रक्षा परिषद ने इस साल जितनी ख़रीद मंज़ूर की, उतना पैसा पूरे साल के बजट में है ही नहीं
सोमवार को 1.10 लाख करोड़ की मंज़ूरी मिली, मार्च में 2.38 लाख करोड़ की। इस साल पूँजीगत अधिग्रहण का पूरा बजट 1.85 लाख करोड़ का है। विरोधाभास नहीं है, क्योंकि यह मंज़ूरी ख़रीद नहीं है।

सोमवार शाम की सुर्ख़ियाँ एक जैसी थीं: रक्षा मंत्रालय ने 1.10 लाख करोड़ रुपये की ख़रीद को मंज़ूरी दी।
रक्षा मंत्रालय की अपनी विज्ञप्ति में जो लिखा है, वह थोड़ा अलग है।
उसका पहला वाक्य कहता है कि रक्षा अधिग्रहण परिषद ने प्रस्तावों को "आवश्यकता की स्वीकृति" दी, और फिर कोष्ठक में उसका अर्थ भी समझा देता है: सैद्धांतिक प्रशासनिक मंज़ूरी।
ये दोनों वाक्य एक बात नहीं कहते। पहला ख़रीद की बात करता है, दूसरा इरादे की।
सबसे तेज़ जाँच अंकगणित से होती है
इस फ़र्क़ को साबित करने के लिए किसी विशेषज्ञ की ज़रूरत नहीं। जोड़-घटाव पर्याप्त है।
इसी साल मार्च में रक्षा अधिग्रहण परिषद की एक बैठक हुई थी जिसमें 2.38 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों को यही स्वीकृति मिली थी।
सोमवार को 1.10 लाख करोड़ के प्रस्तावों को मिली।
दो बैठकें, कुल 3.48 लाख करोड़।
अब बजट देखिए। वित्त वर्ष 2026-27 में रक्षा बलों के लिए पूँजीगत मद में 2.19 लाख करोड़ रुपये से कुछ ज़्यादा रखे गए हैं, और उनमें से पूँजीगत अधिग्रहण के लिए 1.85 लाख करोड़।
यानी साल भर में नए साज़ो-सामान की ख़रीद पर जितना ख़र्च हो सकता है, उससे लगभग दोगुनी रक़म की मंज़ूरी दो बैठकों में दी जा चुकी है।
अगर यह मंज़ूरी ख़रीद होती तो यह हिसाब बैठता ही नहीं। यह बैठता है क्योंकि यह ख़रीद नहीं है।
तो यह मंज़ूरी है किस चीज़ की

आवश्यकता की स्वीकृति एक लंबी प्रक्रिया का पहला औपचारिक क़दम है।
इसका मतलब यह है कि सेना ने कोई ज़रूरत बताई, मंत्रालय ने उसे वाजिब माना, और यह तय कर दिया कि यह ख़रीद किस रास्ते से होगी। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में कई श्रेणियाँ हैं, और स्वीकृति के साथ यह भी तय होता है कि प्रस्ताव किस श्रेणी में जाएगा, यानी सामान भारत में बनेगा, बाहर से आएगा, या दोनों के मेल से।
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 में ये श्रेणियाँ क्रम से रखी गई हैं, और उनका क्रम अपने आप एक नीति है। सबसे ऊपर वह श्रेणी है जिसमें उपकरण भारत में डिज़ाइन, विकसित और निर्मित हो। उसके नीचे वह जिसमें वह भारत में बने पर डिज़ाइन बाहर का हो। सबसे नीचे सीधी विदेशी ख़रीद।
नियम यह है कि प्रस्ताव को पहले ऊपर वाली श्रेणियों में परखा जाए, और नीचे तभी उतरा जाए जब ऊपर कोई विकल्प न मिले। इसीलिए स्वीकृति के साथ श्रेणी तय होना मामूली बात नहीं है, उसी से यह तय हो जाता है कि अगले कई साल किस तरह के दावेदार इस दौड़ में रहेंगे।
इसके बाद जो होना है वह यह है।
मंत्रालय निविदा जारी करता है। कंपनियाँ बोली लगाती हैं। उनके उपकरणों का मैदानी परीक्षण होता है, जो भारत में गर्मी, सर्दी और ऊँचाई तीनों में कराया जाता है। जो खरे उतरते हैं उनकी तकनीकी जाँच होती है। फिर व्यावसायिक बोलियाँ खुलती हैं और सबसे कम बोली वाले के साथ क़ीमत पर बातचीत होती है।
उसके बाद प्रस्ताव मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति के पास जाता है, जो अंतिम मंज़ूरी देती है।
तब जाकर अनुबंध पर दस्तख़त होते हैं। और भुगतान उसके बाद, क़िस्तों में, कई सालों में।
इसमें कितना वक़्त लगता है
यही वह सवाल है जिसका जवाब सुर्ख़ियों में नहीं आता।
बड़े रक्षा सौदों में स्वीकृति से अनुबंध तक का सफ़र आम तौर पर कई साल का होता है। मैदानी परीक्षण अपने आप में कई मौसमों में फैलते हैं, क्योंकि एक ही उपकरण को लद्दाख की ठंड और राजस्थान की गर्मी दोनों में परखा जाता है।
और हर स्वीकृति अनुबंध तक नहीं पहुँचती।
कुछ प्रस्ताव इसलिए रुक जाते हैं कि परीक्षण में कोई भी दावेदार शर्तें पूरी नहीं करता। कुछ इसलिए कि क़ीमत बजट से बाहर निकल जाती है। कुछ इसलिए कि ज़रूरत ख़ुद बदल जाती है, क्योंकि तब तक तकनीक आगे बढ़ चुकी होती है।
संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने इस अंतर पर बार-बार ध्यान दिलाया है। उसकी एक रिपोर्ट में दर्ज है कि 2021-22 और 2022-23 में, दिसंबर 2022 तक, उनतीस मामलों में क़रीब 60,679 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई थी।
स्वीकृति और अनुबंध की गिनती अलग-अलग रखी जाती है, और यही इस बात का सबूत है कि दोनों एक चीज़ नहीं हैं।
इसी समिति ने एक और बात कई बार दर्ज की है। सेना के पास मौजूद साज़ो-सामान का बड़ा हिस्सा पुराना है, और आधुनिकीकरण की रफ़्तार उस हिस्से को घटाने के लिए पर्याप्त नहीं रही। यह टिप्पणी एक रिपोर्ट की नहीं, कई रिपोर्टों की है।
इन दोनों बातों को साथ रखिए तो तस्वीर बनती है। मंज़ूरियाँ बड़ी संख्या में दी जा रही हैं, और सामान उस रफ़्तार से नहीं पहुँच रहा। बीच का जो हिस्सा है, वही असली समस्या है, और वही सबसे कम गिना जाता है।
एक रास्ता जो इस प्रक्रिया से बाहर जाता है

यहाँ एक अपवाद बताना ज़रूरी है, क्योंकि उसके बिना तस्वीर अधूरी रहेगी।
सरकार के पास आपातकालीन ख़रीद का अधिकार है। सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद इसका इस्तेमाल हुआ है, और उसमें यह पूरी लंबी प्रक्रिया छोटी कर दी जाती है। तय समय में सीमित मात्रा में सामान सीधे ख़रीदा जाता है।
यह रास्ता तेज़ है, पर वह स्थायी हल नहीं है। उसमें मात्रा सीमित रहती है और क़ीमत पर मोलभाव की गुंजाइश कम। इसीलिए वह ज़रूरत के वक़्त का इंतज़ाम है, आधुनिकीकरण का तरीक़ा नहीं।
आम ख़रीद उसी लंबे रास्ते से होती है जिसका पहला क़दम सोमवार को उठा।
सोमवार को किन चीज़ों को स्वीकृति मिली
विज्ञप्ति में सूची दी गई है, और उसे पढ़ना अपने आप में जानकारीपूर्ण है।
थल सेना के लिए रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु टोही वाहनों की स्वीकृति मिली। ये वाहन उन इलाक़ों का पता लगाने, पहचान करने और उन्हें चिह्नित करने के काम आते हैं जहाँ ऐसे तत्वों का असर हो।
उच्च गतिशीलता वाले वाहन मंज़ूर हुए, जो मुश्किल इलाक़ों में रसद पहुँचाने के लिए हैं।
स्वचालित यांत्रिक बारूदी सुरंग बिछाने वाले वाहन मंज़ूर हुए। ये कठिन भू-भाग में तेज़ी से सुरंगें बिछाने के लिए हैं, और इनका मक़सद वही काम मशीन से कराना है जो अब तक हाथ से होता आया है।
उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर मंज़ूर हुए, जो थल सेना और वायु सेना दोनों के लिए हैं।
ट्रॉल टैंक और सर्वत्र ब्रिज सिस्टम मंज़ूर हुए, जो लड़ाकू दस्तों को नदी-नाले पार कराने के काम आते हैं।
नौसेना वाली दो चीज़ें अलग हैं

नौसेना के लिए जो दो प्रस्ताव मंज़ूर हुए, उनकी शब्दावली बाक़ी से अलग है, और वह फ़र्क़ मायने रखता है।
अरुध्रा रडार और मरीन गैस टर्बाइन, दोनों के लिए विज्ञप्ति कहती है कि स्वीकृति "डिज़ाइन एवं विकास और उसके बाद उनकी ख़रीद" के लिए दी गई है।
यानी ये चीज़ें अभी बनी नहीं हैं। पहले इन्हें बनाया जाएगा, फिर ख़रीदा जाएगा।
अरुध्रा रडार नौसैनिक हवाई अड्डों पर लगे मौजूदा एयर रूट सर्विलांस रडार की जगह लेगा। मरीन गैस टर्बाइन युद्धपोतों को चलाने वाली प्रणाली है, और विज्ञप्ति में इसका मक़सद साफ़ लिखा है: विदेशी विक्रेताओं पर निर्भरता घटाना।
यह दूसरा वाला मामला ख़ास तौर पर लंबा चलेगा। युद्धपोत का इंजन बनाना उन कुछ तकनीकों में है जिन पर दुनिया के गिने-चुने देशों का क़ब्ज़ा है, और उसे विकसित करने में एक दशक लग सकता है।
तो इस स्वीकृति और उस टर्बाइन के किसी जहाज़ में लगने के बीच जो दूरी है, वह सालों की नहीं, शायद दशकों की है।
और यही इस मामले की सबसे अहम बात भी है। भारत के ज़्यादातर बड़े युद्धपोत विदेशी गैस टर्बाइन से चलते हैं। इसका मतलब यह है कि उनके रखरखाव, कल-पुर्ज़ों और उन्नयन के लिए भारत को हर बार बाहर देखना पड़ता है, और यह निर्भरता किसी भी तनाव के दौर में एक कमज़ोरी बन जाती है।
इसलिए यह स्वीकृति जिस चीज़ की है, वह ख़रीद से बड़ी है। यह एक क्षमता खड़ी करने का फ़ैसला है, और ऐसे फ़ैसलों का हिसाब रुपयों में नहीं, सालों में लगता है।
संख्या का मतलब क्या है
यह सब पढ़ने के बाद सवाल यह बनता है कि फिर 1.10 लाख करोड़ का मतलब क्या है।
इसका मतलब है: अगर ये सारे प्रस्ताव अपने अनुमानित मूल्य पर अनुबंध तक पहुँचें, तो कुल इतना ख़र्च होगा।
इसमें दो शर्तें छिपी हैं। पहली, सारे प्रस्ताव पहुँचें। दूसरी, अनुमानित मूल्य पर पहुँचें।
अनुमानित मूल्य स्वीकृति के वक़्त लगाया जाता है और वह अक्सर बदलता है। जब निविदा निकलती है और असली बोलियाँ आती हैं, तब पता चलता है कि बाज़ार क्या माँग रहा है।
इसलिए यह संख्या एक ऊपरी अनुमान है, वह भी उस स्थिति का जिसमें सब कुछ ठीक चले।
यह ग़लतफ़हमी बनती कैसे है
यहाँ किसी पर झूठ बोलने का इल्ज़ाम नहीं है। विज्ञप्ति में सही शब्द लिखे हैं और उनका अर्थ भी समझाया गया है।
दिक़्क़त अनुवाद में होती है, और वह अनुवाद ख़बर लिखने की जल्दी में होता है।
"आवश्यकता की स्वीकृति दी गई" लंबा वाक्य है और उसे समझाने में जगह लगती है। "मंज़ूरी दी" छोटा है और तुरंत समझ आता है। पर हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में "मंज़ूरी" का रोज़मर्रा का मतलब यह होता है कि काम हो गया।
रोज़ाना यही होता रहे तो एक धारणा बन जाती है कि रक्षा ख़रीद पर हर कुछ महीने में लाखों करोड़ ख़र्च हो रहे हैं। और तब असली सवाल पूछे ही नहीं जाते।
यह हर मंत्रालय में होता है
रक्षा इस मामले में अकेला नहीं है। सरकारी काम में मंज़ूरी के कई दर्जे होते हैं और हर दर्जे का अपना नाम होता है।
सैद्धांतिक मंज़ूरी, प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, व्यय स्वीकृति। इनमें से हर एक अलग चीज़ है और हर एक के बाद काम रुक सकता है।
सड़क परियोजनाओं में यही होता है। सिंचाई में यही। शहरी बुनियादी ढाँचे में यही। घोषणा के दिन जो रक़म छपती है वह आख़िरी दर्जे की नहीं, अक्सर पहले दर्जे की होती है।
पाठक के लिए इसका एक सीधा नतीजा है। किसी भी बड़ी सरकारी संख्या को पढ़ते वक़्त यह पूछना चाहिए कि वह किस दर्जे की मंज़ूरी है, और उसके बाद कितने दर्जे बाक़ी हैं।
यह सवाल ज़्यादातर विज्ञप्तियों में ही जवाब पा जाता है, बशर्ते पूरी विज्ञप्ति पढ़ी जाए। इस मामले में जवाब पहली पंक्ति में था।
जो सवाल पूछे जाने चाहिए
अगर स्वीकृति को ख़रीद न मानें, तो जाँचने लायक़ चीज़ें बदल जाती हैं।
पहला सवाल: पिछले पाँच साल में जितनी स्वीकृतियाँ दी गईं, उनमें से कितने प्रतिशत अनुबंध तक पहुँचे। यह आँकड़ा सार्वजनिक तौर पर एक जगह उपलब्ध नहीं है, और होना चाहिए।
दूसरा सवाल: स्वीकृति से अनुबंध तक का औसत समय कितना है, और वह घट रहा है या बढ़ रहा है।
तीसरा सवाल: जो स्वीकृतियाँ अनुबंध तक नहीं पहुँचीं, वे किस चरण पर अटकीं। परीक्षण पर, क़ीमत पर, या ज़रूरत बदल जाने पर।
चौथा सवाल, जो शायद सबसे ज़रूरी है: इस साल की स्वीकृतियों में से कितनी उन प्रस्तावों की हैं जिन्हें पहले भी स्वीकृति मिल चुकी थी। स्वीकृति की एक तय अवधि होती है और वह बीत जाने पर उसे नए सिरे से लेना पड़ता है। ऐसी दोबारा दी गई स्वीकृतियाँ भी उसी कुल जोड़ में गिनी जाती हैं।
अगर किसी साल का बड़ा हिस्सा पुरानी स्वीकृतियों का नवीनीकरण हो, तो वह संख्या नई ख़रीद नहीं, पुरानी देरी दिखा रही होगी। यह अंतर बाहर से नहीं दिखता।
इन तीनों के जवाब मिलें तो रक्षा आधुनिकीकरण की असली रफ़्तार दिखेगी। लाखों करोड़ वाली सुर्ख़ियों से वह नहीं दिखती।
और आख़िर में एक बात जो सही है
यह सब कहने का मतलब यह नहीं कि सोमवार की बैठक बेमानी थी।
आवश्यकता की स्वीकृति ज़रूरी क़दम है और उसके बिना कुछ आगे नहीं बढ़ता। जिन उपकरणों की सूची इसमें है, वे सेना की असली ज़रूरतें हैं। बारूदी सुरंग बिछाने वाला वाहन उस काम को मशीन पर डालता है जिसमें अभी जवान ख़ुद लगते हैं।
बात सिर्फ़ इतनी है कि इस क़दम को आख़िरी क़दम की तरह न पढ़ा जाए।
विज्ञप्ति में एक और बात है जिस पर ध्यान जाना चाहिए। मंत्रालय ने कहा है कि इन प्रस्तावों का बड़ा हिस्सा भारतीय स्रोतों से पूरा होगा।
यह दावा जाँचने लायक़ है, पर उसे जाँचने का वक़्त अभी नहीं आया। भारतीय स्रोत से ख़रीद का असली हिसाब तब बनता है जब अनुबंध हो जाए और यह पता चले कि जो कंपनी जीती वह क्या-क्या भारत में बना रही है और क्या-क्या आयात कर रही है।
बहुत से मामलों में भारतीय कंपनी अंतिम असेंबली भारत में करती है और मुख्य कल-पुर्ज़े बाहर से लाती है। वह भी भारतीय ख़रीद में गिना जाता है, और तकनीकी तौर पर ग़लत नहीं है। पर उसका मतलब वह नहीं है जो सुनने में लगता है।
मंत्रालय ने अपनी विज्ञप्ति में स्वीकृति और ख़रीद का फ़र्क़ साफ़ लिखा था। वह पहले ही वाक्य में था, और कोष्ठक में उसका अर्थ भी दिया था।
स्रोतरक्षा मंत्रालय की विज्ञप्ति, 7 सितंबर 2026, केंद्रीय बजट 2026-27 में रक्षा आवंटन, पीआईबी, रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020, रक्षा मंत्रालय, मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन संस्थान, बजट विश्लेषण