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गृह मंत्री ने जब्ती के आँकड़े गिनाए, पर वज़न अकेले यह नहीं बताता कि नशा घटा या बढ़ा

पणजी में अमित शाह ने कहा कि 2004-14 में 26 लाख किलो नशीला माल जब्त हुआ था और 2014-26 में 1.19 करोड़ किलो। दोनों अवधियाँ बराबर नहीं हैं, और किलो की गिनती अपने आप में एक तरफ़ झुकी होती है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की समीक्षा बैठक, नई दिल्ली, 2016। ब्यूरो के कैडर का पुनर्गठन 2019 के बाद हुए बदलावों में गिनाया गया
तस्वीर: Ministry of Home Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को पणजी में नारकोटिक्स नियंत्रण पर संवाददाता सम्मेलन किया और उसमें दो आँकड़े रखे जो कल सबसे ज़्यादा छपेंगे।

पहला: 2004 से 2014 के बीच देश में 26 लाख किलो नशीला माल जब्त हुआ, जिसका मूल्य क़रीब 40,000 करोड़ रुपये आँका गया।

दूसरा: 2014 से 2026 के बीच यह बढ़कर 1 करोड़ 19 लाख किलो से ऊपर पहुँचा, मूल्य क़रीब 1 लाख 89 हज़ार करोड़ रुपये।

नष्ट किए गए माल का आँकड़ा भी दिया गया। पहली अवधि में 3 लाख 36 हज़ार किलो, दूसरी में 48 लाख 68 हज़ार किलो।

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत भी मौजूद थे।

पहली बात: अवधियाँ बराबर नहीं हैं

2004 से 2014 दस साल है। 2014 से 2026 बारह साल है।

यानी तुलना में दूसरी अवधि पहले से बीस फ़ीसदी लंबी है। अगर सालाना औसत निकालें तो पहली अवधि में 2.6 लाख किलो प्रति वर्ष और दूसरी में क़रीब 9.9 लाख किलो प्रति वर्ष बैठता है।

अनुपात फिर भी बड़ा रहता है, पर वह 4.6 गुना है, 4.5 गुना के आसपास, न कि आँकड़ों को सीधे रखने पर दिखने वाला अंतर।

यह छोटी बात लग सकती है। पर जब कोई संख्या नीति की सफलता के सबूत के तौर पर रखी जाती है, तो उसका आधार बराबर होना चाहिए।

दूसरी बात: किलो किस चीज़ के हैं

नशीले पदार्थों की जब्ती का वज़न एक ही तरह के माल का नहीं होता, और यही इस आँकड़े की सबसे बड़ी सीमा है।

गाँजा भारी और सस्ता होता है। एक ट्रक भरा गाँजा टनों में तुलता है और उसकी क़ीमत उतनी नहीं होती।

हेरोइन, कोकीन और मेथ का वज़न बहुत कम होता है और असर बहुत ज़्यादा। एक किलो हेरोइन का बाज़ार मूल्य कई करोड़ रुपये तक जाता है और वह हज़ारों ख़ुराक बनती है।

इसलिए किलो में कुल जब्ती लगभग हमेशा गाँजे की तरफ़ झुकी होती है। अगर किसी साल एक राज्य में गाँजे की बड़ी खेप पकड़ी जाए, तो देश का कुल वज़न उछल जाता है, भले ही सिंथेटिक नशे की तस्करी उसी साल बढ़ी हो।

यही वजह है कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो अपनी सालाना रिपोर्ट में जब्ती को नशा-वार अलग करके देता है। कुल वज़न वहाँ भी छपता है, पर विश्लेषण उसका नहीं होता।

विज्ञप्ति में यह बँटवारा नहीं है।

गाँजे का खेत। वज़न में जब्ती का बड़ा हिस्सा आमतौर पर गाँजा होता है, जो भारी और सस्ता है
तस्वीर: Emeraldeye, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

तीसरी बात: जब्ती बढ़ने के दो मतलब होते हैं

यह सबसे बुनियादी सवाल है और इसका जवाब किसी भी देश में आसान नहीं है।

अगर किसी साल पुलिस ज़्यादा माल पकड़ती है, तो इसके दो कारण हो सकते हैं। या तो पकड़ने की क्षमता बढ़ी है, या तस्करी बढ़ी है।

दोनों सूरतों में जब्ती का आँकड़ा ऊपर जाएगा।

अकेला जब्ती-आँकड़ा इन दोनों में फ़र्क़ नहीं कर सकता। इसके लिए दूसरे आँकड़े चाहिए: नशे की लत के प्रसार का सर्वेक्षण, अस्पतालों में नशे से जुड़े भर्ती के मामले, सड़क पर बिकने वाले नशे की क़ीमत, और मुक़दमों की दोषसिद्धि दर।

नशे की क़ीमत ख़ासकर काम की चीज़ है। अगर आपूर्ति सच में घटती है तो सड़क पर क़ीमत बढ़ती है। यह आँकड़ा भारत में व्यवस्थित रूप से इकट्ठा नहीं होता।

यह कहना कि आँकड़ा कुछ साबित नहीं करता, यह कहना नहीं है कि कार्रवाई नहीं हुई। यह कहना है कि इस एक संख्या से जो निष्कर्ष निकाला जा रहा है, वह इसी संख्या से नहीं निकल सकता।

जो ढाँचा 2019 के बाद बना

विज्ञप्ति का सबसे ठोस हिस्सा वह है जिसमें संस्थागत बदलाव गिनाए गए हैं, क्योंकि ये जाँचे जा सकते हैं।

2019 में चार-स्तरीय एनकॉर्ड तंत्र बना। हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश को समर्पित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फ़ोर्स बनाने का मॉडल भेजा गया और संयुक्त समन्वय समिति बनी।

एनकॉर्ड की बैठकों की गिनती दी गई है: 10 शीर्ष स्तर की, 7 कार्यपालक, 277 राज्य स्तर की और 16,798 ज़िला स्तर की।

नशाग्रस्त युवाओं के पुनर्वास के लिए 1933 मानस हेल्पलाइन शुरू हुई। साइबर अपराध के लिए 1930 अलग है, और दोनों नंबर अलग-अलग काम के हैं।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के कैडर का पुनर्गठन हुआ। निदान पोर्टल से नारको अपराधियों का राष्ट्रीय डेटाबेस बना। सीसीटीएनएस के आँकड़ों से देश भर के हॉटस्पॉट का नक़्शा तैयार किया गया।

जाँच का तरीक़ा भी बदला। छोटी पुड़िया पकड़ने पर यह देखा जाता है कि वह आई कहाँ से, और सीमा पर बड़ा ज़ख़ीरा पकड़ने पर यह कि वह किस रास्ते युवाओं तक पहुँचता। विज्ञप्ति इसे नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे, दोनों तरफ़ की जाँच कहती है।

वित्तीय जाँच और पीआईटी-एनडीपीएस पर अलग ज़ोर दिया गया, और डार्क नेट, एन्क्रिप्टेड संचार तथा क्रिप्टो लेन-देन के लिए टास्क फ़ोर्स में अलग सेल बनाने का काम शुरू हुआ।

चलता-फिरता कार्गो स्कैनर (यह तस्वीर अमेरिकी सीमा एजेंसी की है)। रोडमैप में जोखिम-आधारित प्रोफ़ाइलिंग और स्कैनर लगाने का ज़िक्र है
तस्वीर: CBP Photography, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

भारत दो रास्तों के बीच में है

गृह मंत्री ने अपनी बात में दो भौगोलिक नाम लिए और उन्हें रोकने के लिए चतुष्कोणीय रणनीति का ज़िक्र किया।

ये नाम तस्करी की दुनिया के पुराने नाम हैं। पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान का इलाक़ा है, जहाँ से अफ़ीम और हेरोइन आती रही है। पूरब में म्यांमार, लाओस और थाईलैंड का इलाक़ा है, जो पहले अफ़ीम के लिए जाना जाता था और अब मेथेम्फ़ेटामीन के लिए।

भारत ठीक इन दोनों के बीच में है, और इसकी सीमाएँ दोनों तक जाती हैं।

इसका एक नतीजा यह है कि भारत में जो पकड़ा जाता है, उसका बड़ा हिस्सा भारत के लिए नहीं होता। वह रास्ते में होता है।

दूसरा नतीजा और गंभीर है। भारत दवा बनाने वाला बड़ा देश है, और सिंथेटिक नशा बनाने में लगने वाले कई रसायन वैध दवा उद्योग के ही कच्चे माल हैं। इन्हें प्रीकर्सर कहते हैं और इनका नियंत्रण नारकोटिक्स एजेंसी अकेले नहीं कर सकती, क्योंकि इनका वैध इस्तेमाल कहीं ज़्यादा बड़ा है।

विज्ञप्ति में इसी वजह से प्रीकर्सर और सिंथेटिक नशे के लिए अलग अंतर-मंत्रालयी व्यवस्था बनाने का ज़िक्र है, और रोडमैप का पूरा एक स्तंभ इसी पर है।

अगले तीन साल का रोडमैप

यह हिस्सा नया है और इसमें तारीख़ें हैं, इसलिए इसे बाद में जाँचा जा सकेगा।

जुलाई 2026 से जुलाई 2029 तक की अवधि मिशन मोड घोषित की गई है। चार स्तंभ बताए गए हैं: ख़ुफ़िया और ऑपरेशन आधारित प्रवर्तन, प्रीकर्सर और सिंथेटिक नशे का नियंत्रण, माँग और नुक़सान में कमी, और क्षमता निर्माण।

इन चार में 25 घटक और 200 से ज़्यादा एक्शन पॉइंट रखे गए हैं। तिमाही समीक्षा और परिणाम आधारित जवाबदेही का ज़िक्र है।

तीन प्रतिबद्धताएँ ऐसी हैं जिनकी तारीख़ साफ़ है।

पहली, नशामुक्ति केंद्रों की संख्या तीन गुना बढ़ाकर 1,751 की जाएगी। इसका मतलब है कि अभी क़रीब 584 हैं। सामाजिक न्याय विभाग, स्वास्थ्य विभाग और जेल प्रशासन मिलकर यह करेंगे, और क़रीब 10,000 स्वयंसेवक जोड़े जाएँगे।

दूसरी, मार्च 2027 तक हर राज्य में पूरी तरह सुसज्जित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फ़ोर्स बनाने के लिए सात फ़ीसदी केंद्रीय सहायता दी जाएगी।

तीसरी, फ़ोरेंसिक रिपोर्ट 30 दिन में आने की व्यवस्था गृह मंत्रालय करेगा।

आख़िरी वाली सबसे अहम है और सबसे कम चर्चा में आएगी। एनडीपीएस के मुक़दमों में देरी की सबसे बड़ी वजह अक्सर रासायनिक जाँच रिपोर्ट का इंतज़ार होता है, और उसी इंतज़ार में ज़मानत मिल जाती है। तीस दिन की समयसीमा अगर सच में लागू हुई तो वह जब्ती के किसी भी आँकड़े से ज़्यादा फ़र्क़ डालेगी।

भगोड़े, नोटिस और संपत्ति

नशे से हटकर भी कुछ आँकड़े दिए गए, जो आंतरिक सुरक्षा के दायरे के हैं।

2019 से जुलाई 2026 तक 36 देशों से 274 भगोड़ों का प्रत्यर्पण हुआ। इनमें आर्थिक अपराध, आतंकवाद, नारकोटिक्स और गैंगवार के मामले बताए गए।

पिछले तीन साल में 401 रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुए, और अकेले 2026 में जुलाई तक 182।

इसके लिए भारतपोल नाम की व्यवस्था बनी, जिससे 14 से ज़्यादा केंद्रीय एजेंसियाँ और सभी राज्यों की पुलिस जुड़ी हैं।

2019 से 2026 तक भगोड़ों की क़रीब 17,874 करोड़ रुपये की संपत्ति सील या ज़ब्त की गई।

गोवा के बारे में एक अलग आँकड़ा दिया गया: नई न्याय संहिता और तीन आपराधिक क़ानून लागू होने के बाद राज्य की दोषसिद्धि दर 53.2 फ़ीसदी तक पहुँची है, जो गृह मंत्री के मुताबिक़ क़रीब तीस फ़ीसदी की बढ़त है।

एक क्षेत्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला। एनडीपीएस मुक़दमों में देरी की एक बड़ी वजह रासायनिक जाँच रिपोर्ट का इंतज़ार होता है
तस्वीर: Adbh266, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

16,798 बैठकें, और उनका मतलब

ज़िला स्तर की बैठकों की संख्या सबसे बड़ी है और उसे अकेले पढ़ने से कुछ पता नहीं चलता।

देश में क़रीब 780 ज़िले हैं। एनकॉर्ड 2019 में बना। अगर सात साल में 16,798 बैठकें हुईं, तो प्रति ज़िला औसतन 21 बैठकें बैठती हैं, यानी हर ज़िले में साल में तीन।

नियम के हिसाब से ज़िला एनकॉर्ड समिति की बैठक हर तिमाही होनी चाहिए, यानी साल में चार। औसत उससे थोड़ा कम है।

यह औसत की समस्या भी हो सकती है, क्योंकि कुछ ज़िलों में बैठकें नियमित होंगी और कुछ में लगभग नहीं। राज्यवार ब्योरे के बिना यह तय नहीं हो सकता।

गोवा को इस सम्मेलन के लिए चुनना अपने आप में एक बात कहता है। राज्य छोटा है, पर उसकी नशे की समस्या पर्यटन से जुड़ी है और उसका स्वरूप बाक़ी देश से अलग है। गृह मंत्री ने कहा कि इसी अवधि में गोवा में कार्रवाई लगभग तीन गुना बढ़ी है, और यह भी कि विदेशियों का भारत में स्वागत है, पर नशे के साथ नहीं।

माँग की तरफ़ क्या है

आपूर्ति रोकने के मुक़ाबले माँग घटाने के आँकड़े कम हैं, और जो हैं वे अलग तरह के हैं।

नशा मुक्त भारत अभियान के तहत 25 करोड़ नागरिकों से संपर्क करके शपथ दिलाई गई। उपचार और पुनर्वास के तहत 5 लाख 70 हज़ार लोगों को नशामुक्त बनाने का काम बताया गया।

25 करोड़ शपथ और 5.7 लाख उपचार, ये दो बिलकुल अलग तरह के आँकड़े हैं। पहला पहुँच का है, दूसरा नतीजे का। इन्हें एक साथ पढ़ने पर अनुपात ख़ुद बोलता है।

एनसीसी, एनएसएस और माई भारत के ज़रिए लाखों नशामुक्ति मित्र तैयार करने की बात है, और शिक्षण संस्थानों को नशा-मुक्त बनाने का संकल्प।

एक क़ानूनी प्रावधान जिसका ज़िक्र नहीं आया

एनडीपीएस अधिनियम में धारा 64A नाम का एक प्रावधान है। इसके तहत जो व्यक्ति ख़ुद आगे बढ़कर किसी सरकारी या सरकार से मान्यता प्राप्त अस्पताल या संस्था में नशामुक्ति का इलाज कराता है, उसे धारा 27 के तहत सेवन के अपराध और कम मात्रा वाले अपराधों में मुक़दमे से छूट मिल सकती है।

छूट शर्त के साथ है। इलाज पूरा न किया जाए तो छूट वापस ली जा सकती है।

यह प्रावधान क़ानून में 2001 से है और अदालतों में इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है।

नशामुक्ति केंद्रों की संख्या तीन गुना करने की घोषणा के साथ इस धारा का ज़िक्र स्वाभाविक होता, क्योंकि दोनों एक ही तर्क पर खड़े हैं: लत वाले व्यक्ति को अपराधी की जगह मरीज़ मानना। विज्ञप्ति में यह ज़िक्र नहीं है।

कम मात्रा का मतलब क्या है

धारा 64A की छूट कम मात्रा वाले अपराधों पर लागू होती है, इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि कम मात्रा होती कितनी है।

यह हर नशे के लिए अलग है और केंद्र सरकार की 19 अक्तूबर 2001 की अधिसूचना में तय है।

हेरोइन के लिए कम मात्रा 5 ग्राम है और व्यावसायिक मात्रा 250 ग्राम। गाँजे के लिए कम मात्रा 1 किलो है और व्यावसायिक मात्रा 20 किलो। बीच की मात्रा को मध्यम माना जाता है।

फ़र्क़ बहुत बड़ा है। कम मात्रा में अधिकतम सज़ा छह महीने या दस हज़ार रुपये जुर्माना या दोनों है, और ज़मानत सामान्य नियमों से मिलती है।

व्यावसायिक मात्रा में न्यूनतम सज़ा दस साल है और ज़मानत की शर्तें धारा 37 के तहत बहुत कड़ी हैं। अदालत को यह संतुष्टि दर्ज करनी पड़ती है कि आरोपी दोषी नहीं है और ज़मानत पर रहते हुए अपराध नहीं करेगा।

यही वजह है कि एनडीपीएस के मुक़दमों में सबसे बड़ी लड़ाई अक्सर मात्रा पर होती है, और उसी में रासायनिक जाँच रिपोर्ट का महत्व है, जिसकी तीस दिन की समयसीमा का वादा किया गया है।

जो आँकड़े नहीं दिए गए

चार चीज़ें ऐसी हैं जो इस विज्ञप्ति में नहीं हैं और जिनके बिना तस्वीर पूरी नहीं होती।

जब्ती का नशा-वार बँटवारा नहीं है, यानी 1.19 करोड़ किलो में गाँजा कितना और हेरोइन कितनी।

एनडीपीएस मुक़दमों की दोषसिद्धि दर नहीं दी गई। गोवा की कुल दोषसिद्धि दर दी गई है, जो सब अपराधों की है।

अदालतों में लंबित एनडीपीएस मामलों और विचाराधीन क़ैदियों की संख्या नहीं है। देश की जेलों में एनडीपीएस के विचाराधीन क़ैदियों का अनुपात लगातार चर्चा का विषय रहा है।

और नशे के प्रसार का कोई ताज़ा राष्ट्रीय सर्वेक्षण नहीं गिनाया गया। सामाजिक न्याय मंत्रालय ने 2019 में एक व्यापक सर्वेक्षण कराया था। उसके बाद का कोई तुलनीय आँकड़ा सार्वजनिक रूप से नहीं है।

तीन साल के रोडमैप में तिमाही समीक्षा का वादा है। पहली समीक्षा के आँकड़े जब आएँ, तो देखने की चीज़ यही रहेगी कि उनमें ये चारों हैं या नहीं।

स्रोतगृह मंत्रालय, पणजी में गृह मंत्री की संवाददाता सम्मेलन की विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026, राजस्व विभाग, एनडीपीएस अधिनियम की धारा 64A पर टिप्पणी, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, गृह मंत्रालय, गोवा की समीक्षा बैठक की विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026

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