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नेपाल की जो 40 मेगावाट बिजली भारत से होकर बांग्लादेश जाती थी, वह बाढ़ के बाद शून्य है और नया रास्ता दिल्ली की मंज़ूरी पर अटका है

26 अगस्त की बाढ़ ने चिलिमे और त्रिशूली को बंद किया, और उसी के साथ नेपाल का पहला तीसरे देश को बिजली बेचने वाला सौदा रुक गया। नेपाल अब चाहता है कि किसी दूसरी परियोजना की बिजली उसी लाइन से भेजी जाए। इसके लिए मंज़ूरी काठमांडू या ढाका से नहीं, भारत के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण से आनी है।

रसुवा ज़िले में चिलिमे जलविद्युत केंद्र और उसके सामने का स्विचयार्ड। यह तस्वीर 2013 की है; इसी परियोजना में 26 अगस्त की बाढ़ के बाद उत्पादन ठप है
तस्वीर: Nirmal Dulal, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

बांग्लादेश जाने वाली 40 मेगावाट बिजली पूरी नहीं, दो टुकड़ों में गिनी जाती थी। 21.4 मेगावाट चिलिमे जलविद्युत परियोजना से, 18.6 मेगावाट त्रिशूली जलविद्युत केंद्र से। दोनों नेपाल के रसुवा ज़िले में हैं, दोनों भोटेकोशी की धारा पर, और 26 अगस्त 2026 के बाद दोनों में उत्पादन ठप है।

नेपाल विद्युत प्राधिकरण के कार्यवाहक प्रबंध निदेशक दीर्घायु कुमार श्रेष्ठ का वाक्य इससे भी छोटा है। "इस समय बांग्लादेश को बिजली निर्यात व्यावहारिक रूप से शून्य पर है।"

अब नेपाल चाहता है कि किसी और परियोजना की बिजली उसी लाइन से ढाका भेजी जाए, और यह फ़ैसला न काठमांडू का है न ढाका का।

बिजली का रास्ता मुज़फ़्फ़रपुर से होकर जाता है

झारखंड के जमशेदपुर में पावर ग्रिड का 400/220 केवी सबस्टेशन और उसका स्विचयार्ड। नेपाल की बिजली ऐसे ही 400 केवी तंत्र से होकर मुज़फ़्फ़रपुर पहुँचती है, जहाँ उसकी गिनती होती है
तस्वीर: SHUBHAM KR SONI, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

नेपाल की यह बिजली सीधे बांग्लादेश नहीं पहुँचती। वह पहले 400 केवी की धालकेबर–मुज़फ़्फ़रपुर लाइन से बिहार में भारतीय ग्रिड में आती है, और फिर भारत उतनी ही बिजली बहरामपुर–भेरामारा उच्च वोल्टेज डीसी जोड़ से बांग्लादेश को देता है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण निर्यात की गई ऊर्जा की गणना मुज़फ़्फ़रपुर पर करता है, अपनी सरहद पर नहीं। बीच का पूरा हिस्सा एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम संभालता है। धालकेबर–मुज़फ़्फ़रपुर की क्षमता 1,000 मेगावाट है; बहरामपुर–भेरामारा जोड़ की क्षमता भी 1,000 मेगावाट है, जिसमें से बांग्लादेश आम तौर पर 920 से 930 मेगावाट पहले से खींचता रहा है।

3 अक्टूबर 2024 को काठमांडू में तीन दस्तख़त

समझौते पर तीन संस्थाओं ने दस्तख़त किए। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक कुलमान घीसिंग, बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद रेज़ाउल करीम, और एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम की मुख्य कार्यकारी रेणु नारंग। यह पहला मौक़ा था जब नेपाल किसी तीसरे देश को बिजली बेचने जा रहा था। तय हुआ कि हर साल 15 जून से 15 नवंबर तक की मानसूनी खिड़की में 1,44,000 मेगावाट-घंटा बिजली 6.4 अमेरिकी सेंट प्रति यूनिट की दर पर जाएगी। दस्तख़त मूल रूप से 28 जुलाई को होने थे; बांग्लादेश में सरकार बदलने से तारीख़ टल गई।

14 करोड़ यूनिट का गुणा और 33 करोड़ का अनुमान

काठमांडू पोस्ट की उसी रिपोर्ट में दो आँकड़े साथ-साथ छपे हैं जो आपस में मेल नहीं खाते। एक तरफ़ 1,44,000 मेगावाट-घंटा, यानी 14 करोड़ 40 लाख यूनिट, 6.4 सेंट प्रति यूनिट पर; इसका गुणनफल लगभग 92 लाख डॉलर बैठता है। दूसरी तरफ़ उसी रिपोर्ट में लिखा है कि प्राधिकरण को इस बिक्री से सालाना क़रीब 33 करोड़ नेपाली रुपये की कमाई का अनुमान है, जो 92 लाख डॉलर का चौथाई भी नहीं। असली आँकड़ा बाद में आया: वित्त वर्ष 2025-26 में बांग्लादेश की बिक्री से नेपाल ने 1.06 अरब नेपाली रुपये कमाए।

"अनुमति" किस दफ़्तर से मिलती है

भारत का केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण इस कारोबार में नामित प्राधिकारी है। 26 फ़रवरी 2021 को उसने "नामित प्राधिकारी द्वारा बिजली के सीमा-पार आयात/निर्यात की मंज़ूरी और सुविधा की प्रक्रिया" जारी की। इसके तहत नेपाली परियोजना को पहले अपनी सरकार से निर्यात की इजाज़त लेनी होती है, भारतीय आयातक के पास नेपाली उत्पादक से बिजली ख़रीद समझौता या आशय पत्र होना चाहिए, और भारतीय व्यापारी को केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण से मंज़ूरी लेनी पड़ती है जिसमें मेगावाट और अवधि दर्ज होते हैं। मंज़ूरी परियोजना के नाम से जुड़ी होती है। इसीलिए चिलिमे और त्रिशूली की जगह कोई और संयंत्र रखना नेपाल के अधिकार में नहीं है।

2018 की मार्गदर्शिका में तीसरे देश वाली शर्त

18 दिसंबर 2018 को भारत के बिजली मंत्रालय ने "बिजली के आयात/निर्यात (सीमा-पार) के लिए मार्गदर्शिका, 2018" जारी की थी। इसमें व्यापार के तीन रास्ते रखे गए: सरकारों के बीच द्विपक्षीय समझौता, बोली, और संस्थाओं के आपसी क़रार। तीसरे देश वाला हिस्सा इसी दस्तावेज़ में जुड़ा। उसमें लिखा है कि त्रिपक्षीय समझौतों की सूरत में भारत से होकर बिजली का व्यापार भारत सरकार और संबंधित पड़ोसी देशों की सरकारों के बीच हस्ताक्षरित द्विपक्षीय समझौतों के समग्र ढाँचे के भीतर ही मंज़ूर होगा। नेपाल और बांग्लादेश ने 2018 में ही आपस में सहमति पत्र किया था।

धारा 6.3 और ज़मीनी सरहद की परिभाषा

2021 की प्रक्रिया में एक धारा है जिसका नंबर 6.3 है और जो नेपाल की आधी बहस तय करती है। वह उन परियोजनाओं से आयात रोकती है जिनका प्रभावी नियंत्रण, या धन का स्रोत, या लाभकारी स्वामी का निवास, ऐसे किसी तीसरे देश में हो जिसके साथ भारत की ज़मीनी सरहद लगती है और जिससे भारत का बिजली क्षेत्र में सहयोग का द्विपक्षीय समझौता नहीं है। 2018 की मार्गदर्शिका में यह प्रावधान नहीं था। 2016 के संस्करण में शर्त थी कि परियोजना में 51 फ़ीसदी भारतीय हिस्सेदारी हो; नेपाल ने पैरवी करके वह हटवाई थी।

456 मेगावाट की अपर तामाकोशी अब भी बाहर है

नेपाल ने इस बार जो विकल्प भारत के सामने रखे हैं, उनमें 456 मेगावाट की अपर तामाकोशी जलविद्युत परियोजना है। यह नेपाल की सबसे बड़ी परियोजना है और उसका भारतीय बाज़ार में प्रवेश बरसों से अटका है। कारण मालिकाना नहीं, ठेका है। बिजलीघर के दीवानी निर्माण का ठेका प्रतिस्पर्धी बोली में एक चीनी कंपनी, सिनोहाइड्रो कॉर्पोरेशन, ने जीता था, जबकि जल-यांत्रिक और विद्युत-यांत्रिक हिस्से भारतीय कंपनियों ने दिए। नेपाली विकासकर्ताओं का कहना है कि भारत यह नीति निर्माण ठेकों और उपकरण आपूर्ति तक लागू कर रहा है।

जून 2026 में दिल्ली ने चार चीनी कंपनियों को छूट दी

इसी साल जून में भारत के वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने चार चीन-संबद्ध कंपनियों को दो साल की छूट दी कि वे बिजली पारेषण ढाँचे के सरकारी ठेकों के लिए बोली लगा सकें। ये हैं टीबीईए एनर्जी इंडिया, नानजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया और ताइकाई इलेक्ट्रिक (इंडिया)। साथ में यह भी लिखा गया कि छूट सिर्फ़ इन्हीं चार के लिए है और इसे दूसरी फ़र्मों के लिए मिसाल न माना जाए। 2020 में चीन से रिश्ते बिगड़ने के बाद ही भारत ने ज़मीनी सरहद साझा करने वाले देशों के बोलीदाताओं पर ख़रीद नियम कसे थे।

20 मेगावाट जो नवंबर 2025 में तय होकर भी नहीं गए

27 नवंबर 2025 को ढाका में नेपाल और बांग्लादेश की संयुक्त संचालन समिति की बैठक में सैद्धांतिक सहमति बनी थी कि मौजूदा 40 मेगावाट में 20 मेगावाट और जोड़े जाएँ। भारत ने मंज़ूरी नहीं दी। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने पारेषण क्षमता की कमी का हवाला दिया, और एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम ने कहा कि 1,000 मेगावाट क्षमता वाली भारत–बांग्लादेश लाइन में अतिरिक्त आवंटन की जगह नहीं है। प्राधिकरण के बिजली व्यापार विभाग के निदेशक थर्क बहादुर थापा के शब्दों में, "इस बार बांग्लादेश को सिर्फ़ 40 मेगावाट ही जाएगी; जवाब मिला कि लाइन में क्षमता नहीं है।"

15 जुलाई 2026 को क्षमता बढ़ी, पर दूसरी सरहद पर

इसके सात महीने बाद, 15 जुलाई 2026 को, नेपाल और भारत ने धालकेबर–मुज़फ़्फ़रपुर और धालकेबर–सीतामढ़ी की 400 केवी लाइनों की संयुक्त स्थानांतरण क्षमता बढ़ाने पर सहमति दी। नेपाल को आयात के लिए यह 1 गीगावाट से 1.4 गीगावाट की गई, और नेपाल से निर्यात के लिए 1.1 गीगावाट से 1.65 गीगावाट। यह बढ़ोतरी नेपाल–भारत सरहद पर है। जिस लाइन की तंगी का हवाला 20 मेगावाट रोकने में दिया गया, वह भारत–बांग्लादेश सरहद पर है।

लांगतांग लिरुंग से गिरा बर्फ़ और चट्टान का टुकड़ा

त्सेर्गो री से दिखता लांगतांग लिरुंग और उसके नीचे उतरता हिमनद। यह तस्वीर 2000 की है; 26 अगस्त को इसी पहाड़ पर 5,200 से 5,400 मीटर की ऊँचाई से बर्फ़ और चट्टान का टुकड़ा टूटकर गिरा
तस्वीर: Ahtih (talk), विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

26 अगस्त 2026 को नेपाली समयानुसार सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर लांगतांग लिरुंग पर हिमनद ढहा। 5,200 से 5,400 मीटर की ऊँचाई से बर्फ़ और चट्टान का लगभग 0.2 वर्ग किलोमीटर का टुकड़ा क़रीब 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा, टकराव की रगड़ से पिघला, और नीचे की नदियों का बहाव धकेल दिया। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि भूकंपीय संकेत ढहने से पहले नहीं आया, बल्कि ढहने से ही पैदा हुआ। त्रिशूली घाटी में अकेले 30 से ज़्यादा जलविद्युत परियोजनाएँ चालू हैं या बन रही हैं।

बंद पड़ी दो परियोजनाएँ और 42 साल पुराना देवीघाट

चिलिमे की कुल क्षमता 22.1 मेगावाट है और उसमें से 21.4 मेगावाट निर्यात के लिए मंज़ूर थी। त्रिशूली की कुल क्षमता 24 मेगावाट, मंज़ूर हिस्सा 18.6 मेगावाट। 30 अगस्त की एक रिपोर्ट में चिलिमे की क्षमता 22 मेगावाट दर्ज है और यह भी कि परियोजना मलबे में दब गई। उसी सूची में 111 मेगावाट की रसुवागढ़ी पूरी तरह बह गई बताई गई है, और 14.1 मेगावाट का देवीघाट, जो 42 साल पुराना था, नष्ट हो गया। प्राधिकरण की 25 मेगावाट की सौर परियोजना को भी भारी नुक़सान पहुँचा।

कितने मेगावाट गए, इस पर आँकड़े अलग-अलग हैं

नेपाल विद्युत प्राधिकरण के हवाले से दर्ज है कि अनुमानित 431 मेगावाट बिजली ग्रिड से हट गई और निर्माणाधीन 470 मेगावाट की परियोजनाएँ क्षतिग्रस्त हुईं; क्षतिग्रस्त परियोजनाओं की संख्या 13 बताई गई। दूसरी रिपोर्टों में टूट अलग है: 281 मेगावाट स्थापित क्षमता नष्ट या बुरी तरह क्षतिग्रस्त, 150 मेगावाट पारेषण लाइन टूटने से ग्रिड से कटी, और निर्माणाधीन 700 मेगावाट प्रभावित। पहले दो जोड़ने पर 431 बनता है, पर निर्माणाधीन क्षमता का अंतर बना रहता है। ऑनलाइनखबर ने 12 परियोजनाओं में उत्पादन बंद होना लिखा; दूसरी जगह 15 संयंत्र छपे।

निर्यात 1,000 से घटकर 650 मेगावाट पर

बरसात में नेपाल औसतन क़रीब 1,000 मेगावाट बिजली निर्यात कर रहा था। बाढ़ के बाद यह घटकर लगभग 650 मेगावाट रह गई। भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए मंज़ूरशुदा निर्यात क्षमता 1,200 मेगावाट तक थी। बांग्लादेश का हिस्सा इसमें 40 मेगावाट का था, बाक़ी सब भारत जाता है, और सबसे बड़ा हिस्सा उसी धालकेबर–मुज़फ़्फ़रपुर लाइन से बिहार में उतरता है। तीन परियोजनाएँ, सांजेन, अपर सांजेन और सलासुंगी, राष्ट्रीय ग्रिड से कटकर अलग-थलग चल रही हैं। बिहार के लिए सीधा असर यही है कि सरहद पार से ग्रिड में उतरने वाली बिजली घटी है।

नेपाल ने भारत से क्या माँगा है

दीर्घायु कुमार श्रेष्ठ ने कहा, "बांग्लादेश को बिजली देने वाली दोनों परियोजनाएँ क्षतिग्रस्त हैं, इसलिए हमने भारत से कहा है कि विकल्प के तौर पर किसी दूसरी परियोजना की बिजली भेजने दी जाए।" प्राधिकरण ने अपर तामाकोशी समेत कई परियोजनाओं से निर्यात की इजाज़त माँगी है। यह माँग सीधे उसी धारा से टकराती है जो चीनी निवेश, चीनी ठेकेदार या कुछ मामलों में चीनी उपकरण वाली परियोजनाओं को रोकती है। पूर्व सचिव अनूप उपाध्याय का कहना है कि जिन चिंताओं से ये पाबंदियाँ लगी थीं वे कम हो रही हैं, इसलिए नेपाल को अब पूछना चाहिए।

73.75 मेगावाट की मंज़ूरियाँ बाढ़ से पहले ही बीत चुकी थीं

बाढ़ आने से पहले भी नेपाल के पास ऐसी क्षमता थी जिसे वह बेच नहीं सकता था। तीन नवीकरणीय परियोजनाओं की निर्यात मंज़ूरी की मियाद ख़त्म हो चुकी थी और नवीनीकरण नहीं हुआ: 38.8 मेगावाट की अपर चमेलिया, 24.25 मेगावाट की सेती नदी, और 10.70 मेगावाट की अपर तादी खोला। तीनों को जोड़ें तो 73.75 मेगावाट बैठता है, बांग्लादेश वाले पूरे सौदे से लगभग दोगुना। नवीनीकरण की एक शर्त उपकरण आयात से जुड़ी है, जिस पर स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक संघ के अध्यक्ष मोहन डंगी का कहना है कि उपकरण डेढ़ से दो साल बाद पहुँचते हैं।

नुक़सान के अनुमान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते

यहाँ स्रोत खुलकर अलग-अलग हैं, क्योंकि वे एक ही चीज़ नहीं गिन रहे। नेपाल सरकार के प्रारंभिक आकलन में बाढ़ से 400 अरब नेपाली रुपये से ज़्यादा, यानी लगभग 2.64 अरब डॉलर, का नुक़सान दर्ज है, और यह "नुक़सान" है। वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले ने रॉयटर्स से कहा कि पुनर्निर्माण पर 4 से 5 अरब डॉलर लगेंगे, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था के लगभग दसवें हिस्से के बराबर है, और यह "पुनर्निर्माण लागत" है। इन्हीं वाग्ले के हवाले से एक जगह यह लागत 900 अरब नेपाली रुपये यानी 6 अरब डॉलर दर्ज है। अधिकारियों के अनुमानों की सीमा 4 से 7 अरब डॉलर के बीच फैली है। किस आकलन में बीमा, मुआवज़ा और खोई हुई कमाई शामिल है, यह किसी दस्तावेज़ में साफ़ नहीं है।

जलविद्युत के नुक़सान पर सरकारी और निजी आकलन

अकेले जलविद्युत परियोजनाओं के नुक़सान का अनुमान 100 अरब नेपाली रुपये दर्ज है। प्राधिकरण के प्रवक्ता राजन ढकाल ने इसे "सैकड़ों अरब रुपये" कहा। निजी क्षेत्र का आकलन बहुत नीचे है: स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष उत्तम भ्लोन लामा के अनुसार औसत नुक़सान 25 से 30 अरब रुपये है। सड़कों और पुलों का अलग आँकड़ा 30 अरब रुपये है, जिसमें 68 झूला पुल और 33 वाहन पुल शामिल हैं, और 33 झूला पुल मरम्मत लायक़ नहीं बचे।

2 करोड़ डॉलर की माँग और 175 प्रस्ताव

नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के हानि और क्षति कोष से 2 करोड़ डॉलर माँगे हैं। यह कोष 20 नवंबर 2022 को मिस्र में हुए कॉप-27 में बना था। अब तक 27 साझेदार देशों ने इसमें कुल 82 करोड़ 6 लाख डॉलर देने का वादा किया है, और उसमें से लगभग एक तिहाई ही असल में आया है। कोष के पास आपदाग्रस्त देशों के 175 प्रस्ताव पड़े हैं, और बोर्ड की बैठक दिसंबर 2026 में तय थी। कोष के पूर्व सह-अध्यक्ष रिचर्ड शरमन ने पैमाने का फ़र्क़ इन शब्दों में रखा: "2 करोड़ डॉलर। यह 5 अरब डॉलर नहीं हो सकता।"

काठमांडू ने साफ़ किया कि माँग किससे नहीं है

4 सितंबर को नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने एक स्पष्टीकरण जारी किया। "न मैंने, न विदेश मंत्रालय या नेपाल सरकार में किसी ने भारत या किसी अन्य देश से मुआवज़े का दावा या माँग की है।" भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से ज़िम्मेदार विकसित देशों को आगे आना चाहिए। इसी संदर्भ में जो हिस्सेदारियाँ रखी गईं: चीन 32 से 34 फ़ीसदी, अमेरिका लगभग 12, भारत 7.6 और नेपाल 0.1 फ़ीसदी।

पिछले वित्त वर्ष का हिसाब और उसमें एक फ़र्क़

वित्त वर्ष 2025-26 में नेपाल ने भारत और बांग्लादेश को कुल 29.32 अरब नेपाली रुपये की बिजली बेची, जो पिछले साल के 17.45 अरब से लगभग 68 फ़ीसदी ज़्यादा और अब तक की सबसे बड़ी कमाई है। शुद्ध व्यापार अधिशेष 18.76 अरब रहा, जबकि उससे पिछले वर्ष यह 4.53 अरब था। यहाँ एक फ़र्क़ दर्ज करने लायक़ है। जुलाई की रिपोर्ट में भारत से आयात 10.55 अरब और अधिशेष 18.76 अरब बताया गया; सितंबर की रिपोर्ट में वही आयात 10.23 अरब और अधिशेष 19.09 अरब है। दोनों गणनाएँ अपने भीतर सही बैठती हैं, पर आयात का आँकड़ा एक ही अख़बार में दो तरह छपा है।

बांग्लादेश की तरफ़ 32 गीगावाट और 98 फ़ीसदी जीवाश्म ईंधन

बांग्लादेश की स्थापित बिजली क्षमता 32 गीगावाट है और उसका 98 फ़ीसदी जीवाश्म ईंधन पर टिका है। हाल में उसकी कमी एक समय 3,500 मेगावाट से ऊपर चली गई थी। देश ने 2030 तक 20 फ़ीसदी बिजली गैर-आयातित घरेलू नवीकरणीय स्रोतों से लेने का लक्ष्य रखा है, यानी नेपाली जलविद्युत उस लक्ष्य में गिनी नहीं जाएगी। ऊर्जा अर्थशास्त्र एवं वित्तीय विश्लेषण संस्थान के शफ़ीक़ुल आलम के अनुसार नेपाल और भूटान की जलविद्युत बांग्लादेश के मौजूदा कई स्रोतों से सस्ती पड़ सकती है। पहली खेप 15 नवंबर 2024 को बारह घंटे के लिए भेजी गई थी।

गिनती अब भी बदल रही है

एक जलविद्युत परियोजना की सुरंग से गाद हटाती मशीन और पास खड़ा एक बचावकर्मी। यह तस्वीर फ़रवरी 2021 में उत्तराखंड के तपोवन की है, जहाँ हिमनद टूटने के बाद सुरंग में फँसे लोगों की गिनती कई दिन बदलती रही
तस्वीर: Press Information Bureau, India, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

मरने वालों की संख्या नेपाल में कम से कम 1,357 और तिब्बत में 43 दर्ज है, लापता 5,326 और 519, घायल 6,827 से ऊपर। 8,317 मकान नष्ट हुए, 1,806 हेक्टेयर खेती की ज़मीन बर्बाद हुई और मलबा 22 लाख टन आँका गया। जलविद्युत परियोजनाओं पर काम कर रहे मज़दूरों और इंजीनियरों की गिनती भी एक जैसी नहीं है: एक रिपोर्ट में 983 लोग सुरंगों और बिजलीघरों में फँसे या संपर्क से बाहर बताए गए, दूसरी में 974 लापता, और सरकारी रिकॉर्ड में 639। 9 सितंबर को चैंपियंस लीग के मैचों में नेपाल के पीड़ितों के लिए मौन रखा गया।

मीटर मुज़फ़्फ़रपुर पर लगा है

समझौते की खिड़की 15 नवंबर को बंद होती है। उसके बाद सर्दियों में नदियों का बहाव घटता है, नेपाल की अपनी खपत निर्यात से आगे निकल जाती है और वह भारत से बिजली ख़रीदने लगता है। उस खिड़की के बचे हफ़्तों में बांग्लादेश तक कुछ पहुँचेगा या नहीं, यह नेपाल के मरम्मत कार्यक्रम पर नहीं, भारत के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की एक नई मंज़ूरी पर टिका है, जिसमें परियोजना का नाम, मेगावाट और अवधि दर्ज होनी है। मुज़फ़्फ़रपुर के उसी मीटर पर, जहाँ नेपाल अपनी निर्यात की गई ऊर्जा गिनता है, 26 अगस्त के बाद से बांग्लादेश के खाते में शून्य दर्ज हो रहा है।

स्रोतकाठमांडू पोस्ट, नेपाल के बांग्लादेश को बिजली निर्यात रुकने पर रिपोर्ट, 2 सितंबर 2026, काठमांडू पोस्ट, नेपाल–भारत–बांग्लादेश त्रिपक्षीय बिजली समझौते की रिपोर्ट, 3 अक्टूबर 2024, काठमांडू पोस्ट, अतिरिक्त 20 मेगावाट की मंज़ूरी रुकने पर रिपोर्ट, 14 जून 2026, काठमांडू पोस्ट, भारत की फ़रवरी 2021 की सीमा-पार बिजली प्रक्रिया पर रिपोर्ट, 28 फ़रवरी 2021, काठमांडू पोस्ट, भारत की चीनी कंपनियों को दी गई छूट पर रिपोर्ट, 17 जुलाई 2026, काठमांडू पोस्ट, वित्त वर्ष 2025-26 के बिजली व्यापार आँकड़े, 24 जुलाई 2026, काठमांडू पोस्ट, जलविद्युत क्षेत्र को हुए नुक़सान पर रिपोर्ट, 30 अगस्त 2026, सासेक (दक्षिण एशिया उप-क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग), भारत की 2018 सीमा-पार बिजली मार्गदर्शिका पर विवरण, इको-बिज़नेस, बांग्लादेश की नेपाली बिजली की माँग और निर्यात रुकने पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, इको-बिज़नेस, नेपाल की जलविद्युत रणनीति पर बाढ़ के असर की रिपोर्ट, सितंबर 2026, मोंगाबे, नेपाल की जलविद्युत-प्रथम रणनीति पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, द प्रिंट, नेपाल की जलवायु मुआवज़ा माँग और संयुक्त राष्ट्र कोष पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, एनरडेटा, नेपाल–भारत पारेषण क्षमता बढ़ाने के फ़ैसले की रिपोर्ट, 15 जुलाई 2026, ऑनलाइनखबर, रसुवा की बाढ़ से निर्यात रुकने पर रिपोर्ट, 3 सितंबर 2026, द क्लाइमेट वॉच, भोटेकोशी बाढ़ से बिजली निर्यात में कटौती पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, विकिपीडिया, 2026 की नेपाल बाढ़ का संकलित विवरण, सितंबर 2026 तक अद्यतन

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