गिद्ध लौट रहे हैं, पर सरकारी विज्ञप्ति उस दवा का नाम एक बार भी नहीं लेती
पंचकूला में अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस मना। पिंजौर के केंद्र ने 2025-26 में 356 गिद्ध रखे और 35 चूज़े पैदा किए। जिस दवा ने भारत के गिद्ध ख़त्म किए, उसका नाम डाइक्लोफ़ेनाक है।

पिंजौर में एक बाड़ा है जिसमें इस साल 356 गिद्ध रहे।
हरियाणा के इस क़स्बे में जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र 2001 में बना था और यह देश का पहला गिद्ध देखभाल केंद्र है। इसे हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने मिलकर खड़ा किया।
शनिवार को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने वहाँ का दौरा किया और फिर पंचकूला में अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। कार्यशाला का विषय था: संकट से उबरना।
केंद्र का हिसाब विज्ञप्ति में दिया गया है। 2025-26 में 356 गिद्ध रखे गए, 35 चूज़े पैदा हुए, 87 गिद्ध छोड़े जाने या पुनर्वास में गए, 90 पक्षी दूसरे केंद्रों को दिए गए, और 22 संस्थानों के 1,222 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया।
पूरी विज्ञप्ति में यह नहीं लिखा कि यह केंद्र बनाना क्यों पड़ा।
संकट कितना बड़ा था
1980 के दशक की शुरुआत में भारत में गिद्धों की संख्या का अनुमान क़रीब चार करोड़ था।
सफ़ेद पूँछ वाला गिद्ध उस समय दुनिया का सबसे बड़ी संख्या वाला बड़ा शिकारी पक्षी माना जाता था। सेव नाम के अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की नीति टिप्पणी में यही वाक्य है, और उसके साथ यह भी कि अकेले भारत में इनकी गिनती करोड़ों में थी।
2007 तक वह एक लाख से नीचे आ चुकी थी।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और रॉयल सोसाइटी फ़ॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स के सर्वेक्षणों ने 1992 से 2007 के बीच की गिरावट 95 फ़ीसदी से ज़्यादा मापी।
सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध में यह गिरावट 99.9 फ़ीसदी थी।
इस आँकड़े को समझने के लिए इसे उलटकर पढ़िए। जहाँ एक हज़ार पक्षी थे, वहाँ एक बचा।
यह किसी भी पक्षी प्रजाति की सबसे तेज़ दर्ज गिरावटों में गिनी जाती है, और यह भारत, पाकिस्तान और नेपाल तीनों में एक साथ हुई।
वजह ढूँढ़ने में कई साल लगे
नब्बे के दशक के आख़िर में जब पक्षी विज्ञानी यह देख रहे थे कि गिद्ध पेड़ों से गर्दन लटकाकर मर रहे हैं, तो कई अनुमान लगे। कोई वायरस, कोई ज़हर, कोई बीमारी।
जवाब 2004 में मिला, और वह एक दवा थी।
डाइक्लोफ़ेनाक एक सस्ती दर्द निवारक और सूजन कम करने वाली दवा है। नब्बे के दशक में इसका पशु चिकित्सा में इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा, क्योंकि यह सस्ती थी और बूढ़े या बीमार मवेशी को कुछ दिन और खड़ा रख देती थी।
अगर ऐसा जानवर मर जाए और उसका शव गिद्ध खाएँ, तो दवा के अवशेष गिद्ध के शरीर में पहुँचते हैं। गिद्ध की किडनी इसे सह नहीं पाती। यूरिक एसिड जमा होता है और पक्षी कुछ दिन में मर जाता है।
गिद्ध झुंड में खाते हैं। एक शव पर दर्जनों पक्षी उतरते हैं। इसलिए एक इलाज किया हुआ मवेशी एक साथ कई गिद्ध मार सकता था।

रोक एक बार नहीं, बार-बार लगानी पड़ी
पशु चिकित्सा में डाइक्लोफ़ेनाक पर 2006 में रोक लगी।
इसके बाद वही हुआ जो अक्सर होता है। दवा कंपनियों ने दूसरी दवाओं की तरफ़ रुख़ किया, और उनमें से कई पर बाद में वही आपत्ति निकली।
एसिक्लोफ़ेनाक शरीर में जाकर डाइक्लोफ़ेनाक में ही बदल जाती है। कीटोप्रोफ़ेन भी गिद्धों के लिए घातक पाई गई। दोनों पर आगे चलकर रोक लगी।
निमेसुलाइड सबसे बाद में आई। भारत के औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड ने 25 जनवरी 2024 की बैठक में इस पर राष्ट्रीय रोक की सिफ़ारिश की, और राजपत्र अधिसूचना 30 दिसंबर 2024 को जारी हुई।
यानी जिस दवा ने ढाई दशक पहले संकट खड़ा किया, उसके परिवार की आख़िरी दवा पर रोक अभी पौने दो साल पहले लगी है।
एक और रास्ता बचा रहा जिसे बंद करना मुश्किल रहा। डाइक्लोफ़ेनाक इंसानों के लिए वैध है और बड़ी शीशियों में बिकती रही। यह शीशियाँ पशुओं पर इस्तेमाल होती रहीं, और 2018 तक के सर्वेक्षणों में मरे हुए गिद्धों के ऊतकों में इसके अवशेष मिलते रहे।
इस सूची में एक नाम और है जिस पर भारत में अब तक रोक नहीं लगी। फ़्लूनिक्सिन भी परीक्षणों में गिद्धों के लिए ज़हरीली पाई गई है, और सेव की अप्रैल 2025 की नीति टिप्पणी उसे उन दवाओं में गिनाती है जिनका पशु चिकित्सा में इस्तेमाल बढ़ा है।
सुरक्षित विकल्प एक नहीं, दो हैं। मेलॉक्सिकैम पर हुए परीक्षणों में यह गिद्धों के लिए हानिरहित पाई गई। टॉल्फ़ेनैमिक एसिड भी सुरक्षित पाई गई है। दोनों पशु चिकित्सा में उसी काम के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं जिसके लिए डाइक्लोफ़ेनाक दी जाती थी।
यानी यह ऐसी समस्या नहीं है जिसमें पशुपालक के पास कोई रास्ता न बचता हो। रास्ता मौजूद है, सस्ता है, और दो दवाओं का है।
जो नहीं मरे, उन्होंने क्या किया
गिद्धों के ग़ायब होने से जो जगह ख़ाली हुई, वह ख़ाली नहीं रही।
भारत में हर साल लाखों मवेशी मरते हैं और उनके शव खुले में डाले जाते हैं। गिद्ध उन्हें कुछ घंटों में साफ़ कर देते थे।
गिद्ध न रहे तो दो चीज़ें हुईं। शव लंबे समय तक पड़े रहने लगे और कई जगह नदियों में डाले जाने लगे। और उन्हें खाने वाले दूसरे जीव बढ़े, ख़ासकर आवारा कुत्ते और चूहे।
कुत्ता और गिद्ध एक जैसे सफ़ाईकर्मी नहीं हैं। गिद्ध का पेट इतना अम्लीय होता है कि एंथ्रैक्स तक के जीवाणु उसमें नष्ट हो जाते हैं। कुत्ता वही रोग आगे ले जाता है, और रेबीज़ भी।
2024 के अक्तूबर में अमेरिकन इकोनॉमिक रिव्यू में आयल फ़्रैंक और अनंत सुदर्शन का एक शोधपत्र छपा, जिसका शीर्षक था कि किसी आधारशिला प्रजाति के ख़त्म होने की सामाजिक क़ीमत क्या होती है।
उन्होंने भारत के ज़िलों के आँकड़े लेकर यह देखा कि जिन इलाक़ों में गिद्ध पहले ज़्यादा थे, वहाँ गिरावट के बाद मानव मृत्यु दर में क्या बदलाव आया।
उनका अनुमान यह था कि 2000 से 2005 के बीच हर साल क़रीब एक लाख अतिरिक्त मानव मौतें हुईं, यानी पाँच साल में पाँच लाख से ज़्यादा, और सालाना क़रीब 69.4 अरब डॉलर की क्षति।
यहाँ एक बात साफ़ कह देनी चाहिए। यह अर्थशास्त्र का अनुमान है, मृत्यु प्रमाणपत्रों की गिनती नहीं। इसमें आँकड़ों की तुलना से निष्कर्ष निकाला गया है, और ऐसे तरीक़ों की अपनी सीमाएँ होती हैं। यह संख्या पिछले दो साल में हर जगह छपी है, अक्सर बिना यह बताए कि यह अनुमान है।
पर दिशा पर बहस नहीं है। गिद्धों का जाना इंसानों के लिए महँगा पड़ा, यह अब कई अलग तरीक़ों से दिख चुका है। सेव की नीति टिप्पणी अकेले रेबीज़ के इलाज पर हुए ख़र्च को 34 अरब डॉलर आँकती है।

आज कितने बचे हैं
यह वह आँकड़ा है जो विज्ञप्ति में नहीं है, और जो ढूँढ़ने पर मिल जाता है।
सेव, यानी सेविंग एशियाज़ वल्चर्स फ़्रॉम एक्सटिंक्शन, एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन है जिसमें बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी भी शामिल है, यानी वही संस्था जो पिंजौर का केंद्र चलाती है। उसकी भारत पर नीति टिप्पणी अप्रैल 2025 में अद्यतन हुई। उसमें प्रजातिवार अनुमान इस तरह हैं।
सफ़ेद पूँछ वाला गिद्ध: भारत में क़रीब 6,000, दुनिया भर में क़रीब 10,000।
भारतीय या लंबी चोंच वाला गिद्ध: भारत में क़रीब 15,000, दुनिया भर में 15,500। यानी इस प्रजाति के लगभग सारे पक्षी भारत में हैं।
पतली चोंच वाला गिद्ध: भारत में क़रीब 750, दुनिया भर में 1,000।
लाल सिर वाले गिद्ध का भारत के लिए कोई अनुमान नहीं है, दुनिया भर का अनुमान 2,500 से 10,000 के बीच है।
चारों प्रजातियाँ अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की सूची में गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।
इन संख्याओं को पढ़ने का सही तरीक़ा यह है: जिस पक्षी की गिनती कभी करोड़ों में थी, उसके छह हज़ार बचे हैं। और जिन तीन प्रजातियों के अनुमान उपलब्ध हैं, उनका जोड़ बाईस हज़ार के आसपास बैठता है।
सबसे लंबी गिनती क्या कहती है
भारत में गिद्धों की सबसे लंबी चलने वाली गिनती सड़क पर होती है।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी 1992 से एक ही तरीक़े से यह सर्वेक्षण करती आई है: तय सड़कों पर, तय समय पर, अनुभवी पर्यवेक्षकों के साथ, प्रजनन काल के अंत में जब पक्षी सबसे ज़्यादा दिखते हैं। तीस साल में आठ सर्वेक्षण हुए, तेरह राज्यों में, कुल सत्रह हज़ार किलोमीटर।
इसके नतीजे 2024 में बर्ड कंज़र्वेशन इंटरनेशनल में विभु प्रकाश और उनके सहयोगियों के शोधपत्र के रूप में छपे, और वे 2022 तक के आँकड़ों पर आधारित हैं।
लंबी चोंच वाले गिद्ध में गिरावट 1992 के मुक़ाबले 97.9 फ़ीसदी है, और 2002 के मुक़ाबले 48 फ़ीसदी।
सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध में 1992 के मुक़ाबले 99.8 फ़ीसदी, और 2002 के मुक़ाबले 87 फ़ीसदी।
यहाँ 99.8 और 99.9 का फ़र्क़ चूक नहीं है, दो अलग खिड़कियाँ हैं। 99.9 का आँकड़ा उन्हीं शोधकर्ताओं के 2007 वाले पर्चे का है और 1992 से 2007 के पंद्रह साल नापता है। 99.8 का आँकड़ा 2022 तक का है। ऊपर से यह उल्टा लगता है, पर इसका मतलब सीधा है: बीच के पंद्रह साल में थोड़े पक्षी वापस आए, इतने कि तीसरे दशमलव पर फ़र्क़ पड़ जाए, और इससे ज़्यादा नहीं।
दूसरा आँकड़ा पहले से ज़्यादा मायने रखता है। 2002 का मतलब है रोक लगने से चार साल पहले। यानी रोक के आसपास के दौर से भी गिरावट जारी रही।
शोधपत्र का निष्कर्ष एक वाक्य में यह है कि आबादी अपने नए निचले स्तर पर कम से कम स्थिर हो गई है।
स्थिर होना और उबरना एक बात नहीं है। शोधकर्ताओं ने साफ़ लिखा कि गिरावट रुकी है, पर सुधार के संकेत नहीं मिले।
कार्यशाला का विषय था "संकट से उबरना"। भारत की सबसे लंबी गिनती अभी उबरने की नहीं, रुकने की ख़बर देती है।

नेपाल में वही रोक लगी, और वहाँ गिनती बढ़ी
तुलना करने के लिए एक पड़ोसी मौजूद है।
नेपाल ने भी पशु चिकित्सा में डाइक्लोफ़ेनाक पर 2006 में ही रोक लगाई। फ़र्क़ अमल में रहा।
नेपाल में सुरक्षित क्षेत्र वाली व्यवस्था ज़्यादा सख़्ती से चली। 2011 तक वहाँ के बड़े हिस्से में दुकानों पर यह दवा मिलना लगभग बंद हो गया था, और यह बात खुली तथा गुप्त दोनों तरह की दुकान-जाँचों से दर्ज हुई। 2021 में नेपाल में दुनिया का पहला पूरी तरह सुरक्षित घोषित गिद्ध क्षेत्र बना।
नतीजा भी दर्ज है। नेपाल में सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध की तेज़ गिरावट 2002 से क़रीब 2013 तक चली, और उसके बाद 2018 तक आंशिक सुधार दिखा।
सेव की नीति टिप्पणी इस अंतर को सीधे शब्दों में रखती है: भारत में कोई मज़बूत सुधार नहीं हुआ है, जबकि नेपाल में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जहाँ डाइक्लोफ़ेनाक का इस्तेमाल ज़्यादा प्रभावी ढंग से रोका गया।
यह वाक्य उसी गठबंधन का है जिसका सदस्य पिंजौर का केंद्र चलाता है। यानी यह बाहर से की गई आलोचना नहीं है।
फ़र्क़ किस चीज़ का है, यह भी उसी टिप्पणी में है। भारत में डाइक्लोफ़ेनाक का अवैध पशु-इस्तेमाल जारी रहा, और साथ में एसिक्लोफ़ेनाक, निमेसुलाइड, कीटोप्रोफ़ेन और फ़्लूनिक्सिन का इस्तेमाल बढ़ा।
रोक लगाना एक काम है। दुकान तक पहुँचना दूसरा।
ढाँचा जो बनाया गया
गिद्ध संरक्षण कार्य योजना 2020-2025 को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने 5 अक्तूबर 2020 को मंज़ूरी दी।
इसमें पाँच राज्यों में नए संरक्षण प्रजनन केंद्र बनाने की बात थी: उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु।
चार बचाव केंद्र तय हुए: पिंजौर, भोपाल, गुवाहाटी और हैदराबाद।
आज देश में नौ संरक्षण प्रजनन केंद्र हैं।
इनके साथ गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र की व्यवस्था है, जो देश की आठ जगहों पर चल रही है जहाँ गिद्धों की आबादी बची हुई थी।
इसका आकार तय है। एक ऐसा गोला जिसकी त्रिज्या क़रीब सौ किलोमीटर हो, और जिसके बीच में या तो गिद्धों की कोई बड़ी घोंसला-बस्ती हो या वह जगह जहाँ पाले हुए पक्षी छोड़े जाने हैं। सौ किलोमीटर इसलिए कि गिद्ध खाने की तलाश में इतनी दूर तक चला जाता है।
काम तीन तरह का होता है। इलाक़े की हर पशु चिकित्सा दुकान की जाँच, जिसमें खुली जाँच के साथ-साथ ग्राहक बनकर की गई गुप्त जाँच भी शामिल है, क्योंकि दुकानदार सामने से मना कर देता है। मरे हुए पशुओं के शवों के नमूने लेकर यह देखना कि उनमें ज़हरीली दवा के अवशेष हैं या नहीं। और पशुपालकों तक पहुँचकर उन्हें सुरक्षित विकल्प बताना।
योजना का लक्ष्य यह था कि हर राज्य में कम से कम एक ऐसा क्षेत्र हो।
कार्य योजना की अवधि 2025 में ख़त्म हो चुकी है। विज्ञप्ति में यह नहीं बताया गया कि उसके बाद क्या है।
छोड़ना सबसे मुश्किल हिस्सा है
प्रजनन केंद्र में चूज़ा पैदा होना काम की शुरुआत है, अंत नहीं।
गिद्ध देर से परिपक्व होते हैं और आमतौर पर साल में एक अंडा देते हैं। इसलिए संख्या बढ़ने की रफ़्तार धीमी है। पिंजौर के 356 पक्षियों पर 35 चूज़े इसी हक़ीक़त का आँकड़ा है।
असली अड़चन छोड़ने पर आती है। बाड़े में पला पक्षी बाहर तभी ज़िंदा रहेगा जब बाहर का इलाक़ा दवा से मुक्त हो। इसीलिए छोड़ने से पहले सुरक्षित क्षेत्र बनाना पड़ता है, और छोड़े गए पक्षियों पर उपग्रह टैग लगाकर उन्हें महीनों देखा जाता है।
हरियाणा के मंत्री राव नरबीर सिंह ने पंचकूला में यही बात कही, और यह वाक्य विज्ञप्ति का सबसे सटीक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि प्रजनन की सफलता सिर्फ़ पैदा हुए बच्चों की संख्या से नहीं आँकी जानी चाहिए, बल्कि इससे कि एक स्वस्थ और आनुवंशिक रूप से प्रबंधित आबादी बनी या नहीं।
जो विज्ञप्ति नहीं कहती
चार बातें ग़ैरहाज़िर हैं।
डाइक्लोफ़ेनाक का नाम नहीं है। विज्ञप्ति सिर्फ़ इतना कहती है कि गिरावट का मुख्य कारण खाद्य शृंखला में व्यवधान और पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवाएँ थीं।
गिरावट का पैमाना नहीं है। न 99.9 फ़ीसदी, न चार करोड़ से एक लाख।
देश में आज गिद्धों की कुल अनुमानित संख्या नहीं दी गई। यह चूक इसलिए खटकती है कि आँकड़ा मौजूद है, और उसी गठबंधन ने छापा है जिसका सदस्य पिंजौर का केंद्र चलाता है। सफ़ेद पूँछ वाले छह हज़ार, लंबी चोंच वाले पंद्रह हज़ार, पतली चोंच वाले साढ़े सात सौ।
और यह भी नहीं बताया गया कि सबसे लंबी चलने वाली गिनती का निष्कर्ष क्या है। वह निष्कर्ष कार्यशाला के नाम से मेल नहीं खाता।
और छोड़े गए गिद्धों में से कितने ज़िंदा बचे, यह नहीं बताया गया। 87 का आँकड़ा योगदान का है, जीवित रहने का नहीं।
अगली बार जब यह दिन मनाया जाए, तो देखने की चीज़ यही रहेगी: कितने पक्षी बाहर हैं, और कितने बचे हुए हैं।
स्रोतपर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026, फ़्रैंक और सुदर्शन, अमेरिकन इकोनॉमिक रिव्यू, अक्तूबर 2024, सेव, निमेसुलाइड पर राजपत्र अधिसूचना की रिपोर्ट, गिद्ध संरक्षण कार्य योजना 2020-2025, पीएलओएस वन, डाइक्लोफ़ेनाक पर रोक के बाद गिरावट की दर पर अध्ययन, सेव, भारत पर नीति टिप्पणी, अप्रैल 2025 में अद्यतन, बर्ड कंज़र्वेशन इंटरनेशनल, नेपाल में आंशिक सुधार पर अध्ययन, प्रकाश आदि, बर्ड कंज़र्वेशन इंटरनेशनल 2024, सड़क सर्वेक्षण के तीस साल