ज़रूरी खनिजों के लिए बाहर खदानें, घर में ब्लॉक बिना ख़रीदार लौट रहे हैं
शुक्रवार को दिल्ली में खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि भारत ऑस्ट्रेलिया और चिली में लिथियम ब्लॉक लेने की बात कर रहा है और अर्जेंटीना में पाँच और चाहता है। उसी दिन देश के भीतर आठवें दौर की नीलामी खुली हुई थी, जिसकी बोली 21 सितंबर को बंद होगी।

इंडिया हैबिटेट सेंटर के सिल्वर ओक हॉल में शुक्रवार, 11 सितंबर को भारतीय उद्योग परिसंघ का महत्वपूर्ण खनिजों पर तीसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन चल रहा था। उसी के अलग-अलग सत्रों से निकलकर खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने पत्रकारों से कहा, "भारत के पास लिथियम के भंडार सीमित हैं। इसलिए हमने अर्जेंटीना में पाँच ब्लॉक लिए और अब पाँच और लेना चाहते हैं।" उन्होंने जोड़ा कि ऑस्ट्रेलिया और चिली से भी बात चल रही है, सरकार के स्तर पर भी और निजी कंपनियों के स्तर पर भी। यह बयान द हिंदू में सप्तपर्णो घोष ने उसी शाम दर्ज किया।
उसी दिन देश के भीतर खान मंत्रालय की आठवें दौर की नीलामी खुली हुई थी। नौ राज्यों के 20 ब्लॉक, जिनमें 13 नए हैं और 7 दूसरी बार पेश किए गए हैं। निविदा दस्तावेज़ बेचने की आख़िरी तारीख़ 14 सितंबर है और बोली जमा करने की 21 सितंबर।
भारत बाहर खदान इसलिए ले रहा है कि घर की ज़मीन पर खनिज नहीं है, यह अधूरी बात है। घर में जो ब्लॉक नीलामी में रखे गए, उनका बड़ा हिस्सा ख़रीदार न मिलने पर लौट आया, और जो बिके उनमें से कोई अभी उत्पादन तक नहीं पहुँचा।
बाहर जाने की जल्दी की एक वजह यहीं दर्ज है।
दूतावासों में खनिज अधिकारी, और निजी कंपनियों के लिए नया दरवाज़ा
बिज़नेस स्टैंडर्ड के साकेत कुमार ने उसी दिन की रिपोर्ट में मंत्री के बयान का जो हिस्सा दर्ज किया, वह घोषणा से ज़्यादा प्रशासनिक है। रेड्डी ने कहा कि उनका मंत्रालय विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर उन निजी उद्यमियों और खनिज उद्योग के साझेदारों का हाथ थामने का काम कर रहा है जो खनिज-समृद्ध देशों में मौक़े तलाश रहे हैं। सरकार ने ऐसे सभी देशों के भारतीय दूतावासों में खनिज अधिकारी तैनात किए हैं।
रिपोर्ट में एक और बात है, जो सरकारी विज्ञप्तियों में नहीं मिलती। भारतीय और भारतीय मूल के खनन कारोबारियों का एक छोटा-सा नेटवर्क विदेश में महत्वपूर्ण खनिजों की परिसंपत्तियाँ पहले ही ख़रीद चुका है। उनके पास अन्वेषण के अधिकार हैं, पर उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सरकार से संस्थागत मदद का इंतज़ार है। मंत्री ने उनकी भूमिका को स्वीकार किया और कहा, "हमें भारत में भी और विदेश में भी ऐसी कंपनियाँ चाहिए जो पूरी मूल्य शृंखला पर काम करें।"
यह पुराने ढर्रे से अलग है। अब तक विदेश में खदान लेने का काम एक ही रास्ते से होता था: काबिल, यानी खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड, जो नाल्को, हिंदुस्तान कॉपर और एमईसीएल की साझा कंपनी है। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के घटकों में "विदेश में महत्वपूर्ण खनिज परिसंपत्तियों का अधिग्रहण" शामिल है, और मिशन सरकारी तथा निजी दोनों कंपनियों को इसके लिए प्रोत्साहित करता है। नया यह है कि इसके पीछे राजनयिक मशीनरी लगाई जा रही है।
रेड्डी ने उसी मंच से यह भी बताया कि जापान, पेरू, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे तकनीक में आगे देशों के साथ साझेदारी हुई है, मिशन के तहत भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने इस साल अकेले 300 अन्वेषण परियोजनाएँ ली हैं, और गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तथा ओडिशा की सरकारों के साथ मिलकर चार खनिज प्रसंस्करण पार्क बन रहे हैं। सम्मेलन के विशेष पूर्ण सत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि क्षमता अन्वेषण से लेकर परिष्करण, प्रसंस्करण और विनिर्माण तक पूरी शृंखला में बनानी होगी।
काबिल का अर्जेंटीना समझौता और उसकी शर्तें
काबिल की स्थापना ही इसी काम के लिए हुई थी। तत्कालीन खान मंत्री प्रह्लाद जोशी ने 13 दिसंबर 2023 को लोकसभा में लिखित जवाब दिया कि नाल्को, हिंदुस्तान कॉपर और एमईसीएल की इक्विटी से बनी इस संयुक्त उद्यम कंपनी का मक़सद लिथियम और कोबाल्ट जैसी विदेशी खनिज परिसंपत्तियाँ हासिल करना है, ताकि भारतीय बाज़ार को इनकी लगातार आपूर्ति मिलती रहे। उसी जवाब में लिखा है कि काबिल ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और चिली में मौक़े तलाश रहा है।
15 जनवरी 2024 को कातामार्का में काबिल और वहाँ की सरकारी कंपनी कैमयेन के बीच समझौता हुआ। पाँच लिथियम ब्राइन ब्लॉक, नाम से कोर्तादेरा-1, कोर्तादेरा-6, कोर्तादेरा-7, कोर्तादेरा-8 और कातेओ-2022-01810132, कुल क्षेत्रफल क़रीब 15,703 हेक्टेयर। खान मंत्रालय की विज्ञप्ति परियोजना की लागत क़रीब 200 करोड़ रुपये बताती है।
समझौते से जो अधिकार मिला, उसे विज्ञप्ति ने साफ़ लिखा है: अन्वेषण और अनन्यता का अधिकार, और लिथियम मिलने पर ही व्यावसायिक उत्पादन का अधिकार। यानी 2024 में जो हस्ताक्षर हुए, वे खदान के नहीं, खोज की इजाज़त के थे।
इसके बाद की रफ़्तार तारीख़ों से दिखती है। समझौते के चौदह महीने बाद, मार्च 2025 में, खान मंत्रालय ने राज्यसभा को इससे आगे कुछ नहीं बताया: काबिल ने कैमयेन के साथ अन्वेषण और विकास समझौता किया है, बस इतना। ब्लॉक में लिथियम कितना है और किस गुणवत्ता का है, यह ड्रिलिंग और जाँच के बाद तय होगा। उत्पादन कब शुरू होगा, इसकी कोई तारीख़ किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया वाला हिस्सा इससे भी कम आगे बढ़ा है। खान मंत्रालय ने मार्च 2025 में राज्यसभा को बताया कि काबिल और ऑस्ट्रेलिया सरकार के महत्वपूर्ण खनिज सुविधा कार्यालय के बीच लिथियम तथा कोबाल्ट परिसंपत्तियों पर संयुक्त जाँच-पड़ताल और संयुक्त निवेश के लिए समझौता ज्ञापन हुआ है। शुक्रवार का बयान उसी बातचीत का ताज़ा चरण है।
निर्भरता का हिसाब: लिथियम, कोबाल्ट, निकल और दुर्लभ मृदा
आयात पर निर्भरता का सबसे साफ़ सरकारी आँकड़ा 2 अगस्त 2023 का है, जब खान मंत्रालय ने लोकसभा में वाणिज्य विभाग के हवाले से 2022-23 के आँकड़े रखे। कोबाल्ट पर निर्भरता 100 फ़ीसदी, लिथियम पर 100 फ़ीसदी, निकल पर 100 फ़ीसदी, और तांबे के अयस्क तथा सांद्र पर 93 फ़ीसदी।
एक साल बाद, 5 अगस्त 2024 को, उसी मंत्रालय ने लोकसभा में उससे भी सीधी बात लिखी: देश में कोबाल्ट, निकल, लिथियम और नियोडिमियम के उत्पादन के लिए कोई चालू खनन पट्टा नहीं है। महत्वपूर्ण खनिजों के जो 54 पट्टे हैं, वे ग्रेफ़ाइट (32), रॉक फ़ॉस्फ़ेट (7) और टिन अयस्क (15) के हैं, और उनमें से भी सिर्फ़ 20 चालू हैं, 34 बंद पड़े हैं।
उसी जवाब में आगे की ज़रूरत का अनुमान है, और उसकी ढाल तीखी है। लिथियम की सालाना ज़रूरत 2025 में 58 टन, 2026 में 174 टन, 2027 में 517 टन और 2030 में 13,671 टन आँकी गई है। कोबाल्ट की 17 टन से बढ़कर 3,878 टन, निकल की 2,629 टन से बढ़कर 17,492 टन। पाँच साल में लिथियम की माँग दो सौ गुना से ज़्यादा होनी है, और जिस देश में उसका कोई चालू पट्टा नहीं, वह पूरी मात्रा बाहर से आएगी।
नीति आयोग ने फ़रवरी 2026 में जो खंड छापा, उसमें 2025 से 2070 तक की कुल माँग और घरेलू उपलब्धता एक ही तालिका में हैं। तांबे की माँग 6.6 करोड़ टन, ग्रेफ़ाइट की 4.65 करोड़ टन, निकल की 1.15 करोड़ टन, लिथियम की 54.68 लाख टन, कोबाल्ट की 14.54 लाख टन और दुर्लभ मृदा की 6.68 लाख टन। आयात निर्भरता के ख़ाने में सिलिकॉन, निकल, लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा, पाँचों के सामने 100 लिखा है। भंडार वाला ख़ाना इन पाँचों के लिए ख़ाली है, और तालिका के नीचे की टिप्पणी बताती है कि ख़ाली ख़ाने का मतलब शून्य नहीं, पूरा आकलन करने लायक़ आँकड़े उपलब्ध न होना है।
चीन पर निर्भरता का सबसे ठोस आँकड़ा खनिज का नहीं, तैयार पुर्ज़े का है। भारी उद्योग मंत्रालय ने 1 अगस्त 2025 को राज्यसभा में डीजीसीआईएस की तालिका रखी। धातु के स्थायी मैग्नेट की श्रेणी में चीन का हिस्सा 2022-23 में मात्रा के हिसाब से 82.2 फ़ीसदी था, 2023-24 में 88.8 और 2024-25 में 90.4 फ़ीसदी। क़ीमत के हिसाब से वही आँकड़े 70.9, 72.8 और 81.3 फ़ीसदी हैं। निर्भरता घटी नहीं, इन तीन बरसों में बढ़ी है।

भंडार और संसाधन दो अलग चीज़ें हैं
इस बहस में दो शब्द गड्ड-मड्ड होते रहते हैं। नीति आयोग की तालिका की पाद-टिप्पणी दोनों की परिभाषा देती है। संसाधन का मतलब है पृथ्वी की परत में खनिज की मौजूदगी, जिसका कोई मूल्य हो सकता है। भंडार उसका वह हिस्सा है जिसे मौजूदा क़ानूनी अनुमति, तकनीक और आर्थिक हालात में निकाला जाना संभव हो।
बीच की सीढ़ियों के नाम भी सरकारी हैं। खान मंत्रालय ने अप्रैल 2025 में लोकसभा को बताया कि जीएसआई संयुक्त राष्ट्र के वर्गीकरण पर चलता है: G4 टोही सर्वेक्षण, G3 प्रारंभिक अन्वेषण, G2 सामान्य अन्वेषण।
रियासी का आँकड़ा इस सीढ़ी पर कहाँ है, यह जीएसआई के अपने वाक्य में है। 9 फ़रवरी 2023 की विज्ञप्ति कहती है कि जीएसआई ने पहली बार जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले के सलाल-हैमाना क्षेत्र में 59 लाख टन के अनुमानित लिथियम संसाधन (G3) स्थापित किए हैं। अनुमानित संसाधन, G3 स्तर का। भंडार शब्द उस वाक्य में है ही नहीं।
वाक्य यह भी नहीं बताता कि 59 लाख टन अयस्क है या उसमें मौजूद लिथियम। अगस्त 2024 में मंत्रालय ने लोकसभा में जीएसआई के जोड़े संसाधन की तालिका रखी, जिसमें लिथियम के आगे 1.23 करोड़ टन है। उसमें बारह में से दस खनिजों के आगे 'अयस्क' है, लिथियम के आगे नहीं।
रियासी की नीलामी दो बार क्यों रद्द हुई
पहली नीलामी 29 नवंबर 2023 को शुरू हुई। आठ राज्यों के 20 ब्लॉक, जिनमें 16 समग्र लाइसेंस के लिए थे और 4 खनन पट्टे के लिए। दो ब्लॉक लिथियम के थे: एक जम्मू-कश्मीर का और दूसरा छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले का कटघोरा। तत्कालीन खान मंत्री प्रह्लाद जोशी ने उसी दिन अपनी पोस्ट में कहा कि नीलामी में रखे सभी खनिजों की अनुमानित क़ीमत क़रीब 45,000 करोड़ रुपये है।
नतीजा 29 मार्च 2024 की विज्ञप्ति में है। 20 में से 18 ब्लॉक के लिए 56 भौतिक और 56 ऑनलाइन बोलियाँ आईं, और 13 मार्च 2024 को 13 ब्लॉक की नीलामी रद्द कर दी गई: दो के लिए कोई बोली नहीं आई और 11 के लिए तीन से कम तकनीकी रूप से योग्य बोलीदाता थे। रद्द हुए 11 में से 7 को अगले दौर में फिर रखा गया।
रियासी का ब्लॉक दूसरी कोशिश में भी नहीं बिका। खान मंत्री किशन रेड्डी ने राज्यसभा में यही बताया, और कश्मीर लाइफ़ ने 13 मार्च 2025 को उनका जवाब दर्ज किया कि बोली न आने पर नीलामी रद्द हुई और वहाँ अन्वेषण G3 स्तर तक ही पहुँचा है। उसी जवाब में उन्होंने कहा कि दो लिथियम ब्लॉक रखे गए थे और कटघोरा बिक गया।
कटघोरा किसने ख़रीदा, यह तुलना के लिए काम का है। द प्रिंट में मौसमी दास गुप्ता ने 24 जून 2024 को लिखा कि कोलकाता की मैकी साउथ माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड, जो तीन साल पहले बनी थी, ने 76.05 फ़ीसदी प्रीमियम पर वह ब्लॉक लिया। उसी प्रेस वार्ता में खान सचिव वी. एल. कांथा राव ने कहा कि कटघोरा समग्र लाइसेंस वाला ब्लॉक है, यानी वहाँ सिर्फ़ G4 स्तर का टोही सर्वेक्षण हुआ है और विस्तृत जाँच ख़रीदार को ख़ुद करनी होगी।

दो एक जैसे ब्लॉक, एक ही दिन, एक ही खनिज, और दो अलग नतीजे। फ़र्क़ क्यों पड़ा, इसका सबसे सीधा जवाब सरकारी दस्तावेज़ में ही है। नीति आयोग के फ़रवरी 2026 के खंड में लिखा है कि भारत की भूवैज्ञानिक रिपोर्टिंग अब भी यूएनएफ़सी शैली के पुराने वर्गीकरण पर टिकी है, जिसमें आर्थिक व्यवहार्यता, विश्वास का स्तर और योग्य व्यक्ति की जवाबदेह पुष्टि लगातार दर्ज नहीं होती। ये तीनों चीज़ें सीआरआईआरएससीओ या जॉर्क जैसे कोड माँगते हैं, और निवेशक इन्हीं कोड के हिसाब से पैसा लगाते हैं। इसका असर उसी दस्तावेज़ ने लिखा है: निजी और विदेशी निवेशक सरकारी भूवैज्ञानिक काम को या तो छूट देकर आँकते हैं या पूँजी लगाने से पहले दोबारा करवाते हैं।
नीलामी का पूरा हिसाब: 88 ब्लॉक पेश, 56 बिके
इस नीलामी व्यवस्था की बुनियाद 17 अगस्त 2023 को पड़ी, जब एमएमडीआर अधिनियम, 1957 में संशोधन लागू हुआ। अनुसूची-1 के नए भाग-घ में 24 खनिज महत्वपूर्ण और रणनीतिक के रूप में अधिसूचित हुए। परमाणु खनिजों की 12 की सूची से छह खनिज हटाए गए, जिनमें लिथियम भी था, और इसी से निजी कंपनियों के लिए दरवाज़ा खुला। धारा 11घ के तहत इनके खनन पट्टे और समग्र लाइसेंस की नीलामी का अधिकार सिर्फ़ केंद्र के पास आया, जबकि राजस्व राज्य सरकारों को जाता है। साथ में सातवीं अनुसूची के 29 खनिजों के लिए अन्वेषण लाइसेंस नाम की नई रियायत बनी, जिसका धारक 50 साल तक नीलामी प्रीमियम में हिस्सा पाता है।
पहले पाँच दौर का पूरा लेखा-जोखा नीति आयोग की तालिका 4.1 में है। पाँच दौर में क्रमशः 20, 18, 7, 21 और 15 ब्लॉक रखे गए। पसंदीदा बोलीदाता मिला क्रमशः 6, 4, 4, 10 और 10 ब्लॉक को। तीन से कम तकनीकी रूप से योग्य बोलीदाता की वजह से रद्द हुए 12, 9, 3, 7 और 2 ब्लॉक। बिल्कुल कोई बोली न आने वाले ब्लॉक थे 2, 5, 0, 4 और 3। कुल मिलाकर 55 अलग-अलग ब्लॉक में से 34 बिके, और बिके हुए 34 में सबसे बड़ा हिस्सा ग्रेफ़ाइट का था, 15 ब्लॉक।
दूसरी बात जो इस तालिका से निकलती है: असफलता की मुख्य वजह उदासीनता नहीं, अधूरी प्रतिस्पर्धा है। पाँच दौर में 33 ब्लॉक इसलिए रद्द हुए कि योग्य बोलीदाता तीन से कम थे, और 14 इसलिए कि कोई आया ही नहीं।
छठा दौर 16 सितंबर 2025 को शुरू हुआ, 13 राज्यों के 23 ब्लॉक, जिनमें 4 खनन पट्टे के लिए और 19 समग्र लाइसेंस के लिए थे। 31 मार्च 2026 को पीटीआई ने ख़बर दी कि इनमें से 11 ब्लॉक की नीलामी रद्द कर दी गई: पाँच के लिए कोई बोली नहीं आई, पाँच के लिए तीन से कम योग्य बोलीदाता रहे, और पश्चिम बंगाल का बेकु दुर्लभ धातु ब्लॉक भी रद्द हुआ। सातवाँ दौर 23 मार्च 2026 को 19 ब्लॉक के साथ शुरू हुआ, और उस दिन मंत्रालय का अपना आँकड़ा 46 बिके ब्लॉक का था।
15 जुलाई 2026 की विज्ञप्ति में मंत्रालय ने कहा कि आठवें दौर के 20 ब्लॉक मिलाकर अब तक पेश किए गए महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉक की कुल संख्या 88 हो गई है, जिनमें से 56 सफलतापूर्वक नीलाम हो चुके हैं। चार महीने में 46 से 56, यानी दस ब्लॉक और।
जो बिकते हैं, उन पर बोली कितनी चढ़ती है, यह भी देखने लायक़ है। उत्तर प्रदेश का बरवार फ़ॉस्फ़ोराइट ब्लॉक 320 फ़ीसदी प्रीमियम पर गया, कर्नाटक का गनाचरपुरा ग्रेफ़ाइट 271 फ़ीसदी पर और अरुणाचल का एंडोलिन-इशोलिन ग्रेफ़ाइट 237.5 फ़ीसदी पर। नीति आयोग ने इसी पर चेताया है कि कई मामलों में जीतने वाली बोली खनिज के आँके गए मूल्य के 100 फ़ीसदी से ऊपर चली गई, और ऐसी बोली आगे चलकर धातु की लागत बढ़ा सकती है।
अड़चन खनन में नहीं, बीच की कड़ी में है
नीति आयोग के दस्तावेज़ का चौथा स्तंभ इसी वाक्य से शुरू होता है कि भारत की आपूर्ति की अड़चन नीचे के विनिर्माण में उतनी नहीं, बीच की रिफ़ाइनिंग और पुनर्चक्रण क्षमता में केंद्रित है। यह बात सरकार के दूसरे विभाग ने और साफ़ शब्दों में मानी है।
परमाणु ऊर्जा विभाग ने 12 मार्च 2026 को राज्यसभा में लिखा कि भारत के पास खनन से लेकर पृथक्करण और ऑक्साइड तक शोधन की सुविधाएँ मौजूद हैं, धातु निकालने की क्षमता भी विकसित हो चुकी है, पर मिश्रधातु और मैग्नेट जैसे मध्यवर्ती चरणों के औद्योगिक पैमाने के कारख़ाने देश में हैं ही नहीं। इसी वजह से पर्याप्त दुर्लभ मृदा संसाधन होने के बावजूद उत्पादन सीमित स्तर पर है। उसी जवाब में यह भी है कि भारत का दुर्लभ मृदा संसाधन ग्रेड में कमज़ोर है और रेडियोधर्मिता से जुड़ा हुआ है, जिससे निष्कर्षण लंबा, जटिल और महँगा हो जाता है, और मोनाज़ाइट में मुख्यतः हल्की दुर्लभ मृदा है, भारी दुर्लभ मृदा आर्थिक रूप से निकालने लायक़ मात्रा में नहीं।
यह अंतर मैग्नेट के गणित में दिखता है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में बताया कि देश की मौजूदा ज़रूरत क़रीब 4,000 टन दुर्लभ मृदा स्थायी मैग्नेट की है, जो 2030 तक क़रीब 8,000 टन हो जाएगी। विशाखापत्तनम का समेरियम-कोबाल्ट मैग्नेट संयंत्र चालू हो चुका है, शुरुआती क्षमता 500 टन सालाना, अगले चरण में 2,000 टन और 2030 तक 5,000 टन। यानी आज घरेलू क्षमता ज़रूरत के आठवें हिस्से के आसपास है।
इसे भरने के लिए मंत्रिमंडल ने 26 नवंबर 2025 को 7,280 करोड़ रुपये की योजना मंज़ूर की, जिसका लक्ष्य 6,000 टन सालाना की एकीकृत सिंटर्ड मैग्नेट क्षमता बनाना है। इसमें 6,450 करोड़ रुपये पाँच साल की बिक्री से जुड़े प्रोत्साहन के हैं और 750 करोड़ रुपये पूँजी सब्सिडी के। क्षमता वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली से पाँच लाभार्थियों में बाँटी जाएगी, हर एक को अधिकतम 1,200 टन, और कारख़ाना खड़ा करने के लिए दो साल का समय रखा गया है।
चीन की पकड़ इसी बीच की कड़ी पर है। नीति आयोग के आँकड़े के मुताबिक़ दुनिया का क़रीब 60 फ़ीसदी लिथियम शोधन चीन में होता है और कोबाल्ट का 70 फ़ीसदी शोधन भी वहीं, जबकि कोबाल्ट की 70 फ़ीसदी खुदाई कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में होती है। कृत्रिम ग्रेफ़ाइट में यह और सीधा है: 2022-23 में भारत ने चीन से 41,661 टन कृत्रिम ग्रेफ़ाइट मँगाया, जर्मनी से 1,316 टन और मलेशिया से 812 टन।
दो सरकारी बयानों को साथ रखिए। परमाणु ऊर्जा विभाग ने 29 जनवरी 2026 को राज्यसभा में कहा कि समुद्र तटीय रेत खनिजों में मौजूद दुर्लभ मृदा तक पहुँच के लिए भारत चीन पर निर्भर नहीं है। भारी उद्योग मंत्रालय की तालिका बताती है कि धातु के स्थायी मैग्नेट का 90.4 फ़ीसदी हिस्सा चीन से आया। दोनों सही हैं और एक ही शृंखला की दो अलग कड़ियों की बात कर रहे हैं। कच्चा माल यहाँ है, मैग्नेट यहाँ नहीं बनता।
बजट 2026-27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में दुर्लभ मृदा गलियारों की घोषणा हुई है। आईआरईएल का निष्कर्षण संयंत्र ओडिशा में और शोधन इकाई केरल के अलुवा में पहले से है।

पट्टे से उत्पादन तक की समय-सारणी
खनिज मिल भी जाए तो निकलने में कितना वक़्त लगता है, इसका हिसाब अब ख़ुद नियमों में लिखा है। 17 अक्टूबर 2025 से पहले नियम इतना ही कहते थे कि आशय पत्र मिलने के तीन साल में खनन पट्टा निष्पादित हो, जिसे दो साल और बढ़ाया जा सकता है। बीच के चरणों की निगरानी का ज़रिया नहीं था, और चूकने पर एकमात्र नतीजा नीलामी रद्द होना था।
अक्टूबर 2025 के संशोधन ने मध्यवर्ती पड़ाव तय किए। खनन पट्टे के लिए खनन योजना की मंज़ूरी छह महीने में, पर्यावरण मंज़ूरी 18 महीने में और पट्टे का निष्पादन 12 महीने में, यानी कुल तीन साल। समग्र लाइसेंस के लिए शुरू में दो पड़ाव और जुड़ते हैं: लाइसेंस का निष्पादन 12 महीने में और कम से कम G2 स्तर तक की खोज 36 महीने में, यानी आशय पत्र से पट्टे तक कुल सात साल। हर महीने की देरी पर निष्पादन गारंटी का 1 फ़ीसदी काट लिया जाएगा।
इस समय-सारणी को कटघोरा पर लगाइए। समग्र लाइसेंस 2024 में जीता गया, तो नियमों के हिसाब से भी पट्टे का निष्पादन 2031 से पहले नहीं होगा, और उत्पादन उसके बाद। 30 मार्च 2026 के दूसरे संशोधन ने इसे थोड़ा कसा है: दो साल की अतिरिक्त मोहलत अब सिर्फ़ वन भूमि वाले ब्लॉक को मिलेगी, और ब्लॉक का वह हिस्सा अलग किया जा सकेगा जहाँ खनन संभव नहीं और जिसमें कुल अनुमानित संसाधन का 25 फ़ीसदी से कम है।
यह सारणी ज़मीन पर कितनी चलती है, इसका पैमाना नीति आयोग ने दिया है। 2015 से 2024 के बीच 554 खनिज ब्लॉक सफलतापूर्वक नीलाम हुए, और 9 अगस्त 2025 तक उनमें से सिर्फ़ 66 खदानें उत्पादन के चरण तक पहुँची थीं। अड़चन ज़्यादातर मंज़ूरियों में है। खनन शुरू करने से पहले चार मंज़ूरियाँ चाहिए, वन, पर्यावरण, वन्यजीव और संचालन की सहमति, और इनके लिए 420 दिन की क़ानूनी समय-सीमा है। ओडिशा के सुंदरगढ़ की घोड़ाबुरहानी-सागासाही लौह अयस्क खदान को चालू होने में पाँच साल से ज़्यादा लगे, और 2016 में नीलाम हुए ओडिशा के 48 ब्लॉक में 2023 तक वही अकेली नई खदान थी जो शुरू हो सकी।
महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में मंज़ूरी का एक चरण हटा भी दिया गया है। परमाणु ऊर्जा विभाग ने मार्च 2026 के जवाब में दर्ज किया कि अनुसूची-1 के भाग-ख के परमाणु खनिजों और भाग-घ के महत्वपूर्ण तथा रणनीतिक खनिजों की सभी खनन परियोजनाएँ पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 के तहत जन-सुनवाई से छूट प्राप्त हैं।
जो अब भी तय नहीं
शुक्रवार के बयान में एक आँकड़ा ऐसा है जो अपने ही दस्तावेज़ से मेल नहीं खाता। पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने वाली 1,500 करोड़ रुपये की योजना 2 अक्टूबर 2025 को शुरू हुई थी, और पत्र सूचना कार्यालय के 6 सितंबर 2025 के पृष्ठभूमि दस्तावेज़ में उसका डिज़ाइन लक्ष्य लिखा है: 2.7 लाख टन सालाना पुनर्चक्रण क्षमता, उससे 40,000 टन महत्वपूर्ण खनिज, क़रीब 8,000 करोड़ रुपये का निवेश और क़रीब 70,000 रोज़गार। रेड्डी ने 11 सितंबर को कहा कि 125 इकाइयों ने पंजीकरण कराया, 58 को मंज़ूरी मिल चुकी है, और ये परियोजनाएँ सालाना क़रीब 96,000 टन महत्वपूर्ण खनिज निकालने की राह पर हैं। यह योजना के अपने लक्ष्य से दोगुने से ज़्यादा है, और दोनों में से कोई दस्तावेज़ इस फ़र्क़ को समझाता नहीं। प्रोत्साहन राशि इन 58 के बीच कैसे बँटेगी, इस पर मंत्रालय ने नीति आयोग से राय माँगी है।
रेड्डी ने यह भी कहा कि भारत की महत्वपूर्ण खनिज ज़रूरत का 25 से 30 फ़ीसदी हिस्सा ई-कचरे से आ सकता है। यह अनुमान है, और इसके पीछे की गणना अभी सार्वजनिक नहीं है।
बाक़ी जो तय नहीं, वह सूची छोटी और साफ़ है। अर्जेंटीना के पाँच ब्लॉक में लिथियम कितना है, यह ड्रिलिंग और जाँच के बाद ही पता चलेगा। रियासी में अन्वेषण अब भी चल रहा है, यह डॉ. जितेंद्र सिंह ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में कहा; G3 से आगे की कोई रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आई। 7,280 करोड़ रुपये की मैग्नेट योजना के पाँच लाभार्थियों के नाम अभी तय नहीं हुए। और आठवें दौर के 20 ब्लॉक पर बोलियाँ 21 सितंबर को बंद होंगी।
इनमें से किसी का नतीजा इस साल नहीं आएगा।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, 11 सितंबर 2026, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय: सीआईआई के तीसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में डॉ. जितेंद्र सिंह का संबोधन, द हिंदू, सप्तपर्णो घोष, 11 सितंबर 2026: किशन रेड्डी का बयान, ई-कचरे से खनिज वसूली के आँकड़े, बिज़नेस स्टैंडर्ड, साकेत कुमार, 11 सितंबर 2026: दूतावासों में खनिज अधिकारी, विदेश मंत्रालय के साथ समन्वय, प्रसंस्करण पार्क, पत्र सूचना कार्यालय, 15 जुलाई 2026, खान मंत्रालय: आठवें दौर की नीलामी, 88 ब्लॉक पेश और 56 बिकने का सरकारी आँकड़ा, राज्यवार सूची और तारीख़ें, पत्र सूचना कार्यालय, 22 मार्च 2026, खान मंत्रालय: सातवें दौर की घोषणा, एमएमडीआर संशोधन 17 अगस्त 2023 और 46 ब्लॉक का आँकड़ा, नीति आयोग, फ़रवरी 2026, खंड 10: महत्वपूर्ण खनिज आकलन, माँग और आपूर्ति (तालिका 3.1 और 4.1, रिफ़ाइनिंग और नीलामी पर निष्कर्ष), पत्र सूचना कार्यालय, 9 फ़रवरी 2023, खान मंत्रालय: जीएसआई का रियासी में G3 स्तर का अनुमानित लिथियम संसाधन, 62वीं सीजीपीबी बैठक, पत्र सूचना कार्यालय, 5 अगस्त 2024, खान मंत्रालय: लोकसभा में लिखित उत्तर, चालू पट्टों की संख्या और 2030 तक की अनुमानित ज़रूरत, पत्र सूचना कार्यालय, 2 अगस्त 2023, खान मंत्रालय: लोकसभा में आयात निर्भरता के आँकड़े, वाणिज्य विभाग के स्रोत से, पत्र सूचना कार्यालय, 12 मार्च 2026, परमाणु ऊर्जा विभाग: राज्यसभा में दुर्लभ मृदा संसाधन, मिश्रधातु और मैग्नेट कारख़ानों की अनुपस्थिति, पत्र सूचना कार्यालय, 1 अगस्त 2025, भारी उद्योग मंत्रालय: राज्यसभा में मैग्नेट आयात की डीजीसीआईएस तालिका, चीन पर निर्भरता, पत्र सूचना कार्यालय, 19 अक्टूबर 2025, खान मंत्रालय: खनिज (नीलामी) नियमों में मध्यवर्ती समय-सीमाओं का संशोधन, पत्र सूचना कार्यालय, 7 अप्रैल 2026, खान मंत्रालय: खनिज (नीलामी) दूसरा संशोधन नियम, 2026, पत्र सूचना कार्यालय, 15 जनवरी 2024, खान मंत्रालय: काबिल और कैमयेन के बीच समझौता, पाँच ब्राइन ब्लॉक के नाम और क्षेत्रफल, पत्र सूचना कार्यालय, 24 मार्च 2025, खान मंत्रालय: राज्यसभा में काबिल, ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौता ज्ञापन और मिशन के घटक, पत्र सूचना कार्यालय, 13 दिसंबर 2023, खान मंत्रालय: लोकसभा में काबिल की संरचना, उद्देश्य और ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, चिली में तलाश, पत्र सूचना कार्यालय, 26 नवंबर 2025, मंत्रिमंडल: सिंटर्ड दुर्लभ मृदा स्थायी मैग्नेट योजना, 7,280 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, 25 मार्च 2026, परमाणु ऊर्जा विभाग: लोकसभा में मैग्नेट की मौजूदा ज़रूरत, विशाखापत्तनम संयंत्र की क्षमता, पत्र सूचना कार्यालय, 2 अप्रैल 2025, खान मंत्रालय: लोकसभा अतारांकित प्रश्न 5253, यूएनएफ़सी के G4, G3 और G2 चरणों की परिभाषा, पत्र सूचना कार्यालय, 29 मार्च 2024, खान मंत्रालय: पहले दौर में 13 ब्लॉक रद्द होने का ब्यौरा, पत्र सूचना कार्यालय, 29 नवंबर 2023, खान मंत्रालय: पहले दौर की नीलामी, 20 ब्लॉक की राज्यवार और खनिजवार सूची, बिज़नेस स्टैंडर्ड, पीटीआई, 31 मार्च 2026: छठे दौर के 11 ब्लॉक रद्द, कारणों का विभाजन, द प्रिंट, मौसमी दास गुप्ता, 24 जून 2024: कटघोरा ब्लॉक का ख़रीदार और खान सचिव का बयान कि यह समग्र लाइसेंस ब्लॉक है, कश्मीर लाइफ़, 13 मार्च 2025: राज्यसभा में किशन रेड्डी का जवाब कि रियासी की नीलामी बोली न आने पर रद्द हुई और अन्वेषण G3 तक पहुँचा है, पत्र सूचना कार्यालय पृष्ठभूमि दस्तावेज़, 6 सितंबर 2025: 30 महत्वपूर्ण खनिजों की सूची और पुनर्चक्रण योजना के लक्ष्य, पत्र सूचना कार्यालय पृष्ठभूमि दस्तावेज़, 2 फ़रवरी 2026: दुर्लभ मृदा गलियारे, आईआरईएल की इकाइयाँ और जीएसआई का 48.26 करोड़ टन का आँकड़ा, पत्र सूचना कार्यालय, 29 जनवरी 2025, मंत्रिमंडल: राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन की मंज़ूरी और उसका ख़र्च