करूर भगदड़ का एक साल: एफ़आईआर तीन नाम पर, चार्जशीट अब तक दाख़िल नहीं
27 सितंबर 2025 को करूर में तमिलगा वेट्टी कषगम की रैली में मची भगदड़ में 41 लोगों की जान गई थी। एक साल बाद जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई के पास है, राज्य का जांच आयोग दो हफ़्ते में निलंबित हो चुका है, और तीन अलग-अलग मुआवज़ा घोषणाओं का पूरा भुगतान किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं मिलता।

रविवार, 27 सितंबर 2026 को करूर की भगदड़ को एक साल पूरा हुआ। ठीक एक साल पहले, शनिवार की शाम, तमिलगा वेट्टी कषगम (टीवीके) की एक चुनावी रैली में भगदड़ मची थी। कम से कम 41 लोगों की जान गई। रैली को संबोधित करने वाले अभिनेता-राजनेता विजय तब टीवीके अध्यक्ष थे। किसी सरकारी पद पर नहीं। वह अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हैं। 10 मई 2026 के विधानसभा चुनाव में टीवीके ने 108 सीटें जीतीं, सबसे बड़ी पार्टी बनकर।
यह लेख एक साल का हिसाब है। दोष तय करने की कोशिश नहीं। मौत की सरकारी गिनती किस आँकड़े पर टिकी, प्राथमिकी और जांच किस मोड़ पर हैं, राज्य के अपने जांच आयोग का क्या हुआ, तीन घोषित मुआवज़ों में से कितना दर्ज तौर पर पहुँचा, रैली की इजाज़त के काग़ज़ में क्या लिखा था, और अदालतों में अभी क्या तय हुआ है, क्या नहीं: यही आगे दर्ज है। कोई आरोपी दोषी नहीं ठहराया गया है। कोई चार्जशीट भी अभी दाख़िल नहीं हुई।
मौत की गिनती छत्तीस से इकतालीस तक पहुँची
हादसे की रात करूर ज़िला प्रशासन ने जो पहला आँकड़ा दिया, वह 36 का था। प्रसार भारती की न्यूज़ ऑन एयर सेवा ने 28 सितंबर 2025 की रात 9:07 बजे इसी आँकड़े के साथ रिपोर्ट दी। साथ ही राज्य सरकार के एक जांच आयोग बनाने की घोषणा भी उसी में दर्ज है। उसी दिन राज्य के स्वास्थ्य सचिव के हवाले से डेक्कन हेराल्ड ने आँकड़ा 40 बताया, और 67 लोगों के अस्पतालों में भर्ती होने की बात कही। यह कोई विरोधाभास नहीं था। गिनती का स्वाभाविक बढ़ना था: घायलों में से कुछ इलाज के दौरान दम तोड़ते गए।
अंतिम आँकड़ा 41 पर टिका। इलाज के दौरान एक और मरीज़ की मौत हुई, और 29 सितंबर 2025 की शाम 6:13 बजे न्यूज़ ऑन एयर ने आँकड़ा 41 दर्ज किया; उसी रिपोर्ट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के घटनास्थल-दौरे का ज़िक्र भी है, पर मृतक की पहचान दर्ज नहीं है। यही आँकड़ा सुप्रीम कोर्ट के अपने रिकॉर्ड में भी है। जांच सीबीआई को सौंपने वाले 13 अक्टूबर 2025 के आदेश में अदालत ने साफ़ तौर पर 41 मौतें दर्ज कीं।
घायलों की गिनती पर कोई एक आँकड़ा नहीं ठहरा। अलग-अलग समय और स्रोतों में यह संख्या 60 से लेकर 142 तक बताई गई है। किसी एक सरकारी दस्तावेज़ में अंतिम, संशोधित घायल-संख्या अब तक दर्ज नहीं मिली।
प्राथमिकी, गिरफ़्तारी और हिरासत का रिकॉर्ड
करूर टाउन पुलिस ने हादसे के अगले दिन, 28 सितंबर 2025 को प्राथमिकी दर्ज की। इसमें तीन टीवीके पदाधिकारी नामज़द हैं। करूर पश्चिम ज़िला सचिव मथियाझगन, राज्य महासचिव आनंद, और राज्य संयुक्त सचिव निर्मल कुमार। चार धाराएँ लगीं, सभी भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) से। धारा 105: हत्या की श्रेणी में न आने वाली आपराधिक मानव-वध, पहले आईपीसी की धारा 304। धारा 110: आपराधिक मानव-वध का प्रयास, पहले धारा 308। धारा 125: जीवन या सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाला कृत्य, पहले धाराएँ 336 से 338। और धारा 223: लोक सेवक के विधिवत आदेश की अवज्ञा, पहले धारा 188। इनके साथ तमिलनाडु सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, 1992 की धारा 3 भी जुड़ी है।
एफ़आईआर में आरोप है कि टीवीके ने विजय का पहुँचना जानबूझकर टाला, ताक़त दिखाने के लिए। यह भी कि पार्टी ने पुलिस की सलाह नज़रअंदाज़ की और तय शर्तें तोड़ीं। ये आरोप प्राथमिकी में दर्ज हैं, स्थापित तथ्य नहीं। किसी अदालत ने अब तक इन पर फ़ैसला नहीं दिया।
मथियाझगन और करूर के एक और पदाधिकारी, पौन राज, को 30 सितंबर 2025 को गिरफ़्तार किया गया। दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया, 14 अक्टूबर 2025 तक। बाद में दोनों ज़मानत पर छूट गए, उसी दौर में जब जांच राज्य से सीबीआई के हाथ जा रही थी। न्यायिक हिरासत जांच की एक प्रक्रिया है। दोष का फ़ैसला नहीं। इससे यह तय नहीं होता कि आरोप सही हैं या ग़लत।
विजय ख़ुद इस प्राथमिकी में आरोपी नहीं हैं। सीबीआई ने उन्हें बीएनएसएस की धारा 179 के तहत गवाह के तौर पर तलब किया है, आरोपी के तौर पर नहीं। उनके ख़िलाफ़ अब तक कोई अलग प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है।
जांच सीबीआई के पास, एक साल में चार्जशीट नहीं
टीवीके ने हादसे के दो-तीन दिन के भीतर मद्रास हाईकोर्ट का रुख़ किया। माँग सीबीआई या एक स्वतंत्र एसआईटी की जांच की थी। पार्टी ने अदालत में यह भी दावा किया कि हादसे के पीछे एक "डीएमके साज़िश" थी, एक आरोप जिसे किसी अदालत ने अब तक जांचा या सही नहीं ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने 10 अक्टूबर 2025 को इस पर सुनवाई की और आदेश सुरक्षित रखा। तीन दिन बाद, सोमवार 13 अक्टूबर को, अदालत ने पूरी जांच सीबीआई को सौंप दी।
पीठ ने वजह भी दर्ज की। मामले में सत्ताधारी दल का सीधा नाता था; उस समय राज्य में डीएमके की सरकार थी, टीवीके तब विपक्ष में थी। उस दल का राज्य पुलिस पर बड़ा नियंत्रण था, और पुलिस ख़ुद सार्वजनिक तौर पर अपनी भूमिका का बचाव कर चुकी थी। इससे जांच की निष्पक्षता पर भरोसे की कमी पैदा हुई। इसी आदेश से राज्य की एसआईटी और जस्टिस जगदीसन आयोग, दोनों निलंबित हुए।
सीबीआई ने मामला 18 अक्टूबर 2025 को दोबारा दर्ज किया, उन्हीं तीन नामों के साथ जो मूल प्राथमिकी में थे। उसने अपनी शुरुआती रिपोर्ट 23 अक्टूबर को करूर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में सीलबंद जमा की। बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि अगर चार्जशीट दाख़िल हो, तो वह तिरुचिरापल्ली की अदालत में होगी, सीबीआई की विशेष अदालत में। निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक तीन-सदस्यीय समिति बनाई। मुखिया सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अजय रस्तोगी हैं। साथ में महानिरीक्षक या उससे ऊपर रैंक के दो आईपीएस अधिकारी, जो तमिलनाडु कैडर के हो सकते हैं पर राज्य के मूल निवासी नहीं होने चाहिए। सीबीआई को हर महीने इस समिति को प्रगति रिपोर्ट देनी है।
विजय से पूछताछ कई दौर में हुई। पहली 12 जनवरी 2026 को। दूसरी 19 जनवरी को, क़रीब सौ सवालों के साथ, छह घंटे तक। मार्च में तीसरी बैठक हुई, सात घंटे की; उससे पहले उन्होंने राजनीतिक व्यस्तताओं का हवाला देकर पंद्रह दिन का समय माँगा था। फ़रवरी 2026 में अधिकारियों के हवाले से कई अख़बारों ने लिखा कि चार्जशीट उसी महीने के अंत तक दाख़िल हो सकती है। वह महीना बीत गया। कुछ नहीं दाख़िल हुआ। दिसंबर 2025 में राज्य सरकार ख़ुद सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी, सीबीआई हस्तांतरण का आदेश वापस लेने की माँग लेकर। हलफ़नामे में एक दलील यह थी कि राज्य एसआईटी की अगुवाई कर रहीं अधिकारी असरा गर्ग की योग्यता निष्पक्ष जांच के लिए पर्याप्त थी। दूसरी दलील यह कि सुप्रीम कोर्ट ने पक्षपात सचमुच साबित हुए बिना ही सीधे सीबीआई को सौंपने जैसी अंतिम राहत दे दी थी। अदालत ने दोनों दलीलें ख़ारिज कर दीं।
आज, एक साल पूरे होने पर, उपलब्ध रिकॉर्ड में कहीं चार्जशीट दाख़िल होने की पुष्टि नहीं मिलती। न करूर की अदालत में, न तिरुचिरापल्ली की सीबीआई विशेष अदालत में। पिछले महीनों में हर पूछताछ, हर तलबी और अदालत की हर सुनवाई की रिपोर्ट छपी है। अगर चार्जशीट दाख़िल हुई होती, वह भी छपती। यह ख़ामोशी ख़ुद एक तथ्य है। एक साल बाद भी जांच पूरी नहीं हुई। किसी अदालत के सामने आरोप तय करने का चरण अभी शुरू नहीं हुआ है। जिन तीन नामों से मामला दर्ज हुआ, उन्हीं तीन के आगे मामला अभी टिका है। जांच का दायरा एक साल में औपचारिक रूप से न घटा है, न बढ़ा। निगरानी समिति की मासिक प्रगति रिपोर्टें सीधे अदालत को जाती हैं। उनमें से कोई भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं मिलती।

जांच आयोग दो हफ़्ते में निलंबित
राज्य सरकार ने हादसे के अगले ही दिन, 28 सितंबर 2025 को, एक-सदस्यीय जांच आयोग बनाया। अध्यक्षता मद्रास हाईकोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अरुणा जगदीसन को मिली। यह आयोग जांच आयोग अधिनियम, 1952 के तहत गठित हुआ, वही रास्ता जिससे आमतौर पर ऐसे हादसों की प्रशासनिक जांच होती है। जस्टिस जगदीसन ने उसी शाम घटनास्थल का दौरा किया। आयोग के दायरे में तीन काम तय हुए: हादसे तक ले जाने वाली चूकों की पहचान, रैली को दी गई अनुमति और सुरक्षा नियमों के पालन की समीक्षा, और मौजूदा नियमों की जाँच। सरकार ने तीन महीने की समयसीमा दी, अधिसूचना की तारीख़ से। यानी लगभग 28 दिसंबर 2025 तक।

वह समयसीमा कभी पूरी नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट के 13 अक्टूबर के उसी आदेश ने आयोग को निलंबित कर दिया, जिस आदेश ने जांच सीबीआई को सौंपी थी। अधिसूचना के महज़ दो हफ़्ते बाद। राज्य सरकार ने दिसंबर में आयोग की बहाली की माँग की। दलील थी कि निगरानी समिति में "ग़ैर-मूल निवासी" अफ़सर की शर्त पक्षपातपूर्ण है। शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025 को अदालत ने वह माँग ठुकरा दी। कारण दिया: सब कुछ निष्पक्ष रहना चाहिए। उसी सुनवाई में पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की एक अलग कार्यवाही पर भी तल्ख़ टिप्पणी की, यह कहते हुए कि हाईकोर्ट में "कुछ ग़लत चल रहा है"। जस्टिस जगदीसन का आयोग तब से निलंबित है। उसकी कोई अंतरिम या अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है।
यह उनका पहला ऐसा आयोग नहीं था। 2018 में तूतीकोरिन में स्टरलाइट-विरोधी प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में 13 नागरिकों की मौत हुई थी। उस जांच की अगुवाई भी जस्टिस जगदीसन ने की थी। उनकी रिपोर्ट ने पुलिस कार्रवाई को "अनुचित" और "अंधाधुंध" बताया, और कई अफ़सरों को ज़िम्मेदार ठहराया। करूर आयोग उसी रिकॉर्ड के साथ शुरू हुआ। दो हफ़्ते में रुक गया।
मुआवज़ा की तीन घोषणाएँ, भुगतान का अधूरा हिसाब
हादसे की अगली सुबह तीन अलग-अलग घोषणाएँ हुईं। तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्य सरकार की ओर से हर मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये देने का ऐलान किया, और हर घायल को 1 लाख। टीवीके और विजय ने अपनी ओर से 20 लाख रुपये प्रति मृतक की घोषणा की, 2 लाख प्रति घायल। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से 2 लाख रुपये प्रति मृतक और 50 हज़ार प्रति घायल का ऐलान किया। कांग्रेस पार्टी ने एक करोड़ रुपये का सामूहिक कोष भी घोषित किया। परिवार-दर-परिवार बँटवारे का ब्योरा दर्ज नहीं है।
इनमें से कोई भी रक़म किसी वैधानिक अधिकार से नहीं निकली। राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ़) के तहत जान गंवाने पर एकसमान 4 लाख रुपये का प्रावधान है। पर यह प्रावधान केवल गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित आपदाओं पर लागू होता है: चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट प्रकोप और शीतलहर। भगदड़ या क्रश इस सूची में नहीं है। करूर के परिवारों को घोषित तीनों रक़में इसीलिए विवेकाधीन सहायता हैं। किसी अधिसूचित मुआवज़ा-अनुसूची का हिस्सा नहीं।
भुगतान का दस्तावेज़ी सुबूत छिटपुट है। डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने 28 सितंबर को ख़ुद कुछ परिवारों को राज्य सरकार के चेक सौंपे। द साउथ फ़र्स्ट की 5 अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में एक परिवार, आनंद ज्योति, का हवाला है। उन्हें राज्य का चेक मिल चुका था, पर उन्होंने तब तक भुनाया नहीं था। पूछे जाने पर उनका जवाब था: "नहीं, हमें अभी तक कुछ नहीं मिला है। इस बारे में कोई ख़बर भी नहीं सुनी।" यह जवाब केंद्र और टीवीके की घोषित रक़मों के बारे में था। एक साल बाद के सार्वजनिक रिकॉर्ड में यह दर्ज नहीं मिलता कि सभी 41 परिवारों को तीनों रक़में पूरी मिल चुकी हैं या नहीं। घोषणा और भुगतान, यह दो अलग बातें हैं।
सरकारी नौकरी का आदेश अदालत में अटका
मुआवज़े से अलग, राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति देने का फ़ैसला किया। यह आदेश तब आया जब विजय ख़ुद मुख्यमंत्री बन चुके थे। 6 जुलाई 2026 का सरकारी आदेश 32 परिजनों को नियुक्ति देता है, कनिष्ठ सहायक और कार्यालय सहायक जैसे पदों पर, योग्यता के अनुसार। 9 जुलाई को एक संशोधित आदेश जारी हुआ। 10 जुलाई 2026 को विजय करूर गए, मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी पहली यात्रा पर। उन्होंने ख़ुद नियुक्ति-पत्र परिवारों को सौंपे।
यह आदेश ज़्यादा दिन नहीं टिका। मदुरै पीठ के जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने 27 जुलाई 2026 को इसे रद्द कर दिया। पीठ ने लिखा: "सार्वजनिक नौकरी को राज्य की तरफ़ से उदारता के तौर पर नहीं फेंका जा सकता। इसे अर्जित करना होता है।" फ़ैसला अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन पर टिका था, यानी समानता और सरकारी नौकरी में समान अवसर के अधिकार पर।
राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची। शुक्रवार, 14 अगस्त 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मदुरै पीठ के फ़ैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। पीठ ने पूछा: "सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले आप कौन होते हैं? मान लीजिए किसी परिवार का इकलौता सदस्य इस हादसे में मारा गया, तो क्या सरकार को उसके बेटे या बेटी को नौकरी नहीं देनी चाहिए?" यह अंतिम फ़ैसला नहीं है। केवल अंतरिम राहत है। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 32 नियुक्तियाँ फ़िलहाल एक अस्थायी आदेश के सहारे टिकी हैं, किसी तय क़ानूनी हक़ पर नहीं।
दस हज़ार की इजाज़त, सत्ताईस हज़ार जुटे
टीवीके ने पुलिस को 25 सितंबर 2025 को एक अर्ज़ी दी। माँग 27 सितंबर को करूर शहर में रैली की इजाज़त की थी। अर्ज़ी में अनुमानित भीड़ 10,000 बताई गई। अनुमति दोपहर 3 बजे से रात 10 बजे तक के समय-दायरे के लिए मिली। तमिलनाडु के तत्कालीन डीजीपी जी. वेंकटरमन के हवाले से राज्य सरकार का अपना अनुमान क़रीब 27,000 का है, अर्ज़ी के आँकड़े से लगभग तिगुना। अन्य अनुमान इससे अलग हैं। कुछ रिपोर्टों में पुलिस के भीतरी अनुमान 15,000 से 20,000 के बीच बताए गए। कुछ स्थानीय रिपोर्टों में यह आँकड़ा 50,000 तक पहुँचता है। यह फ़र्क़ सुलझा नहीं है। अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग गिनती दर्ज है।

रैली स्थल पर भीड़ सुबह 11 बजे से जुटनी शुरू हुई, टीवीके के ऐलान पर भरोसा करते हुए कि विजय दोपहर तक पहुँचेंगे। वह शाम क़रीब 7:40 बजे पहुँचे। तय समय से लगभग सात घंटे बाद। एफ़आईआर में दर्ज बीएनएस की धारा 223 लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा से जुड़ी है। यही वह धारा है जो अनुमति की शर्तों के उल्लंघन के आरोप को क़ानूनी आधार देती है। पर यह भी अब तक सिर्फ़ आरोप है। अदालत में साबित नहीं हुआ। पुलिस की मूल अनुमति-अर्ज़ी में दर्ज दूसरी शर्तें, जैसे बैरिकेडिंग, मेडिकल इंतज़ाम या पानी की व्यवस्था के निर्देश, किसी सार्वजनिक आरटीआई जवाब या अदालती दस्तावेज़ में दर्ज नहीं मिलीं। यह जानकारी का एक अंतर है। इसे अनुमान से नहीं भरा जा सकता।
अदालतों में अब भी चल रहे तीन और मामले
करूर मामले से जुड़ी अदालती कार्यवाही अकेले जांच या नौकरी के आदेश तक सीमित नहीं है। पहला मामला उसी दिसंबर 2025 की सुनवाई का विस्तार है। वहाँ सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट की एक अलग कार्यवाही पर सवाल उठाए थे: हाईकोर्ट ने रैली-सुरक्षा प्रक्रिया से जुड़ी एक रिट याचिका को एक आपराधिक मामले की तरह बरता, और टीवीके को पक्षकार बनाए बिना उसके ख़िलाफ़ टिप्पणियाँ कीं। इस पर आगे क्या हुआ, सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं है।
दूसरा मामला ताज़ा है। यह राजनीतिक भूमिकाओं की उलटी तस्वीर दिखाता है। डीएमके के संगठन सचिव आर.एस. भारती ने वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ैफ़ा अहमदी के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की, गवाहों को प्रभावित किए जाने के आरोप के साथ। याचिका में मुख्यमंत्री विजय, मंत्री आधव अर्जुन और अन्य राज्य अधिकारियों पर आरोप है। माँग चार हिस्सों में है। मुख्यमंत्री और मंत्री मामले या सीबीआई जांच पर सार्वजनिक बयान न दें। पीड़ित परिवारों से संपर्क न करें। मंत्री अर्जुन के 2 जुलाई 2026 के एक बयान पर सीबीआई शिक़ायत दर्ज हो। राहत योजनाओं पर अदालत की निगरानी रहे। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ के सामने यह याचिका मंगलवार, 7 जुलाई 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुई।
भूमिकाएँ यहाँ पलट गई हैं। एक साल पहले जो पार्टी राज्य पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाकर सीबीआई जांच माँग रही थी, वह अब सत्ता में है। जो पार्टी तब सत्ता में थी, वह अब निष्पक्षता की माँग लेकर अदालत पहुँची है। इस याचिका का आगे क्या नतीजा निकला, यह उपलब्ध रिकॉर्ड में दर्ज नहीं मिलता।
तीसरा मामला जुलाई-अगस्त 2026 का नौकरी-विवाद है, जिसका ब्योरा ऊपर दर्ज है।
यही अदालतों में अभी दर्ज है। भगदड़ को एक साल हो चुका है। चार्जशीट अभी तक दाख़िल नहीं हुई।
स्रोतसुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर: सुप्रीम कोर्ट का 13 अक्टूबर 2025 का आदेश, सीबीआई को जांच सौंपने और निगरानी समिति गठित करने पर, मृतकों की संख्या 41 सहित, न्यूज़ ऑन एयर (प्रसार भारती), 28 सितंबर 2025, रात 9:07: मृतकों की संख्या 36 और जांच आयोग के गठन की घोषणा, न्यूज़ ऑन एयर (प्रसार भारती): मृतकों की संख्या 41 होने की पुष्टि, एक और मरीज़ की मौत के बाद, डेक्कन हेराल्ड, 28 सितंबर 2025: राज्य के स्वास्थ्य सचिव के हवाले से मृतकों की संख्या 40 और घायलों का ब्योरा, द ट्रिब्यून, 30 सितंबर 2025: मूल प्राथमिकी का ब्योरा, नामज़द पदाधिकारी और बीएनएस की धाराएँ, ईटीवी भारत: सीबीआई द्वारा 18 अक्टूबर 2025 को मामला पुनः दर्ज करने और 23 अक्टूबर को करूर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में रिपोर्ट सौंपने का ब्योरा, एएनआई, 30 सितंबर 2025: दो टीवीके पदाधिकारियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की रिपोर्ट, द न्यूज़ मिनट: सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अक्टूबर 2025 को जस्टिस अरुणा जगदीसन आयोग और राज्य एसआईटी को निलंबित करने का आदेश, डीटी नेक्स्ट: जस्टिस अरुणा जगदीसन आयोग को अधिसूचना से तीन महीने में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश का ब्योरा, वनइंडिया: जस्टिस अरुणा जगदीसन का परिचय, 2018 के तूतीकोरिन पुलिस गोलीबारी आयोग की रिपोर्ट सहित, डेक्कन हेराल्ड, 12 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोग की निलंबन वापस लेने से इनकार, द फ़ेडरल, 2 दिसंबर 2025: तमिलनाडु सरकार के हलफ़नामे का ब्योरा, सीबीआई हस्तांतरण और आयोग की बहाली की माँग सहित, द ट्रिब्यून, 12 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट की मद्रास हाईकोर्ट की कार्यवाही पर टिप्पणी, द साउथ फ़र्स्ट, 5 अक्टूबर 2025: मुआवज़े की घोषणाओं और भुगतान में देरी का ब्योरा, प्रभावित परिवार के हवाले से, द ट्रिब्यून, 28 सितंबर 2025: पुलिस को दी गई अनुमति-अर्ज़ी और डीजीपी के अनुमानित भीड़ के आँकड़े, द न्यूज़ मिनट: रैली के दिन की घटनाओं का समयक्रम, विजय के पहुँचने में देरी सहित, लॉ ट्रेंड, 6 जुलाई 2026, दोपहर 12:26: गवाहों को प्रभावित करने के आरोप वाली याचिका, 7 जुलाई की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की रिपोर्ट, लॉबीट, 31 जुलाई 2026: मदुरै पीठ (जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन व जस्टिस आर. शक्तिवेल) का 27 जुलाई 2026 का फ़ैसला, अनुच्छेद 14-16 और सरकारी नौकरी के आदेश को रद्द करते हुए, वर्डिक्टम, 14 अगस्त 2026, शाम 4:00: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ द्वारा मदुरै पीठ के फ़ैसले पर अंतरिम रोक