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रेल मंत्री ने जो सुधारने को कहा, उसकी सूची पढ़िए तो पता चलता है कि अभी क्या-क्या ख़राब है

सिग्नल की तकनीकी ख़ामियाँ, तय उम्र पार कर चुके ओएचई पुर्ज़े, कोच की बिजली की वायरिंग, और वे जगहें जहाँ पटरी के फ़ास्टनर लगे ही नहीं हैं। निर्देश की सूची अपने आप एक ख़राबी की सूची है।

रेल मंत्री ने जो सुधारने को कहा, उसकी सूची पढ़िए तो पता चलता है कि अभी क्या-क्या ख़राब है

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रेल भवन में सुरक्षा समीक्षा की बैठक की। उसमें रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष, बोर्ड के सदस्य, ज़ोनल रेलवे के महाप्रबंधक और मंडल रेल प्रबंधक मौजूद थे।

विज्ञप्ति बताती है कि मंत्री ने क्या-क्या सुधारने को कहा।

उस सूची को उलटकर पढ़िए। तब वह बताती है कि आज क्या-क्या ठीक नहीं है।

सूची, जैसी वह है

सिग्नलिंग से जुड़ी तकनीकी ख़ामियाँ मिशन मोड में दूर करने को कहा गया।

तिरुचिरापल्ली जंक्शन पर लगा एक रेल सिग्नल
तस्वीर: पी. जेगनाथन, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

ओवरहेड इक्विपमेंट के बारे में निर्देश यह है कि जिन जगहों पर पुर्ज़ों की तय सेवा अवधि पूरी हो चुकी है, वहाँ उनके रखरखाव और बदलने की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। यानी ऐसी जगहें हैं जहाँ पुर्ज़े अपनी उम्र पार कर चुके हैं और अब भी लगे हुए हैं।

कोच के रखरखाव में ख़ास ध्यान आग से जुड़े बिजली के सर्किट और वायरिंग पर देने को कहा गया।

वैगन और कोच के कपलर तथा पहियों के रखरखाव पर ध्यान देने को कहा गया। कपलर वह जोड़ है जो दो डिब्बों को आपस में बाँधता है।

पटरी के बारे में पॉइंट मशीन, टर्नआउट और फ़ास्टनर के रखरखाव पर ज़ोर दिया गया। और उसके बाद यह वाक्य आता है: जहाँ कहीं भी फ़ास्टनर नहीं हैं, वहाँ उन्हें लगाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

फ़ास्टनर वह पुर्ज़ा है जो पटरी को स्लीपर से जकड़कर रखता है।

पंजाब में पटरी के रखरखाव का काम, जिसमें स्लीपर हाथ से ढोए जा रहे हैं
तस्वीर: गोपाल अग्रवाल, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

और आपूर्ति की गुणवत्ता

एक और निर्देश है जो अलग से पढ़ने लायक़ है।

बैठक में कहा गया कि ख़राब गुणवत्ता वाली आपूर्ति के मामलों में कड़ी कार्रवाई की जाए। सिग्नलिंग और दूरसंचार, ओएचई, ट्रैक, कोच या वैगन से जुड़ी सामग्री की गुणवत्ता में कमी मिलने पर संबंधित आपूर्तिकर्ता के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो।

और जानबूझकर की गई लापरवाही में आपूर्तिकर्ता को स्थायी रूप से काली सूची में डालने के निर्देश दिए गए।

विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि अब तक कितने मामले पकड़े गए, कितने आपूर्तिकर्ताओं पर कार्रवाई हुई, या कितने काली सूची में गए।

एक महीना पहले क्या हुआ था

3 अगस्त 2026 को रेलवे बोर्ड ने एक आदेश निकाला था। उसका विषय था, विभागीय दुर्घटना जाँचों का समय पर पूरा होना।

आदेश में कहा गया कि कई दुर्घटना मामलों में विभागीय जाँच तय समयसीमा में पूरी नहीं हुई है, और सभी लंबित जाँचों की समीक्षा करके उन्हें तय समय में पूरा कराया जाए।

यानी सुरक्षा समीक्षा से एक महीना पहले, बोर्ड को यह लिखकर भेजना पड़ा कि पुरानी जाँचें पूरी की जाएँ।

और लेखापरीक्षक क्या कहता है

नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने मार्च 2025 को समाप्त वर्ष के लिए भारतीय रेल के वित्त और लेखों की समीक्षा वाली रिपोर्ट संसद में रखी है।

उस रिपोर्ट में दर्ज है कि सुरक्षा से जुड़े 20,304 काम अधूरे पड़े हैं।

पूरी तरह वित्तपोषित 22,350 कामों में से 14,016 पूरे हुए, यानी 62.71 फ़ीसदी। आंशिक रूप से वित्तपोषित 28,340 कामों में से 16,370 पूरे हुए, यानी 57.76 फ़ीसदी।

राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष के बारे में रिपोर्ट दो बातें कहती है। पहली, कोष के शुरुआती पाँच साल में रेलवे ने अपने आंतरिक संसाधनों से 5,324.62 करोड़ रुपये दिए, जबकि देना 25,000 करोड़ था। यह लक्ष्य का 21.30 फ़ीसदी है।

दूसरी, 2022-23 से 2024-25 के बीच इस कोष से 3,397.60 करोड़ रुपये दूसरे कामों में लगाए गए।

⚠ इन आँकड़ों के लिए हम रिपोर्ट की मूल पीडीएफ़ नहीं खोल सके। ये आँकड़े रिपोर्ट के हवाले से छपी ख़बरों से लिए गए हैं, और छपने से पहले इन्हें मूल रिपोर्ट से मिलाया जाना चाहिए।

जो ढाँचा शायद ही कोई देखता है

रेल दुर्घटनाओं की वैधानिक जाँच रेल संरक्षा आयोग करता है।

वह आयोग रेल मंत्रालय के अधीन नहीं है। वह नागर विमानन मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आता है।

यह 1989 के रेल अधिनियम के तहत बनी व्यवस्था है, और इसका तर्क सीधा है। जो विभाग रेल चलाता है, वही अपनी दुर्घटनाओं की वैधानिक जाँच नहीं करेगा।

तो एक तरफ़ मंत्री की समीक्षा है और विभागीय जाँचें हैं, जो रेल मंत्रालय के भीतर होती हैं। दूसरी तरफ़ वैधानिक जाँच है, जो बाहर होती है।

बोर्ड का 3 अगस्त वाला आदेश पहली तरह की जाँचों के बारे में है।

तो इसे कैसे पढ़ें

रेलवे को यह पता है कि क्या ख़राब है। मंत्री की सूची उसी जानकारी की सूची है, और वह विस्तार से है।

जो सूची में नहीं है वह यह है कि इनमें से कोई काम कब तक होगा, कितने पैसे से होगा, और अब तक कितना हुआ है।

लेखापरीक्षक की रिपोर्ट उसी खाली जगह में बैठती है। वह बताती है कि सुरक्षा के काम शुरू होते हैं और अधूरे रहते हैं, और उनके लिए रखा पैसा कहीं और चला जाता है।

समस्या पहचानने की नहीं दिखती। पहचान तो हर बार दर्ज हो जाती है।

स्रोतरेल मंत्रालय, सुरक्षा समीक्षा बैठक की विज्ञप्ति, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक, रेलवे वित्त पर रिपोर्ट, मार्च 2025 को समाप्त वर्ष, रेल संरक्षा आयोग, नागर विमानन मंत्रालय

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।