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36 राज्यों के एएनटीएफ़ प्रमुखों का सम्मेलन आज, पर टास्क फ़ोर्स कब बनी इस पर गृह मंत्रालय के दस्तावेज़ ख़ुद असहमत

अमित शाह आज दिल्ली में तीसरे राष्ट्रीय एएनटीएफ़ सम्मेलन का उद्घाटन कर रहे हैं और लखनऊ-देहरादून में नए ज़ोनल परिसरों की नींव रखेंगे। पर गृह मंत्रालय की 2025 की विज्ञप्ति टास्क फ़ोर्स बनाने का निर्देश 2021 का बताती है, जबकि छह सितंबर 2026 की विज्ञप्ति उसे 2019 से जोड़ती है।

नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय की इमारत, जुलाई 2014 की तस्वीर। आज का सम्मेलन इसी मंत्रालय के अधीन नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो करा रहा है
तस्वीर: U.S. Department of State from United States, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

लखनऊ और देहरादून में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के नए ज़ोनल परिसरों की नींव आज पड़ रही है। गृह मंत्री अमित शाह ख़ुद यह नींव रखेंगे, नई दिल्ली में शुरू हो रहे एंटी-नारकोटिक्स टास्क फ़ोर्स प्रमुखों के तीसरे राष्ट्रीय सम्मेलन के मौक़े पर। सम्मेलन 22 और 23 सितंबर, दो दिन का है, और इसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो करा रहा है। 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एएनटीएफ़ प्रमुख इसमें शामिल हो रहे हैं।

इसी मौक़े पर ब्यूरो अपनी नई वेबसाइट शुरू करेगा, नशे के ख़िलाफ़ जागरूकता के टीवी विज्ञापन जारी होंगे, और सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के एएनटीएफ़ को सम्मानित किया जाएगा। यह ब्योरा सम्मेलन से पहले जारी सरकारी और एजेंसी सूचनाओं में दर्ज है।

सम्मेलन का विषय है यूनाइटेड रिज़ॉल्व, शेयर्ड रिस्पॉन्सिबिलिटी। साझा ज़िम्मेदारी के साथ एकजुट संकल्प। यह विषय नया नहीं है। यही विषय पिछले दो सम्मेलनों में भी था। नया क्या है, यह तीनों सम्मेलनों को साथ रखकर ही समझ आता है।

एएनटीएफ़ की अगुवाई एडीजी-आईजी स्तर का अधिकारी करता है

एएनटीएफ़ कोई नई संस्था नहीं है, और न ही यह किसी अलग क़ानून से बनी है। यह एक प्रशासनिक निर्देश है। लोकसभा में 11 फ़रवरी 2025 को गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के लिखित जवाब के मुताबिक़, हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में एक समर्पित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फ़ोर्स बनाई गई है। इसका मुखिया अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या पुलिस महानिरीक्षक स्तर का अधिकारी होता है। इसका काम एनकॉर्ड बैठकों में लिए गए फ़ैसलों पर अमल की निगरानी करना है। बाक़ी काम राज्य पुलिस का है।

एएनटीएफ़ राज्य पुलिस के भीतर बना एक समन्वय ढाँचा है। यह केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच कड़ी का काम करता है, अपने बूते स्वतंत्र जाँच एजेंसी की तरह मामले दर्ज नहीं करता। इसी लिखित जवाब में एक और परत दर्ज है: बड़ी जब्ती की जाँच पर नज़र रखने के लिए एनसीबी महानिदेशक की अध्यक्षता में अलग से एक संयुक्त समन्वय समिति बनी है। सीमा सुरक्षा बल, असम राइफ़ल्स, सशस्त्र सीमा बल, रेलवे सुरक्षा बल और तटरक्षक बल को भी एनडीपीएस अधिनियम के तहत तलाशी, ज़ब्ती और गिरफ़्तारी के अधिकार मिले हुए हैं। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण को 2020 में नार्को-आतंकवाद के मामलों की जाँच का विशेष अधिकार दिया गया था, यानी जहाँ नशे और आतंकवाद की फ़ंडिंग आपस में जुड़ी नज़र आएँ।

पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले में सीमा सुरक्षा बल के परिसर का प्रवेश द्वार, मार्च 2013 की तस्वीर। एनडीपीएस अधिनियम के तहत बीएसएफ़ को भी तलाशी और ज़ब्ती का अधिकार मिला हुआ है
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

सम्मेलन एनसीबी करा रहा है, गृह मंत्रालय के अधीन। इसमें 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एएनटीएफ़ प्रमुखों के अलावा दूसरे मंत्रालयों के प्रतिनिधि भी बुलाए गए हैं। पिछले सम्मेलन में गृह सचिव, आईबी निदेशक और एनसीबी महानिदेशक जैसे वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए थे, गृह मंत्रालय की 16 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति के मुताबिक़।

तीन सम्मेलन, तीन तारीखें

पहला सम्मेलन 19 अप्रैल 2023 को नई दिल्ली में हुआ। गृह मंत्रालय ने इसे बुलाया था और अमित शाह ने इसका उद्घाटन किया था। संयुक्त राष्ट्र के नशा एवं अपराध कार्यालय, यूएनओडीसी, के दक्षिण एशिया दफ़्तर के मुताबिक़, इसमें सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार, गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय, एनसीबी महानिदेशक एस.एन. प्रधान और यूएनओडीसी के दक्षिण एशिया प्रतिनिधि मार्को टेक्सेरा भी मौजूद थे। उसी सम्मेलन में तीन-सूत्री रणनीति घोषित हुई: संस्थागत ढाँचा मज़बूत करना, नशा-रोधी एजेंसियों में समन्वय बढ़ाना, और जन-जागरूकता अभियान चलाना। फ़ेहरिस्त लंबी थी। एक मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल, मैप ड्रग्स, भी उसी मौक़े पर शुरू हुआ, जिसका मक़सद अवैध खेती की पहचान और उसे नष्ट करना बताया गया।

दूसरा सम्मेलन 16 और 17 सितंबर 2025 को हुआ। वही शहर, वही विषय। गृह मंत्रालय की 13 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति के मुताबिक़ उसमें भी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एएनटीएफ़ प्रमुख आए थे। उस मौक़े पर एनसीबी की सालाना रिपोर्ट-2024 जारी हुई और ऑनलाइन ड्रग डिस्पोज़ल कैंपेन शुरू हुआ।

तीसरा सम्मेलन आज है। पहले और दूसरे के बीच क़रीब ढाई साल का फ़ासला था, अप्रैल 2023 से सितंबर 2025 तक। दूसरे और तीसरे के बीच सिर्फ़ एक साल है। सम्मेलन अब सालाना हो गया लगता है, दस्तावेज़ों की तारीख़ों से यही निकलता है।

टास्क फ़ोर्स कब बनी, इस पर मंत्रालय के दो बयान अलग हैं

यहाँ एक विसंगति है। यह ग़ौर करने लायक़ है, क्योंकि दोनों तरफ़ गृह मंत्रालय ही है।

गृह मंत्रालय की 13 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति के मुताबिक़, गृह मंत्री अमित शाह ने 2021 में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को समर्पित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फ़ोर्स बनाने का निर्देश दिया था। प्रसार भारती के न्यूज़ ऑन एयर पोर्टल पर उसी दिन छपी ख़बर ने भी यही तारीख़ दोहराई।

लेकिन छह सितंबर 2026 को गोवा में शाह की अपनी संवाददाता सम्मेलन की विज्ञप्ति, जिसे भारत पन्ना पहले रिपोर्ट कर चुका है, कहती है कि 2019 में चार-स्तरीय एनकॉर्ड ढाँचा बना और उसी साल हर राज्य को समर्पित एएनटीएफ़ बनाने का मॉडल भेजा गया।

दो साल का फ़ासला है, 2019 और 2021 के बीच।

एनकॉर्ड की चार-स्तरीय संरचना और एएनटीएफ़ बनाने का सीधा निर्देश, ये दो अलग क़दम हैं। इसलिए अलग-अलग साल में उठे हों, यह मुमकिन है। पर दोनों विज्ञप्तियाँ एक ही मंत्रालय की हैं, और दोनों में एएनटीएफ़ शब्द सीधे इस्तेमाल हुआ है, अलग-अलग साल के साथ। कौन सी तारीख़ सही है, यह उपलब्ध दस्तावेज़ों से तय नहीं होता। दोनों तारीख़ें यहाँ दर्ज हैं।

यह फ़र्क़ सिर्फ़ इतिहास की बात नहीं। टास्क फ़ोर्स कितने बरस पुरानी मानी जाए, इससे उसके काम को परखने का पैमाना बदलता है। 2021 से गिनें, तो मार्च 2027 तक हर राज्य में पूरी तरह सुसज्जित एएनटीएफ़ बनाने का जो लक्ष्य गृह मंत्रालय पहले ही घोषित कर चुका है, वह क़रीब छह साल में पूरा होगा। 2019 से गिनें, तो आठ साल में।

पिछले सम्मेलन के वादों का हिसाब अब तक नहीं मिला

दूसरे सम्मेलन में अमित शाह ने कई ठोस बातें कही थीं, गृह मंत्रालय की 16 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति के मुताबिक़। उन्होंने बताया कि देश के 272 ज़िलों ने एक भी एनकॉर्ड बैठक नहीं की थी, और सभी एएनटीएफ़ प्रमुखों से ज़िला कलेक्टरों को बैठकें कराने के लिए प्रेरित करने को कहा। पोर्टल पर राज्य-स्तरीय एनकॉर्ड बैठकों की रिपोर्टिंग ठीक करने की ज़रूरत है, यह भी उन्होंने कहा। यानी जो आँकड़ा दर्ज हो रहा था, उसमें ख़ुद गड़बड़ी थी। यह ख़ुद मंत्रालय की बात है।

उन्होंने हर राज्य से साल में 12 दिन इसी काम के लिए समर्पित करने को कहा। यह माँग बड़ी थी। हर तीन महीने में ज़ब्त नशीले पदार्थ नष्ट करने की वैज्ञानिक व्यवस्था बनाने की बात कही, क्योंकि पुलिस हिरासत में पड़ा माल ख़तरा है। हर एएनटीएफ़ प्रमुख से एक जाँच-सूची बनाने को कहा गया, जिसमें यह दर्ज हो कि जाँच कैसे हुई और ज़िला पुलिस ने मामले की पहचान में क्या किया। इस सूची की समीक्षा भी हर तीन महीने में होनी थी।

उन्होंने हर राज्य को एक विशेष दस्ता बनाने को कहा जो वित्तीय लेन-देन, हवाला और क्रिप्टो लेन-देन पर नज़र रखे। नेटवर्क की पूरी कड़ी पहचानने के लिए नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड यानी नैटग्रिड के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया। हर राज्य में नशे पर केंद्रित एक फ़ोरेंसिक लैब यूनिट होनी चाहिए, यह भी उन्होंने कहा, ताकि आरोपियों को आसानी से ज़मानत न मिले। हर सुझाव ठोस था।

चंडीगढ़ में केंद्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला की इमारत। दूसरे सम्मेलन में गृह मंत्री ने हर राज्य में नशे पर केंद्रित ऐसी ही एक फ़ोरेंसिक इकाई बनाने को कहा था
तस्वीर: ソキ, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

पीआईटी-एनडीपीएस लगाने में झिझक न बरतने और एनसीबी के पोर्टल पर दर्ज मामलों का अध्ययन कर अभियोजन मज़बूत करने को भी कहा गया। एनसीबी, सीबीआई और राज्य पुलिस के साझा तंत्र से भगोड़ों के प्रत्यर्पण को आसान बनाने पर भी ज़ोर रहा, न सिर्फ़ नशे बल्कि आतंकवाद और गैंगवार के भगोड़ों के लिए भी। मक़सद आँकड़े बनाना नहीं, बल्कि ऐसा भारत बनाना है जहाँ ऐसे आँकड़ों की ज़रूरत ही न पड़े, यह उन्होंने कहा।

इसी विज्ञप्ति में दर्ज है कि उस दिन तक 1 लाख 37 हज़ार 917 किलो नशीला माल, क़रीब 4,800 करोड़ रुपये का, 11 जगहों पर नष्ट किया जा चुका था। एनआईए ने पीआईटी-एनडीपीएस अधिनियम के तहत 18 मामले दर्ज किए थे, और एनसीबी ने राज्यों से मिले 35 से ज़्यादा मामलों में 360-डिग्री जाँच शुरू की थी।

यह सब एक साल पहले की बातें हैं। तीसरे सम्मेलन से पहले जारी किसी दस्तावेज़ में यह नहीं बताया गया कि 272 ज़िलों वाला आँकड़ा अब घटकर कितना रह गया, कितने राज्यों ने 12 दिन वाली प्रतिबद्धता निभाई, फ़ोरेंसिक लैब यूनिट कितने राज्यों में बनी, या तिमाही समीक्षा की व्यवस्था कहाँ तक लागू हुई। यह हिसाब न मिलना भी एक तथ्य है।

लखनऊ और देहरादून का चुनाव क्यों

आज के सम्मेलन में शाह लखनऊ और देहरादून में एनसीबी के नए ज़ोनल परिसरों की नींव रखेंगे। यह हर पूर्व-सूचना में एक जैसा दर्ज है। पर यह दोनों शहर ही क्यों, इसकी वजह किसी सरकारी दस्तावेज़ में इस डेस्क को नहीं मिली।

एनसीबी के अपने संगठनात्मक विवरण के मुताबिक़, लखनऊ ब्यूरो के शुरुआती 13 ज़ोनल दफ़्तरों में से एक है, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों के साथ। देहरादून पहले एक उप-ज़ोनल इकाई था, जिसे बाद के कैडर पुनर्गठन में ज़ोनल दर्जा दिया गया, अमृतसर और इंफाल जैसी कुछ और उप-ज़ोनल इकाइयों के साथ। यह पुनर्गठन ठीक कब हुआ, इसकी तारीख़ इस विवरण में नहीं है। इसी पुनर्गठन में रायपुर, भोपाल, जयपुर, कोच्चि, श्रीनगर, गोरखपुर, इटानगर, अगरतला, विशाखापत्तनम और जलपाईगुड़ी में भी नए दफ़्तर खुले थे।

दोनों जगह एनसीबी का दफ़्तर पहले से मौजूद है। आज जो बन रहा है, वह नए ज़ोन की नींव नहीं बल्कि नए परिसर की नींव है, यह भेद ध्यान देने लायक़ है। पहले से मौजूद ज़ोन को नई, समर्पित इमारत मिलना अलग बात है, नए ज़ोन का बनना अलग बात। इन्हीं दो शहरों को अभी क्यों चुना गया, इसका जवाब पूर्व-सूचनाओं की भाषा में नहीं है।

आठ सत्र, सात नाम

सम्मेलन की पूर्व-सूचनाओं में लगातार कहा गया है कि आठ तकनीकी सत्र होंगे। एएनआई की 21 सितंबर की रिपोर्ट, तथा उसी दिन द प्रिंट और डेली एक्सेलसियर में छपी ख़बरें, तीनों यही आँकड़ा दोहराती हैं। पर तीनों जगह सत्रों के नाम गिनने पर सात ही आते हैं: संस्थागत ढाँचा, नशा-तस्करी नेटवर्क और कार्टेल तोड़ना, माँग में कमी और पुनर्वास, प्रवर्तन की प्रभावशीलता, पूर्ववर्ती रसायन और सिंथेटिक ड्रग्स, अवैध खेती और वैकल्पिक फ़सलें, और डार्कनेट-क्रिप्टोकरेंसी से जुड़ी जाँच। आठवाँ सत्र किसी रिपोर्ट में अलग से नहीं गिना गया।

यह पहली बार नहीं हुआ। पिछले साल की गृह मंत्रालय विज्ञप्ति में भी आठ तकनीकी सत्रों का दावा था। पर रोमन अंकों में सूची सात पर ख़त्म होती है, आई से सात तक, जिसमें से एक सत्र नेटवर्क तोड़ने पर दो हिस्सों में बँटा बताया गया था। दोनों साल एक ही जगह अटकते हैं। इस साल का आठवाँ सत्र क्या है, यह एनसीबी की अपनी एजेंडा शीट से ही पता चलेगा, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

एक विषय हर साल दोहराया गया है: डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी। दूसरे सम्मेलन में शाह ने ख़ुद कहा था कि सिंथेटिक ड्रग्स और लैब का चलन आने वाले दिनों में बढ़ने की आशंका है। उन्होंने हर राज्य के एएनटीएफ़ प्रमुख से डार्कनेट विश्लेषण, क्रिप्टोकरेंसी ट्रैकिंग और मेटाडेटा विश्लेषण जैसी तकनीकें अपनाने को कहा था। यह किसी ट्रेंड-रिपोर्ट का दावा नहीं। यह गृह मंत्री का अपना बयान है, दर्ज गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति में।

स्वीडन के एक विश्वविद्यालय का सर्वर कक्ष, दिसंबर 2010 की तस्वीर; यह भारत की किसी एजेंसी का नहीं है। सम्मेलन के जिस सत्र में डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी की जाँच पर चर्चा होगी, वहाँ यही तकनीकी बुनियाद काम आती है
तस्वीर: Esquilo, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

सबसे बेहतर एएनटीएफ़ का सम्मान, मापदंड सार्वजनिक नहीं

आज सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के एएनटीएफ़ को सम्मानित किया जाएगा। यह हर पूर्व-सूचना में है। किस आधार पर बेहतर प्रदर्शन तय होता है, यह किसी में नहीं है। जब्ती का वज़न, मामलों की संख्या, सज़ा की दर, या एनकॉर्ड बैठकों की नियमितता, इनमें से कौन-सा पैमाना इस्तेमाल हुआ, एनसीबी ने सार्वजनिक नहीं किया।

यह मापदंड न बताना दिलचस्प है। मार्च 2027 तक हर राज्य में पूरी तरह सुसज्जित एएनटीएफ़ बनाने की जो समयसीमा गृह मंत्रालय पहले घोषित कर चुका है, उसके हिसाब से अब क़रीब सत्रह महीने बचे हैं। कौन-से राज्यों ने अपना एएनटीएफ़ ढाँचा पहले ही पूरा कर लिया और कौन-से पीछे हैं, यह ठीक वही आँकड़ा है जो सम्मान देने के लिए काम आ सकता था। आज की पूर्व-सूचनाओं में राज्यवार प्रगति की कोई तालिका नहीं है। सम्मेलन के दौरान ऐसी कोई तालिका जारी होने का ज़िक्र भी कहीं नहीं है।

आँकड़ा एनसीबी के भीतर मौजूद हो सकता है। पर सम्मेलन शुरू होने तक वह सार्वजनिक दस्तावेज़ों में नहीं आया। एनसीबी अगर सम्मेलन के दौरान या बाद में राज्यवार तालिका जारी करे, तो वह ख़ुद अलग से जाँचने लायक़ ख़बर होगी।

आज के सम्मेलन पर अभी कोई सरकारी विज्ञप्ति नहीं

इस लेख को लिखे जाने तक पीआईबी की वेबसाइट पर आज के सम्मेलन के लिए गृह मंत्रालय की अपनी कोई विज्ञप्ति नहीं मिली। पिछले सम्मेलन में मंत्रालय ने सम्मेलन से पहले और उद्घाटन वाले दिन, दोनों मौक़ों पर अलग-अलग विज्ञप्तियाँ जारी की थीं। इस बार अब तक जो पढ़ने को मिला, वह समाचार एजेंसियों की पूर्व-सूचनाएँ हैं, मंत्रालय का अपना बयान नहीं।

सम्मेलन के दौरान असल में क्या तय हुआ, राज्यों ने अपनी प्रगति पर क्या बताया, और आठवें सत्र में क्या हुआ, इनमें से कोई भी बात अभी किसी दर्ज दस्तावेज़ में मौजूद नहीं है। 2026 में अब तक की जब्ती, गिरफ़्तारी या पूर्ववर्ती रसायन की मात्रा का कोई आँकड़ा भी आज के सम्मेलन से जोड़कर किसी दस्तावेज़ में नहीं दिया गया। इसलिए यहाँ भी कोई आँकड़ा नहीं जोड़ा जा रहा।

सम्मेलन शुरू हो चुका है। दो नए भवनों की नींव पड़ रही है। एक सम्मान बँट रहा है जिसकी शर्तें अब तक सार्वजनिक नहीं। बाक़ी तस्वीर गृह मंत्रालय की अपनी अगली विज्ञप्ति के बाद ही साफ़ होगी।

स्रोतगृह मंत्रालय, दूसरे एएनटीएफ़ सम्मेलन की पूर्व-सूचना विज्ञप्ति, 13 सितंबर 2025, गृह मंत्रालय, दूसरे एएनटीएफ़ सम्मेलन में गृह मंत्री के संबोधन की विज्ञप्ति, 16 सितंबर 2025, गृह मंत्रालय, लोकसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का लिखित जवाब, 11 फ़रवरी 2025, गृह मंत्रालय, पणजी संवाददाता सम्मेलन विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026, यूएनओडीसी दक्षिण एशिया, पहले एएनटीएफ़ सम्मेलन की रिपोर्ट, 19 अप्रैल 2023, प्रसार भारती, न्यूज़ ऑन एयर, 13 सितंबर 2025, एएनआई, 21 सितंबर 2026, 14:04 बजे, द प्रिंट, 21 सितंबर 2026, डेली एक्सेलसियर, 21 सितंबर 2026, विकिपीडिया, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का संगठनात्मक विवरण

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