरी हफ़्ते में विभाग ने यही तरीक़ा अपनाने की बात कही थी। मौजूदा किताबें वापस नहीं ली जाएंगी। बदले में सुधार-पर्चियां भेजी जाएंगी, जिन्हें ग़लत तस्वीरों पर चिपकाया जा सकता है।

कोलकाता के बैद्यपाड़ा गर्ल्स हाई स्कूल की एक ख़ाली कक्षा, दिसंबर 2020 की तस्वीर; यह ओडिशा के किसी स्कूल की नहीं है, पर सुधार-पर्चियां ऐसी ही कक्षाओं में पहुंचती हैं
तस्वीर: Sumita Roy Dutta, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पूरी तरह सुधरी हुई नई किताबें 2027-28 के सत्र में आने की बात उसी जून में कही गई थी। सितंबर के जवाब में मंत्री ने इस समयसीमा को दोहराया नहीं। इसलिए यह अब भी जून की योजना है, सितंबर की पुष्टि नहीं।

शुक्रवार, 26 जून को मुख्यमंत्री माझी ने एक शर्त जोड़ी थी। अगर जांच में यह साबित हुआ कि किसी ने जानबूझकर गड़बड़ी की, किसी साज़िश के तहत, तो दोषी को ख़ुद किताबें दोबारा छापने और बांटने का पूरा ख़र्च उठाना होगा। यह शर्त अब भी क्राइम ब्रांच की जांच के नतीजे पर टिकी है। अब तक किसी को यह ख़र्च उठाने का आदेश नहीं मिला। मौजूदा 175 करोड़ रुपये और सुधार-पर्ची भेजने का ख़र्च, दोनों फ़िलहाल राज्य के बजट से गए हैं, किसी प्रिंटर या ठेकेदार से वसूले नहीं गए।

आगे के लिए ढांचागत बदलाव भी घोषित हुए हैं। चार चरणों की प्रूफ़रीडिंग होगी: अकादमिक जांच, तथ्य व तस्वीर जांच, भाषा जांच, और आख़िर में प्रिंटर की जांच। हर ग़लती के लिए ज़िम्मेदारी तय करने वाला एक रिस्पॉन्सिबिलिटी मैट्रिक्स बनेगा। एससीईआरटी के भीतर एक अलग गुणवत्ता-जांच सेल बनाने की बात है। ख़राब काम करने वाले प्रिंटरों और डीटीपी एजेंसियों के लिए जुर्माने और ब्लैकलिस्टिंग की सिफ़ारिश भी हुई है। ये सब अगली किताबों के लिए हैं। मौजूदा 1,741 ग़लतियों का हिसाब सुधार-पर्चियों से ही चुकता होगा।

एनसीईआरटी ने 2017 में तेरह सौ ग़लतियां सुधारी थीं, बिना केस बनाए

तुलना के लिए एक पुराना, पर दर्ज उदाहरण एनसीईआरटी का अपना है। अगस्त 2017 में प्रिंटवीक इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, एनसीईआरटी ने अपनी सभी किताबों की समीक्षा में 1,300 से ज़्यादा तथ्यात्मक ग़लतियां पाईं। यह कोई पाठ्यक्रम बदलाव नहीं था। तत्कालीन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने साफ़ किया था कि यह सिर्फ़ तथ्यों की समीक्षा है, पूरी किताब का पुनर्लेखन नहीं। क़रीब 900 शिक्षकों ने 2,500 से ज़्यादा सुधार सुझाए, और एनसीईआरटी ने अगले शैक्षणिक सत्र से पहले सुधार पूरा करने का लक्ष्य रखा।

पैमाना छोटा नहीं था। एनसीईआरटी उन दिनों हर साल क़रीब 4.5 करोड़ किताबें छापता था, और अगले साल के ऑर्डर 6 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद थी, ओडिशा के मौजूदा क़रीब तीन करोड़ से भी ज़्यादा। फिर भी उस सुधार में कोई एफ़आईआर या निलंबन का ज़िक्र उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं मिलता।

एससीईआरटी की अगली, पूरी तरह सुधरी किताबें 2027-28 के सत्र में आने का वादा है। तब तक मौजूदा किताबें सुधार-पर्चियों के सहारे चलेंगी।

स्रोतओमकॉम न्यूज़, 25 सितंबर 2026: मंत्री नित्यानंद गोंड का विधानसभा में जवाब, 1,741 की गिनती और तीन नामी उदाहरण, ओडिशा पोस्ट, 25 सितंबर 2026: 1,741 का वर्गीकरण (5 तथ्यात्मक, 1,075 भाषा, 661 सुझाव), कक्षा-विषयवार गिनती और 175 करोड़ रुपये, ओडिशा पोस्ट, 14 जुलाई 2026: पूर्व एससीईआरटी निदेशक मनोज कुमार पाढ़ी की गिरफ़्तारी, आरोप और न्यायिक हिरासत का ब्योरा, ओडिशा टीवी, 25 सितंबर 2026: सदन में मंत्री का जवाब, दस अफ़सरों पर कार्रवाई का ब्योरा, ओडिशा टीवी, 23 जून 2026: टीबीपी एंड एम का बयान, 55 किताबें, 2,98,29,273 किताबों की ज़रूरत, आउटसोर्स प्रिंटिंग पर 21 करोड़ रुपये, कलिंगा टीवी, 26 सितंबर 2026 (शुक्रवार के सदन-सत्र की रिपोर्ट): गौतम बुद्ध दास के सवाल पर जवाब, दस अफ़सरों पर कार्रवाई, सीबी-सीआईडी जांच का ज़िक्र, कलिंगा टीवी, 26 जून 2026: मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का बयान, दोबारा छपाई का ख़र्च दोषी को उठाना होगा, प्रगतिवादी, 25 सितंबर 2026: 1,741 बनाम एससीईआरटी की शुरुआती 1,678 की गिनती, कक्षा आठ के 707 का ब्योरा, द प्रिंट हिंदी, 25 सितंबर 2026: सोफ़िया फ़िरदौस के सवाल पर लिखित जवाब, कक्षा-विषयवार गिनती, ऑर्गनाइज़र, 2 जुलाई 2026: आयुक्त-सह-सचिव एन. थिरुमाला नायक का 1,678 की गिनती को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया दावा कहना, ऑर्गनाइज़र, 12 जुलाई 2026: मुख्यमंत्री का जांच क्राइम ब्रांच को सौंपना, विकास आयुक्त समिति की जांच का दायरा, द फ़ेडरल, 1 जुलाई 2026: न्यूटन, हम्पी-कोणार्क, नियमगिरि, बरहमपुर और बॉलीवुड गीतों के नामी उदाहरण, 55 किताबों में 1,600 से ज़्यादा ग़लतियां, ओडिशाबाइट्स, 23 जून 2026: टीबीपी एंड एम की सफ़ाई, 21 करोड़ बनाम 165 करोड़ के दावे का खंडन, प्रमेय न्यूज़, 24 जून 2026: 1,678 की गिनती, 90 फ़ीसदी छपाई पूरी, 18 जून की तीन-सदस्यीय जांच समिति, फ़्री प्रेस जर्नल, 14 जुलाई 2026: क्राइम ब्रांच केस संख्या 08/2026, बीएनएस धाराएं, मधुस्मिता साहू की शिकायत, द वायर, 24 सितंबर 2026: जांच समिति के दस्तावेज़ के हवाले से भूमिकाओं के दोहराव और घटी समयसीमा का ब्योरा, 1,731 की गिनती, प्रिंटवीक इंडिया, अगस्त 2017: एनसीईआरटी की समीक्षा में 1,300 से ज़्यादा तथ्यात्मक ग़लतियां, शिक्षकों के सुझाव, छपाई का पैमाना

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