नेपाल को बिजली भेजने की मंज़ूरी में 600 और 54 मेगावाट के साथ एक घड़ी भी लिखी है: रात 12 से शाम 6 बजे तक
विद्युत मंत्रालय ने सोमवार, 14 सितंबर को नेपाल विद्युत प्राधिकरण के लिए 13 सितंबर से 31 दिसंबर तक बिजली निर्यात की मंज़ूरी दी। विज्ञप्ति में दो लाइनों के नाम हैं, दो आँकड़े हैं और दिन के अठारह घंटे तय हैं। शाम छह से रात बारह बजे तक के छह घंटे उन अठारह में नहीं आते, और भारतीय बिजली बाज़ार में बेचने वालों की सबसे बड़ी कमी इन्हीं घंटों में रहती है।

विद्युत मंत्रालय की विज्ञप्ति सोमवार, 14 सितंबर को दोपहर 1 बजकर 38 मिनट पर आई और उसमें चार तारीख़ें, दो लाइनों के नाम और दो आँकड़े थे। नेपाल विद्युत प्राधिकरण को 13 सितंबर 2026 से 31 दिसंबर 2026 तक भारत से बिजली मिलेगी। मुज़फ़्फ़रपुर–धालकेबर 400 केवी लाइन से 600 मेगावाट तक और तनकपुर–महेंद्रनगर 132 केवी लाइन से 54 मेगावाट तक। जनवरी 2027 से कितनी जाएगी, यह दिसंबर में तय होगा।
एक आँकड़ा और है, और उसी पर यह पूरी मंज़ूरी टिकी है। बिजली रोज़ अठारह घंटे भेजी जाएगी, रात 12 बजे से शाम 6 बजे तक। शाम छह से रात बारह तक के छह घंटे मंज़ूरी में नहीं हैं।
भारतीय बिजली बाज़ार में बेचने वालों की सबसे बड़ी कमी इन्हीं छह घंटों में रहती है।
मंज़ूरी में लिखी हुई घड़ी
विज्ञप्ति संख्या 2310045 हिंदी में है और 2310017 उसी का अंग्रेज़ी पाठ। दोनों एक ही मिनट पर जारी हुए। अंग्रेज़ी में लाइन का ब्योरा "Muzaffarpur - Dhalkebar 400 kV D/c line" लिखा है, जहाँ D/c का मतलब डबल सर्किट है, यानी एक ही मीनारों की क़तार पर दो सर्किट साथ-साथ। हिंदी अनुवाद में यह "400 केवी डीसी लाइन" हो गया है, जिसे पढ़कर लगेगा कि डायरेक्ट करंट की बात हो रही है। दूसरी लाइन, तनकपुर–महेंद्रनगर, में S/c लिखा है, यानी एकल सर्किट।
मंत्रालय ने अपने दोनों आँकड़े कहीं जोड़े नहीं हैं। 654 मेगावाट का जो आँकड़ा सोमवार शाम से हर जगह छपा, वह 600 और 54 का योग है और एजेंसियों ने लगाया है। जोड़ अपनी जगह ठीक है, पर दोनों लाइनें अलग सरहदों पर हैं, अलग वोल्टेज की हैं और उनकी बिजली एक ही जगह नहीं उतरती। मुज़फ़्फ़रपुर बिहार में है, तनकपुर उत्तराखंड के चंपावत ज़िले में।
विज्ञप्ति में तीन चीज़ें नहीं हैं। बिजली का दाम नहीं है। भारत की वह कंपनी नहीं है जो यह बिजली भेजेगी। और यह भी नहीं लिखा कि बिजली आएगी कहाँ से, किसी बिजलीघर से या बाज़ार से। मंज़ूरी का बाक़ी ढाँचा इन्हीं तीन ख़ाली जगहों में है, और वह ढाँचा सार्वजनिक दस्तावेज़ों में दर्ज है।
13 सितंबर से 31 दिसंबर तक 110 दिन बनते हैं।
मंज़ूरी का दफ़्तर: नामित प्राधिकारी और सरकार की सहमति
सीमा पार बिजली भेजने या मँगाने का नियम विद्युत मंत्रालय के 18 दिसंबर 2018 के कार्यालय ज्ञापन संख्या 14/1/2017-ट्रांस से चलता है, जिसने 2016 की पुरानी मार्गदर्शिका को रद्द कर दिया था। उसकी धारा 4.4 कहती है कि कोई भी संस्था बिजली का आयात या निर्यात तभी कर सकती है जब नामित प्राधिकारी से मंज़ूरी ले ले। धारा 4.2 के तहत यह प्राधिकारी मंत्रालय ने ख़ुद तय करना था, और 24 दिसंबर 2018 के एक अलग ज्ञापन से यह ज़िम्मा केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के सदस्य (विद्युत प्रणाली) को दिया गया।
तो विज्ञप्ति पर नाम विद्युत मंत्रालय का क्यों है। इसका जवाब उसी मार्गदर्शिका की धारा 4.6 में है: बिजली का यह लेन-देन अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मामला है, इसलिए नामित प्राधिकारी मंज़ूरी देगा या नहीं देगा, यह भारत सरकार की सहमति लेने के बाद ही तय होगा। इस बार का मंज़ूरी पत्र अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है; पिछली मंज़ूरियों के पत्र प्राधिकरण ने अपनी वेबसाइट पर डाले हैं और उन पर दस्तख़त नामित प्राधिकारी के नोडल अधिकारी, मुख्य अभियंता बी. एस. बैरवा के हैं। 26 फ़रवरी 2021 की प्रक्रिया इस पर समयसीमा भी बाँधती है। पूरी अर्ज़ी मिलने के 60 दिन के भीतर प्राधिकारी उसे सरकार की सहमति के लिए भेजेगा, और सरकार का आख़िरी जवाब आने के 15 दिन के भीतर आवेदक को बताएगा।
धारा 4.5 में एक छूट है। जहाँ किसी ख़ास परियोजना के लिए दोनों सरकारों के बीच अंतर-सरकारी समझौता हो चुका है, वहाँ नामित प्राधिकारी की मंज़ूरी नहीं चाहिए। नेपाल को होने वाला यह निर्यात उस छूट में नहीं आता।
प्रक्रिया की धारा 6.5 में वह रास्ता है जिससे यह सौदा चलता है। भारत का कोई भी व्यापार अनुज्ञप्तिधारी पड़ोसी देश की किसी संस्था की तरफ़ से भारतीय बिजली एक्सचेंजों पर सौदा कर सकता है, बशर्ते नामित प्राधिकारी ने उसे तय मेगावाट और तय अवधि के लिए मंज़ूरी दे रखी हो। धारा 6.6 इसी पर एक बंदिश लगाती है: एक्सचेंज पर व्यापार की मंज़ूरी एक बार में ज़्यादा से ज़्यादा एक साल की होगी। धारा 6.7.6 और कड़ी है। एक साल या उससे कम की मंज़ूरी लेने वाली संस्था को तीन महीने के भीतर मध्यम या अल्पकालिक पारेषण पहुँच के लिए अर्ज़ी देनी होगी, वरना मंज़ूरी अपने आप रद्द मानी जाएगी।
एक शर्त और है, जो नेपाल पर नहीं बल्कि भारतीय बिजलीघरों पर लगती है। धारा 5.2(क) के मुताबिक़ कोयले से बनी बिजली भारत से तभी बाहर जा सकती है जब वह आयातित कोयले, नीलामी वाले कोयले या व्यावसायिक खनन के कोयले से बनी हो। घरेलू आवंटन वाले कोयले की बिजली निर्यात के लिए पात्र नहीं है, और 2023 में प्राधिकरण ने इसके लिए अलग जाँच-व्यवस्था जारी की, क्योंकि एक ही बिजलीघर दोनों तरह का कोयला जला सकता है।
दाम एक्सचेंज पर तय होता है, भुगतान भारतीय रुपये में
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण अपनी वेबसाइट पर हर मंज़ूरी की एक पंक्ति छापता है, और उसमें एक ख़ाना "लेन-देन का तरीक़ा" का है। नेपाल को भेजी जाने वाली बिजली की पिछली सारी मंज़ूरियों में इस ख़ाने में एक ही शब्द है: पावर एक्सचेंज। साथ में कोष्ठक में डीएएम और आरटीएम, यानी दिन-पूर्व बाज़ार और वास्तविक समय बाज़ार।
इसका सीधा अर्थ है कि नेपाल विद्युत प्राधिकरण भारत सरकार से बिजली नहीं ख़रीदता। वह भारत के उसी एक्सचेंज से ख़रीदता है जिससे पंजाब की वितरण कंपनी और केरल का बोर्ड ख़रीदते हैं, और उतना ही भाव चुकाता है जितना उस खंड में बाज़ार साफ़ होता है। मार्गदर्शिका की धारा 7.2.1 कहती है कि निर्यात का शुल्क आपसी सहमति से या प्रतिस्पर्धी बोली से तय होगा, और भारतीय ग्रिड से बिजली ले जाने का पारेषण शुल्क उसके ऊपर लगेगा।
पैसे का रास्ता सीईआरसी के 8 मार्च 2019 के सीमा-पार व्यापार विनियमों में बँधा है। अल्पकालिक पहुँच देने और उसका बिल बनाने का काम राष्ट्रीय भार प्रेषण केंद्र का है; मध्यम और दीर्घकालिक पहुँच केंद्रीय पारेषण उपयोगिता देती है। ग्रिड चलाने के सारे शुल्क, विचलन और प्रतिक्रियाशील ऊर्जा समेत, एक निपटान नोडल एजेंसी के मार्फ़त चुकते हैं, जिसे हर पड़ोसी देश के लिए विद्युत मंत्रालय अलग से अधिसूचित करता है। नेपाल के लिए वह एजेंसी एनटीपीसी विद्युत व्यापार निगम है। यह विज्ञप्तियों में नहीं, मंज़ूरी के पत्रों की प्रतिलिपि सूची में लिखा मिलता है, जहाँ अंतिम पंक्ति हर बार यही है: "सीजीएम, एनवीवीएन (एसएनए के रूप में)"।
विनियम 33 गारंटी की रक़म तय करता है। पड़ोसी देश के ग्राहक को पारेषण पहुँच शुरू होने से कम से कम 90 दिन पहले दो साख-पत्र खोलने होते हैं, दोनों औसत मासिक बिल के 2.1 गुना के बराबर और दोनों एक साल के लिए वैध। एक केंद्रीय पारेषण उपयोगिता के नाम पारेषण शुल्क के लिए, दूसरा निपटान नोडल एजेंसी के नाम ग्रिड के शुल्कों के लिए। भुगतान चूकने पर एक ही सज़ा है, और वह विनियम में साफ़ लिखी है: भारतीय ग्रिड तक पहुँच बंद, जब तक बक़ाया न चुके।
विनियम 35 मुद्रा तय करता है। यह सारी गारंटी भारतीय रुपये में होगी, किसी राष्ट्रीयकृत भारतीय बैंक से, या पड़ोसी देश के बैंक से जिसकी पुष्टि कोई राष्ट्रीयकृत भारतीय बैंक करे। नेपाल विद्युत प्राधिकरण का भारत के साथ पूरा बिजली व्यापार भारतीय रुपये में ही निपटता है; बांग्लादेश वाला हिस्सा अमेरिकी डॉलर में निपटता है।
दो लाइनें, और 1996 की संधि से बनी तनकपुर वाली
मुज़फ़्फ़रपुर–धालकेबर 400 केवी दोहरे सर्किट की लाइन की तबादला क्षमता 1,000 मेगावाट है। इस मंज़ूरी के 600 मेगावाट उसका साठ फ़ीसदी हैं। लोकसभा में 2 अप्रैल 2026 को विद्युत राज्यमंत्री श्रीपद नाइक ने भारत-नेपाल के जितने सीमा-पार जोड़ गिनाए, उनमें पंद्रहवें नंबर पर इसी लाइन को एचटीएलएस तार से दोबारा तानने का काम दर्ज है, जिससे उसकी क्षमता बढ़ेगी। जुलाई 2026 में पोखरा में हुई दोनों देशों की ऊर्जा सचिव स्तरीय संयुक्त संचालन समिति की तेरहवीं बैठक में तय हुआ कि धालकेबर–मुज़फ़्फ़रपुर और निर्माणाधीन धालकेबर–सीतामढ़ी लाइनों से नेपाल की तरफ़ आयात की क्षमता 1,400 मेगावाट और भारत की तरफ़ निर्यात की क्षमता 1,650 मेगावाट हो जाएगी। सारी लाइनें मिलाकर यह आँकड़ा 1,530 और 1,850 मेगावाट बैठता है।
दूसरी लाइन की कहानी तीस साल पुरानी है। 12 फ़रवरी 1996 की महाकाली संधि का अनुच्छेद 2 तनकपुर बाँध के पूर्वी तटबंध के बदले नेपाल को दो चीज़ें देता है: बरसात में 1,000 और सूखे में 300 क्यूसेक पानी, और हर साल 7 करोड़ यूनिट बिजली, मुफ़्त, लगातार। संधि यह भी लिखती है कि इसके लिए भारत तनकपुर बिजलीघर से नेपाल-भारत सरहद तक 132 केवी की पारेषण लाइन बनाएगा। तनकपुर–महेंद्रनगर की लाइन उसी वाक्य से निकली है। संधि उसी कोष्ठक में तनकपुर बिजलीघर का ब्योरा भी दर्ज करती है: स्थापित क्षमता 1,20,000 किलोवाट, यानी 120 मेगावाट, और 90 फ़ीसदी भरोसेमंद वर्ष के प्रवाह पर सालाना 44.84 करोड़ यूनिट।

साल भर में 7 करोड़ यूनिट का मतलब है चौबीसों घंटे चलती हुई क़रीब 8 मेगावाट बिजली। इस मंज़ूरी ने उसी तार पर रोज़ अठारह घंटे के लिए 54 मेगावाट तक की छूट रख दी है। 110 दिन तक पूरी सीमा इस्तेमाल हो तो यह 10.69 करोड़ यूनिट बैठती है, यानी संधि वाली सालाना मुफ़्त बिजली से ज़्यादा, और चार महीने से भी कम में। बड़ी लाइन पर वही हिसाब 118.8 करोड़ यूनिट पर पहुँचता है। दोनों आँकड़े छत के हैं, अनुमान नहीं; असल में कितनी बिजली जाएगी यह हर पंद्रह मिनट के सौदे तय करेंगे।
मंज़ूरी में जिन लाइनों का नाम नहीं है, वे भी कम नहीं हैं। राज्यमंत्री की उसी सूची में बिहार से जाने वाली 132 केवी की तीन कड़ियाँ हैं, कटैया–कुशहा (तीन सर्किट), रक्सौल–परवानीपुर (दो सर्किट) और रामनगर–सूरजपुरा (एक सर्किट), और उत्तर प्रदेश से न्यू नौतनवा–मैनहिया। पिछली सर्दी में इन्हीं कड़ियों के लिए अलग मंज़ूरियाँ निकली थीं: 28 अक्टूबर 2025 को पीटीसी इंडिया को बिहार की लाइनों से 300 मेगावाट और न्यू नौतनवा से 50 मेगावाट। दोनों 31 दिसंबर 2025 को ख़त्म हो गईं। प्राधिकरण की सार्वजनिक तालिका में, जैसी वह 15 सितंबर 2026 को पढ़ी गई, उनके बाद की कोई मंज़ूरी दर्ज नहीं है।
एक्सचेंज पर 15 सितंबर का भाव, घंटे दर घंटे
इंडियन एनर्जी एक्सचेंज अपने दिन-पूर्व बाज़ार का पूरा ब्योरा रोज़ छापता है, पंद्रह-पंद्रह मिनट के 96 खंडों में। 15 सितंबर, मंगलवार की आपूर्ति के लिए जो सौदे एक दिन पहले हुए, उनका आकार इस तरह है।
रात 12 से 12:15 वाले पहले ही खंड में ख़रीद की बोलियाँ 63,048 मेगावाट थीं और बिक्री की सिर्फ़ 1,120 मेगावाट। बाज़ार उतने पर ही साफ़ हुआ जितना बिकने आया था, और भाव 10 रुपये प्रति यूनिट पर पहुँच गया, जो दिन-पूर्व बाज़ार की ऊपरी सीमा है। शाम 8 बजे वाले खंड में ख़रीद की बोलियाँ बढ़कर 75,364 मेगावाट हो गईं और बिक्री की घटकर 715 मेगावाट। पूरे देश में उस पंद्रह मिनट के लिए बेचने को 715 मेगावाट थी।
दोपहर का चेहरा उल्टा है। 12 बजे वाले खंड में बिक्री की बोलियाँ 25,420 मेगावाट थीं, ख़रीद की 24,430, और 10,829 मेगावाट का सौदा 2.70 रुपये प्रति यूनिट पर हुआ। दिन का सबसे नीचे का भाव 2.66 रुपये रहा। पूरे दिन का औसत 8 रुपये प्रति यूनिट बैठा, इसलिए कि 96 में से 65 खंडों में, यानी सवा सोलह घंटे, भाव उसी छत पर टिका रहा। छत से नीचे का सौदा सिर्फ़ सुबह 8:15 और शाम 4 बजे के बीच हुआ।

अब मंज़ूरी की घड़ी दोबारा देखिए। रात 12 से शाम 6 बजे तक के अठारह घंटों में उस दिन दिन-पूर्व बाज़ार का औसत भाव 7.34 रुपये प्रति यूनिट रहा, औसतन 8,880 मेगावाट बिकने आई और 5,222 मेगावाट का सौदा हुआ। मंज़ूरी से बाहर छूटे छह घंटों में चौबीस के चौबीस खंडों में भाव 10 रुपये की छत पर था, बेचने के लिए औसतन 751 मेगावाट आई, और वह पूरी की पूरी बिक गई।
यह घड़ी इस बार पहली बार नहीं लगी। 19 नवंबर 2024 को नामित प्राधिकारी ने एनवीवीएन को इन्हीं दोनों लाइनों पर इन्हीं 600 और 54 मेगावाट की मंज़ूरी दी थी, और उसकी शर्त वाले ख़ाने में लिखा था: बिजली रोज़ बीस घंटे भेजी जाएगी, 0000 से 1700 और 2100 से 2400 बजे तक, यानी 1700 से 2100 के चार घंटे छोड़कर। उसी पत्र की दूसरी पंक्ति 16 मार्च 2025 से 30 जून 2025 तक की अवधि के लिए और सख़्त है: बिजली सिर्फ़ सौर घंटों में, सुबह 6 से शाम 6 बजे तक। 4 नवंबर 2024 को भूटान की ड्रुक ग्रीन पावर कॉरपोरेशन को दी गई 1,100 मेगावाट की मंज़ूरी में भी वही चार घंटे कटे हुए हैं। यह किसी एक पड़ोसी पर लगी शर्त नहीं, इन मंज़ूरियों का बना-बनाया ढाँचा है।
निर्यात की कसौटी ख़ुद मार्गदर्शिका में लिखी है। धारा 6.1 कहती है कि उपलब्ध उत्पादन क्षमता और माँग को देखकर ही मंज़ूरी दी जाएगी, और निर्यात आम तौर पर तभी होगा जब क्षमता घरेलू माँग से ज़्यादा हो। उसी धारा का अगला वाक्य इस कसौटी के ऊपर एक चाबी रख देता है: बड़े नीतिगत हितों के लिए भारत सरकार पड़ोसी देशों से बिजली मँगाने या भेजने का अधिकार अपने पास रखती है। हर मंज़ूरी पत्र की शर्त (ख) यही वाक्य दोहराती है और जोड़ती है कि यह भाग लेने वाली संस्था पर बाध्यकारी होगा।
सरकारी बहीखाते में क्षमता माँग से ज़्यादा दिखती भी है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के जुलाई 2026 के कार्यकारी सारांश में पूरे देश की ऊर्जा ज़रूरत 170.34 अरब यूनिट है और उपलब्धता 170.16 अरब, यानी 0.1 फ़ीसदी की कमी। चरम माँग 2,70,322 मेगावाट थी और पूरी हुई 2,70,203 मेगावाट। उसी महीने पंजाब में 4.2 करोड़ यूनिट और केरल में 90 लाख यूनिट बिजली माँग के मुक़ाबले नहीं दी जा सकी। राष्ट्रीय आँकड़े पर यह 0.1 फ़ीसदी है और राज्य के भीतर वह शाम की कटौती है, जिसका ब्योरा इसी जगह 12 सितंबर को छपे "सितंबर की शाम के लिए केरल को बिजली बेचने कोई तैयार नहीं हुआ" और 14 सितंबर के पंजाब वाले लेख में है।
कुलेखानी की झील और सर्दियों के लिए जमा पानी
26 अगस्त की भोटेकोशी बाढ़ के बाद नेपाल के तंत्र से कितनी बिजली हटी, इस पर आँकड़े मेल नहीं खाते। विद्युत मंत्रालय की विज्ञप्ति कोई संख्या नहीं देती, सिर्फ़ "भारी नुक़सान" लिखती है। काठमांडू पोस्ट ने 14 सितंबर को कमी 350 से 400 मेगावाट के बीच बताई। उसी अख़बार की 12 सितंबर की रिपोर्ट में कुलेखानी-1 के प्रमुख प्रल्हाद राउत के हवाले से रसुवा और नुवाकोट में 400 मेगावाट से ज़्यादा उत्पादन बंद होना दर्ज है। इसी जगह 10 सितंबर को छपे लेख में नेपाल विद्युत प्राधिकरण के हवाले से 431 मेगावाट का आँकड़ा था। तीनों आँकड़े एक ही दायरे में हैं, पर एक जैसे नहीं, और कोई आधिकारिक अंतिम गणना अब तक सामने नहीं आई।
नेपाल की स्थापित क्षमता इस साल 4,200 से 4,300 मेगावाट के बीच पहुँची है। मायरिपब्लिका ने 14 अप्रैल को इसे 4,200 मेगावाट बताया था, जिसमें 103 मेगावाट ऐसी भी गिनी गई है जो राष्ट्रीय ग्रिड से जुड़ी ही नहीं; पीपुल्स रिव्यू ने 9 मई को नेपाल के ऊर्जा, जल संसाधन तथा सिंचाई मंत्रालय के हवाले से आँकड़ा 4,296 मेगावाट छापा। यह पूरी क्षमता जाड़े में काम नहीं आती, क्योंकि इसका ज़्यादातर हिस्सा नदी के बहाव पर चलने वाली परियोजनाओं का है और सूखे महीनों में उनका उत्पादन आधे से नीचे चला जाता है। जमा किए हुए पानी वाली इकलौती बड़ी व्यवस्था कुलेखानी है, मकवानपुर ज़िले में, तीन सीढ़ियों में: कुलेखानी-1 से 60 मेगावाट, वही पानी नीचे जाकर कुलेखानी-2 से 32 और कुलेखानी-3 से 14, कुल 106 मेगावाट।
कुलेखानी को बरसात में नहीं चलाया जाता। उसका पानी सर्दियों के लिए जमा रखा जाता है, जब नदियाँ दुबली पड़ती हैं। बाढ़ के बाद तीनों इकाइयाँ चौबीसों घंटे चल रही हैं, क्योंकि रसुवा और नुवाकोट का जो उत्पादन एक झटके में बैठ गया, उसकी भरपाई ग्रिड को कहीं से करनी थी।
इसका असर झील में दिखता है। काठमांडू पोस्ट की उसी रिपोर्ट में प्राधिकरण की अपनी निगरानी के हवाले से दर्ज है कि लगातार उत्पादन से इंद्र सरोवर का जलस्तर रोज़ 20 से 25 सेंटीमीटर गिर रहा है, जबकि आने वाली धाराएँ 15 से 18 सेंटीमीटर ही भर पा रही हैं; शुद्ध गिरावट रोज़ 2 से 10 सेंटीमीटर की है। शुक्रवार दोपहर 2 बजे जलस्तर 1,522.46 मीटर था। बाँध की संरचनात्मक अधिकतम सीमा 1,530 मीटर है, पर 2015 के भूकंप के बाद मुख्य बाँध में दरारें मिलीं और जापानी विशेषज्ञों की जाँच के बाद से सुरक्षित सीमा 1,527 मीटर मानी जाती है।

झील पहले से छोटी होती जा रही है। 1982 में जब कुलेखानी-1 चालू हुआ, जलाशय की सक्रिय गहराई 57 मीटर थी, क्षमता 8.53 करोड़ घन मीटर, और उससे सालाना 21.11 करोड़ यूनिट बिजली बनती थी। जुलाई 1993 की बाढ़ ने झील की तली छह मीटर ऊपर उठा दी। गाद जमती गई, भंडारण पाँच साल पहले घटकर 5.99 करोड़ घन मीटर रह गया, और उसी जलाशय से सालाना बिजली बनाने की क्षमता 14.47 करोड़ यूनिट पर आ गई, यानी 6.64 करोड़ यूनिट कम। प्राधिकरण के कार्यवाहक प्रबंध निदेशक दीर्घायु कुमार श्रेष्ठ ने काठमांडू पोस्ट से कहा कि सूखे मौसम के लिए भारत से अतिरिक्त बिजली माँगी गई थी और मंज़ूरी मिल गई है, और यह बिजली जाड़े में इस्तेमाल होगी। बरसात अभी ख़त्म नहीं हुई है, इसलिए नेपाल फ़िलहाल भारतीय बाज़ार में क़रीब 500 मेगावाट बेच भी रहा है।
एक बरस का दोतरफ़ा हिसाब
बिजली दोनों तरफ़ जाती है, और पिछले वित्त वर्ष का पूरा हिसाब नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अपने आँकड़ों में है। 2025-26 में नेपाल ने भारत और बांग्लादेश को 387.7 करोड़ यूनिट बिजली बेची, जो उससे पिछले साल की 238.3 करोड़ यूनिट से 62.89 फ़ीसदी ज़्यादा है। बिक्री का औसत भाव 7.56 नेपाली रुपये प्रति यूनिट रहा, जिसमें भारतीय एक्सचेंज के दोनों बाज़ार, एनवीवीएन के साथ का मध्यम अवधि का समझौता और बांग्लादेश वाला हिस्सा तीनों शामिल हैं। इससे हुई कमाई का रुपया-हिसाब इसी जगह 10 सितंबर को छपे "नेपाल की जो 40 मेगावाट बिजली भारत से होकर बांग्लादेश जाती थी" वाले लेख में दर्ज है।
उसी साल उल्टी दिशा में नेपाल ने भारत से 115 करोड़ यूनिट बिजली ख़रीदी, जो उससे पिछले साल की 168 करोड़ यूनिट से 31.57 फ़ीसदी कम है। इस ख़रीद का बिल 10.56 अरब नेपाली रुपये रहा, जो 12.92 अरब से 18.29 फ़ीसदी कम है।
इन दो जोड़ियों को आपस में भाग देने पर एक बात निकलती है जो किसी विज्ञप्ति में नहीं है। नेपाल ने भारत से बिजली औसतन क़रीब 9.2 नेपाली रुपये प्रति यूनिट पर ख़रीदी और औसतन 7.56 पर बेची। नेपाली रुपया भारतीय रुपये से 1.60 के तय भाव पर बँधा है, इसलिए यह क़रीब 5.75 भारतीय रुपये पर ख़रीद और 4.73 पर बिक्री बैठती है। दोनों औसत अलग मौसमों के हैं: बेचना बरसात में होता है जब भारतीय बाज़ार सस्ता है, और ख़रीदना जाड़े में जब वही बाज़ार महँगा है।
इस मंज़ूरी की छत को उसी तराज़ू पर रखिए। 400 केवी लाइन पर 110 दिन की पूरी सीमा 118.8 करोड़ यूनिट बनती है, जो पिछले पूरे साल के 115 करोड़ यूनिट के आयात से ज़्यादा है।
भारत के अपने बहीखाते में नेपाल की कोई पंक्ति नहीं है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के मासिक उत्पादन कार्यक्रम में "भूटान आयात" नाम का एक अलग ख़ाना है, जिसके सामने 4,410 मेगावाट दर्ज है और जिससे जुलाई 2026 में 151.18 करोड़ यूनिट आई। भूटान की पनबिजली भारत के उत्पादन के हिसाब का हिस्सा है। नेपाल की बिजली बाज़ार का सौदा है, और सौदे बहीखाते की उस तालिका में नहीं आते।
दिसंबर की समीक्षा और खुली हुई बातें
"जनवरी 2027 से निर्यात की जाने वाली बिजली की मात्रा की समीक्षा दिसंबर 2026 में की जाएगी।" यह वाक्य नया नहीं है। 28 अक्टूबर 2025 के दोनों मंज़ूरी पत्रों में इसका पिछला संस्करण मौजूद है, शब्दशः, सिर्फ़ साल बदलकर।
प्रक्रिया के हिसाब से एक्सचेंज वाली मंज़ूरी एक साल से ज़्यादा की हो ही नहीं सकती, और यह वाली 110 दिन की है। पारेषण पहुँच की अर्ज़ी तीन महीने में न पड़े तो वह ख़ुद रद्द हो जाएगी।
सार्वजनिक रिकॉर्ड में अभी दो चीज़ें ख़ाली हैं। भारत की कौन-सी कंपनी नेपाल की तरफ़ से एक्सचेंज पर बोली लगाएगी, यह कहीं दर्ज नहीं है; प्राधिकरण की मंज़ूरी-तालिका में नेपाल को निर्यात की आख़िरी प्रविष्टि अब भी 28 अक्टूबर 2025 की है। उसी तालिका में एक और गड़बड़ी है: 4 नवंबर 2024 की 1,100 मेगावाट वाली पंक्ति देश के ख़ाने में नेपाल लिखती है, जबकि उससे जुड़ा मंज़ूरी पत्र भूटान की ड्रुक ग्रीन पावर कॉरपोरेशन के लिए है।
दिसंबर की समीक्षा जनवरी की मात्रा तय करेगी। विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि वह समीक्षा किन आँकड़ों पर होगी।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, विद्युत मंत्रालय, 14 सितंबर 2026, दोपहर 1:38 बजे: 'नेपाल को बिजली निर्यात की मंजूरी' (विज्ञप्ति आईडी 2310045), उसी विज्ञप्ति का अंग्रेज़ी पाठ, 'Export of Power to Nepal Approved' (विज्ञप्ति आईडी 2310017), विद्युत मंत्रालय, कार्यालय ज्ञापन संख्या 14/1/2017-ट्रांस, 18 दिसंबर 2018: सीमा-पार बिजली आयात/निर्यात मार्गदर्शिका 2018, आठ पन्ने, विद्युत मंत्रालय का 24 दिसंबर 2018 का ज्ञापन: केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के सदस्य (विद्युत प्रणाली) की नामित प्राधिकारी के रूप में नियुक्ति, नामित प्राधिकारी की प्रक्रिया, 26 फ़रवरी 2021: धारा 6.4, 6.5, 6.6 और 6.7 में पात्रता, समयसीमा और शर्तें, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण: निर्यात के लिए पात्र ईंधन की जाँच-व्यवस्था, 2023, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीमा-पार बिजली व्यापार) विनियम, 2019, अधिसूचना संख्या 13/2/7/2015-पीएम/सीईआरसी, 8 मार्च 2019, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण: सीमा-पार आयात/निर्यात मंज़ूरियों की सार्वजनिक तालिका, 15 सितंबर 2026 को पढ़ी गई, नामित प्राधिकारी की 19 नवंबर 2024 की मंज़ूरी, संख्या I/44522/2024: एनवीवीएन को 600 मेगावाट, मुज़फ़्फ़रपुर–धालकेबर लाइन, घंटों की शर्त सहित, नामित प्राधिकारी की 19 नवंबर 2024 की मंज़ूरी, संख्या I/44521/2024: एनवीवीएन को 54 मेगावाट, तनकपुर–महेंद्रनगर लाइन, नामित प्राधिकारी की 28 अक्टूबर 2025 की मंज़ूरी, संख्या I/55556/2025: पीटीसी इंडिया को बिहार की 132 केवी लाइनों से 300 मेगावाट, नामित प्राधिकारी की 28 अक्टूबर 2025 की मंज़ूरी, संख्या I/55555/2025: पीटीसी इंडिया को न्यू नौतनवा–मैनहिया लाइन से 50 मेगावाट, नामित प्राधिकारी की 4 नवंबर 2024 की मंज़ूरी, संख्या I/44192/2024: ड्रुक ग्रीन पावर कॉरपोरेशन, भूटान को 1,100 मेगावाट, इंडियन एनर्जी एक्सचेंज, दिन-पूर्व बाज़ार का मार्केट स्नैपशॉट, 15 सितंबर 2026 की आपूर्ति, 96 पंद्रह-मिनटी खंड, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, मासिक कार्यकारी सारांश, जुलाई 2026: बिजली आपूर्ति स्थिति और उत्पादन तालिकाएँ, पत्र सूचना कार्यालय, विद्युत मंत्रालय, 2 अप्रैल 2026: लोकसभा में राज्यमंत्री श्रीपद नाइक का लिखित उत्तर, पड़ोसी देशों से सीमा-पार जोड़ों की पूरी सूची, महाकाली संधि, 12 फ़रवरी 1996, जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन विभाग की प्रति: अनुच्छेद 2 में तनकपुर से 7 करोड़ यूनिट और 132 केवी लाइन, काठमांडू पोस्ट, अनिल गिरी, 14 सितंबर 2026: नेपाल विद्युत प्राधिकरण के कार्यवाहक प्रबंध निदेशक दीर्घायु कुमार श्रेष्ठ के बयान और बाढ़ से कमी का अनुमान, काठमांडू पोस्ट, प्रताप बिष्ट, हेटौंडा, 12 सितंबर 2026: कुलेखानी का चौबीस घंटे चलना, इंद्र सरोवर का जलस्तर और गाद का हिसाब, काठमांडू पोस्ट, सीमा तामंग, 24 जुलाई 2026: धालकेबर–मुज़फ़्फ़रपुर की 1,000 मेगावाट क्षमता, दोनों दिशाओं की सीमाएँ और आयात का ब्योरा, द राइज़िंग नेपाल, 24 जुलाई 2026: नेपाल विद्युत प्राधिकरण के आँकड़ों पर आधारित यूनिट-वार निर्यात और आयात, तथा औसत भाव, मायरिपब्लिका, 14 अप्रैल 2026: नेपाल की स्थापित क्षमता 4,200 मेगावाट, और उसमें ग्रिड से न जुड़ी 103 मेगावाट, पीपुल्स रिव्यू, 9 मई 2026: ऊर्जा, जल संसाधन तथा सिंचाई मंत्रालय के हवाले से स्थापित क्षमता 4,296 मेगावाट