भारत पन्ना
देश

नक़ली दवा के आरोप में बेंगलुरु की कृपा हेल्थकेयर पर छापा, मालिक गिरफ़्तार

शनिवार, 12 सितंबर को बेंगलुरु पुलिस की विशेष जाँच टीम और कर्नाटक के औषधि नियंत्रण विभाग ने मिनर्वा सर्कल के पास एक थोक दवा कारोबार के दफ़्तर और गोदाम की तलाशी ली और मालिक वीरेश कुमार जैन को गिरफ़्तार किया। जाँच अधिकारियों का कहना है कि कैंसर की दवाएँ, जीवन रक्षक दवाएँ और आईसीयू के इंजेक्शन एमआरपी से क़रीब आधे दाम पर 90 से ज़्यादा अस्पतालों, क्लीनिकों और दवा दुकानों तक पहुँचे। यह संख्या जाँच एजेंसी का आकलन है और नमूने अभी प्रयोगशालाओं में हैं।

डिब्बे से बाहर निकली गोलियों और कैप्सूलों की ढेरी, दिसंबर 2009 की यह तस्वीर इस मामले की नहीं है; पैकेट से अलग हो जाने पर दवा की पहचान सिर्फ़ प्रयोगशाला की जाँच से होती है
तस्वीर: Pöllö, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

बेंगलुरु पुलिस की विशेष जाँच टीम और कर्नाटक के औषधि नियंत्रण विभाग ने शनिवार, 12 सितंबर को शहर के मिनर्वा सर्कल के पास कृपा हेल्थकेयर नाम के थोक दवा कारोबार के दफ़्तर और गोदाम की तलाशी ली। पुलिस के मुताबिक़ वहाँ से नक़ली होने के संदेह वाली दवाओं का बड़ा ज़ख़ीरा मिला, और कारोबार के मालिक वीरेश कुमार जैन को गिरफ़्तार किया गया।

जाँच अधिकारियों का कहना है कि इस कथित नेटवर्क से कैंसर की दवाएँ, दूसरी जीवन रक्षक दवाएँ और आईसीयू के इंजेक्शन बेंगलुरु और आसपास के 90 से ज़्यादा अस्पतालों, क्लीनिकों और दवा दुकानों तक पहुँचे। आरोप है कि एक्सपायर और सस्ती दवाओं को नए डिब्बों में भरकर नामी कंपनियों जैसे लेबल लगाए गए और उन्हें छपी क़ीमत से क़रीब आधे दाम पर बेचा गया।

अदालत में अभी कुछ भी साबित नहीं हुआ है। ज़ब्त दवाओं के नमूने प्रयोगशालाओं में हैं और उनकी रिपोर्ट आनी बाक़ी है।

कारख़ाने से किसी मरीज़ की नस तक पहुँचने के बीच दवा पर पाँच सरकारी मुहरें लगती हैं: थोक विक्रेता का लाइसेंस, बिल और बैच का रजिस्टर, अस्पताल की ख़रीद प्रक्रिया, औषधि निरीक्षक का उठाया नमूना, और सीडीएससीओ की मासिक सूची। यह लेख उन पाँचों का हिसाब है, दस्तावेज़ दर दस्तावेज़।

शनिवार की कार्रवाई और 18 अगस्त का छापा

पुलिस के मुताबिक़ कृपा हेल्थकेयर तक पहुँचने का रास्ता एक पुराने मामले से निकला। 18 अगस्त को बिदादी और दोड्डेरी इलाक़े के एक फ़ार्महाउस पर छापा पड़ा था, जहाँ से क़रीब पाँच करोड़ रुपये की संदिग्ध नक़ली दवाएँ, नक़ली बिल, इंजेक्शन भरने की मशीन और नक़ली लेबल ज़ब्त हुए। कंट्री ऐंड पॉलिटिक्स ने इस ज़ब्ती का आँकड़ा 4.91 करोड़ रुपये से पाँच करोड़ के बीच लिखा है। इस फ़ार्महाउस का पता स्रोतों में एक जैसा नहीं है: इंडियन एक्सप्रेस ने बिदादी और दोड्डेरी को बेंगलुरु दक्षिण ज़िले में बताया है, सियासत और कंट्री ऐंड पॉलिटिक्स ने रामनगर ज़िले में।

उस ज़ब्ती के बाद जाँच का दायरा बढ़ा। डेक्कन क्रॉनिकल के मुताबिक़ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. ख़ादर ने इस काम के लिए विशेष जाँच टीम बनाई, जिसके मुखिया संयुक्त पुलिस आयुक्त वंशीकृष्ण हैं; इंडियन एक्सप्रेस ने उनका पद संयुक्त पुलिस आयुक्त (पश्चिम) दर्ज किया है। सियासत के मुताबिक़ एसआईटी और औषधि नियंत्रण विभाग ने छह राज्यों में दस से ज़्यादा जगहों पर एक साथ तलाशी ली। नाम पाँच के आते हैं: कर्नाटक, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र। छठे का नाम किसी रिपोर्ट में नहीं है, हालाँकि न्यूज़फ़र्स्ट प्राइम और कंट्री ऐंड पॉलिटिक्स दोनों ने महाराष्ट्र के साथ गुजरात तक दवा जाने की बात लिखी है।

वंशीकृष्ण ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि अंतरराज्यीय वितरण का पूरा फैलाव, दवाएँ कहाँ-कहाँ गईं और लेन-देन कितने का था, यह अभी तय होना है। "हमने बैंक लेन-देन के रिकॉर्ड, ख़रीद और बिक्री के वाउचर और दूसरे दस्तावेज़ ज़ब्त किए हैं। दवा और पैसे, दोनों का बहाव तय करने के लिए इन्हें मिलाया जा रहा है," उन्होंने कहा।

अब तक की गिरफ़्तारी एक ही है। पुलिस के मुताबिक़ वीरेश कुमार जैन क़रीब पाँच साल से यह कारोबार चला रहे थे, और प्रशांत नाम के जिस व्यक्ति को जाँच अधिकारी इस नेटवर्क का मुख्य आरोपी बताते हैं, उनसे वीरेश का जुड़ाव जाँच के दायरे में है। प्रशांत फ़रार हैं। न्यूज़फ़र्स्ट प्राइम के मुताबिक़ जाँच में सामने आया है कि कृपा हेल्थकेयर 2021 में पंजीकृत हुई थी, और उससे पहले वीरेश छोटा फुटकर कारोबार करते थे। पंजीकरण का यह साल और "क़रीब पाँच साल" का आँकड़ा आपस में मिलते हैं।

नब्बे अस्पतालों का आँकड़ा कहाँ से आया

यह संख्या किसी बरामद सूची पर नहीं टिकी। जाँच अधिकारियों ने इसे अपने आकलन के तौर पर बताया है। डेक्कन क्रॉनिकल ने इसे "सूत्रों" के हवाले से "क़रीब 90 अस्पताल और क्लीनिक" लिखा, इंडियन एक्सप्रेस ने "जाँचकर्ताओं को संदेह है" के साथ "90 से ज़्यादा", और सियासत ने "बेंगलुरु और आसपास के 90 से ज़्यादा अस्पताल, क्लीनिक और दवा दुकानें"। किसी दस्तावेज़ में किसी अस्पताल का नाम अभी सार्वजनिक नहीं है।

ऐसी सूची बन सकती है, और उसका काग़ज़ मौजूद है। थोक बिक्री का हर बिल नियम से ख़रीदार का नाम, उसका बिक्री लाइसेंस नंबर, दवा का नाम, मात्रा और बैच नंबर दर्ज करता है। वंशीकृष्ण के बयान में ज़ब्त "ख़रीद और बिक्री के वाउचर" इसी काग़ज़ का नाम हैं।

कंट्री ऐंड पॉलिटिक्स के मुताबिक़ एसआईटी अभी ज़ब्त बैच नंबरों और रिकॉर्ड को मिलाकर यही तय कर रही है कि दवाएँ किन-किन प्रतिष्ठानों तक गईं।

एक बात यहीं साफ़ रहनी चाहिए। किसी अस्पताल का नाम ऐसी सूची में आना उस अस्पताल पर आरोप नहीं है। वह लाइसेंसधारी थोक विक्रेता से बिल पर दवा ख़रीदने वाला ख़रीदार भी हो सकता है।

फ़ॉर्म 20-बी और थोक विक्रेता का काग़ज़ी रिकॉर्ड

थोक में दवा बेचने के लिए औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियमावली, 1945 के तहत फ़ॉर्म 20-बी या 21-बी का लाइसेंस चाहिए। नियम 64 के परंतुक में लाइसेंस देने वाले अफ़सर को दो चीज़ें देखनी होती हैं। पहली, जगह कम से कम दस वर्ग मीटर की हो, और उसी पते पर फुटकर बिक्री का फ़ॉर्म 20 या 21 भी लेना हो तो पंद्रह वर्ग मीटर की। दूसरी, दुकान एक "सक्षम व्यक्ति" के ज़िम्मे हो।

सक्षम व्यक्ति की परिभाषा नियम में तीन विकल्पों की है: वह पंजीकृत फ़ार्मासिस्ट हो, या मैट्रिक या उसके बराबर की परीक्षा पास हो और दवा बेचने का चार साल का तजुर्बा रखता हो, या किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की डिग्री के साथ दवाओं से जुड़े काम का एक साल का तजुर्बा रखता हो। थोक दवा के गोदाम में फ़ार्मासिस्ट का होना क़ानूनन ज़रूरी नहीं है।

इसके आगे लाइसेंस जो कुछ जाँचता है, वह काग़ज़ है। नियम 65 के उपनियम 5 के मुताबिक़ थोक में हुई हर बिक्री नक़द या उधार के एक मेमो पर होगी, जिस पर विक्रेता का नाम, पता और लाइसेंस नंबर छपा होगा, और जिसमें बिक्री की तारीख़, ख़रीदार का नाम-पता और उसका बिक्री लाइसेंस नंबर, दवा का नाम, मात्रा और बैच नंबर, निर्माता का नाम, और उस सक्षम व्यक्ति के दस्तख़त दर्ज होंगे जिसकी देखरेख में बिक्री हुई। सरकारी एजेंसी, अस्पताल, शिक्षण या शोध संस्थान, या अपने मरीज़ों को देने के लिए ख़रीदने वाले पंजीकृत डॉक्टर के मामले में उस संस्था या डॉक्टर का नाम-पता लिखना होता है। इन मेमो की कार्बन प्रति तीन साल संभालकर रखनी होती है।

तीन ब्लिस्टर पट्टियों की पन्नी पर उभरे बैच नंबर और एक्सपायरी की तारीख़, ब्रांड का नाम कहीं नहीं, जून 2025 की तस्वीर; नियम 65 के मुताबिक़ थोक बिक्री के हर मेमो में यही बैच नंबर दर्ज होना चाहिए
तस्वीर: Tarasna0922, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

ख़रीद की तरफ़ भी यही अनुशासन है। जो दवा आगे बेचने के लिए ख़रीदी गई है, उसके रिकॉर्ड में ख़रीद की तारीख़, जिससे ख़रीदी उसका नाम, पता और लाइसेंस नंबर, दवा का नाम, मात्रा और बैच नंबर, और निर्माता का नाम दर्ज होगा। ख़रीद बिल क्रम संख्या डालकर तारीख़वार रखे जाएँगे। रजिस्टर कम से कम दो साल सुरक्षित रहेंगे, और निरीक्षक के माँगने पर पेश करने होंगे। 1940 के क़ानून की धारा 18ए इससे एक क़दम आगे जाती है: जो व्यक्ति ख़ुद निर्माता या उसका वितरण एजेंट नहीं है, वह निरीक्षक के पूछने पर बताने को बाध्य है कि उसने यह दवा किससे ली।

पूरा ढाँचा इस मान्यता पर टिका है कि बिल सच बोलता है। 18 अगस्त के फ़ार्महाउस से ज़ब्त बताई गई चीज़ों में नक़ली बिल और नक़ली लेबल, दोनों हैं।

एमआरपी, व्यापार मार्जिन और आधी क़ीमत की ख़रीद

किसी अस्पताल के ख़रीद अफ़सर के सामने जब कोई थोक विक्रेता कैंसर की दवा डिब्बे पर छपी क़ीमत से पचास फ़ीसदी कम पर रखता है, तो वह छूट अपने आप शक़ पैदा नहीं करती। इसकी वजह सरकार के अपने काग़ज़ में दर्ज है।

दवाओं की क़ीमत दो हिस्सों में बँटी है। अनुसूचित फ़ॉर्मूलेशन की अधिकतम क़ीमत एनपीपीए तय करता है। ग़ैर-अनुसूचित दवाओं की एमआरपी कंपनी ख़ुद तय करती है, और उस पर सालाना बढ़ोतरी की सीमा भर लगती है। कैंसर की ज़्यादातर दवाएँ लंबे समय तक दूसरी श्रेणी में रहीं। फ़रवरी 2019 में एनपीपीए ने 42 ग़ैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर दाम की सीधी सीमा नहीं लगाई, स्टॉकिस्ट की क़ीमत और एमआरपी के बीच के व्यापार मार्जिन पर 30 फ़ीसदी की सीमा लगाई। अपने परिचय पृष्ठ पर एनपीपीए इसे ग़ैर-अनुसूचित दवाओं के लिए "प्रयोग का प्रमाण" कहता है और बताता है कि इससे 526 ब्रांड में 984 करोड़ रुपये सालाना की बचत हुई और कटौती 90 फ़ीसदी तक पहुँची।

उस दावे के नीचे एक सूची है जिसे पढ़ा जा सकता है। एनपीपीए ने 8 मार्च 2019 से लागू संशोधित एमआरपी की ग्यारह पन्ने की तालिका छापी, जिसमें हर ब्रांड की पुरानी क़ीमत, नई क़ीमत और कटौती का फ़ीसदी दर्ज है। सूची 526 पंक्तियों तक जाती है। जिन 454 पंक्तियों में पुरानी और नई, दोनों क़ीमतें साथ दर्ज हैं, उनमें कटौती का मध्यमान 47.6 फ़ीसदी है। 203 ब्रांड की छपी क़ीमत आधी या उससे ज़्यादा गिरी, 57 ब्रांड की तीन-चौथाई से ज़्यादा।

तालिका की सबसे ऊपरी पंक्तियाँ यह बताती हैं कि छपी हुई क़ीमत क्या चीज़ थी। अर्लोटिनिब 150 मिलीग्राम की दस गोलियों के एक ब्रांड की एमआरपी 9,999 रुपये थी, जो 891.79 रुपये पर आ गई: 91.08 फ़ीसदी की कटौती। पेमेट्रेक्सेड 500 मिलीग्राम इंजेक्शन की एक शीशी 25,400 रुपये पर बिकती थी, जो 2,509 रुपये की हुई। एक और पेमेट्रेक्सेड ब्रांड 19,440 रुपये से 2,543.83 रुपये पर आया।

कैंसर की दवाओं के काँच के एम्प्यूल और शीशियाँ, अमेरिकी राष्ट्रीय कैंसर संस्थान की 1986 की श्वेत-श्याम तस्वीर; पेमेट्रेक्सेड 500 मिलीग्राम की ऐसी ही एक शीशी की छपी क़ीमत 2019 में 25,400 रुपये से 2,509 रुपये पर आ गई थी
तस्वीर: Bill Branson (Photographer), विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

इस श्रेणी की दवाओं पर डिब्बे पर छपा नंबर कभी कोई ज़मीन नहीं था। जिस बाज़ार में सरकार का एक आदेश छपी हुई क़ीमत को नब्बे फ़ीसदी तक गिरा दे, उसमें पचास फ़ीसदी की छूट किसी ख़रीद अफ़सर के लिए असामान्य संख्या नहीं बनती। न्यूज़फ़र्स्ट प्राइम के मुताबिक़ जाँच में सामने आई कहानी भी यही है: आरोपियों ने यह भरोसा किया कि जिस मरीज़ को दवा चाहिए, वह सस्ती मिलने पर ख़ुश होगा और उसकी असलियत पर सवाल कम उठाएगा।

अस्पताल की ख़रीद प्रक्रिया जो जाँचती है, वह आपूर्तिकर्ता का लाइसेंस नंबर, बैच, एक्सपायरी और बिल है। दवा की जाँच वह नहीं कराती। पहचान की एक और परत क्यूआर कोड की है: 17 नवंबर 2022 की अधिसूचना जीएसआर 823(ई) के तहत, जो 1 अगस्त 2023 से लागू है, अनुसूची एच-2 में गिनाए गए शीर्ष 300 ब्रांड पर बारकोड या क्यूआर कोड छापना ज़रूरी है। यह परत दो तरह से बँधी है: 300 ब्रांड तक, और कोड निर्माता के पैकेट पर छपता है, यानी उसी पैकेट पर जिसकी नक़ल बनाने का आरोप इस मामले में है।

नमूना उठाने की प्रक्रिया और कर्नाटक के आठ निरीक्षक

बाज़ार में चल रही दवा की असली जाँच एक ही रास्ते से होती है: औषधि निरीक्षक नमूना उठाए। 1940 के क़ानून की धारा 23 इस काम को बारीकी से बाँधती है। निरीक्षक उचित क़ीमत चुकाकर नमूना लेता है, लिखित में बताता है कि वह जाँच के लिए है, और जिस व्यक्ति से लिया है उसकी मौजूदगी में नमूने को चार हिस्सों में बाँटकर सील और निशान लगाता है। वह व्यक्ति अपनी मुहर भी लगा सकता है। कारख़ाने से लिए नमूने के तीन ही हिस्से होते हैं।

चारों हिस्सों की मंज़िल अलग है। एक उसी व्यक्ति को लौटता है जिससे नमूना लिया गया, एक सरकारी विश्लेषक के पास जाँच के लिए जाता है, एक उस अदालत में पेश होता है जहाँ मुक़दमा चले, और चौथा उस व्यक्ति को भेजा जाता है जिसका नाम-पता धारा 18ए के तहत बताया गया हो, यानी जिससे यह दवा ख़रीदी गई थी।

दस्ताने पहने एक विश्लेषक गोली को घुलनशीलता जाँचने वाले उपकरण के पात्र में रखता हुआ, अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन की प्रयोगशाला की फ़रवरी 2013 की तस्वीर; भारत में नमूने का एक हिस्सा इसी तरह सरकारी विश्लेषक की मेज़ तक पहुँचता है
तस्वीर: The U.S. Food and Drug Administration, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

धारा 25 आगे का रास्ता तय करती है। सरकारी विश्लेषक तीन प्रतियों में हस्ताक्षरित रिपोर्ट देता है। उसमें लिखी बातें साक्ष्य मानी जाती हैं, और वह साक्ष्य निर्णायक हो जाता है, बशर्ते जिससे नमूना लिया गया वह प्रति मिलने के अट्ठाईस दिन के भीतर लिखकर यह न बताए कि वह रिपोर्ट के ख़िलाफ़ सबूत पेश करेगा।

यह पूरी प्रक्रिया एक निरीक्षक के दुकान तक पहुँचने से शुरू होती है। कर्नाटक में वे निरीक्षक कितने हैं, यह आँकड़ा डेक्कन हेराल्ड ने 20 जनवरी 2025 को राज्य के विभाग के हवाले से छापा था: स्वीकृत 112 पदों पर आठ औषधि निरीक्षक काम पर थे, और हर महीने नमूने उठाने का लक्ष्य 55 सहायक औषधि नियंत्रकों के कंधों पर आ गया था। उसी रिपोर्ट में दर्ज है कि 1 जनवरी 2022 से 18 जनवरी 2025 के बीच कर्नाटक में 1,007 बैच अधोमानक, यानी नॉट ऑफ़ स्टैंडर्ड क्वालिटी, घोषित हुए: पैरासिटामॉल के 96, डॉम्पेरिडोन के 53, फ़ोलिक एसिड के 52 और रिंगर लैक्टेट की ड्रिप के 86। इनमें सिर्फ़ 30 बैच कर्नाटक की 16 कंपनियों के बनाए थे, बाक़ी बाहर से आए।

पद ख़ाली रहने की वजह एक क़ानूनी विवाद थी, और वह अब तय हो चुका है। कर्नाटक लोक सेवा आयोग ने निरीक्षक भर्ती में डिग्री के साथ अनुसूची सी या सी-1 की दवाओं के निर्माण या परीक्षण का अठारह महीने का तजुर्बा अनिवार्य रखा था। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा राज्य बनाम कृष्ण कुमार और उससे जुड़े मामलों में हरियाणा और कर्नाटक, दोनों की अपीलें ख़ारिज कर दीं। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि नियुक्ति का अधिकार भले केंद्र और राज्य दोनों के पास हो, योग्यता वही चलेगी जो केंद्र के बनाए नियम 49 में लिखी है। नियम 49 फ़ार्मेसी या फ़ार्मास्युटिकल साइंसेज़ की डिग्री माँगता है, या क्लिनिकल फ़ार्माकोलॉजी या माइक्रोबायोलॉजी में विशेषज्ञता के साथ मेडिसिन की डिग्री। उसमें अठारह महीने का तजुर्बा एक अलग काम के लिए दर्ज है: अनुसूची सी की दवाओं के निर्माण का निरीक्षण करने के अधिकार के लिए।

मशेलकर समिति ने जो मानक सुझाया था, वह एक निरीक्षक पर 200 बिक्री प्रतिष्ठान का था, और वह भी इस शर्त पर उदार बनाया गया कि लाइसेंस पाँच साल चलेगा और वैधानिक निरीक्षण साल में एक बार होगा।

सीडीएससीओ की मासिक सूची का इस साल का हिसाब

हर महीने सीडीएससीओ एक सूची छापता है, जिसमें उस महीने जाँच में फ़ेल हुए नमूने दर्ज होते हैं। 2025 से यह सूची पीडीएफ़ से हटकर एक सार्वजनिक डेटाबेस में आ गई है, जिसके दो अलग हिस्से हैं: एक अधोमानक दवाओं का, दूसरा नक़ली दवाओं का।

13 सितंबर 2026 को यह डेटाबेस पढ़ने पर 2026 का हिसाब यह बनता है। अधोमानक की प्रविष्टियाँ जनवरी में 218, फ़रवरी में 217, मार्च में 190, अप्रैल में 121, मई में 162, जून में 193 और जुलाई में 239। सात महीनों का जोड़ 1,340। नक़ली की सूची उसी अवधि में कुल 14 प्रविष्टियाँ दिखाती है: जनवरी में चार, फ़रवरी में चार, मार्च में एक, अप्रैल में दो, मई में दो, जून में एक भी नहीं, और जुलाई में एक।

जुलाई 2026 की पूरे देश की नक़ली दवा सूची में वह एक ही प्रविष्टि है: ब्यूप्रेनॉर्फ़िन इंजेक्शन आईपी 2 मिलीलीटर, बैच एलएम1888, जाँच केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कोलकाता में हुई। निर्माता वाले ख़ाने में कंपनी का नाम नहीं, "जाँच जारी है" लिखा है। मार्च 2026 में उसी प्रयोगशाला ने उसी इंजेक्शन का बैच एलएम1889 इसी सूची में डाला था।

चौदह में से दस प्रविष्टियों में निर्माता का ख़ाना इसी तरह ख़ाली है। चौदहों में टिप्पणी एक ही वाक्य की है, कि उत्पाद नक़ली प्रतीत होता है और यह जाँच के नतीजे पर निर्भर है। कंपनी का जवाब भी चौदहों में एक ही वाक्य का है: लेबल पर जिस निर्माता का नाम छपा है, उसने बताया है कि यह बैच उसने नहीं बनाया। नक़ली का निर्धारण इसी इनकार पर टिका है।

सूची जो नहीं बताती, वह भी उतना ही अहम है। चौदह में एक भी कैंसर की दवा नहीं है। सूची में वे नमूने आते हैं जो उठाए गए और फ़ेल हुए, बाज़ार में चल रही दवाओं का अनुपात इससे नहीं निकलता। और सूची राज्यों के भेजने पर टिकी है: जुलाई 2026 के लिए 13 सितंबर तक 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने अपनी रिपोर्ट नहीं भेजी थी, जिनमें बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर शामिल हैं। अगस्त 2026 के ख़ाने में एक भी प्रविष्टि नहीं है; वहाँ सैंतीसों राज्य और केंद्रशासित प्रदेश बाक़ी दिखते हैं।

इसीलिए मासिक सूची को जोड़कर साल का आँकड़ा नहीं बनता। 2 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में दिए गए उत्तर के मुताबिक़, जिसे द साउथ फ़र्स्ट ने अगले दिन छापा, 2024-25 में प्रयोगशालाओं ने 1,16,323 नमूने जाँचे, जिनमें 3,104 अधोमानक निकले और 245 नक़ली या मिलावटी। उससे पिछले साल 1,06,150 नमूनों में 2,988 और 282। पाँच बरस में जाँचे गए नमूने 37 फ़ीसदी बढ़े, अधोमानक की संख्या 2,500 और 3,100 के बीच टिकी रही, और नक़ली की पहचान 2022-23 के 424 से गिरकर 245 पर आ गई, जबकि उसी साल अभियोजन 961 तक पहुँचे।

बेंगलुरु में जिस तरीक़े का आरोप है, उसके लिए इस तंत्र में एक ख़ास अंधा कोना है। एक्सपायरी निकल चुकी असली दवा नए डिब्बे और नए लेबल के साथ बेची जाए, तो प्रयोगशाला में उसका रसायन ठीक निकल सकता है। गड़बड़ी लेबल में है, और लेबल ही वह चीज़ है जिसे यह पूरी व्यवस्था सच मानकर चलती है।

धारा 17बी की 'नक़ली' और धारा 16 की 'अधोमानक'

रोज़ की भाषा में नक़ली दवा का मतलब बेअसर दवा है। क़ानून की भाषा में ये दो अलग सवाल हैं।

1940 के क़ानून की धारा 16 कहती है कि "मानक गुणवत्ता" का अर्थ है दवा दूसरी अनुसूची में तय मानक पर खरी उतरे। इस पर फ़ेल नमूना अधोमानक कहलाता है। धारा 17ए मिलावटी दवा की परिभाषा देती है: गंदी या सड़ी चीज़ की मौजूदगी, अस्वच्छ हालात में तैयारी या भंडारण, और ऐसी मिलावट जो दवा की गुणवत्ता या ताक़त घटा दे।

धारा 17बी अलग सवाल पूछती है, पहचान का। इसके मुताबिक़ दवा नक़ली मानी जाएगी अगर वह किसी दूसरी दवा के नाम से बनाई गई हो; अगर वह किसी दूसरी दवा की नक़ल या विकल्प हो, या उससे इस तरह मिलती हो कि धोखा हो जाए, या उसके लेबल या डिब्बे पर किसी दूसरी दवा का नाम हो और साफ़-साफ़ यह न लिखा हो कि वह उससे अलग चीज़ है; अगर लेबल पर निर्माता के तौर पर ऐसी कंपनी का नाम छपा हो जो काल्पनिक हो या जिसका वजूद न हो; अगर उसमें पूरी तरह या अंशतः कोई दूसरी दवा भर दी गई हो; या अगर वह किसी ऐसे निर्माता का उत्पाद होने का दावा करे जिसका वह वाक़ई उत्पाद नहीं है।

सही रसायन वाली दवा भी नक़ली हो सकती है, अगर उस पर किसी और का नाम छपा हो। बेंगलुरु के मामले में प्रयोगशाला की रिपोर्ट इसीलिए अकेली फ़ैसला नहीं करेगी। रसायन की जाँच धारा 16 वाले सवाल का जवाब देगी; धारा 17बी वाले सवाल का जवाब लेबल, बिल, बैच नंबर और उस कंपनी के बयान से बनेगा जिसका नाम डिब्बे पर छपा है।

सज़ा भी इसी लकीर पर बँटी है। धारा 27 के खंड (क) में वह दवा आती है जो मिलावटी या नक़ली होने के कारण मौत या गंभीर चोट की वजह बन सकती है; सज़ा कम से कम दस साल से उम्रक़ैद तक, जुर्माना कम से कम दस लाख रुपये या ज़ब्त दवाओं की क़ीमत का तिगुना, जो ज़्यादा हो। खंड (ग) में वे नक़ली दवाएँ हैं जो इस श्रेणी में नहीं आतीं; सज़ा कम से कम सात साल से उम्रक़ैद तक, जुर्माना कम से कम तीन लाख रुपये या ज़ब्त क़ीमत का तिगुना। बिना वैध लाइसेंस बनाई या बेची गई दवा खंड (ख) में है, तीन से पाँच साल और कम से कम एक लाख रुपये।

ये संख्याएँ 2008 के संशोधन की हैं। क़ानून के अपने फ़ुटनोट बताते हैं कि 10 अगस्त 2009 से पहले खंड (क) की सज़ा कम से कम पाँच साल और जुर्माना दस हज़ार रुपये था, और खंड (ख) की सज़ा एक से तीन साल और जुर्माना पाँच हज़ार। उसी संशोधन ने एक नया प्रावधान जोड़ा: खंड (क) में वसूला गया जुर्माना उस व्यक्ति को मुआवज़े के तौर पर मिलेगा जिसने वह दवा इस्तेमाल की, और उसकी मौत हो जाने पर उसके रिश्तेदार को, जिसकी परिभाषा क़ानून में गिनाई गई है।

उसी संशोधन से धारा 36एबी और 36एसी आईं। पहली के तहत सरकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करके सत्र न्यायालयों को विशेष अदालत अधिसूचित करती है। दूसरी नक़ली और मिलावटी दवा के अपराधों को संज्ञेय बनाती है और ज़मानत पर दो शर्तें लगाती है: सरकारी वकील को सुनवाई का मौक़ा मिले, और उसके विरोध करने पर अदालत यह दर्ज करे कि आरोपी के दोषी न होने के उचित आधार हैं। सोलह साल से कम उम्र, महिला और बीमार या अशक्त व्यक्ति के लिए इसमें छूट है।

प्रयोगशाला की रिपोर्ट आने से पहले की सीमा

कृपा हेल्थकेयर से ज़ब्त दवाओं के नमूने प्रयोगशालाओं में भेजे जा चुके हैं, ताकि उनका रसायन और गुणवत्ता तय हो। धारा 25 के ढाँचे में रिपोर्ट आने के बाद भी अट्ठाईस दिन की एक खिड़की खुली रहती है, और उसमें चुनौती मिलने पर अदालत के पास रखा हिस्सा केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला जा सकता है।

तब तक जो बातें दर्ज हैं, वे ये हैं। एक गिरफ़्तारी हुई है। 2021 में पंजीकृत एक कारोबार की तलाशी हुई है और उसका दफ़्तर, गोदाम और मालिक का घर खंगाला गया है। बैंक के रिकॉर्ड, ख़रीद-बिक्री के वाउचर और बैच के ब्योरे ज़ब्त हैं। पंद्रह से ज़्यादा मेडिकल प्रतिनिधियों की भूमिका जाँच के दायरे में है। सियासत और कंट्री ऐंड पॉलिटिक्स की रिपोर्टों के मुताबिक़ संदिग्ध बैच एहतियातन कर्नाटक एफ़डीए के पोर्टल पर रोक दिए गए हैं। प्रशांत अब तक पकड़ में नहीं आए हैं।

और ये बातें दर्ज नहीं हैं। किसी अस्पताल का नाम सामने नहीं आया है। कितने मरीज़ों को ये दवाएँ लगीं, यह किसी दस्तावेज़ में नहीं है। किसी मरीज़ को नुक़सान पहुँचने की कोई पुष्ट शिकायत सार्वजनिक नहीं हुई है। ज़ब्त माल धारा 17बी के अर्थ में नक़ली है या सिर्फ़ धारा 16 के अर्थ में अधोमानक, यह प्रयोगशाला और लेबल पर छपी कंपनियों के जवाब, दोनों से तय होगा। कारोबार कितने का था, इसका जवाब एसआईटी के मुखिया के अपने शब्दों में अभी बनाया जा रहा है।

मामला एक गिरफ़्तारी, एक फ़रार आरोपी और प्रयोगशाला में पड़े नमूनों पर खड़ा है।

स्रोतकेंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) का सार्वजनिक एनएसक्यू और नक़ली दवा डेटाबेस, 13 सितंबर 2026 को पढ़ा गया: 2026 के हर महीने की प्रविष्टियाँ, और 'पेंडिंग स्टेट्स' की सूची, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और नियमावली, 1945 का सीडीएससीओ द्वारा प्रकाशित 635 पन्ने का पाठ: धारा 16, 17, 17ए, 17बी, 18ए, 23, 25, 27, 36एबी, 36एसी और नियम 49, 64, 65, पत्र सूचना कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, 12 अगस्त 2025: राज्यसभा में अनुप्रिया पटेल का लिखित उत्तर, जोखिम आधारित निरीक्षण, क्यूआर कोड की अधिसूचनाएँ और 2008 का संशोधन, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए): 8 मार्च 2019 से लागू ग़ैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं की संशोधित एमआरपी सूची, 526 ब्रांड, ग्यारह पन्ने, एनपीपीए का परिचय पृष्ठ: फ़रवरी 2019 में 42 ग़ैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन का प्रयोग और 526 ब्रांड में हुई बचत, औषधि नियामक ढाँचे पर डॉ. आर.ए. मशेलकर की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट: निरीक्षकों का मानक और बिक्री प्रतिष्ठानों की गिनती, द इंडियन एक्सप्रेस, 12 सितंबर 2026, रात 8:21: अतिया फ़िरदौस की रिपोर्ट, संयुक्त पुलिस आयुक्त वंशीकृष्ण का बयान और 18 अगस्त के छापे का ब्योरा, डेक्कन क्रॉनिकल, 12 सितंबर 2026: छापे का ब्योरा, नमूने प्रयोगशाला भेजे जाने, और स्वास्थ्य मंत्री यू.टी. ख़ादर के एसआईटी गठित करने की जानकारी, सियासत डेली, 12 सितंबर 2026, शाम 5:42: छह राज्यों में दस से ज़्यादा जगह तलाशी, और कर्नाटक एफ़डीए पोर्टल पर बैच रोके जाने की बात, कंट्री ऐंड पॉलिटिक्स, 12 सितंबर 2026: संयुक्त पुलिस आयुक्त सी. वंशीकृष्ण का नाम, 4.91 करोड़ की ज़ब्ती का आँकड़ा, और महाराष्ट्र-गुजरात तक फैलाव, न्यूज़फ़र्स्ट प्राइम, 12 सितंबर 2026, दोपहर 1:16: कृपा हेल्थकेयर के 2021 में पंजीकरण, कमीशन पर मेडिकल प्रतिनिधियों, और थायरॉयड-विटामिन की दवाओं का ज़िक्र, डेक्कन हेराल्ड, 20 जनवरी 2025: कर्नाटक के औषधि नियंत्रण विभाग के आँकड़ों पर रिपोर्ट, 112 स्वीकृत पदों पर आठ निरीक्षक और 1,007 अधोमानक बैच, द साउथ फ़र्स्ट, 3 दिसंबर 2025: 2 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में दिए गए उत्तर के पाँच बरस के आँकड़े, नमूने, अधोमानक, नक़ली और अभियोजन, वर्डिक्टम: हरियाणा राज्य बनाम कृष्ण कुमार और संबद्ध मामले, 2026 आईएनएससी 63, जनवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला और नियम 49 पर उसकी व्याख्या

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।