भागलपुर में गंगा 2021 के रिकॉर्ड से ऊपर है और भागलपुर की अपनी बारिश 61 फ़ीसदी कम; एक ही मानसून ने बिहार को डुबोया और कर्नाटक को सुखाया
बिहार में 34 लाख लोग बाढ़ में हैं, जबकि राज्य के अपने आसमान से सामान्य से बहुत कम पानी गिरा। पानी नेपाल से आया, उस हिमनद से जो 26 अगस्त को लांगतांग लिरुंग पर ढहा। कर्नाटक में 31 में से 30 ज़िले सूखे हैं और 126 तालुक सूखाग्रस्त होने वाले हैं। बुंदेलखंड में खेत-तालाब ख़ाली हैं।

8 सितंबर की सुबह आठ बजे भागलपुर ज़िले के सुल्तानगंज में गंगा का पानी 36.80 मीटर पर था।
इस जगह का अब तक का सबसे ऊँचा दर्ज जलस्तर 36.75 मीटर था, 17 अगस्त 2021 का। वह रिकॉर्ड मंगलवार को टूट गया।
उसी भागलपुर ज़िले में इस मानसून की बारिश, 13 जुलाई तक के आँकड़े में, सामान्य से 61 फ़ीसदी कम थी।
यह विरोधाभास नहीं है। यह भूगोल है, और इस लेख का पहला आधा हिस्सा उसी को खोलता है। दूसरा आधा कर्नाटक और बुंदेलखंड का है, जहाँ कमी वाक़ई कमी है।
बिहार: 34 लाख, 13 ज़िले, 480 पंचायतें
बिहार आपदा प्रबंधन विभाग के 8 सितंबर के बुलेटिन के अनुसार, जिसे पीटीआई ने छापा, 13 ज़िलों की 480 ग्राम पंचायतों में 34.31 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। एक दिन पहले यह संख्या 29.13 लाख थी।
ज़िले जिनके नाम बुलेटिन में हैं: पटना, भागलपुर, वैशाली, सारण, बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर। बाक़ी छह का नाम पीटीआई की रिपोर्ट में नहीं है।
ज़मीन पर: 432 सामुदायिक रसोई चल रही हैं, 14 राहत शिविर, 1,832 नावें, राज्य आपदा बल की 27 और राष्ट्रीय आपदा बल की 10 टीमें। 1.29 लाख पॉलिथीन शीट और 22,900 सूखे राशन के पैकेट बँटे हैं, 3,142 क्विंटल चारा। भागलपुर के खरीक-रघोपुर में एक नाव पलटी; सवार दसों लोग बचा लिए गए।
कौन-सी नदियाँ ख़तरे से ऊपर हैं
बुलेटिन में सूची लंबी है: गंडक डुमरियाघाट और हाजीपुर में; कोसी बलतारा और कुरसेला में; बूढ़ी गंडक खगड़िया में; गंगा दीघा, गांधी घाट, हाथीदह, भागलपुर, कहलगाँव और मुंगेर में; और पुनपुन, बागमती, घाघरा।
इनमें गंडक और कोसी के नाम पर रुकिए। ये दोनों नेपाल से आती हैं। 8 सितंबर की सुबह दस बजे गंडक बैराज से 1,04,400 क्यूसेक और कोसी बैराज से 1,69,985 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा था। इस साल का शिखर गंडक पर 2,24,000 क्यूसेक और कोसी पर 2,55,425 क्यूसेक रहा है।
बिहार का अपना आसमान
अब बिहार की अपनी बारिश देखिए। डाउन टु अर्थ ने 13 जुलाई तक के भारतीय मौसम विभाग के ज़िलावार आँकड़े छापे थे: बिहार के 38 में से 29 ज़िले घाटे में, 7 में बड़ा घाटा। गंगा किनारे के ज़िले: पटना सामान्य से 57 फ़ीसदी कम, भोजपुर 63 कम, नालंदा 61, भागलपुर 61, मुंगेर 54, जहानाबाद 67, बक्सर 52।
यह जुलाई के मध्य की तस्वीर है, और उसके बाद सितंबर में बिहार में सामान्य से 31 फ़ीसदी ज़्यादा बारिश हुई है, 79.6 मिलीमीटर, बुलेटिन के अनुसार। पर एक हफ़्ते की अच्छी बारिश जुलाई का 61 फ़ीसदी का छेद नहीं भरती, और न ही वह गंगा को रिकॉर्ड पर ले जाती।
मौसम विभाग की परिभाषा में 26 से 50 फ़ीसदी की कमी "मध्यम मौसम-विज्ञानी सूखा" है और 50 से ऊपर "गंभीर"। भागलपुर जुलाई में गंभीर सूखे की श्रेणी में था। सितंबर में वह रिकॉर्ड बाढ़ में है।
दो शब्द: ख़तरे का निशान और उच्चतम बाढ़ स्तर
बुलेटिन में दो पैमाने आते हैं और दोनों अलग हैं। "ख़तरे का निशान" वह जलस्तर है जिसके ऊपर नदी किनारे की बस्तियों और खेतों में पानी घुसना शुरू होता है; यह हर गेज पर पहले से तय है। "उच्चतम बाढ़ स्तर" वह सबसे ऊँचा जलस्तर है जो उस गेज पर कभी दर्ज हुआ।
सुल्तानगंज पर मंगलवार को दूसरा पैमाना टूटा। यानी यह सिर्फ़ ख़तरे से ऊपर नहीं, उस गेज के इतिहास में सबसे ऊपर था। बाक़ी जगहों, दीघा से कहलगाँव तक, गंगा पहले पैमाने के ऊपर है, दूसरे के नहीं।
पानी कहाँ से आया

26 अगस्त 2026 की सुबह लगभग 8:37 बजे नेपाल के रसुवा ज़िले में लांगतांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी मुख पर, क़रीब 5,200 मीटर की ऊँचाई पर, एक हिमनद का हिस्सा ढहा। यह हिमनदी झील का फटना नहीं था; बर्फ़ और मलबा लगभग 1,200 मीटर नीचे गिरा और घर्षण से पिघला। ढहने से 5.2 तीव्रता का भूकंपीय संकेत बना।
पानी त्रिशूली में गया, जिसे ऊपरी हिस्से में भोटेकोशी कहते हैं। नेपाल में 1,355 से ज़्यादा लोग मारे गए और 4,996 लापता हैं; तिब्बत की ओर 43 मौतें और 519 लापता। रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और चितवन ज़िले सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। शव उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और महाराजगंज तक बहकर पहुँचे।
त्रिशूली देवघाट में नारायणी में मिलती है। नारायणी भारत में आकर गंडक कहलाती है। गंडक डुमरियाघाट और हाजीपुर में ख़तरे के निशान से ऊपर है और पटना के पास गंगा में मिलती है।
यानी भागलपुर का रिकॉर्ड उस बर्फ़ का है जो 26 अगस्त को 5,200 मीटर पर टूटी।
और कोसी

कोसी भी नेपाल से आती है, पर उसकी कहानी इस साल की बारिश की है, उस हिमनद की नहीं। उसका बैराज-निकास इस साल 2,55,425 क्यूसेक तक गया, जो गंडक से ज़्यादा है। दो नदियाँ, दो अलग कारण, एक ही राज्य में एक ही हफ़्ते।
भारत ने नेपाल को 29 अगस्त तक 62 टन राहत सामग्री और बचाव दल भेजे, जिनमें फ़ोरेंसिक और सुरंग विशेषज्ञ थे।
कर्नाटक: 31 में से 30
अब दक्षिण चलिए, जहाँ कमी उधार की नहीं है।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के आँकड़ों में 31 में से 30 ज़िलों में बारिश सामान्य से कम है। सबसे ख़राब: चामराजनगर सामान्य से 59 फ़ीसदी कम, चिक्कबल्लापुर 57, कोलार 56, बल्लारी 52। बेंगलुरु शहरी में 44 फ़ीसदी की कमी: 1 जून से 8 सितंबर तक 183 मिलीमीटर, सामान्य लगभग 320।
एकमात्र ज़िला जो सामान्य की परिभाषा में है, बेलगावी, और वह भी 14 फ़ीसदी कम पर; सामान्य का दायरा माइनस 19 से प्लस 19 है। मलनाड और तटीय ज़िले, जो राज्य की नदियों के जलग्रहण हैं, 20 से 36 फ़ीसदी कम पर हैं।
101, फिर 25 और
राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर ने मंगलवार को कहा: "पहले चरण में 101 तालुक सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं। दूसरे चरण का आकलन चल रहा है, और 25 तालुक और सूखाग्रस्त घोषित होने की पात्रता पूरी कर चुके हैं। उन्हें जल्द अधिसूचित किया जाएगा।"
उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में 200 से ज़्यादा तालुक सूखाग्रस्त घोषित हुए थे, और इस साल भी संख्या 200 पार कर सकती है। राज्य में कुल 239 तालुक हैं।
सियासत की रिपोर्ट में संख्याएँ थोड़ी अलग हैं: 102 घोषित, 26 और प्रस्तावित, 228 तालुकों में सूखे जैसी स्थिति, 122 में लगातार तीन हफ़्ते पर्याप्त बारिश नहीं। बुआई का आँकड़ा उसी रिपोर्ट से: पिछले सीज़न 82.5 लाख हेक्टेयर, इस सीज़न 36.5 लाख। अधिकारियों का अनुमान है कि बारिश न सुधरी तो फ़सल का नुक़सान 50 फ़ीसदी के आसपास हो सकता है।
101 या 102, 25 या 26: यह फ़र्क़ दो रिपोर्टों के समय का है। हम दोनों दे रहे हैं।
दो एजेंसियाँ, दो घाटे
कर्नाटक में एक और फ़र्क़ है जो मौसम का नहीं, नापने का है। डेक्कन हेराल्ड ने सवाल उठाया कि राज्य के पास घाटे के दो आँकड़े क्यों हैं: भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 26 फ़ीसदी, राज्य के अपने निगरानी केंद्र के अनुसार 32 फ़ीसदी।
वजह वर्षामापी यंत्रों की संख्या और "सामान्य" की गणना के आधार में है; राज्य का केंद्र कहीं ज़्यादा यंत्र इस्तेमाल करता है। सूखा घोषित करने का पैमाना राज्य के आँकड़े पर चलता है; केंद्र से राहत माँगने की मेज़ पर मौसम विभाग का आँकड़ा भी रखा जाता है। छह अंकों का यह फ़र्क़ पैसे में बदलता है।
बुंदेलखंड: तालाब जो पानी नहीं रोकते
तीसरा हिस्सा उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का है, और यहाँ कहानी बारिश से आगे जाती है।
मोंगाबे की अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार 1 अगस्त तक बांदा में बारिश सामान्य से 26 फ़ीसदी और महोबा में 43 फ़ीसदी कम थी। इसी इलाक़े के लिए 2009 के बुंदेलखंड पैकेज में 7,266 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए थे, जिसमें 30,000 खेत-तालाबों का लक्ष्य था। 2016-17 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत खेत-तालाब योजना आई; पहले चरण में सात ज़िलों में 2,000 तालाब बने।
तालाब का मानक नाप 22 गुणा 20 गुणा 3 मीटर है, लागत लगभग 1.05 लाख रुपये, जिसमें आधी सरकार देती है। क्षमता क़रीब 11.5 लाख लीटर।
जिनके तालाब भरे, और जिनके नहीं
बांदा के महुआ ब्लॉक के मणिपुर गाँव के विपिन कुमार यादव, 35, ने मई 2024 में तालाब खुदवाया; सिंचाई मिली तो गेहूँ 3.5 से 4.5 क्विंटल प्रति एकड़ से बढ़कर 9 से 10 क्विंटल हुआ। इस साल जुलाई तक एक ही बारिश हुई और तालाब में पानी पिछले साल का चौथाई था। उनके भाई केशव का बाँध टूटा और गाद भरी; सरसों को पानी नहीं मिला।
चित्रकूट के मानिकपुर ब्लॉक के डोडा माफ़ी गाँव के सुंदर कोल, 65, की ज़मीन रेतीली है; पानी रिस जाता है; पंद्रह साल में तालाब से एक बार भी सिंचाई नहीं हुई। मुल्लू कोल, 42, का तालाब गाद से छह फ़ुट से तीन फ़ुट रह गया। बुल्ली मवासी, 65, का तालाब 2009-10 में मनरेगा से खुदा, दस फ़ुट की जगह पाँच फ़ुट; उनके शब्द: "पिछले पंद्रह साल में मैं एक बूँद सिंचाई नहीं कर पाया।" महोबा के मुकेश कुमार, 28, का अप्रैल 2023 का तालाब गाद से तीन फ़ुट खो चुका है।
कारण, जो चित्रकूट और महोबा के भूमि संरक्षण अधिकारियों और सतना के सेवानिवृत्त जल-भूविज्ञानी शशिकांत त्रिपाठी ने गिनाए: रेतीली मिट्टी में रिसाव और अस्तर का न होना; गाद; ग़लत जगह, जहाँ बहाव पहुँचता ही नहीं; पैसा ख़त्म होने से अधूरी खुदाई; और देखरेख का कोई बजट नहीं।
खेत का हिसाब: जुलाई और सितंबर
डाउन टु अर्थ के 13 जुलाई के आँकड़े में देश के 741 में से 397 ज़िले घाटे में थे; 10 जुलाई तक धान 114.7 लाख हेक्टेयर में बोया गया था, पिछले साल इसी तारीख़ के 125.5 लाख के मुक़ाबले, और कुल खरीफ़ 531.2 लाख हेक्टेयर बनाम 632.7 लाख, यानी 16 फ़ीसदी पीछे।
आठ हफ़्ते बाद तस्वीर बदली। कृषि मंत्रालय ने 8 सितंबर को बताया कि 4 सितंबर तक खरीफ़ की बुआई 1,086.31 लाख हेक्टेयर पहुँच गई है। यानी जुलाई का 16 फ़ीसदी का अंतर बड़े हिस्से में भर गया; बुआई हुई, देर से हुई। देर से बोई फ़सल की पैदावार क्या होगी, यह अक्टूबर बताएगा।
उत्तर प्रदेश और झारखंड के आँकड़े जुलाई में बिहार से भी ख़राब थे: भदोही में 88 फ़ीसदी कम, कौशांबी 80, जौनपुर 75; झारखंड के साहिबगंज में 99 फ़ीसदी कम, यानी लगभग कुछ नहीं। ये गंगा के मैदान के वही ज़िले हैं जहाँ आज गंगा किनारे बाढ़ है।
ट्रैक्टर जो नहीं बिके
कमी का एक और पैमाना गाड़ियों के डीलरों से आया। ऑटोमोबाइल डीलर संघ ने अगस्त की बिक्री के आँकड़ों में लिखा कि 14 राज्यों में 13 फ़ीसदी के मानसून घाटे ने ट्रैक्टरों को रोका: अगस्त में ट्रैक्टर की बिक्री जुलाई से 25 फ़ीसदी कम रही, जबकि पिछले अगस्त से सिर्फ़ 0.84 फ़ीसदी ऊपर। कार और दोपहिया 16 से 20 फ़ीसदी बढ़े।
किसान ट्रैक्टर तब ख़रीदता है जब उसे फ़सल दिखती है। अगस्त में उसे नहीं दिखी।
सूखे राज्य को पानी छोड़ने का आदेश

कर्नाटक की कमी का एक नतीजा उसकी सीमा के बाहर गया। द हिंदू के अनुसार कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण ने कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए रोज़ 6,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया, और इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार कर्नाटक इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर रहा है।
मलनाड और तटीय ज़िले, जहाँ कावेरी और उसकी सहायक नदियाँ भरती हैं, इस साल 20 से 36 फ़ीसदी कम बारिश पर हैं। जिस राज्य के 30 ज़िले सूखे हों, उससे रोज़ 6,000 क्यूसेक माँगना वह झगड़ा है जो हर कमज़ोर मानसून में लौटता है, और 2023 में भी लौटा था।
पूरे देश की तस्वीर
बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार जून से अगस्त तक देश की बारिश सामान्य से 13.8 फ़ीसदी कम रही; 31 अगस्त तक लगभग 350 ज़िले, यानी 47 फ़ीसदी, घाटे या बड़े घाटे में; और अगस्त 1901 के बाद सबसे गर्म। मौसम विभाग ने 29 मई को ही अपना मौसमी अनुमान घटाकर दीर्घावधि औसत का 90 फ़ीसदी कर दिया था और 60 फ़ीसदी संभावना कमी की बताई थी।
सितंबर के लिए अनुमान सामान्य से कम का है, और एल नीनो मज़बूत हो रहा है; मोंगाबे ने अमेरिकी एजेंसी के 13 अगस्त के परामर्श का हवाला दिया है कि अक्टूबर-दिसंबर में 1950 के बाद का सबसे प्रबल एल नीनो बनने की 69 फ़ीसदी संभावना है।
एक मानसून, तीन नतीजे
बिहार डूबा है क्योंकि नेपाल का हिमनद टूटा और कोसी-गंडक भरीं; बिहार के अपने खेत जुलाई में सूखे थे। कर्नाटक सूखा है क्योंकि उसका अपना आसमान चुप रहा, और यह तक तय नहीं कि कितना चुप। बुंदेलखंड सूखा है क्योंकि बारिश कम हुई और जो पानी आया, उसे रोकने के लिए बने तालाब उसे रोक नहीं पाए।
तीनों में एक ही मौसम है। तीनों में कारण अलग हैं, और इसीलिए उपाय भी अलग होंगे: बाढ़ में नाव और रसोई, सूखे में तालुक की घोषणा और राहत, तालाब में अस्तर और गाद निकालने का बजट। एक ही शब्द "मानसून" तीनों को ढँक देता है, और यही वह शब्द है जिससे बचकर पढ़ना चाहिए।
स्रोतपीटीआई, बिहार आपदा प्रबंधन विभाग का बुलेटिन, 8 सितंबर 2026, इंडियन एक्सप्रेस, कर्नाटक के ज़िलावार आँकड़े, 8 सितंबर 2026, मोंगाबे, बुंदेलखंड के खेत-तालाब, अगस्त 2026, डाउन टु अर्थ, ज़िलावार वर्षा-घाटा, 13 जुलाई 2026 तक, 2026 की नेपाल-तिब्बत बाढ़, संकलन