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त्रिपुरा से यूरोप गया जैविक चावल अठारह टन है, यानी एक ट्रक भर

एपीडा की विज्ञप्ति कहती है कि किसानों को घरेलू भाव से चालीस फ़ीसदी तक ज़्यादा मिलने की उम्मीद है। जिस बाज़ार में यह खेप गई है, वहाँ भारतीय चावल की खेपें पिछले पाँच साल में दो सौ से ज़्यादा बार रोकी जा चुकी हैं।

त्रिपुरा से यूरोप गया जैविक चावल अठारह टन है, यानी एक ट्रक भर

2 सितंबर 2026 को त्रिपुरा से चार क़िस्मों का जैविक चावल ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड के लिए रवाना हुआ।

मात्रा 18 मीट्रिक टन है।

एक भरा हुआ ट्रक लगभग इतना ही ढोता है।

विज्ञप्ति क्या कहती है

चावल राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम से प्रमाणित है, जिसे संक्षेप में एनपीओपी कहा जाता है। खेप कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, यानी एपीडा, की पहल पर गई है।

विज्ञप्ति में एक उम्मीद दर्ज है। इस अवसर से शामिल किसानों को घरेलू बाज़ार के मुक़ाबले 40 फ़ीसदी तक ज़्यादा मूल्य मिलने की उम्मीद है।

कितने किसान शामिल हैं, यह नहीं लिखा। कितनी ज़मीन से यह चावल आया, यह भी नहीं। और 40 फ़ीसदी किस भाव पर, यह भी नहीं।

त्रिपुरा का एक धान का खेत
तस्वीर: सोमन, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.5

अब उस बाज़ार को देखिए

यूरोपीय संघ में खाना बेचना मुश्किल है, और मुश्किल की जड़ एक संख्या में है।

जिन कीटनाशकों की यूरोपीय संघ में इजाज़त नहीं है, उनके लिए वहाँ एक डिफ़ॉल्ट अधिकतम अवशेष सीमा लागू होती है। वह सीमा 0.01 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम है।

यह इतनी नीची है कि व्यवहार में इसे शून्य सहनशीलता माना जाता है। यानी अगर वह रसायन पकड़ में आया, तो खेप रुक जाती है।

अब इसे भारतीय हालात के साथ रखिए। जो कीटनाशक यहाँ पंजीकृत और क़ानूनी हैं, ज़रूरी नहीं कि वे वहाँ पंजीकृत हों। भारत में उनका इस्तेमाल जायज़ है, और यूरोप में उनके लिए सीमा लगभग शून्य है।

और यह हो चुका है

यूरोपीय संघ की एक व्यवस्था है जिसे खाद्य और चारे के लिए त्वरित चेतावनी प्रणाली कहते हैं। जब कोई खेप जाँच में फँसती है, वहाँ उसकी सूचना दर्ज होती है।

पिछले पाँच साल में भारतीय चावल की खेपों के ख़िलाफ़ दो सौ से ज़्यादा ऐसी चेतावनियाँ दर्ज हुई हैं। इनमें जो नाम बार-बार आते हैं, वे ट्राइसाइक्लाज़ोल और थायमेथॉक्सम जैसे कीटनाशक हैं।

ग़ैर-बासमती चावल की खेपों के मामले में यह तेज़ी से बढ़ा है। 2020 में तीन मामले थे। 2024 में सैंतीस।

⚠ ये आँकड़े यूरोपीय प्रणाली के हवाले से छपी रिपोर्टों से लिए गए हैं। हम प्रणाली के अपने डेटाबेस से इन्हें नहीं मिला सके, इसलिए इन्हें उसी तरह पढ़ा जाए।

0.01 मिलीग्रामप्रति किलो, यूरोप में उन कीटनाशकों की सीमा जो वहाँ पंजीकृत नहीं हैं

जैविक होना अलग बात है

यहाँ एक फ़र्क़ है जो अक्सर मिला दिया जाता है।

जैविक प्रमाणन यह कहता है कि खेती में रासायनिक कीटनाशक और उर्वरक इस्तेमाल नहीं हुए। यह प्रक्रिया का प्रमाण है।

अवशेष सीमा उत्पाद की जाँच है। वह यह देखती है कि दाने में क्या मिला।

दोनों अलग हैं, और जैविक खेप भी अवशेष जाँच में फँस सकती है। वजह ज़रूरी नहीं कि किसान हो। पड़ोस के खेत से बहाव, साझा गोदाम, साझा ट्रक, या प्रसंस्करण की जगह पर मिलावट, इनमें से कुछ भी हो सकता है।

इसलिए जैविक प्रमाणपत्र इस जोखिम को कम करता है, ख़त्म नहीं करता।

काग़ज़ की तरफ़

यूरोपीय आयोग ने एनपीओपी को अपने जैविक नियमन के बराबर मान्यता दी है, बिना प्रसंस्करण वाले वनस्पति उत्पादों के लिए।

यह बड़ी सुविधा है। इसका मतलब है कि भारतीय जैविक चावल को यूरोप में अलग से प्रमाणन नहीं कराना पड़ता।

पर यह पूरी छूट नहीं है। मान्यता एक श्रेणी तक है, हर उत्पाद तक नहीं। और हर खेप के साथ एक लेनदेन प्रमाणपत्र लगता है, जो उसी खेप के लिए जारी होता है।

इसके अलावा ख़रीदार अवशेष जाँच की रिपोर्ट माँगते हैं, और खेत से बंदरगाह तक का ब्योरा भी।

यानी 18 टन के पीछे भी उतना ही काग़ज़ चलता है जितना बड़ी खेप के पीछे।

तो यह ख़बर क्यों है

यह ख़बर इसलिए नहीं है कि 18 टन बड़ी मात्रा है। वह छोटी है।

यह इसलिए है कि यह पहली सीढ़ी जैसी चीज़ है। त्रिपुरा से यूरोप तक जैविक चावल की एक कड़ी बनी है, और उसमें प्रमाणन, लेनदेन प्रमाणपत्र और जाँच, तीनों काम कर गए।

अगली बात देखने लायक़ यह होगी कि दूसरी खेप कब जाती है और कितनी बड़ी होती है। और वह 40 फ़ीसदी वाली उम्मीद किसान के हाथ में सचमुच पहुँची या नहीं।

विज्ञप्ति में इनमें से किसी का जवाब नहीं है, क्योंकि अभी हो ही नहीं सकता।

स्रोतवाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, एपीडा की विज्ञप्ति, एपीडा, राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम, यूरोपीय आयोग, खाद्य एवं चारा के लिए त्वरित चेतावनी प्रणाली

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।