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सुप्रीम कोर्ट: वैवाहिक विवाद के पॉक्सो मामलों में फ़ौरन गिरफ़्तारी नहीं, मनोवैज्ञानिक जांच पहले

गुरुवार, 24 सितंबर को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि जहाँ बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा हो और पॉक्सो का आरोप ख़ुद परिवार के किसी सदस्य पर लगे, वहाँ गिरफ़्तारी से पहले बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन ज़रूरी होगा। यह फ़ैसला बेंगलुरु के एक मामले में सीबीआई जांच के बाद आया, जिसमें अदालत ने एफ़आईआर रद्द कर बेटी की क़ानूनी कस्टडी पिता को लौटाई।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की इमारत और गुंबद, मई 2007 की तस्वीर; गुरुवार का फ़ैसला इसी अदालत की एक पीठ ने सुनाया
तस्वीर: Legaleagle86 at English Wikipedia., विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

तलाक़ या कस्टडी की लड़ाई के बीच अगर कोई माँ या पिता अपने ही जीवनसाथी पर बच्चे के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाए, तो पुलिस को क्या फ़ौरन गिरफ़्तार कर लेना चाहिए? गुरुवार, 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने ठीक इसी सवाल पर एक फ़ैसला सुनाया। जवाब था: नहीं, कम से कम उन मामलों में नहीं जहाँ आरोप घर के ही किसी सदस्य पर हो और माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद पहले से चल रहा हो। वहाँ गिरफ़्तारी से पहले बच्चे का विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए। यह फ़ैसला पॉक्सो एक्ट, यानी बच्चों को यौन अपराधों से बचाने वाले 2012 के क़ानून, के तहत आया है।

आगे का सवाल उतना सीधा नहीं है। अदालत ने जो कहा, वह हर ऐसे मामले पर लागू होने वाला निर्देश है, या सिर्फ़ इसी मामले पर की गई टिप्पणी? यह फ़र्क़ किसी अगले मामले में किसी और माता-पिता की गिरफ़्तारी तय कर सकता है, और नीचे तीसरे हिस्से में यही सवाल केंद्र में है।

मामला बेंगलुरु से शुरू हुआ, फ़ैसला पाँच महीने बाद आया

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसले में असली नाम नहीं लिखे। बच्ची की पहचान छुपाने के लिए पिता को 'R', माँ को 'E' और बच्ची को 'M' लिखा गया है। पॉक्सो मामलों में पहचान छुपाना अदालत का तय तरीक़ा है, और यह अख़बार भी वही तरीक़ा अपना रहा है।

कहानी कर्नाटक हाई कोर्ट में चल रहे एक तलाक़ और कस्टडी के मुक़दमे से शुरू होती है। हाई कोर्ट ने 'R' और 'E' की ग्यारह बरस की बेटी 'M' की कस्टडी पिता 'R' को दी थी; माँ 'E' को मिलने-जुलने का अधिकार मिला था। 2024 में 'E' ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि 'R' ने बेटी का यौन उत्पीड़न किया। शिकायत पॉक्सो एक्ट की धारा 10 (गंभीर यौन उत्पीड़न, पैठ यानी पेनिट्रेशन वाला मामला नहीं) और भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 504, 506 के साथ किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 के तहत दर्ज हुई।

बेंगलुरु में कर्नाटक हाई कोर्ट की 'अटारा कचेरी' इमारत; 'R' और 'E' का तलाक़-कस्टडी मुक़दमा यहीं चला था
तस्वीर: N. Vivekananthamoorthy, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। 11 अप्रैल 2026 को उसी पीठ, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथन, ने जांच सीबीआई को सौंप दी थी। साथ में एक शर्त जोड़ी: टीम में डीआईजी रैंक का अफ़सर हो, और एक वरिष्ठ महिला मनोवैज्ञानिक भी शामिल हो। तब तक किसी पक्ष के ख़िलाफ़ कोई सख़्त क़दम नहीं। पीठ ने उस दिन यह भी कहा था कि बच्ची अनावश्यक रूप से पीड़ित की जा रही है। कस्टडी अस्थायी रूप से माँ के पास चली गई, और पिता के ख़िलाफ़ पॉक्सो कार्यवाही पर रोक लगी रही।

सीबीआई ने पूछताछ, सीसीटीवी फ़ुटेज और फ़ोरेंसिक इंटरव्यू के अलावा बेंगलुरु के निम्हांस से बाल मनोचिकित्सकों की मदद ली। बयानों को उसने अविश्वसनीय पाया। लाइवलॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ सीबीआई ने लिखा कि आरोप "not made out" थे और मामला "not fit for prosecution" था। आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने आगे मुक़दमा चलने देना ख़ुद "an abuse of the process of law" क़रार दिया। बार एंड बेंच ने फ़ैसले का एक और हिस्सा उद्धृत किया है, जिसमें अदालत लिखती है कि कई बार "gullible parties" अपने वकीलों की उस सलाह में बह जाते हैं जो "win at any cost" के उसूल पर चलती है, और ग़ुस्से में अंधा माता-पिता परिणामों की परवाह किए बग़ैर इसका शिकार बन जाता है।

24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इसी सीबीआई रिपोर्ट के आधार पर एफ़आईआर रद्द कर दी। बेटी की क़ानूनी कस्टडी पिता को वापस मिली। असल में बेटी को पिता के साथ फिर से कैसे बसाया जाए, यह तय करने का काम बेंगलुरु की फ़ैमिली कोर्ट और विशेषज्ञों की एक समिति को सौंपा गया है।

फ़ैसले का हवाला किस नंबर से दिया जाए, इसमें भी उलझन मिली। लाइवलॉ ने इसे अपने रिकॉर्ड में "2026 LiveLaw (SC) 982" के तौर पर दर्ज किया है। कहीं-कहीं "2026 INSC 1049" नंबर भी दिखा, पर इस अख़बार को वह नंबर किसी भरोसेमंद दस्तावेज़ में नहीं मिला। "2026 INSC 1043" नंबर पक्के तौर पर एक बिल्कुल अलग फ़ैसले का है, जिसका ज़िक्र आगे सातवें हिस्से में है। जब तक अदालत की अपनी वेबसाइट से पुष्टि नहीं होती, यह अख़बार 'R' बनाम 'E' को नाम और तारीख़ से पहचान दे रहा है, नंबर से नहीं।

गिरफ़्तारी से पहले मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, दो शर्तों पर

पीठ ने जो एहतियात तय किए, वे हर पॉक्सो मामले पर लागू नहीं होते। दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए। पहली, आरोप बच्चे के माता-पिता में से किसी एक पर हो, या घर में साथ रहने वाले किसी परिजन पर। दूसरी, बच्चे के माता-पिता के बीच किसी तरह का वैवाहिक विवाद पहले से चल रहा हो। दोनों शर्तें न मिलें, तो यह पूरा ढांचा लागू ही नहीं होता।

दोनों शर्तें मिलने पर शिकायत लेने वाले पुलिस अफ़सर का पहला काम है यह जांचना कि माता-पिता के बीच सचमुच वैवाहिक विवाद है या नहीं, और यह जांच शिकायत मिलते ही, शुरुआत में करनी होगी। इसके बाद जांच अधिकारी या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट को, यानी पुलिस की उस इकाई को जो बच्चों से जुड़े मामले देखती है, बाल मनोरोग या क्लिनिकल साइकोलॉजी के किसी विशेषज्ञ की मदद लेनी होगी। विशेषज्ञ बच्चे का आकलन करेगा, बग़ैर दबाव और बग़ैर बार-बार पूछताछ के, पॉक्सो एक्ट और उसके नियमों के दायरे में रहते हुए। इसके बाद वह अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सौंपेगा।

एक शर्त पीठ ने साफ़ रखी। यह रिपोर्ट सलाह है, बंधन नहीं। लाइवलॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ अदालत ने लिखा कि जांच अधिकारी "would not be bound by the findings or the contents of the expert report" है। फ़ैसला यह भी नहीं कहता कि गिरफ़्तारी कभी नहीं होगी। वह सिर्फ़ इतना कहता है कि जल्दबाज़ी न हो।

आईएएनएस की रिपोर्ट में दर्ज एक पंक्ति शायद इसे सबसे साफ़ बताती है: "The mere registration of a POCSO case should not by itself be treated as proof of the allegation or allowed to defeat the parent's legitimate claim for custody or guardianship", यानी सिर्फ़ पॉक्सो का मामला दर्ज होना आरोप को सच नहीं मानता, न ही इससे कस्टडी या अभिभावकत्व का किसी माता-पिता का हक़ ख़ारिज होना चाहिए।

यह निर्देश है या टिप्पणी: फ़ैसला ख़ुद क्या कहता है?

यही फ़र्क़ इस पूरी रिपोर्टिंग की जान है। बार एंड बेंच ने अपनी सुर्ख़ी में लिखा कि अदालत ने "guidelines" तय कीं। लाइवलॉ की रिपोर्ट में "guidelines", "directions" और "safeguards", तीनों शब्द बदल-बदल कर आते हैं। लॉ ट्रेंड ने भी इसे दिशा-निर्देश बताया। किसी रिपोर्ट में इसे सिर्फ़ टिप्पणी नहीं कहा गया। यानी हर उपलब्ध स्रोत इसे कुछ ऐसा मानता है जिसका पालन आगे के मामलों में भी होना चाहिए, सिर्फ़ इसी मामले तक सीमित सलाह नहीं।

भाषा भी यही इशारा करती है। "shall engage the services of an expert" और पुलिस अफ़सर की "duty" जैसे शब्द रिपोर्टों में दर्ज हैं। दोनों जगह बंधनकारी क्रियाएँ हैं, वैकल्पिक "मे" या "may" नहीं। यह भाषा किसी राय की नहीं, किसी हुक्म की लगती है।

पर एक चीज़ किसी रिपोर्ट में नहीं मिली, न लाइवलॉ में, न बार एंड बेंच में, न आईएएनएस या लॉ ट्रेंड में। 2014 के अर्नेश कुमार फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ लिखा था कि दिशा-निर्देश न मानने वाले पुलिस अफ़सर पर विभागीय कार्रवाई होगी, और हाई कोर्ट में अवमानना का मामला चलेगा। लापरवाह मजिस्ट्रेट पर भी विभागीय कार्रवाई की बात उसी फ़ैसले में लिखी गई थी। 'R' बनाम 'E' की जिन पंक्तियों की रिपोर्टिंग हुई है, उनमें ऐसी कोई सज़ा या नतीजा दर्ज नहीं मिलता। पूरा फ़ैसला इस अख़बार ने नहीं पढ़ा। sci.gov.in इस मशीन पर नहीं खुला, और इंडियनकानून या वेर्डिक्टम पर भी यह फ़ैसला अलग से नहीं मिला।

इतना दर्ज है: भाषा निर्देश की है। पालन न होने पर क्या होगा, यह उपलब्ध रिपोर्टिंग में कहीं नहीं लिखा।

अर्नेश कुमार की सात साल की सीमा में यह मामला पहले से था

गिरफ़्तारी पर लगाम की कहानी 2026 में शुरू नहीं हुई। 2 जुलाई 2014 को अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में जस्टिस चंद्रमौली कुमार प्रसाद और जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने कहा था: जिन अपराधों में सज़ा सात साल तक की है, वहाँ गिरफ़्तारी नियम नहीं, अपवाद होनी चाहिए। तब से यह सिद्धांत सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) की धारा 41ए में है, और 1 जुलाई 2024 से नई संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस, की धारा 35 में। दोनों का तरीक़ा एक जैसा है: पहले नोटिस भेजकर पेश होने को कहा जाए, गिरफ़्तारी बाद की बात है।

यह तस्वीर कनाडा की एक विधि लाइब्रेरी की है; अर्नेश कुमार जैसी पुरानी नज़ीरें भी ऐसी ही जिल्दों में दर्ज रहती हैं
तस्वीर: David Whelan, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

यहाँ एक बात ज़्यादातर रिपोर्टों ने नहीं बताई। 'E' की शिकायत पॉक्सो एक्ट की जिस धारा 10 के तहत दर्ज हुई थी, उसकी सज़ा ख़ुद क़ानून में पाँच से सात साल है। सात साल से ज़्यादा नहीं। मतलब यह मामला अर्नेश कुमार की सीमा के भीतर पहले से ही आता था, नई व्यवस्था के बिना भी।

तो नया क्या है? दो चीज़ें। पहली, गिरफ़्तारी से पहले बाल मनोरोग विशेषज्ञ की राय लेना, जो शर्त सीआरपीसी 41ए या बीएनएसएस 35 में कहीं नहीं है, और पॉक्सो में भी अब तक नहीं थी। दूसरी, यह ढांचा पूरे पॉक्सो एक्ट के लिए नहीं, सिर्फ़ उस हालत के लिए बना है जहाँ आरोपी घर का ही सदस्य हो और वैवाहिक विवाद चल रहा हो।

एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है। अगर आरोप धारा 10 की बजाय धारा 6, यानी सात साल से कहीं ज़्यादा, बीस साल से लेकर उम्रक़ैद तक की सज़ा वाले गंभीर पैठ के अपराध, के तहत लगे, तो क्या यही ढांचा वहाँ भी लागू होगा? इसका जवाब आठवें हिस्से में है।

धारा 19 की अनिवार्य रिपोर्टिंग, ज़िक्र रिपोर्टिंग में कहीं नहीं

पॉक्सो एक्ट की धारा 19 कहती है: जिस किसी को भी यह आशंका हो कि ऐसा कोई अपराध होने वाला है, या पता चले कि हो चुका है, वह इसकी सूचना पुलिस या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट को देगा। यह हर व्यक्ति पर लागू होता है, बच्चे के अपने परिवार पर भी। सूचना न देना ख़ुद एक अपराध है, धारा 21 के तहत, जिसमें जेल तक हो सकती है।

यह पेच है। कोई माता-पिता बच्चे से जुड़ी बात जानकर पुलिस को न बताए, तो वह ख़ुद क़ानून तोड़ता है। जल्दी शिकायत करना धारा 19 की मांग है, देरी नहीं। नई सुरक्षा व्यवस्था पुलिस से धीरज मांगती है।

इस अख़बार ने जिन पाँच रिपोर्टों की जांच की, लाइवलॉ, बार एंड बेंच, द प्रिंट, आईएएनएस और लॉ ट्रेंड, किसी में भी धारा 19 का ज़िक्र नहीं मिला। फ़ैसले ने यह तनाव सुलझाया या नहीं, यह उपलब्ध रिपोर्टिंग में कहीं दर्ज नहीं है।

एनसीआरबी में 'झूठा' पुलिस का वर्गीकरण है, 'बरी' अदालत का फ़ैसला

एक दावा जांचने लायक़ है: क्या एनसीआरबी झूठे मामलों की गिनती रखता ही नहीं? जवाब आधा हाँ, आधा नहीं है।

एनसीआरबी की "क्राइम इन इंडिया 2023" रिपोर्ट की तालिका 4A.3, जो बताती है कि पुलिस जांच के आख़िर में मामलों का निपटान कैसे हुआ, में पॉक्सो एक्ट की एक पूरी अलग कतार है, जिसका शीर्षक है "Cases Ended as Final Report False"। यानी जांच के बाद पुलिस ने ख़ुद माना कि मामला झूठा था। 2023 में देशभर में ऐसे 1,805 पॉक्सो मामले दर्ज हुए। यह संख्या असली है, सरकारी है, और नाम बता देती है। यह दावा ग़लत है कि ऐसी कोई गिनती मौजूद नहीं।

इसे बड़ा दिखाना भी उतना ही ग़लत होगा। 2023 में पूरे देश में 67,694 पॉक्सो मामले दर्ज हुए, और पुलिस ने 67,217 का निपटारा किया। इनमें से 63,393 में चार्जशीट लगी, यानी 94.3 फ़ीसदी मामलों में पुलिस को आगे बढ़ने लायक़ सबूत मिला। सिर्फ़ 3,547 मामले किसी न किसी फ़ाइनल रिपोर्ट पर ख़त्म हुए, यानी चार्जशीट की बजाय बंद करने की रिपोर्ट पर, और इन्हीं 3,547 में से 1,805, यानी क़रीब आधे, झूठा कहलाए। बाक़ी में या तो सबूत पर्याप्त नहीं मिले (1,078), या मामला मामूली दीवानी विवाद निकला (628), या 33 दूसरी वजहों से बंद हुए। और यह गिनती किसी एक श्रेणी के पॉक्सो मामलों की नहीं है। वैवाहिक विवाद वाले या पारिवारिक मामलों की अलग गिनती एनसीआरबी की इस तालिका में सिरे से नहीं है। इसलिए 1,805 का आँकड़ा 'R' बनाम 'E' जैसे मामलों की गिनती के बारे में कुछ नहीं बताता।

बरी होना बिल्कुल अलग पड़ाव की बात है। यह पुलिस की जांच में नहीं, अदालत में मुक़दमा चलने के बाद तय होता है। एनसीआरबी की तालिका 4A.5 के मुताबिक़ 2023 में देशभर की अदालतों में पॉक्सो के 38,199 मुक़दमों का ट्रायल पूरा हुआ। 11,087 में सज़ा हुई, सज़ा की दर 29 फ़ीसदी, 1,309 में आरोपी बरी नहीं बल्कि आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) हुए, और 25,803 बरी हुए। बरी होने की वजहें कई हो सकती हैं: गवाह मुकर जाना, सबूत की कमी, देरी, या यह कि शिकायत सचमुच झूठी थी। एनसीआरबी का यह आँकड़ा वजह नहीं बताता। अदालत में बरी होना यह साबित नहीं करता कि शिकायत झूठी थी, ठीक वैसे ही जैसे सज़ा न होना यह साबित नहीं करता कि शिकायतकर्ता झूठ बोल रहा था। जिस धारा 10 पर 'R' का मामला दर्ज हुआ था, उसी उपधारा में अकेले 2023 में 22,444 मामले दर्ज हुए, 11,376 का ट्रायल पूरा हुआ, और सज़ा की दर रही 32 फ़ीसदी।

उसी दिन एक अलग पीठ का बिल्कुल अलग फ़ैसला

24 सितंबर को ही सुप्रीम कोर्ट की एक और पीठ, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता, ने पॉक्सो और कस्टडी से जुड़ा एक दूसरा फ़ैसला सुनाया: डी बनाम एस (2026 INSC 1043)। तथ्य पूरी तरह अलग हैं। यहाँ बेटे ने ख़ुद, 2023 में काउंसलिंग के दौरान, अपने पिता पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज की, चार्जशीट भी दाख़िल हुई। दिल्ली की फ़ैमिली कोर्ट ने 2024 में पिता को कस्टडी दी, दिल्ली हाई कोर्ट ने जनवरी 2026 में उसे बरक़रार रखा।

यह तस्वीर उत्तराखंड हाई कोर्ट, नैनीताल, की है, न कि दिल्ली की, जहाँ डी बनाम एस चला था; यहाँ यह देश की हाई कोर्ट व्यवस्था दिखाने के लिए है
तस्वीर: Harshit.S.R, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सुप्रीम कोर्ट ने इस दूसरे मामले में जो लिखा, वह पहले मामले से उलट पढ़ा जा सकता है: पॉक्सो का मामला जब तक अदालत में चल रहा हो, तब तक आरोपी माता-पिता को कस्टडी का हक़दार नहीं माना जा सकता। दोनों फ़ैसले एक ही दिन आए, दोनों पॉक्सो और कस्टडी से जुड़े हैं, और दोनों में "पॉक्सो केस" और "कस्टडी" शब्द बार-बार आते हैं।

यही मिलावट का जोखिम है। इस रिपोर्टिंग के दौरान ख़ुद इस अख़बार को एक जगह ऐसा मिला जहाँ 'R' बनाम 'E' से "2026 INSC 1043" नंबर जोड़ा जा रहा था, जबकि यह नंबर वेर्डिक्टम की अपनी रिपोर्ट में पक्के तौर पर डी बनाम एस का दर्ज है। दो फ़ैसलों को गड्डमड्ड करना यहाँ केवल तथ्य की भूल नहीं होगी। एक में अदालत ने झूठे आरोप की आशंका देखकर एहतियात बरतने को कहा; दूसरे में सच्चे आरोप की आशंका को गंभीरता से लेने को कहा। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और एक-दूसरे का खंडन नहीं करतीं। हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है, यही दोनों फ़ैसलों का साझा सबक़ है।

दायरा अब भी साफ़ नहीं है

चौथे हिस्से में उठा सवाल जवाब के बिना रह जाता है। रिपोर्ट हुई दोनों शर्तें, घर का सदस्य और वैवाहिक विवाद, किसी सज़ा-सीमा का ज़िक्र नहीं करतीं। दो व्याख्याएँ मुमकिन हैं। पहली: यह एहतियाती ढांचा हर पॉक्सो धारा पर बराबर लागू होगा, चाहे सज़ा सात साल की हो या उम्रक़ैद की। दूसरी: फ़ैसले में कहीं यह सीमा लिखी हो, और वह हिस्सा रिपोर्टिंग में न आया हो। कौन-सी सही है, इसका जवाब इस अख़बार के पास मौजूद रिपोर्टिंग में नहीं है। जब तक यह साफ़ नहीं होता, अलग-अलग थानों और निचली अदालतों में इसे अलग-अलग तरह से पढ़े जाने का जोखिम बना रहता है, और एक ही तरह के मामले में शहर के हिसाब से अलग बर्ताव हो सकता है।

'M' की कहानी में भी आख़िरी पन्ना अभी नहीं लिखा गया। क़ानूनी कस्टडी पिता के पास है। असल में वह कब और कैसे पिता के घर लौटेगी, यह बेंगलुरु की फ़ैमिली कोर्ट और विशेषज्ञों की समिति तय करेगी। अदालत ने इतना ही कहा है कि यह प्रक्रिया बच्ची के हिसाब से, धीरे-धीरे होनी चाहिए।

स्रोतलाइवलॉ, 24 सितंबर 2026, दोपहर 12:44: 'R' v 'E' & Anr., नेतृत्व-उद्धरण 2026 LiveLaw (SC) 982, बार एंड बेंच, 24 सितंबर 2026, द प्रिंट, 24 सितंबर 2026, आईएएनएस, 24 सितंबर 2026, शाम 8:11, लॉ ट्रेंड (हिंदी विधि पत्रिका), 24 सितंबर 2026, लॉचक्रा, 24 सितंबर 2026, लाइवलॉ, 11 अप्रैल 2026: सीबीआई जांच सौंपे जाने का अंतरिम आदेश, वेर्डिक्टम, 24 सितंबर 2026: D v S, 2026 INSC 1043 (एक अलग पीठ का अलग फ़ैसला), राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी), क्राइम इन इंडिया 2023, तालिका 4A.3: बच्चों के विरुद्ध अपराधों में पुलिस का निपटान, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी), क्राइम इन इंडिया 2023, तालिका 4A.5: बच्चों के विरुद्ध अपराधों में अदालती निपटान, दृष्टि ज्यूडिशियरी: अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, (2014) 8 SCC 273, 2 जुलाई 2014, पॉक्सो एक्ट, 2012, धारा 10 का मूल पाठ (एपनीलॉ मिरर), पॉक्सो एक्ट, 2012, धारा 19 का मूल पाठ (बैरिस्टरी मिरर)

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