ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र के 140 पैराग्राफ़ में यूक्रेन एक बार नहीं आता
शनिवार, 12 सितंबर को भारत मंडपम में अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने नई दिल्ली घोषणापत्र अपनाया। प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर चढ़े उसके पूरे पाठ को पढ़कर और जुलाई 2025 के रियो घोषणापत्र के सामने रखकर देखने पर तीन चीज़ें निकलती हैं: यूक्रेन का ज़िक्र ग़ायब है, आतंकवाद वाला पैराग्राफ़ लगभग पूरा रियो से उठाया हुआ है, और ईरान पर रियो में जो निंदा दर्ज थी वह इस बार नहीं लिखी गई।

नई दिल्ली घोषणापत्र 140 क्रमांकित पैराग्राफ़ का दस्तावेज़ है। शनिवार, 12 सितंबर को भारत मंडपम में अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इसे अपनाया और उसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर उसका पूरा पाठ चढ़ गया। उन 140 पैराग्राफ़ में "यूक्रेन" शब्द एक बार नहीं आता।
चौदह महीने पहले रियो दे जनेरो में अपनाए गए घोषणापत्र में आता था। एक बार, एक पैराग्राफ़ में, किसी का नाम लिए बिना। वह पैराग्राफ़ इस बार लिखा ही नहीं गया।
यह लेख उस पूरे पाठ को पढ़कर और हर मोड़ पर उसे रियो के पाठ के सामने रखकर लिखा गया है। तुलना में सबसे बड़ी बात यूक्रेन की ग़ैर-मौजूदगी नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि 12 सितंबर को जिस पैराग्राफ़ को अख़बारों ने भारत की कूटनीतिक कामयाबी की तरह छापा, उसके 267 में से 266 शब्द रियो के पैराग्राफ़ से ज्यों के त्यों उठे हुए हैं।
दस्तावेज़ की बनावट: सेहत पर दस पैराग्राफ़, युद्ध पर अठारह
घोषणापत्र का पहला पैराग्राफ़ बताता है कि नेता 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में मिले, और शिखर सम्मेलन का विषय था "Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability"। द इंडियन एक्सप्रेस ने 12 सितंबर की रात छपे अपने विश्लेषण में इसे 45 पन्ने का दस्तावेज़ बताया। पाठ में क़रीब साढ़े सत्रह हज़ार शब्द हैं।
शुरू के छह पैराग्राफ़ भारत की अध्यक्षता का लेखा-जोखा हैं। पैराग्राफ़ 6 में इस अध्यक्षता का सबसे ठोस आँकड़ा दर्ज है: इसके दौरान भारत के तीस शहरों में चार सौ से ज़्यादा बैठकें और आयोजन हुए, मंत्रियों, सांसदों, एजेंसी प्रमुखों, अधिकारियों, विशेषज्ञों, कारोबारियों और आम लोगों के स्तर पर।
इसके बाद दस्तावेज़ का ढाँचा साफ़ है। पैराग्राफ़ 7 से 23 तक वैश्विक शासन, संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन पर हैं। पैराग्राफ़ 24 से 41 तक, यानी अठारह पैराग्राफ़, दुनिया भर के युद्धों, परमाणु ख़तरे और आतंकवाद पर हैं। पैराग्राफ़ 42 से आख़िर तक निन्यानबे पैराग्राफ़ सहयोग की सूची हैं: नशीले पदार्थ, अंतरिक्ष, सेहत, खेती, ऊर्जा, उद्योग, विज्ञान, डिजिटल ढाँचा, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, आपदा, छोटे उद्यम, कर, सीमा शुल्क, जलवायु, नया विकास बैंक, बौद्धिक संपदा, लेखा-परीक्षा, शिक्षा, श्रम, संस्कृति, पर्यटन, खेल, युवा, न्याय और संसद।
इस बँटवारे का एक नाप ध्यान खींचता है। पैराग्राफ़ 50 से 59 तक लगातार दस पैराग्राफ़ सिर्फ़ सेहत पर हैं: चंडीगढ़ की स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक, तपेदिक, दवा नियामकों का समझौता-ज्ञापन, डिजिटल स्वास्थ्य, मोटापा और ग़ैर-संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या, राष्ट्रीय जन-स्वास्थ्य संस्थान, और दवाओं का स्थानीय उत्पादन। दुनिया के सारे युद्धों के लिए अठारह पैराग्राफ़ हैं। एक नेताओं का घोषणापत्र मुख्य रूप से बैठकों की रिपोर्ट होता है, और यह दस्तावेज़ उस बात को छिपाता नहीं।
पैराग्राफ़ 40 की निंदा रियो में लिखी जा चुकी थी
पैराग्राफ़ 40 में पूरा वाक्य यह है: "We condemn in the strongest terms the terrorist attack in Jammu and Kashmir on 22 April 2025, during which 26 people were killed and many more injured." जम्मू-कश्मीर में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा, जिसमें 26 लोग मारे गए और कई घायल हुए। जगह का नाम नहीं है। पूरे 140 पैराग्राफ़ में "पहलगाम" नहीं आता, और "पाकिस्तान" भी एक बार नहीं आता।
उसी पैराग्राफ़ की अगली पंक्ति सीमा पार की बात इन शब्दों में करती है: आतंकवाद के हर रूप से लड़ने की प्रतिबद्धता, "including the cross-border movement of terrorists, terrorism financing and safe havens"। आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, आतंकवाद को पैसा, और पनाहगाहें। "cross-border" शब्द दस्तावेज़ में बारह जगह आता है, पर "cross-border terrorism" एक बार नहीं। रियो के पाठ में भी वह नहीं था।
12 सितंबर की दोपहर से शाम तक अख़बारों ने यही ख़बर दी। द इंडियन एक्सप्रेस ने दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर लिखा कि घोषणापत्र पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करता है और पनाहगाहों के ख़िलाफ़ कार्रवाई माँगता है। बीबीसी हिंदी ने 3 बजकर 55 मिनट पर लिखा कि घोषणापत्र में पहलगाम हमले, फ़लस्तीन, ग़ज़ा और टैरिफ़ का ज़िक्र है। ये रिपोर्टें ग़लत नहीं हैं। हमले की निंदा वहाँ है और वह उसी हमले की है। फ़र्क़ शब्द का है, बात का नहीं।
फ़र्क़ एक और जगह है, और वह बड़ा है। रियो दे जनेरो में 6 जुलाई 2025 को अपनाए गए घोषणापत्र में आतंकवाद वाला पैराग्राफ़ 267 शब्दों का था। नई दिल्ली का पैराग्राफ़ 40, 266 शब्दों का है। दोनों को शब्द-दर-शब्द मिलाने पर पूरे पैराग्राफ़ में दो बदलाव मिलते हैं: रियो में "United Nations" लिखा था, दिल्ली में "UN"; और रियो में "position paper" छोटे अक्षरों में था, दिल्ली में "Position Paper" बड़े अक्षरों में।
पैराग्राफ़ दस वाक्यों का है और दसों वाक्य रियो में उसी क्रम में मौजूद हैं; नौ अक्षर-दर-अक्षर वही हैं और दसवें में सिर्फ़ वह एक अक्षर बड़ा हुआ है। जो लौटा है उसमें शून्य सहिष्णुता की माँग है, दोहरे मानदंडों की अस्वीकृति है, यह कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या नस्ली समूह से जोड़ा न जाए, यह कि लड़ने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी राज्यों की है, ब्रिक्स आतंकरोधी कार्यसमूह और उसके पाँच उपसमूहों का काम है, संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि जल्द अपनाने की माँग है, और नामित आतंकवादियों तथा संगठनों के ख़िलाफ़ मिलकर कार्रवाई की माँग है। 22 अप्रैल का हमला और 26 मौतें, सब रियो में दर्ज हो चुका था, जब वह हमला ढाई महीने पुराना था।
इसे अख़बारों की चूक कहना ठीक नहीं होगा; द इंडियन एक्सप्रेस के 12 सितंबर की रात छपे विश्लेषण ने ख़ुद लिखा कि आतंकवाद पर भाषा 2025 के रियो घोषणापत्र जैसी ही है। जो कहीं दर्ज नहीं हुआ वह यह है कि "जैसी ही" का मतलब 267 में से 266 शब्द है।
इस हिस्से में नया दो जगह है, और दोनों जगह रियो में कोई समकक्ष वाक्य नहीं मिलता। पैराग्राफ़ 41 उग्रवाद और कट्टरपंथ से लड़ने की बात करता है, ख़ास तौर पर "younger generations" यानी नई पीढ़ियों के बीच। पैराग्राफ़ 42 अवैध वित्तीय प्रवाह की लंबी सूची के बीच "organized scam networks, including cross-border fraud operations and so-called scam compounds" पर गंभीर चिंता दर्ज करता है, यानी संगठित ठगी के जाल, सीमा-पार धोखाधड़ी के तंत्र और तथाकथित ठगी-अहाते, जो डिजिटल तकनीक, भुगतान प्रणालियों और कमज़ोर हालात में फँसे लोगों का इस्तेमाल करते हैं।
यूक्रेन पर रियो का पैराग्राफ़ इस बार लिखा ही नहीं गया
रियो के घोषणापत्र में यूक्रेन वाला पैराग्राफ़ तीन वाक्यों का था और उसमें किसी पर आरोप नहीं था। पहला वाक्य: "We recall our national positions concerning the conflict in Ukraine as expressed in the appropriate fora, including the UN Security Council and the UN General Assembly." यानी हम यूक्रेन के संघर्ष पर अपनी-अपनी राष्ट्रीय स्थिति याद दिलाते हैं, जो उपयुक्त मंचों पर रखी जा चुकी है। दूसरा वाक्य मध्यस्थता की कोशिशों को सराहता था और उनमें से दो का नाम लेता था: अफ़्रीकी शांति पहल, और शांति के मित्रों का समूह। तीसरा कहता था कि मौजूदा कोशिशें टिकाऊ शांति-समझौते तक पहुँचेंगी, ऐसी उम्मीद है।

नई दिल्ली के 140 पैराग्राफ़ में इनमें से कुछ नहीं है। न यूक्रेन, न अफ़्रीकी शांति पहल, न शांति के मित्रों का समूह।
"रूस" शब्द पूरे दस्तावेज़ में तीन बार आता है और तीनों बार युद्ध के संदर्भ से बाहर। पैराग्राफ़ 13 में, जहाँ चीन और रूस को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बताया गया है। पैराग्राफ़ 75 में, जहाँ ब्रिक्स विज्ञान-तकनीक-नवाचार ढाँचा कार्यक्रम के दस साल पूरे होने पर अक्टूबर 2026 में रूस में होने वाले आयोजन का ज़िक्र है। और पैराग्राफ़ 115 में, जहाँ 14-15 मई 2026 को मॉस्को में हुई नए विकास बैंक की ग्यारहवीं वार्षिक बैठक के लिए रूस का आभार है। यूरोप, काला सागर या क्रीमिया शब्द दस्तावेज़ में एक बार नहीं आते।
द इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण ने इस ग़ैर-मौजूदगी को 12 सितंबर की रात ही दर्ज किया और उसकी वजह भी लिखी: रूस मेज़ पर था, और आलोचना वाली कोई भी भाषा वह रोक देता। उसी रिपोर्ट ने 2023 के जी-20 शिखर सम्मेलन की याद दिलाई, जब भारत ने रूस का नाम लिए बिना भाषा नरम करके सहमति बनाई थी। फ़र्क़ यह है कि 2023 में नरम भाषा लिखी गई थी। 2026 में पैराग्राफ़ ही नहीं लिखा गया।
ईरान वाले पैराग्राफ़ से निंदा का वाक्य निकल गया
रियो में ईरान पर एक पूरा पैराग्राफ़ था और वह पाँच वाक्यों का था। पहला वाक्य सीधी निंदा थी: "We condemn the military strikes against the Islamic Republic of Iran since 13 June 2025, which constitute a violation of international law and the Charter of the United Nations." 13 जून 2025 से ईरान पर हुए सैन्य हमलों की निंदा, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन हैं। आख़िरी वाक्य था: "We call upon the United Nations Security Council to be seized of this matter." सुरक्षा परिषद इस मामले को अपने हाथ में ले।
नई दिल्ली का पैराग्राफ़ 29 दो वाक्यों का है, और दोनों रियो के दूसरे और तीसरे वाक्य हैं, अक्षरशः। आईएईए की पूर्ण निगरानी में चल रही शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं और नागरिक ढाँचे पर जान-बूझकर किए गए हमलों पर गंभीर चिंता, और यह कि परमाणु सुरक्षा हर हाल में, सशस्त्र संघर्ष में भी, बनाए रखी जानी चाहिए। रियो के वाक्य में जो "further" शब्द था वह हटा है; बाक़ी शब्द वही हैं। निंदा वाला पहला वाक्य नहीं है। क्षेत्रीय चुनौतियों पर कूटनीतिक पहलों के समर्थन वाला चौथा वाक्य नहीं है। सुरक्षा परिषद से मामला उठाने की माँग नहीं है। और "ईरान" शब्द उस पैराग्राफ़ में नहीं है।

पूरे 140 पैराग्राफ़ में ईरान का नाम एक ही बार आता है, पैराग्राफ़ 20 में, जहाँ इथियोपिया और ईरान के विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के आवेदन का समर्थन दर्ज है।
यह बदलाव क्यों हुआ, इसका ब्योरा द इंडियन एक्सप्रेस के राजनयिक संपादक शुभजीत रॉय ने 13 सितंबर की रिपोर्ट में दिया। उनके मुताबिक़ पश्चिम एशिया का युद्ध 28 फ़रवरी को शुरू हुआ, जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला किया, और उसके बाद ईरान ने खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात के ठिकाने भी थे। 2024 में ब्रिक्स में शामिल हुए ये दोनों देश छह महीने से इस युद्ध की शब्दावली पर आमने-सामने थे। मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक कोई साझा बयान दिए बिना ख़त्म हो गई थी; भारत ने अध्यक्ष का वक्तव्य और एक परिणाम दस्तावेज़ जारी किया, जिसमें दर्ज था कि कुछ सदस्यों के विचार अलग हैं। ब्रिक्स शेरपा और विदेश मंत्रालय में सचिव (आर्थिक संबंध) सुधाकर दलेला ने 13 सितंबर को कहा कि नई दिल्ली घोषणापत्र का अपनाया जाना भारत की अध्यक्षता के निर्णायक नतीजों में है।
सहमति की क़ीमत पाठ में दिखती है। पैराग्राफ़ 28, जो इस सहमति का नतीजा है, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर गहरी चिंता जताता है, "recalling our respective national positions" यानी सबकी अपनी-अपनी राष्ट्रीय स्थिति याद दिलाते हुए अधिकतम संयम बरतने को कहता है, नागरिकों और नागरिक ढाँचे की रक्षा तथा देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात करता है, और व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा के सुचारू प्रवाह पर ज़ोर देता है। हमलावर का नाम कहीं नहीं है, और तारीख़ भी नहीं।
ब्योरा एक जगह और छूटा है। लेबनान वाला पैराग्राफ़ 35 रियो से लगभग पूरा वही है: संघर्षविराम का स्वागत, उसके उल्लंघनों की निंदा, और इसराइल से कहा जाना कि वह लेबनानी सरकार से तय शर्तें माने और अपनी क़ाबिज़ फ़ौजें हटाए। रियो में उस आख़िरी माँग में एक ब्योरा था, "including the five sites in Southern Lebanon", यानी दक्षिणी लेबनान के वे पाँच ठिकाने जिन पर क़ब्ज़ा बना हुआ है। दिल्ली के पाठ में वे पाँच ठिकाने नहीं गिने गए; वहाँ सिर्फ़ "all of the Lebanese territories" लिखा है। चौदह महीने में यह वाक्य ज़्यादा ठोस नहीं, कम ठोस हुआ है।
प्रतिबंधों पर रियो का वचन दिल्ली में राय बनकर रह गया
पैराग्राफ़ 22 एकतरफ़ा दबाव वाले उपायों की निंदा करता है और उन्हें अंतरराष्ट्रीय क़ानून के ख़िलाफ़ बताता है। पैराग्राफ़ के पहले दो वाक्य रियो से अक्षरशः वही हैं: एकतरफ़ा आर्थिक प्रतिबंधों और गौण प्रतिबंधों के मानवाधिकारों पर दूरगामी नकारात्मक असर, निशाना बनाए गए देशों की आम आबादी पर, और ग़रीबों तथा कमज़ोर हालात में रहने वालों पर उसका असमान बोझ।
तीसरा वाक्य बदल गया है, और बदलाव पूरे दस्तावेज़ के सबसे ठोस बदलावों में है। रियो में लिखा था: "We reaffirm that BRICS member states do not impose or support non-UN Security Council authorized sanctions that are contrary to international law." ब्रिक्स सदस्य देश ऐसे प्रतिबंध न लगाते हैं, न उनका समर्थन करते हैं, जिन्हें सुरक्षा परिषद ने मंज़ूरी न दी हो। यह अपने ऊपर बाँधी गई शर्त थी।
नई दिल्ली में वही जगह इन शब्दों में भरी गई है: "We reaffirm our opposition to unilateral coercive measures that are contrary to international law and the Charter of the United Nations, including non-UN Security Council authorized sanctions." हम ऐसे उपायों के विरोध को दोहराते हैं। विरोध दर्ज हुआ, वचन नहीं दोहराया गया। बाक़ी पैराग्राफ़ वही है।
इसी तेवर का दूसरा पैराग्राफ़ 27 है, जो लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र को शांति-क्षेत्र बताते हुए क्यूबा पर कसते जा रहे एकतरफ़ा नाकेबंदी उपायों पर गहरी चिंता जताता है, और संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव A/RES/80/4 के मुताबिक़ इन आर्थिक, व्यापारिक और वित्तीय उपायों को ख़त्म करने की ज़रूरत दोहराता है। नाकेबंदी किसकी है, यह वाक्य में नहीं लिखा।
पूरे दस्तावेज़ में "United States" एक बार नहीं आता। "America" चार बार आता है और चारों बार "Latin America" के भीतर। व्यापार वाले पैराग्राफ़ 21 में रियो का वाक्य दोहराते हुए एक जोड़ है: व्यापार-रोधी क़दमों की बाढ़ को अब "that are inconsistent with WTO rules" कहकर विश्व व्यापार संगठन के नियमों के ख़िलाफ़ बताया गया है, जो रियो में नहीं था। और पैराग्राफ़ 20 चीन के उस क़दम को दर्ज करता है जिसमें उसने अपने राजनयिक संबंध वाले 53 अफ़्रीकी देशों तक शून्य-शुल्क व्यवहार बढ़ाया।
सुरक्षा परिषद वाला वाक्य रियो से ज्यों का त्यों है
भारत के लिए सबसे ज़्यादा मायने रखने वाला वाक्य पैराग्राफ़ 13 के आख़िर में है: "Recalling the 2022 Beijing and 2023 Johannesburg-II Leaders' Declarations, China and Russia, as permanent members of the UN Security Council, reiterate their support to the aspirations of Brazil and India to play a greater role in the UN, including its Security Council."
इस वाक्य को ध्यान से पढ़ना पड़ता है। "स्थायी" शब्द चीन और रूस के अपने दर्जे के साथ लगा है, भारत और ब्राज़ील की आकांक्षा के साथ नहीं। भारत और ब्राज़ील के लिए जो शब्द हैं वे हैं "a greater role", यानी बड़ी भूमिका, संयुक्त राष्ट्र में और उसकी सुरक्षा परिषद में। स्थायी सदस्यता का ज़िक्र नहीं है। दक्षिण अफ़्रीका, जो ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और जिसका दावा भी पुराना है, इस वाक्य में नहीं है।
पूरा पैराग्राफ़ 13 रियो के पैराग्राफ़ से अक्षरशः वही है। रियो में पाँच जगह "United Nations" लिखा था और दिल्ली में पाँचों जगह "UN", जिनमें दो इसी वाक्य के भीतर हैं। चौदह महीने में इस माँग की भाषा में और कुछ नहीं जुड़ा।
संयुक्त राष्ट्र पर जो नया है वह पैराग्राफ़ 9 में है, और वह रियो में कहीं नहीं था। अगले महासचिव के चयन की चल रही प्रक्रिया के संदर्भ में ब्रिक्स नेता दर्ज करते हैं कि इस पद पर आज तक कोई महिला नहीं चुनी गई, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र से सिर्फ़ एक व्यक्ति इस पद पर रहा है, और अफ़्रीका तथा एशिया से दो-दो। यह एक वाक्य का पैराग्राफ़ है और इसमें किसी उम्मीदवार का नाम नहीं है।
पैराग्राफ़ 16 भी नया है। वह 1955 के बांडुंग एशियाई-अफ़्रीकी सम्मेलन को याद करता है, जिसने बराबरी, स्वतंत्रता, अहस्तक्षेप और पारस्परिक लाभ के सिद्धांत घोषित किए थे, और कहता है कि बांडुंग की भावना आज भी एक कसौटी है। रियो के पूरे पाठ में बांडुंग शब्द एक बार नहीं आता। जो पैराग्राफ़ रियो से उठाए गए हैं उनमें ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के सुधार वाला 17 और विश्व बैंक शेयरधारिता समीक्षा वाला 19 भी हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक के नेतृत्व-चयन को योग्यता-आधारित, समावेशी और पारदर्शी बनाने की माँग है।
कार्बन सीमा कर, जीवाश्म ईंधन और पेरिस समझौते की गिनती
पैराग्राफ़ 108 पूरा इतना ही है: "We oppose unilateral, punitive, discriminatory and protectionist measures that are not in line with international law, such as carbon border adjustment mechanisms, and express concern that such measures undermine efforts by countries, specifically the developing countries, aimed at addressing the adverse impacts of climate change, increasing adaptive capacity and resilience." एकतरफ़ा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी उपायों का विरोध, जैसे कार्बन सीमा समायोजन तंत्र। यूरोपीय संघ का नाम वाक्य में नहीं है।
जीवाश्म ईंधन वाला वाक्य पैराग्राफ़ 64 में है, और 12 सितंबर को यही वाक्य कई सुर्ख़ियों में गया: "fossil fuels will still play an important role in the world's energy mix, particularly for emerging markets and developing economies"। जीवाश्म ईंधन दुनिया के ऊर्जा-मिश्रण में अब भी अहम भूमिका निभाएँगे, ख़ास तौर पर उभरते बाज़ारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए। यह वाक्य भी नया नहीं है। पैराग्राफ़ 64 के पहले तीन वाक्य रियो के ऊर्जा-सुरक्षा वाले पैराग्राफ़ से अक्षरशः वही हैं।

चौथा वाक्य बदला है, और बदलाव की दिशा एक तरफ़ है। रियो में चौथा वाक्य यह था कि जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा-संक्रमण के आपसी रिश्ते को पहचानते हुए हम यूएनएफ़सीसीसी और उसके पेरिस समझौते के अनुरूप टिकाऊ आर्थिक विकास की साझा प्रतिबद्धता दोहराते हैं। दिल्ली में उसकी जगह ब्रिक्स ऊर्जा शोध सहयोग मंच और ब्रिक्स युवा ऊर्जा शिखर सम्मेलन का स्वागत है।
गिनती भी यही दिशा दिखाती है। रियो के पाठ में "Paris Agreement" दस बार आता है और "UNFCCC" ग्यारह बार। नई दिल्ली के पाठ में तीन और चार बार। "COP30" रियो में तीन बार था, यहाँ एक बार। पेरिस समझौते की प्रतिबद्धता दस्तावेज़ से ग़ायब नहीं हुई है; पैराग्राफ़ 107 उसे साफ़ शब्दों में दोहराता है और शमन, अनुकूलन, हानि-क्षति तथा विकासशील देशों को साधन मुहैया कराने की बात करता है। वह ऊर्जा वाले हिस्से से निकलकर जलवायु वाले हिस्से में सिमट गई है। ऊर्जा वाले पैराग्राफ़ 66 में जिन स्रोतों की सूची है उसमें नवीकरणीय ऊर्जा, जैव-ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन, परमाणु ऊर्जा, पनबिजली, हाइड्रोजन, कम-कार्बन तकनीकें और भंडारण तकनीकें साथ-साथ रखी गई हैं।
आख़िरी दो पैराग्राफ़ रियो के आख़िरी दो पैराग्राफ़ का भरा हुआ फ़ॉर्म हैं
पैराग्राफ़ 139 भारत की अध्यक्षता की सराहना करता है और अठारहवें शिखर सम्मेलन की मेज़बानी के लिए भारत सरकार तथा लोगों का आभार जताता है। पैराग्राफ़ 140 एक वाक्य का है: 2027 में चीन की अध्यक्षता और चीन में होने वाले उन्नीसवें शिखर सम्मेलन को पूरा समर्थन। रियो के आख़िरी दो पैराग्राफ़ भी यही दो वाक्य थे। उनमें ब्राज़ील की जगह भारत, 2025 की जगह 2026, सत्रहवें की जगह अठारहवाँ और रियो दे जनेरो की जगह नई दिल्ली रख दीजिए, पैराग्राफ़ 139 बन जाता है; भारत की जगह चीन, 2026 की जगह 2027 और अठारहवें की जगह उन्नीसवाँ रखिए, पैराग्राफ़ 140।
बीच का पैराग्राफ़ 138 संस्थागत विकास पर है और ब्रिक्स ऑनलाइन अभिलेखीय डेटाबेस की प्रगति का स्वागत करता है।
पूरे पाठ को रियो के पाठ के सामने रखकर गिनने पर आँकड़ा यह बनता है: 140 में से तेईस पैराग्राफ़ ऐसे हैं जिनमें रियो का कम से कम एक पूरा वाक्य अक्षरशः मौजूद है। उन तेईस में से इक्कीस पैराग्राफ़ 65 से पहले हैं, यानी उसी हिस्से में जो युद्ध, प्रतिबंध, आतंकवाद, सुरक्षा परिषद और ऊर्जा पर है। उसके बाद के पचहत्तर पैराग्राफ़ में सिर्फ़ दो हैं। हर साल जो हिस्सा नए सिरे से लिखा जाता है वह सहयोग की सूची है। जिस हिस्से पर सबसे ज़्यादा बातचीत होती है, वह पिछली बार की भाषा पर लौट आता है।
स्रोतप्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट: ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणापत्र का पूरा पाठ, 12 सितंबर 2026, 140 क्रमांकित पैराग्राफ़, प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट: रियो दे जनेरो घोषणापत्र, सत्रहवाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, 6-7 जुलाई 2025, तुलना के लिए पढ़ा गया पूरा पाठ, द इंडियन एक्सप्रेस, 12 सितंबर 2026 रात 10:41: घोषणापत्र 45 पन्ने का है, और यूक्रेन का ज़िक्र कहीं नहीं, द इंडियन एक्सप्रेस, शुभजीत रॉय, 13 सितंबर 2026: ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच पैराग्राफ़ 28 पर बनी सहमति, और मई 2026 की विदेश मंत्रियों की बैठक जो बिना साझा बयान के ख़त्म हुई, द इंडियन एक्सप्रेस, 12 सितंबर 2026 दोपहर 3:20: घोषणापत्र में आतंकवाद पर निंदा की रिपोर्ट, बीबीसी हिंदी, 12 सितंबर 2026 दोपहर 3:55: नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति की रिपोर्ट, द इंडियन एक्सप्रेस, 12 सितंबर 2026 शाम 5:12: कार्बन सीमा कर के विरोध और जीवाश्म ईंधन वाले वाक्य की रिपोर्ट, द इंडियन एक्सप्रेस, 12 सितंबर 2026 दोपहर 2:34: पश्चिम एशिया के युद्ध के बीच ऊर्जा प्रवाह पर घोषणापत्र की भाषा