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गंडक में जितना पानी आया, बैराज उससे छह गुना झेलने के लिए बना है

27 अगस्त की रात वाल्मीकि नगर पर बहाव 1,50,200 क्यूसेक था। डिज़ाइन क्षमता 8,50,000 है। 2008 में कुसहा का तटबंध इससे भी कम पानी पर टूटा था।

गंडक में जितना पानी आया, बैराज उससे छह गुना झेलने के लिए बना है

27 अगस्त की रात साढ़े बारह बजे वाल्मीकि नगर बैराज के छत्तीसों फाटक खुले हुए थे।

गंडक पर उस घड़ी जो बहाव दर्ज हुआ, वह 1,50,200 क्यूसेक था। यह आँकड़ा बिहार जल संसाधन विभाग के अधीक्षण अभियंता मोहम्मद ज़िलानी का दिया हुआ है।

इसी बैराज की डिज़ाइन क्षमता 8,50,000 क्यूसेक है।

यानी जिस रात आठ ज़िले सतर्क किए गए, नदी अपनी क्षमता का सत्रह फ़ीसदी पानी लेकर आई थी।

जो आँकड़ा किसी ने नहीं छापा

इसी मानसून में, जुलाई के महीने में, इसी बैराज से 2,24,000 क्यूसेक गुज़र चुका है। पिछले हफ़्ते वाले बहाव से पचास फ़ीसदी ज़्यादा। उस दिन न चेतावनी थी, न सुर्ख़ी।

कोसी का हाल भी यही रहा। बीरपुर बैराज पर 28 अगस्त की सुबह आठ बजे 1,42,360 क्यूसेक दर्ज हुआ। वहाँ की डिज़ाइन क्षमता 9,50,000 क्यूसेक है, और अब तक का सबसे ऊँचा बहाव 5 अक्टूबर 1968 को दर्ज 7,88,200 क्यूसेक।

तो फिर घबराहट किस बात की थी।

साढ़े तीन घंटे

नेपाल के देवघाट से पानी को बिहार के बैराज तक पहुँचने में लगभग साढ़े तीन घंटे लगते हैं। चेतावनी, तैयारी और फ़ैसले के लिए पूरा समय इतना ही है।

26 अगस्त को नारायणी देवघाट पर 4.77 मीटर पर बह रही थी। वहाँ चेतावनी स्तर 7.30 मीटर है। आठ ज़िलों को सतर्क तब किया गया जब नदी चेतावनी स्तर से ढाई मीटर नीचे थी।

यह ज़रूरत से ज़्यादा नहीं था। नेपाल में उसी सुबह जो हुआ था, उसे देखने के बाद साढ़े तीन घंटे में इंतज़ार करने की गुंजाइश किसी अधिकारी के पास नहीं बचती।

केंद्रीय जल आयोग ने 26 अगस्त को एक विशेष परामर्श जारी किया था, जिस पर उप निदेशक विकास बारबेले के हस्ताक्षर हैं। उसमें गंडक के फाटक चलाने की सलाह थी। फाटक उसी रात खोले गए।

तटबंध असल में किस पर टूटता है

अब वह सवाल, जो इस पूरी कवरेज से ग़ायब रहा।

18 अगस्त 2008 को कोसी का तटबंध नेपाल के कुसहा में टूटा था। उस दिन नदी में जो पानी था, वह बैराज की डिज़ाइन क्षमता के लगभग सातवें हिस्से के बराबर था। तटबंध फिर भी टूटा। नदी ने रास्ता बदल लिया, बिहार के कई ज़िले डूबे, और तेईस से तीस लाख लोग प्रभावित हुए।

पिछले गुरुवार बिहार ने उससे ज़्यादा पानी बिना किसी घटना के पार कर दिया।

सातवाँ हिस्सा2008 में कुसहा का तटबंध डिज़ाइन क्षमता के लगभग इतने बहाव पर टूट गया था

फ़र्क़ पानी का नहीं है। फ़र्क़ उस मिट्टी का है जिस पर तटबंध खड़ा है।

तटबंध चूहों के बिलों से टूटते हैं, रिसाव से टूटते हैं, और उस मरम्मत के न होने से टूटते हैं जो बरसात आने से पहले होनी थी। बहाव सिर्फ़ आख़िरी धक्का देता है। इसीलिए "बिहार बच गया" कहना उतना ही अधूरा है जितना दो दिन पहले "बाढ़ आ गई" कहना था।

विभाग ने अपने बुलेटिन में क्या जोड़ा है

गंडक और कोसी का जो बुलेटिन बिहार जल संसाधन विभाग रोज़ जारी करता है, उसके ऊपर अब एक पंक्ति छपने लगी है। उसमें नेपाल-चीन सीमा के पास हिमनद झीलों की गतिविधि का ज़िक्र है, और यह कि कोई असाधारण घटना हो सकती है।

वह पंक्ति अंग्रेज़ी में है और उसमें दो शब्द ग़लत छपे हैं। किसी ने उसे ठीक करने की ज़हमत नहीं उठाई। पर वह छप रही है, रोज़, सरकारी काग़ज़ पर।

अगली बार का सवाल यह नहीं होगा कि नेपाल से कितना पानी आया। सवाल यह होगा कि उस दिन तटबंध किस हालत में था।

स्रोतजल संसाधन विभाग, बिहार — गंडक बुलेटिन, जल संसाधन विभाग, बिहार — कोसी बुलेटिन, ईटीवी भारत

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।