भारत का जवाब मंच से जयशंकर ने दिया, सीट से गहलोत ने भी दिया
शुक्रवार को न्यूयॉर्क में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया, और अगले दिन शनिवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत का तय राष्ट्रीय वक्तव्य दिया। इन दोनों के बीच, उसी शनिवार शाम, भारत की एक अलग आवाज़ ने महासभा के अपने नियम के तहत औपचारिक 'जवाब देने का अधिकार' इस्तेमाल किया, मंच से नहीं अपनी सीट से।

शुक्रवार को शरीफ़ बोले, शनिवार को जयशंकर
जब कोई देश किसी दूसरे के भाषण का "जवाब" देता है, तो ठीक-ठीक क्या होता है? बीते हफ़्ते न्यूयॉर्क में यह सवाल एक तकनीकी क़वायद नहीं रहा। शुक्रवार, 25 सितंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इक्यासीवें सत्र की आम बहस को संबोधित किया, अपने शब्दों में "चौथी बार", 24 करोड़ पाकिस्तानियों की तरफ़ से। अगले दिन, शनिवार को, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपना तय राष्ट्रीय वक्तव्य दिया। उसी शनिवार शाम भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पेटल गहलोत महासभा हॉल में अपनी सीट से बोलीं, "जवाब देने के अधिकार" के तहत।
अख़बारों और वेबसाइटों ने इन तीनों को लगभग एक पंक्ति में समेट दिया: भारत ने पाकिस्तान को जवाब दिया। यह पंक्ति दो अलग चीज़ों को एक बता देती है। जयशंकर का भाषण महासभा की तय सूची में भारत का नियमित मौक़ा था, जो उसे इक्यासीवें सत्र में वैसे भी मिलना ही था, शरीफ़ ने कुछ कहा होता या नहीं। गहलोत का हस्तक्षेप कुछ और था, नियमावली में दर्ज एक ख़ास और सीमित अधिकार, जो सिर्फ़ तभी मिलता है जब कोई प्रतिनिधिमंडल उसे माँगे।
शरीफ़ ने अपने पूरे लिखित भाषण में कश्मीर पर पुरानी माँग दोहराई। "आठ दशक से कश्मीरी लोग संयुक्त राष्ट्र के उस वादे का इंतज़ार कर रहे हैं जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जनमत संग्रह का था," उन्होंने कहा। सिंधु जल संधि पर उनका वाक्य तीखा था: "Water must never be weaponized... any attempt to stop, impede, or divert Pakistan's share of the waters will be treated as an act of war." यानी पानी को हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए, और पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकना युद्ध की कार्रवाई मानी जाएगी। भारत की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने "RSS-driven Hindutva ideology" को धार्मिक नफ़रत भड़काने की वजह बताया, और सहारनपुर में हाल ही में गिराई गई एक 150 साल पुरानी मस्जिद का हवाला दिया।
अगले दिन जयशंकर ने अपने वक्तव्य में पाकिस्तान का नाम एक बार भी नहीं लिया। पर एक पंक्ति बिल्कुल साफ़ थी: "Yesterday, a serial practitioner of terrorism misrepresented facts before this Assembly. Arguments were invoked to normalise terrorism and claim immunity from its consequences." यानी कल इस सभा के सामने आतंकवाद के एक जाने-पहचाने अभ्यासी ने तथ्य तोड़-मरोड़े, और उसे सामान्य बनाने की कोशिश की। "कल" शब्द ख़ुद शुक्रवार की तरफ़ इशारा है। संयुक्त राष्ट्र की अपनी मीटिंग्स कवरेज ने भी इसे लगभग उसी भाषा में दर्ज किया। भारत के विदेश मंत्रालय का अपना बयान-पन्ना इस रिपोर्ट के लिए सीधे नहीं पढ़ा जा सका, क्योंकि वह पूरी तरह जावास्क्रिप्ट पर टिका है और किसी भी पते पर एक जैसा ख़ाली ढाँचा लौटाता है। इसलिए यहाँ जयशंकर के वाक्य एएनआई, द प्रिंट और डीडी न्यूज़, तीन स्वतंत्र स्रोतों से मिलाकर दर्ज हैं।
यह भी दर्ज करने लायक़ है कि जयशंकर का यह मौक़ा इक्यासीवें सत्र की आम बहस के आख़िरी दिन आया। इस डेस्क की अपनी 22 सितंबर की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी थी कि यह बहस मंगलवार से शुरू होकर शनिवार, 26 सितंबर तक चलेगी, और उसके बाद सिर्फ़ एक औपचारिक बैठक 28 सितंबर को बचेगी। भारत की बारी पाँच दिन की बहस में सबसे आख़िर में आई।
जयशंकर के भाषण में पाकिस्तान पर निशाना, नाम लिए बिना
जयशंकर के अगले वाक्य और सीधे थे। "Friendship and goodwill cannot co-exist with terrorism. And understandings premised on that will naturally be called into question," उन्होंने कहा, यानी दोस्ती और सद्भावना आतंकवाद के साथ नहीं रह सकते, और इस पर टिकी समझ अपने आप सवालों में आ जाएगी। इसके फ़ौरन बाद: "It is for the perpetrator of terrorism to mend its ways." आतंकवाद करने वाले को ही अपना रवैया बदलना होगा। यह पूरा हिस्सा उनके तय वक्तव्य का था, मंच से बोला गया, बिना किसी समय-सीमा के, भारत के अपने महासभा-कोटे के भीतर।
भाषण का बाक़ी हिस्सा कहीं व्यापक था। संयुक्त राष्ट्र की मीटिंग्स कवरेज के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखने में नाकामी सिर्फ़ सुरक्षा को कमज़ोर नहीं करती, बल्कि एक भूमंडलीकृत दुनिया में विकास की रफ़्तार भी धीमी करती है। जो देश किसी लड़ाई से दूर हैं, वे भी उसकी क़ीमत चुका रहे हैं, उन्होंने कहा। जिन पर असर सबसे ज़्यादा पड़ता है, उनकी बात सबसे कम सुनी जाती है। यह उनकी शिकायत की जड़ थी। ख़ाड़ी में जारी टकराव पर उन्होंने संयम और नागरिकों की सुरक्षा की अपील की, और व्यापारिक जहाज़ों तथा नाविकों को निशाना बनाए जाने को "unacceptable" बताया।
एक जुमला उनके भाषण की धुरी बन गया: "everything is being weaponized", यानी हर चीज़ का हथियारीकरण। वित्त और बाज़ार-पहुँच से लेकर आपूर्ति शृंखला और तकनीक तक, हर जगह अति-प्रतिस्पर्धा की मानसिकता घर कर रही है, उन्होंने कहा, जिसमें संस्थाएँ कमज़ोर पड़ रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर उनका रुख़ था कि हर देश को अपने मॉडल और अपनी तैनाती-रणनीति ख़ुद तय करने का हक़ है, इसी याद के साथ कि भारत ने फ़रवरी में अपना एआई इम्पैक्ट समिट आयोजित किया था। भाषण का समापन उन्होंने महात्मा गांधी की उस पंक्ति से किया जो संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उनकी प्रतिमा पर खुदी है: "There is no path to peace. Peace is the path." शांति की ओर कोई अलग रास्ता नहीं, शांति ख़ुद रास्ता है।
शरीफ़ का ज़िक्र भाषण में यहीं ख़त्म हो जाता है। असली "जवाब देने का अधिकार" अभी बाक़ी था। वह किसी मंत्री ने नहीं दिया।
जवाब देने के अधिकार का नियम, महासभा की अपनी किताब में
महासभा की प्रक्रिया-नियमावली में "जवाब देने का अधिकार" एक अलग, गिना-चुना प्रावधान है, कोई ढीली परंपरा नहीं। नियम 73 की भाषा सीधी है: "During the course of a debate, the President may announce the list of speakers and, with the consent of the General Assembly, declare the list closed. He may, however, accord the right of reply to any member if a speech delivered after he has declared the list closed makes this desirable." यानी बहस के दौरान अध्यक्ष वक्ताओं की सूची बंद घोषित कर सकते हैं, पर अगर सूची बंद होने के बाद दिया गया कोई भाषण ऐसा करना ज़रूरी बना दे, तो वे किसी सदस्य को जवाब देने का अधिकार दे सकते हैं। यह अधिकार अपने आप में बहस का हिस्सा नहीं है। यह एक अपवाद है, जो किसी और के भाषण की वजह से बनता है।
नियम 73 सिर्फ़ यह बताता है कि यह अधिकार मिल सकता है। कितनी बार, कितनी देर, कैसे: यह ख़ुद नहीं कहता। यह तय होता है महासभा के एक पुराने फ़ैसले से: दशक संख्या 34/401, जो नियमावली के अनुबंध पाँच में दर्ज है और 1979 में चार अलग बैठकों में पारित हुआ था। अनुबंध पाँच का खंड "एफ़" सीधे "जवाब देने के अधिकार" के नाम से है। इसके चार पैराग्राफ़ ही असल जवाब हैं।
पहला पैराग्राफ़: यह अधिकार "दिन के अंत में" इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ख़ासकर जब उसी दिन एक ही विषय पर दो बैठकें हुई हों। दूसरा, और सबसे तीखा: "The number of interventions in the exercise of the right of reply for any delegation at a given meeting should be limited to two per item." यानी किसी एक बैठक में, किसी एक विषय पर, हर प्रतिनिधिमंडल को सिर्फ़ दो मौक़े मिलते हैं। तीसरा इसकी घड़ी तय करता है। पहला हस्तक्षेप ज़्यादा से ज़्यादा दस मिनट का हो सकता है। दूसरा सिर्फ़ पाँच मिनट का। चौथा प्रावधान बताता है कि यह भाषण कहाँ से दिया जाता है। मत की व्याख्या और प्रक्रियागत प्रस्तावों की तरह, जवाब देने का अधिकार भी प्रतिनिधिमंडल अपनी सीट से इस्तेमाल करते हैं, हॉल के बीचोंबीच बने उस ऊँचे मंच पर गए बिना, जहाँ मंत्री और राष्ट्राध्यक्ष बोलते हैं।

इसी आख़िरी पंक्ति में असल फ़र्क़ छिपा है। शरीफ़ और जयशंकर, दोनों उस मंच पर गए जहाँ हर साल क़रीब दो सौ भाषण होते हैं।
गहलोत नहीं गईं।
वे भारत की सीट पर बैठी रहीं, और वहीं से बोलीं। पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने भी अपना जवाब उसी तरह दिया, सीट से। यह कोई औपचारिकता नहीं है। नियम की भाषा में मंच और सीट का यह फ़र्क़ जान-बूझकर रखा गया है। मक़सद साफ़ है। आम बहस का मंच सिर्फ़ तय सूची के वक्ताओं का रहे, और नोक-झोंक उससे बाहर, किनारे पर बनी रहे।
सीट से दिया गया जवाब: गहलोत और सलीम के अपने शब्द
गहलोत का हस्तक्षेप संयुक्त राष्ट्र की अपनी वेबसाइट gadebate.un.org पर "First Declaration" के नाम से दर्ज है, तारीख़ 26 सितंबर 2026, पन्ने के अपने कोडेड डेटा में। पाकिस्तान की तरफ़ से भी ठीक उसी तारीख़ की एक "First Declaration" दर्ज है। संयुक्त राष्ट्र दोनों के साथ यह भी लिखता है कि यह पाठ स्वचालित रूप से तैयार किया गया प्रतिलेख है, इसमें ग़लतियाँ हो सकती हैं। यह कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। यह वही सीमा है। इस डेस्क ने इसे अपनी पिछली रिपोर्टों में भी दर्ज किया है।

गहलोत की शुरुआत ख़ुद बताती है कि पाकिस्तान पहले बोला: "This afternoon, the General Assembly heard some bizarre remarks from the representative of Pakistan." इसके बाद उन्होंने 11 सितंबर 2001 के हमले की 25वीं बरसी का ज़िक्र किया। उसका सरग़ना, उन्होंने कहा, पाकिस्तानी फ़ौज की एक बड़ी अकादमी की चौखट पर रह रहा था। कश्मीर पर उनका वाक्य था: "This is an integral and inalienable part of my country and will always remain so." पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर की तरफ़ पलटते हुए उन्होंने रावलाकोट का ज़िक्र किया, वहाँ की हिंसा और अधिकारों से इनकार का। उन्होंने पाकिस्तान के "27th amendment" का भी हवाला दिया, और उसके एक "real ruler" को मिली "lifelong immunity" का। यह उनका अपना आरोप है। इसे स्वतंत्र रूप से जाँचा नहीं गया। आख़िर में उनका वाक्य था: "Our right to defend ourselves against terrorism will be exercised, and continued terrorism by Pakistan will have consequences."
पाकिस्तान की जवाबी घोषणा उतनी ही तीखी थी, काउंसलर साइमा सलीम के नाम दर्ज। "It exports terrorism and violence while trying to import victimhood and sympathy," उन्होंने भारत के बारे में कहा। सदी की शुरुआत से पाकिस्तान ने आतंकवाद में लगभग एक लाख जानें गँवाई हैं, उन्होंने दावा किया। कश्मीर पर उनका वाक्य ठीक उलटा था: "Jammu and Kashmir never was, neither is, nor will ever be integral part of India." उन्होंने कुलभूषण जाधव और निखिल गुप्ता के मामलों का हवाला दिया। भारत के आतंकवाद-निर्यात, उनके शब्दों में, "regional to global" हो चुके हैं।
दोनों बयान एक-दूसरे को सीधे काटते हैं। यह रिपोर्ट यह तय करने के काम में नहीं है कि कौन सही है। दोनों तरफ़ के दावे यहाँ उन्हीं के नाम दर्ज हैं। नियम 73 और अनुबंध पाँच की भावना भी यही माँगती है, जवाब दर्ज हो, बहस का फ़ैसला अध्यक्ष या सचिवालय का काम नहीं।
रूस ने सुरक्षा परिषद में भारत-ब्राज़ील का समर्थन किया, जर्मनी-जापान का विरोध
शनिवार को उसी आम बहस में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी भाषण दिया। रूस के विदेश मंत्रालय की अपनी वेबसाइट, mid.ru, इस रिपोर्ट के लिए सीधे नहीं पढ़ी जा सकी। उसने एक स्वचालित बॉट-जाँच खड़ी कर दी, कैप्चा समेत, जिसे यह डेस्क पार करने की कोशिश नहीं करता। इसलिए यहाँ भरोसा संयुक्त राष्ट्र की अपनी मीटिंग्स कवरेज पर किया गया है, जो लावरोव के भाषण को उसी दिन दर्ज करती है, और यह भी साफ़ लिखती है कि यह उसका अपना अंग्रेज़ी रूपांतरण है, रूसी में दिए मूल भाषण का सीधा पाठ नहीं।
सुरक्षा परिषद सुधार पर उनकी बात एक ख़ास बिंदु पर टिकी थी। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड के मुताबिक़ लावरोव ने पश्चिमी देशों के लिए नई सीटों को ख़ारिज करते हुए ख़ासतौर पर जर्मनी और जापान का नाम लिया, जो उनके शब्दों में "embarked on a path of militarisation and revanchism" हैं, यानी सैन्यीकरण और बदले की राजनीति की राह पर निकल चुके हैं। इसके बदले उन्होंने ब्राज़ील और भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का समर्थन किया, साथ ही अफ़्रीक़ी महाद्वीप के हितों को पूरा करने की बात भी कही।
यह चार देशों, भारत, ब्राज़ील, जर्मनी और जापान, को एक साथ गिनने वाला पुराना खाँचा तोड़ता है। ये चारों देश सालों से एक-दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते आए हैं, राजनयिक भाषा में जिन्हें "जी4" कहा जाता है, और सुधार-प्रक्रिया के हर दस्तावेज़ में साथ दिखते हैं। रूस का शनिवार का बयान ठीक इसी चौकड़ी को बीच से काटता है, दो को हाँ कहकर, दो को ना। यह विभाजन नया नहीं है। रूस बरसों से यही रुख़ रखता आया है। पर इसे किन शब्दों में कहा गया, वह हर बार मायने रखता है, क्योंकि कई माध्यमों में यही बयान बिना उद्धरण चिह्न के, ढीले पैराफ़्रेज़ में छपता है, जिसमें "militarisation" और "revanchism" जैसे तीखे मूल शब्द अक्सर गुम हो जाते हैं।
अपने बाक़ी भाषण में लावरोव ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिकी हिरासत पर एतराज़ जताया, ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की हत्या को "an unacceptable manifestation of coercive dictate" बताया, और यूक्रेन में रूस के "special military operation" को अंत तक ले जाने की बात दोहराई। इनमें से कोई भी हिस्सा सीधे भारत या सुरक्षा परिषद सुधार से नहीं जुड़ता। इसलिए यह रिपोर्ट उन पर नहीं रुकती।
सुरक्षा परिषद सुधार पर बातचीत जून के बाद आगे नहीं बढ़ी
लावरोव का समर्थन, या किसी और देश का, सुरक्षा परिषद में सीटें अपने आप नहीं जोड़ता। यह बदलाव सिर्फ़ चार्टर में संशोधन से होता है, और उसका रास्ता एक अलग, धीमी प्रक्रिया से गुज़रता है, जिसे "अंतर-सरकारी वार्ता" यानी IGN कहा जाता है। यह 2009 से चल रही है, दो राजदूतों की सह-अध्यक्षता में, फ़िलहाल नीदरलैंड की लीज़ ख़्रेख़ोरे-फ़ान हारेन (Lise Gregoire-van Haaren) और कुवैत के तारिक़ अल-बनाई (Tareq Albanai)।
इस प्रक्रिया की आख़िरी बैठक 15 और 16 जून 2026 को हुई, अस्सीवें सत्र की छठी IGN बैठक। उसमें सदस्य देशों ने सह-अध्यक्षों के "संशोधित तत्व-पत्र" पर बात की, जो 10 जून 2026 की एक चिट्ठी से भेजा गया था। सह-अध्यक्षों ने ख़ुद 30 जून 2026 को महासभा अध्यक्ष को लिखी अपनी चिट्ठी में जो कहा, वह साफ़ है: इस सत्र का काम इक्यासीवें सत्र में "rolled over" किया जाए, यानी जहाँ छोड़ा गया वहीं से आगे बढ़ाया जाए। यह नतीजे की भाषा नहीं है।
चिट्ठी एक उपलब्धि भी गिनाती है। अफ़्रीक़ी संघ ने इस सत्र में अपना खाका पेश किया, जो "इज़ुलविनी सहमति" पर टिका है। इस पर प्रतिक्रिया में जापान, ब्राज़ील, जर्मनी और भारत, यानी वही "जी4", ने इसे "महत्वपूर्ण क़दम" बताया, पर साथ ही यह भी कहा कि यह प्रक्रिया लगातार एक और साल सुधार को लेकर व्यापक उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। सह-अध्यक्षों ने ख़ुद 1960 के दशक के बाद पहली बार सुधार के लिए "स्पष्ट पैमानों" पर सहमति बनने को एक उपलब्धि बताया, जो 2024 में अपनाए गए "भविष्य के लिए समझौते" से निकली है। यह असल प्रगति है।

संयुक्त राष्ट्र के अपने सुधार-पन्ने पर, जहाँ हर IGN बैठक और चिट्ठी दर्ज होती है, इक्यासीवें सत्र के लिए अब तक कोई नई बैठक या तारीख़ दर्ज नहीं है। यानी शनिवार, 26 सितंबर तक, जिस दिन लावरोव ने भारत और ब्राज़ील का नाम लिया, प्रक्रिया वहीं खड़ी थी जहाँ जून में छोड़ी गई थी। नए सत्र की IGN बैठकें आम तौर पर बाद में शुरू होती हैं, इसमें कुछ असामान्य नहीं। पर इसका मतलब यह भी है कि लावरोव का बयान किसी जारी बहस में हस्तक्षेप नहीं था। यह एक ठहरी हुई प्रक्रिया के बारे में एक बयान भर था।
एक ही घटना, अख़बारों में दो अलग तारीख़ें
गहलोत और सलीम के जवाबों को लेकर एक आख़िरी गड़बड़ी दर्ज करनी ज़रूरी है। इस हस्तक्षेप को कई जगह 25 सितंबर की तारीख़ के साथ रिपोर्ट किया गया, यानी शरीफ़ के भाषण वाला दिन। पाकिस्तान के अपने सरकारी रेडियो, रेडियो पाकिस्तान की वेबसाइट पर छपी रिपोर्ट का पता ख़ुद बताता है कि उसने इसे सही तारीख़, 26 सितंबर, के साथ दर्ज किया था। संयुक्त राष्ट्र का अपना, संरचित रिकॉर्ड भी यही कहता है। दोनों घोषणाएँ 26 सितंबर की हैं, ठीक उसी दिन की जब जयशंकर और लावरोव बोले। गहलोत के अपने पहले वाक्य में "this afternoon" शब्द भी इसी तारीख़ की पुष्टि करता है। फ़र्क़ एक दिन का लगता है, मामूली।
पर यही वह ग़लती है जिसकी तरफ़ यह पूरी रिपोर्ट इशारा करती है। जो लिखा जाता है, वह अक्सर उस दिन की तारीख़ ओढ़ लेता है जिस दिन मुख्य ख़बर बनी थी, न कि उस दिन की जब असल हस्तक्षेप हुआ। शरीफ़ का भाषण शुक्रवार की ख़बर थी। इसलिए उसका जवाब भी शुक्रवार का मान लिया गया, जबकि नियम ख़ुद कहता है कि यह अगले दिन की बैठक के अंत में भी दिया जा सकता है। नियम की किताब पढ़ना, इस एक फ़र्क़ को पकड़ने का भी तरीक़ा है।
स्रोतgadebate.un.org: पाकिस्तान का पन्ना, शहबाज़ शरीफ़ के भाषण की संयुक्त राष्ट्र मीटिंग्स कवरेज, लिखित पाठ का लिंक, और 'जवाब देने का अधिकार' टैब में पाकिस्तान की अपनी घोषणा, संयुक्त राष्ट्र: शहबाज़ शरीफ़ के भाषण का लिखित पाठ, 25 सितंबर 2026, नौ पन्ने, gadebate.un.org: भारत का पन्ना, एस. जयशंकर के भाषण की मीटिंग्स कवरेज, और 'जवाब देने का अधिकार' टैब में भारत की अपनी घोषणा, दोनों 26 सितंबर 2026 को दर्ज, gadebate.un.org: रूसी संघ का पन्ना, सर्गेई लावरोव के भाषण की मीटिंग्स कवरेज, 26 सितंबर 2026, संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रक्रिया-नियमावली, A/520/Rev.20: नियम 73 (जवाब देने का अधिकार) और अनुबंध पाँच, दशक 34/401, खंड एफ़, पैराग्राफ़ 8-11, अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) के सह-अध्यक्षों की महासभा अध्यक्ष को चिट्ठी, 30 जून 2026, संयुक्त राष्ट्र: सुरक्षा परिषद सुधार पर आधिकारिक पन्ना, 27 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, इक्यासीवें सत्र की कोई नई बैठक दर्ज नहीं, एएनआई, 26 सितंबर 2026: जयशंकर के भाषण का ब्योरा, द प्रिंट, 26-27 सितंबर 2026: जयशंकर के भाषण के उद्धरण, डीडी न्यूज़: जयशंकर के भाषण का ब्योरा, भारत पन्ना, 25 सितंबर 2026 — इसी डेस्क की अपनी पिछली रिपोर्ट, जिसमें फ़लस्तीन के रियाद मंसूर के 'जवाब देने के अधिकार' के इस्तेमाल का ज़िक्र बिना नियम बताए आया था, भारत पन्ना, 22 सितंबर 2026 — इसी डेस्क की अपनी रिपोर्ट, इक्यासीवें सत्र की आम बहस के कार्यक्रम पर, बहस मंगलवार से शनिवार 26 सितंबर तक चलने की पुष्टि सहित