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कर्नाटक की मज़दूरी अधिसूचना 1948 के उस क़ानून से जारी हुई जो 21 नवंबर 2025 को निरस्त हो चुका था

22 मई 2026 की पच्चीस पन्ने की अधिसूचना पहले ही पैराग्राफ़ में न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 3(1)(ब) और 5(1)(ब) का हवाला देती है। उसी अधिसूचना के तीसरे पन्ने पर, कन्नड़ पाठ के बीच अंग्रेज़ी में, वेतन संहिता, 2019 की वह धारा 69 छपी है जिसने 1948 के क़ानून को निरस्त किया। शुक्रवार, 18 सितंबर को कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी अधिसूचना को रोकने वाले तीन सरकारी परिपत्रों पर अंतरिम रोक लगाई।

बेंगलुरु में विधान सौध का अग्रभाग, बीच में गुंबद और नीचे स्तंभों वाला बरामदा, जून 2010 की तस्वीर; कार्मिक विभाग की पच्चीस पन्ने की अधिसूचना के सिरे पर इसी इमारत का पता छपा है
तस्वीर: Rameshng at Malayalam Wikipedia, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

कर्नाटक सरकार के कार्मिक विभाग ने 22 मई 2026 को जो अधिसूचना जारी की, वह पच्चीस पन्ने की है। ऊपर विधान सौध का पता है और तारीख़। पहले ही पैराग्राफ़ में राज्य के 81 अनुसूचित नियोजनों की नई न्यूनतम मज़दूरी दरें तय करने की बात है, और उसी वाक्य में वे दो धाराएँ दर्ज हैं जिनके बल पर यह किया गया: न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 3(1)(ब) और धारा 5(1)(ब)।

तीसरे पन्ने पर वही अधिसूचना, कन्नड़ पाठ के बीचोंबीच, अचानक अंग्रेज़ी में वैधानिक पाठ छाप देती है। वह वेतन संहिता, 2019 की धारा 69 है। उसकी पहली उप-धारा की पहली पंक्ति यही कहती है कि मज़दूरी संदाय अधिनियम 1936, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम 1948, बोनस संदाय अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 निरस्त किए जाते हैं।

अधिसूचना अपने भीतर वही उपबंध छापती है जिसने उस क़ानून को ख़त्म किया जिसकी धाराओं से वह ख़ुद निकली है। यह चूक नहीं है। यह बचाव है, जिसे अधिसूचना ने पहले ही अपने भीतर दर्ज कर लिया। शुक्रवार, 18 सितंबर को कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी अधिसूचना को रोक रखने वाले तीन सरकारी परिपत्रों पर अंतरिम रोक लगाई, और उसी अधिसूचना के ख़िलाफ़ नियोक्ताओं की याचिका जून से लंबित है जिस पर कोई रोक नहीं लगी है।

बाईस मई की अधिसूचना और उसमें दर्ज दो धाराएँ

अधिसूचना की संख्या में 411 और 2023 आते हैं, और इस दस्तावेज़ की जो प्रति डेस्क ने पढ़ी उसमें कन्नड़ फ़ॉन्ट टूटा हुआ है, इसलिए पूरा क्रमांक यहाँ नहीं छापा जा रहा। बाक़ी ढाँचा साफ़ है। पाँच अनुसूचियाँ हैं। अनुसूची-1 में 61 नियोजन हैं, अनुसूची-2 में 4, और अनुसूची-3 में 18 नए नियोजन। अनुसूची-4 दरों की तालिका है और अनुसूची-5 कर्मचारियों की श्रेणियों की सूची, जिसमें पदनाम चार सौ से ऊपर चले जाते हैं।

राज्य तीन ज़ोन में बाँटा गया है। ज़ोन-1 ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी का इलाक़ा है, ज़ोन-2 बाक़ी महानगर पालिकाएँ और सभी ज़िला मुख्यालय, ज़ोन-3 इनके बाहर का सब कुछ। कर्मचारी चार दर्जों में बाँटे गए हैं: अकुशल, अर्धकुशल, कुशल और उच्च कुशल। यही अधिसूचना का सबसे बड़ा बदलाव है। पहले हर उद्योग की अपनी अलग दर होती थी, और अब वही दर हुनर और इलाक़े से तय होती है, चाहे उद्योग कोई भी हो।

तालिका सीढ़ीनुमा है। उच्च कुशल कर्मचारी को ज़ोन-1 में 1,196.69 रुपये रोज़, यानी महीने के 31,114.02 रुपये। अकुशल को ज़ोन-3 में 743.05 रुपये रोज़, यानी 19,319.36 रुपये महीना। बीच की हर ख़ाने की क़ीमत दोहराई जाती है: किसी दर्जे की ज़ोन-2 वाली दर उससे एक पायदान नीचे के दर्जे की ज़ोन-1 वाली दर के बराबर है। कुल छह अलग-अलग रक़में पूरी तालिका चलाती हैं।

नगरपालिका की वर्दी पहने एक सफ़ाई कर्मचारी कूड़े के अलग-अलग डिब्बों वाला ठेला लेकर सड़क पर निकला है, तिरुप्पुर, तमिलनाडु की यह तस्वीर 30 मार्च 2020 की है; सफ़ाई का यही काम कर्नाटक की अनुसूचियों में एक नियोजन के तौर पर दर्ज है
तस्वीर: PJeganathan, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अनुसूची-2 की तालिका अलग है और एक पायदान ऊपर बैठती है। उसमें सबसे ऊपर की रक़म 1,316.36 रुपये रोज़ है, यानी 34,225.42 रुपये महीना। डेक्कन हेराल्ड ने 19 सितंबर को दरों की जो हद छापी, वह 19,300 से 31,100 रुपये है। उस हद में 34,225.42 रुपये नहीं आते।

महीने की रक़म 26 दिन पर निकाली जाती है और दिन आठ घंटे का है। परिवर्तनीय महँगाई भत्ता हर साल 1 अप्रैल से संशोधित होगा, औद्योगिक कामगारों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के 9,469 अंक से ऊपर हर अंक पर चार पैसे प्रतिदिन की दर से। मज़दूरी बैंक या चेक से देनी होगी, ओवरटाइम दोगुनी दर पर, और लिंग के आधार पर भेद नहीं।

इक्कीस नवंबर 2025 का राजपत्र और उसकी छह पंक्तियाँ

वेतन संहिता, 2019 भारत के राजपत्र (असाधारण), भाग II खंड 1, संख्या 48 में 8 अगस्त 2019 को छपी थी। उसी दिन राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। यह 2019 का अधिनियम संख्या 29 है और उस पर विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग के सचिव डॉ. जी. नारायण राजू के दस्तख़त हैं। मंज़ूरी मिल जाना और क़ानून का लागू हो जाना, दोनों अलग बातें हैं, और संहिता की धारा 1(3) यही कहती है: संहिता उस तारीख़ से प्रवृत्त होगी जो केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना से नियत करे, और अलग-अलग उपबंधों के लिए अलग-अलग तारीख़ें नियत की जा सकती हैं।

केंद्र ने यह दो किश्तों में किया। पहली किश्त 18 दिसंबर 2020 की अधिसूचना का.आ. 4604(अ) थी, जो केंद्रीय सलाहकार बोर्ड से जुड़े उपबंध लागू करती है। दूसरी किश्त पाँच साल बाद आई।

21 नवंबर 2025 को भारत के राजपत्र (असाधारण), भाग II खंड 3 उप-खंड (ii), संख्या 5146 में श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय की अधिसूचना का.आ. 5322(अ) छपी। उसमें सिर्फ़ छह पंक्तियों की तालिका है। धारा 1 से 41; धारा 42 की उप-धाराएँ (4) से (9); धारा 43 से 66; धारा 67 के कुछ खंड; धारा 68; और छठी पंक्ति पर धारा 69, सिवाय उन उपबंधों के जो 18 दिसंबर 2020 के का.आ. 4604(अ) की क्रम संख्या 3 पर दर्ज हैं। फ़ाइल संख्या एस-32022/1/2025-डब्ल्यूसी है और दस्तख़त संयुक्त सचिव आलोक मिश्रा के। राजपत्र की पीडीएफ़ पर डिजिटल हस्ताक्षर का समय 21 नवंबर 2025, दोपहर 3 बजकर 38 मिनट दर्ज है।

पुणे में भारत सरकार के फ़ोटोज़िंको प्रेस का ग्रंथभांडार, जहाँ से सरकारी प्रकाशन बिकते हैं, जून 2023 की तस्वीर; राजपत्र ऐसे ही सरकारी छापेख़ानों से छपकर निकलता है और उसी छपाई की तारीख़ से कोई उपबंध प्रवृत्त होता है
तस्वीर: DesiBoy101, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

उसी दिन से न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 की धारा 3 और धारा 5 का अस्तित्व ख़त्म हो गया। ये वही दो धाराएँ हैं जिन्हें कर्नाटक ने बाद में अपनी अधिसूचना में उद्धृत किया। बीच में 182 दिन पड़ते हैं।

इसी तालिका में एक और बात है जिस पर किसी रिपोर्ट में ध्यान नहीं गया। धारा 42 की उप-धाराएँ (4) से (9) भी 21 नवंबर 2025 से ही प्रवृत्त हुईं। धारा 42(4) कहती है कि हर राज्य सरकार एक राज्य सलाहकार बोर्ड गठित करेगी, जो न्यूनतम मज़दूरी तय करने और संशोधित करने में सरकार को सलाह देगा। अदला-बदली उसी दिन हुई। पुराने क़ानून की धारा 7 वाला सलाहकार बोर्ड ख़त्म हुआ और संहिता वाला बोर्ड अनिवार्य हुआ। कर्नाटक ने संहिता की धारा 42(4) के तहत कोई बोर्ड गठित किया हो, ऐसी अधिसूचना डेस्क को नहीं मिली।

बचाव की दो धाराएँ, जिन्हें अधिसूचना ख़ुद छापती है

कर्नाटक की अधिसूचना इस पूरे सवाल को जानती है। तीसरे और चौथे पन्ने पर वह धारा 69 की तीनों उप-धाराएँ और साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 पूरी अंग्रेज़ी में छापती है। दोनों उद्धरण राजपत्र के पाठ से शब्दशः मिलते हैं।

धारा 69(2) का अनुवाद यह है: ऐसे निरसन के बावजूद, निरस्त किए गए अधिनियमों के अधीन की गई कोई बात या ली गई कोई कार्रवाई, जिसमें उनके अधीन की गई कोई अधिसूचना, नामनिर्देशन, नियुक्ति, आदेश या निदेश या मज़दूरी की कोई रक़म शामिल है, इस संहिता के तत्संबंधी उपबंधों के अधीन की गई या ली गई मानी जाएगी, और उस हद तक प्रवृत्त रहेगी जहाँ तक वह इस संहिता के उपबंधों के विपरीत न हो। धारा 69(3) कहती है कि इसके साथ-साथ साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 भी इन निरसनों पर लागू होगी।

1897 की धारा 6 पाँच बातें बचाती है। निरसन से किसी निरस्त अधिनियम का पिछला प्रवर्तन प्रभावित नहीं होता, न उसके अधीन विधिवत की गई कोई बात; न अर्जित कोई अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व; न कोई शास्ति या दंड; और न कोई अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार। इन सबका काल एक ही है। ये सब बीती हुई बातें हैं।

राज्य की दलील का ढाँचा यहीं से बनता है, और अधिसूचना ख़ुद उसकी कड़ियाँ गिनाती है। 11 अप्रैल 2025 को कच्ची अधिसूचना निकली। आपत्तियाँ आईं। न्यूनतम मज़दूरी सलाहकार बोर्ड ने 29 जुलाई 2025 और 28 अगस्त 2025 को बैठकें कीं। ये सभी क़दम 21 नवंबर 2025 से पहले के हैं, यानी उस वक़्त के जब 1948 का क़ानून ज़िंदा था। अधिसूचना 16 अप्रैल 2025 के हाई कोर्ट आदेश को भी अंग्रेज़ी में उद्धृत करती है, जिसका अनुवाद है: अंतिम अधिसूचना राज्य सरकार को विधिवत प्रक्रिया के बाद जारी करनी होगी, और उस अंतिम अधिसूचना के जारी होने पर याचिकाकर्ताओं या प्रतिवादियों में से किसी को कोई शिकायत हो तो वे अपने उपचार तलाशने के लिए स्वतंत्र होंगे।

बहस का बिंदु यहीं है। धारा 69(2) बीती कार्रवाई को बचाती ज़रूर है, पर उसी साँस में कहती है कि वह "इस संहिता के तत्संबंधी उपबंधों के अधीन की गई मानी जाएगी", और सिर्फ़ उस हद तक प्रवृत्त रहेगी जहाँ तक वह संहिता के विपरीत न हो। नियोक्ता संघ की याचिका इसी शर्त पर टिकी है। उसका कहना है कि बचत उपबंध पुरानी कार्रवाइयों को नई संहिता के भीतर ले जाता है, पुराने क़ानून को ज़िंदा नहीं रखता। कर्नाटक ने 22 मई 2026 की अंतिम अधिसूचना में जो धाराएँ उद्धृत कीं, वे 1948 के क़ानून की हैं। यह सवाल अब अदालत के सामने है और अब तक किसी अदालत ने इस पर कोई फ़ैसला नहीं दिया है।

संहिता में 'अनुसूचित नियोजन' शब्द एक बार भी नहीं आता

1948 के क़ानून का पूरा ढाँचा उसकी अनुसूची पर टिका था। धारा 3(1)(क) सरकार को उन्हीं नियोजनों की दरें तय करने देती थी जो अनुसूची के भाग I या भाग II में दर्ज हों, या धारा 27 की अधिसूचना से उनमें जोड़े गए हों। धारा 3(1)(ब) उसे पाँच साल से ज़्यादा के अंतराल के बिना उन दरों की समीक्षा और संशोधन का अधिकार देती थी। धारा 5(1)(ब) वह रास्ता है जिससे सरकार अपने प्रस्ताव अधिसूचित करती है और कम से कम दो महीने की तारीख़ देती है।

वेतन संहिता, 2019 के राजपत्र पाठ में, धारा 1 से धारा 69 तक, "अनुसूची" शब्द एक बार भी नहीं आता। एक बार भी नहीं। संहिता में कोई अनुसूची है ही नहीं, इसलिए "अनुसूचित नियोजन" जैसी कोई श्रेणी उसमें बची नहीं। नई व्यवस्था में न्यूनतम मज़दूरी हर नियोजन पर लागू होती है, सूची में नाम हो या न हो। कर्नाटक की अधिसूचना पाँच अनुसूचियों और इक्यासी या तिरासी अनुसूचित नियोजनों पर खड़ी है।

जो ताक़त राज्य को चाहिए थी, वह संहिता में मौजूद थी, बस दूसरे नंबर पर। धारा 8(1)(ब) लगभग वही वाक्य है जो 1948 की धारा 5(1)(ब) था: सरकार अधिसूचना से अपने प्रस्ताव प्रकाशित करे और दो महीने से कम की तारीख़ न दे। फ़र्क़ ज़्यादातर नंबर का है। धारा 8(3) और 1948 की धारा 5(2) की भाषा भी लगभग एक है, अंतर सिर्फ़ इतना कि संहिता से "प्रत्येक अनुसूचित नियोजन के संबंध में" शब्द हटा दिए गए हैं। दोनों में यह भी एक जैसा है कि अधिसूचना जारी होने के तीन महीने बाद प्रवृत्त होगी, जब तक वह ख़ुद कुछ और न कहे। धारा 8(3) का परंतुक सलाहकार बोर्ड से परामर्श की वही शर्त दोहराता है जो 1948 की धारा 5(2) में थी। धारा 8(4) पाँच साल का अंतराल रखती है, बस उसमें "साधारणतया" शब्द जुड़ गया है।

अंतर एक जगह ज़रूर है, और वह छोटा नहीं। 1948 की धारा 3(1)(क) सरकार को दरें तय करने देती थी "अनुसूची के भाग I या भाग II में विनिर्दिष्ट नियोजन" के लिए। संहिता की धारा 8 में यह बंधन कहीं नहीं है। जिस ढाँचे पर कर्नाटक की पाँचों अनुसूचियाँ टिकी हैं, वह ढाँचा नई संहिता में है ही नहीं, और यही नियोक्ता संघ की याचिका का तीसरा आधार है।

एक और उपबंध है जिस पर अभी कुछ नहीं टिकता। संहिता की धारा 9 केंद्र सरकार को फ़्लोर वेज, यानी देशव्यापी न्यूनतम आधार मज़दूरी, तय करने की ज़िम्मेदारी देती है, और धारा 9(2) कहती है कि राज्य की तय की गई दरें उससे कम नहीं हो सकतीं। तक्समैन के विश्लेषण के मुताबिक़ धारा 9 प्रवृत्त तो है, पर उसके तहत अब तक कोई रक़म तय नहीं हुई। यानी धारा 9(2) फ़िलहाल किसी संख्या से नहीं बँधती। इसी विश्लेषण के मुताबिक़ वेतन संहिता के केंद्रीय नियम 8 मई 2026 को सा.का.नि. 343(अ) से अधिसूचित हुए, यानी कर्नाटक की अधिसूचना से ठीक दो हफ़्ते पहले। इन दोनों बातों के लिए राजपत्र के पन्ने डेस्क ने नहीं पढ़े।

अधिसूचना का सबसे अजीब हिस्सा इसके बाद आता है। अनुसूची-3 में दर्ज अठारह नए नियोजनों के बारे में वह ख़ुद लिखती है कि आगे इनकी दरें वेतन संहिता, 2019 की धारा 8(1) के उपबंधों के तहत संशोधित की जाएँगी।

एक ही काग़ज़ आज के लिए 1948 का निरस्त क़ानून इस्तेमाल करता है और कल के लिए 2019 की संहिता।

इक्यासी, तिरासी, निन्यानबे: एक ही काग़ज़ की तीन गिनतियाँ

अधिसूचना के पहले पैराग्राफ़ में जो संख्या छपी है, वह 81 है। उसी अधिसूचना की अनुसूचियाँ जोड़ने पर दूसरा नतीजा निकलता है: 61 जमा 4 जमा 18, यानी 83। एसेंट एचआर ने अनुसूचियों की यही गिनती छापी है। लेबरकोड्स360 ने इसे दूसरे ढंग से लिखा, 65 पुराने नियोजन और 18 नए, जो फिर 83 ही बनता है।

अख़बार भी बँटे हुए हैं। बार एंड बेंच और डेक्कन हेराल्ड, दोनों 19 सितंबर को, 83 लिखते हैं। लाइव लॉ 9 जून को 81 लिखता है, मोंडाक़ का विश्लेषण 81, और टीमलीज़ रेगटेक का 24 मई का सारांश भी 81।

कच्चे मसौदे की गिनती पर भी स्रोत बँटे हैं। 11 अप्रैल 2025 के मसौदे के बारे में अधिसूचना ख़ुद 99 नियोजनों की बात करती है। मोंडाक़ भी 99 लिखता है। लाइव लॉ ने नियोक्ता संघ की याचिका के हवाले से 84 लिखा।

इनमें से किसी एक संख्या को सही मानकर छापने की वजह इस डेस्क के पास नहीं है। यह अंतर ख़ुद ख़बर है। जिस दस्तावेज़ पर लाखों लोगों की मज़दूरी टिकी है, उसके पहले पैराग्राफ़ की संख्या और उसकी अपनी अनुसूचियों की संख्या दो हैं।

तीन परिपत्र और अठारह सितंबर की अंतरिम रोक

शुक्रवार, 18 सितंबर को न्यायमूर्ति एच.टी. नरेंद्र प्रसाद की एकल पीठ ने तीन परिपत्रों के प्रवर्तन पर रोक लगाई और राज्य को नोटिस जारी किया। बार एंड बेंच ने अगले दिन जो रिपोर्ट छापी, उसमें मामले का शीर्षक ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य है। रिट याचिकाओं के नंबर किसी रिपोर्ट में नहीं हैं और आदेश की प्रति नहीं मिल सकी।

बेंगलुरु में कर्नाटक हाई कोर्ट की लाल इमारत अट्टारा कचेरी, जिसके अग्रभाग पर कन्नड़ और अंग्रेज़ी में अदालत का नाम लिखा है, फ़रवरी 2016 की तस्वीर; तीन परिपत्रों पर अंतरिम रोक इसी परिसर से निकली
तस्वीर: Krishna Chaitanya Velaga, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

तीनों परिपत्र अलग-अलग महकमों के हैं: राज्य लेखा परीक्षा एवं लेखा विभाग, 29 जुलाई 2026; नगरपालिका प्रशासन निदेशालय, 10 अगस्त 2026; और ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज विभाग, 28 अगस्त 2026। नगरपालिका प्रशासन वाला परिपत्र महानगर पालिकाओं, शहरी स्थानीय निकायों और ज़िला शहरी विकास कोष्ठों से कहता है कि आउटसोर्स कर्मचारियों को 28 जुलाई 2022 की पुरानी अधिसूचना के हिसाब से ही भुगतान जारी रखें। तीनों में से कोई परिपत्र सार्वजनिक नहीं है। किसी का कोई क्रमांक सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है, इसलिए यहाँ कोई नंबर नहीं छापा जा रहा।

याचिकाकर्ता कौन हैं, इस पर दो अख़बार दो सूचियाँ देते हैं। बार एंड बेंच लिखता है कि याचिकाएँ ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस, कर्नाटक राज्य सरकारी खायमेतरर नौकरर ओक्कूट, ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियंस और दूसरों ने दायर कीं। डेक्कन हेराल्ड एआईटीयूसी, एआईसीसीटीयू और सीटू के नाम देता है। दोनों सूचियाँ एक नहीं हैं।

याचिकाओं में क्या कहा गया, यह बार एंड बेंच की रिपोर्ट से मिलता है। उनका कहना है कि 22 मई की अधिसूचना प्रकाशन के साथ ही प्रवृत्त हो चुकी है, कई विभाग उसे लागू भी कर चुके हैं, और उसकी वैधता पर मुक़दमे लंबित होना उसे रोक रखने का आधार नहीं बनता, ख़ासकर तब जब किसी अदालत ने अधिसूचना पर रोक नहीं लगाई। उनका दूसरा तर्क यह है कि प्रशासनिक निर्देश किसी वैधानिक अधिसूचना को निलंबित नहीं कर सकते। उसी रिपोर्ट के मुताबिक़ याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अधिसूचना वित्त विभाग के कथित मौखिक निर्देशों के आधार पर रोकी गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से क्लिफ़्टन डिरोज़ारियो, मैत्रेयी कृष्णन, रघुपति एस, प्रत्यूषा एम एस, सृजना के, महेश हिरेमनी, के.बी. नारायण स्वामी और एल. मुरलीधर पेशवा पेश हुए।

यह याद रखना ज़रूरी है कि नोटिस जारी करने का मतलब अदालत का सहमत होना नहीं होता, और परिपत्रों पर रोक लगने का मतलब अधिसूचना को सही ठहराना नहीं है। अदालत ने तीन प्रशासनिक आदेशों को रोका है। जिस क़ानून के तहत अधिसूचना बनी, उस पर सवाल दूसरी अदालत में खुला हुआ है।

नियोक्ता संघ की याचिका और 'ग़ैर-मौजूद क़ानून' वाली दलील

वह सवाल रिट याचिका संख्या 16145/2026 में है, जिसका शीर्षक कर्नाटक एंप्लॉयर्स एसोसिएशन एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य है और जिसे न्यायमूर्ति ज्योति एम सुन रही हैं। दूसरी याचिकाकर्ता एथेरियल मशीन्स प्राइवेट लिमिटेड है। लाइव लॉ के मुताबिक़ 2 जून को अदालत ने नोटिस जारी किया और याचिकाकर्ताओं की मौखिक अर्ज़ी पर केंद्र सरकार को पक्षकार बनाने की इजाज़त दी।

9 जून को कई श्रमिक संगठनों की पक्षकार बनने की अर्ज़ियाँ मंज़ूर हुईं। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एस. नागानंद को इन पर कोई आपत्ति नहीं थी। कर्नाटक भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड और कर्नाटक राज्य असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा बोर्ड भी पक्षकार बने। अदालत ने सभी प्रतिवादियों के वकीलों से आपत्तियाँ दाख़िल करने को कहा और मामला 3 जुलाई को सूचीबद्ध हुआ।

याचिका की बुनियाद वही है जो इस पूरी कहानी की है। लाइव लॉ ने उसका जो अंग्रेज़ी वाक्य उद्धृत किया है, उसका अनुवाद यह है: 21 नवंबर 2025 से न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 निरस्त होकर वेतन संहिता, 2019 से प्रतिस्थापित हो चुका है; इसलिए पहले प्रतिवादी ने ग़ैर-मौजूद क़ानून के तहत शक्तियों का प्रयोग किया है, जिससे विवादित अधिसूचना क़ानून की नज़र में शून्य हो जाती है। याचिका का दूसरा तर्क धारा 69 पर है: बचत उपबंध पुराने क़ानूनों के तहत की गई कार्रवाइयों को उसी हद तक बचाता है जहाँ तक वे संहिता के विपरीत न हों। तीसरा तर्क यह कि संहिता ने अनुसूचित नियोजन की अवधारणा ही हटा दी है।

याचिका दरों पर भी है। उसमें 60 फ़ीसदी तक की बढ़ोतरी को "पूरी तरह वहन से बाहर और ज़ब्ती जैसी" कहा गया है, यह दलील देते हुए कि महँगाई का समायोजन तो हर साल परिवर्तनीय महँगाई भत्ते से हो ही जाता है, इसलिए पाँच साल पर होने वाला संशोधन 10 से 15 फ़ीसदी तक रहना चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया है कि हाई कोर्ट के पहले के अंतरिम आदेशों की अवहेलना करके अंतिम अधिसूचना जारी की गई। वे आदेश रिट याचिका 18515/2025, 21852/2025 और 22771/2025 तथा 22776/2025 में हुए थे। इनमें से एक आदेश की तारीख़ पर स्रोत बँटे हैं: मोंडाक़ और एसेंट एचआर उसे 28 जुलाई 2025 का बताते हैं, लाइव लॉ 29 जुलाई 2025 का।

इस याचिका पर आज तक कोई अंतरिम रोक नहीं लगी है। अधिसूचना चल रही है, चुनौती चल रही है, और दोनों साथ-साथ चल रही हैं।

बिना दस्तावेज़ के छपे आँकड़े और अनुपलब्ध काग़ज़ात

जो दो आँकड़े सबसे ज़्यादा दोहराए जा रहे हैं, उनके पीछे कोई दस्तावेज़ नहीं है। डेक्कन हेराल्ड ने 19 सितंबर को लिखा कि अगर सभी विभागों, बोर्डों और निगमों में नई दरें लागू हुईं तो सरकार पर सालाना क़रीब 1,200 करोड़ रुपये का बोझ आएगा, और क़रीब 1.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारी सरकार के लिए काम करते हैं। दोनों आँकड़े एक ही अनाम सूत्र के हैं। अख़बार ने उसे मुख्यमंत्री कार्यालय का सूत्र बताया है। उसी रिपोर्ट में दो और अनाम अधिकारी आपस में असहमत हैं कि यह अंतरिम आदेश सिर्फ़ तीन विभागों पर लागू होगा या सब पर।

उसी रिपोर्ट में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का यह कहना दर्ज है कि कार्मिक विभाग ने मंत्रिमंडल के सामने मामला लाए बिना और पूर्व वित्तीय मंज़ूरी लिए बिना दरें संशोधित कीं, और यह कि 13 अगस्त को उप-मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर की अध्यक्षता में मंत्रिमंडलीय उपसमिति बनी जिसकी अब तक एक भी बैठक नहीं हुई। कौन किस पद पर है, यह डेस्क ने स्वतंत्र रूप से नहीं जाँचा, इसलिए ये बातें डेक्कन हेराल्ड के हवाले से ही पढ़ी जानी चाहिए।

कुछ काग़ज़ इस रिपोर्ट तक नहीं पहुँचे, और उनकी गिनती भी ख़बर का हिस्सा है। तीनों परिपत्रों का पाठ नहीं मिला। वित्त विभाग का कोई आदेश, लिखित या और किसी शक्ल में, नहीं मिला। 18 सितंबर के अंतरिम आदेश की प्रति नहीं मिली और अगली सुनवाई की तारीख़ किसी पढ़ी गई रिपोर्ट में नहीं है। 18 दिसंबर 2020 की अधिसूचना का.आ. 4604(अ) का अपना पाठ भी नहीं पढ़ा जा सका; उसके बारे में जो कुछ यहाँ है, वह 21 नवंबर 2025 के राजपत्र में दिए गए हवाले से है।

और कर्नाटक राजपत्र का वह पन्ना भी नहीं पढ़ा जा सका जिसमें 22 मई की अधिसूचना छपी। अधिसूचना के आख़िरी हिस्से में कर्नाटक राजपत्र के संपादक से उसे ई-गजट में प्रकाशित करने का अनुरोध दर्ज है। यानी 22 मई दस्तख़त की तारीख़ है, प्रकाशन की नहीं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अधिसूचना प्रकाशन के साथ प्रवृत्त हुई। वह प्रकाशन किस दिन हुआ, यह किसी दस्तावेज़ से इस डेस्क ने नहीं देखा।

स्रोतकर्नाटक सरकार, कार्मिक विभाग: 22.05.2026 की अंतिम न्यूनतम मज़दूरी अधिसूचना का पूरा 25 पन्नों का पाठ (एसजीसी मैनेजमेंट सर्विसेज़ की प्रति से), भारत का राजपत्र (असाधारण), भाग II खंड 3 उप-खंड (ii), संख्या 5146, 21 नवंबर 2025: श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय की अधिसूचना का.आ. 5322(अ), भारत का राजपत्र (असाधारण), भाग II खंड 1, संख्या 48, 8 अगस्त 2019: वेतन संहिता, 2019 (2019 का अधिनियम संख्या 29) का पूरा पाठ, इंडियन कानून: न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 का पूरा पाठ, धारा 3, 5, 7 और 8 सहित, बार एंड बेंच, 19 सितंबर 2026: कर्नाटक हाई कोर्ट ने तीन परिपत्रों पर रोक लगाई, याचिकाकर्ताओं और वकीलों के नाम, डेक्कन हेराल्ड, अंबरीश बी, 19 सितंबर 2026: अंतरिम आदेश, 1,200 करोड़ रुपये का अनुमान और मुख्यमंत्री कार्यालय के अनाम सूत्र, लाइव लॉ, सेबिन जेम्स, 9 जून 2026: रिट याचिका 16145/2026 में नियोक्ता संघ की दलीलें और अदालती आदेश, मोंडाक़, 2026: कर्नाटक की संशोधित न्यूनतम मज़दूरी अधिसूचना का विश्लेषण, मसौदे की गिनती और अंतरिम आदेशों की तारीख़ें, एसेंट एचआर: अधिसूचना की पाँच अनुसूचियों का ब्योरा और दर तालिका, टीमलीज़ रेगटेक, 24 मई 2026: अधिसूचना का सारांश, परिवर्तनीय महँगाई भत्ते का सूत्र, लेबरकोड्स360: अधिसूचना में 65 पुराने और 18 नए अनुसूचित नियोजनों की गिनती, तक्समैन: वेतन संहिता, 2019 का विश्लेषण, केंद्रीय नियम 2026 और फ़्लोर वेज पर स्थिति

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।