बहत्तरवाँ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार आज दिल्ली से बाहर एकता नगर में, और रिकॉर्ड बताता है कि यह दूसरी बार है, पहली बार 1970 में मद्रास में हुआ था
कई अख़बार आज के समारोह को पुरस्कार के बहत्तर बरसों में पहली बार दिल्ली से बाहर होना बता रहे हैं। उन्हीं अख़बारों की रिपोर्टों में दर्ज मिलता है कि सत्रहवाँ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 21 नवंबर 1970 को मद्रास में दिया गया था, दिल्ली में नहीं।

आज, 22 सितंबर 2026 को, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू गुजरात के एकता नगर में बहत्तरवें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार देंगी। जगह का पुराना नाम केवड़िया है।
विजेताओं के नाम नए नहीं हैं। पत्र सूचना कार्यालय ने ये नाम 18 जुलाई 2026 की शाम साढ़े सात बजे ही घोषित कर दिए थे। आज सिर्फ़ पदक बँटेंगे, और जगह बदल गई है।
एकता नगर में आज का समारोह, और तीन अख़बारों का दावा
यह पहला मौक़ा है जब एकता नगर में कोई राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार समारोह हो रहा है। इस पर विवाद नहीं है। विवाद इस बात पर है कि यह मौक़ा पूरे पुरस्कार के इतिहास में कैसा है।
वाइब्स ऑफ़ इंडिया ने 8 सितंबर 2026 को अपने शीर्षक में लिखा, "Breaking A 72-Year Tradition: National Film Awards Ceremony Shifts To Gujarat"। रिपोर्ट के पहले पैराग्राफ़ में यह भी है कि पुरस्कार "outside Delhi for the first time in their 72-year history" दिए जा रहे हैं। द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया ने उसी दिन लिखा, "72nd National Film Awards: Ceremony To Be Held In Gujarat; First Time Outside New Delhi In Decades"। द ट्रिब्यून ने आज सुबह 9:24 बजे लिखा कि समारोह "outside Delhi for the first time in seven decades" हो रहा है।
तीन अख़बार, तीन वाक्य, और मतलब लगभग एक जैसा: ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। दावा अगर सही है तो बड़ी बात है। बहत्तर बरस पुराने किसी सरकारी समारोह का पहली बार राजधानी से बाहर जाना छोटी घटना नहीं होगी। पर पहली बार होने का दावा जाँचने का तरीक़ा एक ही है, पुरस्कार का अपना रिकॉर्ड खोलकर देखना, किसी अख़बार की एक पंक्ति पर भरोसा करके नहीं।
रिकॉर्ड की जाँच: 1970 में मद्रास पहले ही यह कर चुका है
अंग्रेज़ी विकिपीडिया के "17th National Film Awards" पन्ने पर समारोह-स्थल का कॉलम भरा हुआ है, University Centenary Auditorium, Madras। तारीख़ भी दर्ज है, 21 नवंबर 1970। यह सत्रहवें संस्करण का समारोह था, 1969 की फ़िल्मों के लिए। उसी समारोह में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार पहली बार दिया गया था, देविका रानी को।
यह अकेला विश्वकोश-पन्ना नहीं बोल रहा। तीनों अख़बार, जो ऊपर पहली बार होने या बहत्तर बरस की परंपरा टूटने की बात लिख चुके हैं, अपने ही लेख में यह मानते हैं। वाइब्स ऑफ़ इंडिया अपने तीसरे पैराग्राफ़ में लिखता है, "The awards have ventured outside Delhi in the past. One notable instance came in 1970, when the 17th National Film Awards were presented at the University Centenary Auditorium in Madras, now Chennai."। द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया लिखता है, "In 1970, the 17th National Film Awards took place at University Centenary Auditorium, Madras (now Chennai)."। द ट्रिब्यून लिखता है, "The earlier major shift from the capital came when Madras (now Chennai) hosted the 17th National Film Awards on November 21, 1970."।
तो तीनों अख़बार जिस तथ्य को अपने शीर्षक में झुठलाते हैं, उसी तथ्य को अपने शरीर में दर्ज करते हैं। यह किसी छिपे स्रोत से नहीं आया। यही रिपोर्टर जानते थे, और यही उन्होंने लिखा भी, बस शीर्षक में नहीं।
इस मंच के 20 सितंबर के लेख ने पहले ही बताया था कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय का अपना पृष्ठभूमि-दस्तावेज़ जगह बदलने को नीतिगत फ़ैसला बताता है, पर कहीं "पहली बार" नहीं लिखता। यह जाँच उसे एक क़दम आगे ले जाती है। दस्तावेज़ की चुप्पी सही निकली, क्योंकि दावा ख़ुद अधूरा है।
फिर भी एक सवाल बाक़ी रहता है। क्या 1970 के बाद कभी दूसरा अपवाद हुआ? इस रिपोर्ट ने पिछले बारह बरसों के पाँच संस्करण अलग से जाँचे, साठवाँ (2013), पैंसठवाँ (2018), उनहत्तरवाँ (2023), सत्तरवाँ (2024) और इकहत्तरवाँ (2025)। पाँचों के विकिपीडिया पन्नों पर जगह एक ही दर्ज है, नई दिल्ली। इकहत्तरवाँ समारोह पिछले बरस 23 सितंबर 2025 को नई दिल्ली में हुआ था। इससे यह साबित नहीं होता कि बीच के बरसों में कोई और अपवाद कभी नहीं हुआ। इतना ज़रूर मिलता है कि जितने संस्करण जाँचे गए, हर एक दिल्ली में हुआ, बिना अपवाद।

रिकॉर्ड छप्पन बरस का हिसाब देता है, बहत्तर का नहीं।
पुरस्कार छप्पन बरस बाद दूसरी बार दिल्ली से बाहर जा रहा है, पहली बार नहीं।
दशकों में पहली बार होने का दावा टिकता है, क्योंकि 1970 और 2026 के बीच पाँच दशकों से ज़्यादा का फ़ासला है। बहत्तर बरस की परंपरा टूटने का दावा नहीं टिकता, क्योंकि परंपरा एक बार पहले भी टूट चुकी है, उन्हीं बहत्तर बरसों के भीतर, और इसे लिखने वाले अख़बार ख़ुद यह जानते थे।
जूरी कैसे बैठती है, फ़ैसला अंतिम किसका होता है
राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार विनियम, 2024 के मुताबिक़ फ़ीचर फ़िल्मों के लिए दो-स्तरीय जूरी व्यवस्था है। पहला स्तर क्षेत्रीय है, दूसरा केंद्रीय। पाँच क्षेत्रीय जूरी हैं, उत्तर पैनल हिंदी, पंजाबी, डोगरी, भोजपुरी, राजस्थानी, उर्दू, अंग्रेज़ी और मध्य भारत की भाषाओं के लिए, पश्चिम पैनल मराठी, गुजराती और कोंकणी के लिए, दक्षिण-एक पैनल तमिल और मलयालम के लिए, दक्षिण-दो पैनल कन्नड़ और तेलुगु के लिए, और पूर्व पैनल बंगाली, असमिया, ओड़िया, मणिपुरी और पूर्वोत्तर की बोलियों के लिए। भाषा से पैनल बनता है, राज्य से नहीं। हर क्षेत्रीय जूरी में एक अध्यक्ष और एक सदस्य उस क्षेत्र से बाहर से लिया जाता है, और तीन सदस्य उसी क्षेत्र से। कुल पाँच सदस्य। नियम ख़ुद कहता है कि दोनों बाहरी सदस्य क्षेत्रीय मोह से मुक्त रहें।
हर क्षेत्रीय जूरी दस फ़ीचर फ़िल्मों तक, या उस क्षेत्र से मिली कुल प्रविष्टियों के तीस फ़ीसद तक, जो भी कम हो, केंद्रीय जूरी को भेज सकती है। आगे का फ़ैसला वहीं होता है। केंद्रीय जूरी में एक अध्यक्ष और दस सदस्य होते हैं, कुल ग्यारह। कोई भी क्षेत्रीय जूरी का सदस्य केंद्रीय जूरी में नहीं आ सकता। यह जूरी दिल्ली में बैठती है, चाहे समारोह कहीं भी हो। समारोह गुजरात में हो या दिल्ली में, फ़ैसला यहीं होता है। यही जूरी फ़ीचर वर्ग के हर पुरस्कार पर आख़िरी सिफ़ारिश देती है, और उसे यह हक़ भी है कि किसी क्षेत्रीय जूरी ने जिस फ़िल्म को आगे नहीं भेजा, उसे वापस बुला सके, बशर्ते अध्यक्ष समेत कम-से-कम पाँच सदस्य लिखित में सहमत हों। गणपूर्ति भी तय है: क्षेत्रीय पैनल में अध्यक्ष समेत चार सदस्य चाहिए, केंद्रीय पैनल में अध्यक्ष समेत दस।
ग़ैर-फ़ीचर वर्ग की जूरी अलग है, एक अध्यक्ष और अधिकतम छह सदस्य। इसमें गणपूर्ति अध्यक्ष समेत छह की है। अध्यक्ष चाहे तो दो पैनल बना सकता है। सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन की जूरी और छोटी है, सिर्फ़ तीन सदस्य, अध्यक्ष समेत। गणपूर्ति यहाँ दो की है। नियम माँग करता है कि हर सदस्य ने कम-से-कम एक किताब लिखी हो, या नियमित समीक्षा। दादासाहेब फाल्के पुरस्कार के लिए कोई प्रविष्टि नहीं मँगाई जाती। सिनेमा की प्रतिष्ठित हस्तियों की एक अलग समिति नाम सुझाती है। सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फ़िल्म की श्रेणी में भी एक अपवाद है। फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया दस फ़िल्मों तक सुझा सकती है, पर जूरी उन्हीं तक सीमित नहीं रहती।
बहत्तरवें संस्करण में फ़ीचर फ़िल्म जूरी के अध्यक्ष जयराज हैं, ग़ैर-फ़ीचर जूरी के असीम सिन्हा, और सिनेमा पर लेखन जूरी के ए. चंद्रशेखर। तीनों नाम पत्र सूचना कार्यालय के दस्तावेज़ों में दर्ज हैं।
पर आख़िरी शब्द जूरी का भी नहीं है। नियम 23.5 कहता है, "The Jury shall make the recommendations, which may be approved by the Ministry of Information and Broadcasting and the decision of the Ministry of Information and Broadcasting shall be final and binding and no appeal or correspondence regarding their decision shall be entertained."। यानी सिफ़ारिश जूरी की, मंज़ूरी मंत्रालय की। कोई विवाद हो तो वह मंत्रालय के सचिव के पास जाता है। सचिव का फ़ैसला अंतिम है। नियम 22.2 एक बात और जोड़ता है। कोई निर्माता या कलाकार सचिव के पास जाने के बजाय सीधे अदालत चला जाए, तो उसकी अर्ज़ी अपने-आप अपात्र मान ली जाएगी। दिया जा चुका पुरस्कार भी वापस लिया जा सकता है।
कौन पात्र है, भाषा की शर्त क्या कहती है
पात्रता की शर्तें नियम में हैं, किसी परंपरा में नहीं। फ़िल्म का सीबीएफ़सी प्रमाणपत्र पुरस्कार वर्ष के भीतर का होना चाहिए, बहत्तरवें संस्करण के लिए 1 जनवरी से 31 दिसंबर 2024 के बीच का। हर फ़िल्म में अंग्रेज़ी उपशीर्षक ज़रूरी है, चाहे फ़िल्म ख़ुद अंग्रेज़ी में ही क्यों न हो। फ़ीचर फ़िल्म की परिभाषा भी नियम में है, बहत्तर मिनट से ज़्यादा लंबी फ़िल्म फ़ीचर वर्ग में जाती है, उससे छोटी ग़ैर-फ़ीचर वर्ग में। डब की गई, दोबारा बनाई गई या पहले किसी और नाम से भेजी जा चुकी फ़िल्में अपात्र हैं। एक निर्माता या संस्था ज़्यादा-से-ज़्यादा सात प्रविष्टियाँ भेज सकती है। अगर कोई आवेदक जूरी के किसी सदस्य को फ़ोन, चिट्ठी या मुलाक़ात से प्रभावित करने की कोशिश करे, तो वह तीन बरस के लिए अपने-आप अयोग्य हो जाता है।
प्रवेश शुल्क भी तय है, फ़ीचर फ़िल्म के लिए ग्यारह हज़ार आठ सौ रुपये अठारह फ़ीसद जीएसटी समेत, और ग़ैर-फ़ीचर के लिए पाँच हज़ार नौ सौ रुपये। 15 मार्च 2024 के एक अलग दिशा-निर्देश के बाद से हर फ़ीचर फ़िल्म में दृष्टि और श्रवण बाधित दर्शकों के लिए क्लोज़्ड कैप्शन और ऑडियो विवरण भी अनिवार्य है।
"any Indian language" की परिभाषा नियम की धारा 2.3 में है, और यह उतनी सीधी नहीं जितनी लगती है। इसमें राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों की सारी सरकारी भाषाएँ आती हैं, संविधान की आठवीं अनुसूची की सारी भाषाएँ आती हैं, और इनके अलावा वे भाषाएँ और बोलियाँ भी, जो भारत में कहीं प्रचलित हों, बशर्ते निर्माता संबंधित राज्य के ज़िलाधिकारी या गृह सचिव से एक प्रमाणपत्र जमा करे कि वह भाषा वहाँ बोली जाती है। इसी प्रावधान से आठवीं अनुसूची से बाहर की भाषाओं की फ़िल्में भी पुरस्कार तक पहुँचती हैं, जैसा बहत्तरवें संस्करण में हुआ।
विदेशी नागरिकों पर नियम उलझा हुआ नहीं, दोहरा है। धारा 7.1 कहती है कि पुरस्कार सिर्फ़ उन्हीं के लिए है जो सामान्यतः भारत में रहते और काम करते हैं। ठीक अगली धारा, 7.2, कहती है, "Film professionals & technicians of foreign origin can also be considered for Awards"। दोनों धाराएँ नियम में साथ-साथ हैं, एक-दूसरे को काटे बिना।
तमगे और नक़द इनाम, और एक जगह हिसाब नहीं मिलता
फ़ीचर फ़िल्म अनुसूची में पुरस्कार क्रम-संख्या I से XXVIII तक हैं, पर XVIII कहीं नहीं है। सूची सीधे सत्रहवें नंबर, सर्वश्रेष्ठ साउंड डिज़ाइन, से उन्नीसवें नंबर, सर्वश्रेष्ठ एडिटिंग, पर चली जाती है। यह जाँच दो अलग तरीक़ों से पीडीएफ़ पढ़कर दोहराई गई, और दोनों बार यही मिला।
बड़े पुरस्कार, जैसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन, सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फ़िल्म, निर्माता और निर्देशक दोनों को अलग-अलग स्वर्ण कमल और तीन-तीन लाख रुपये देते हैं। बाक़ी ज़्यादातर वर्ग, अभिनय और हर तकनीकी विधा समेत, रजत कमल और दो लाख रुपये लाते हैं। आठवीं अनुसूची की हर भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म को भी रजत कमल और दो-दो लाख ही मिलते हैं, स्वर्ण कमल नहीं, भाषा चाहे जितनी भी बड़ी हो।
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार पर दो सरकारी काग़ज़ आपस में नहीं मिलते। विनियम की धारा 6 नक़द राशि पंद्रह लाख रुपये लिखती है। 20 सितंबर 2026 का पत्र सूचना कार्यालय का पृष्ठभूमि-दस्तावेज़ दस लाख रुपये लिखता है। दोनों बहत्तरवें संस्करण के लिए हैं, दोनों सरकारी हैं, और यह रिपोर्ट दोनों आँकड़े दर्ज कर रही है, किसी एक को सही मानकर नहीं।
वेन्यू किसने चुनी, एकता नगर में और क्या है
जगह किसने चुनी, यह सवाल अलग है। विनियम की धारा 4 सीधी है, "The Awards will be organized by the Ministry of Information and Broadcasting, or such other organization as may be notified from time to time, on behalf of the Government of India"। यानी आयोजन का हक़ मंत्रालय का है, या मंत्रालय जिसे तय करे उसका। 2022 में फ़िल्म महोत्सव निदेशालय का एनएफ़डीसी में विलय हुआ। तभी से एनएफ़डीसी ज़मीनी आयोजन देखती है। पर जगह का फ़ैसला ख़ुद मंत्रालय ने लिया है, पत्र सूचना कार्यालय के अपने पृष्ठभूमि-दस्तावेज़ के मुताबिक़। एनएफ़डीसी सिर्फ़ इंतज़ाम देखती है। द ट्रिब्यून की आज की रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है: आज का समारोह केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय और गुजरात सरकार, दोनों मिलकर करा रहे हैं।
एकता नगर का पुराना नाम केवड़िया है। रेलवे स्टेशन का नाम भी जनवरी 2022 में बदलकर एकता नगर किया गया। यह जगह स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी से जानी जाती है, सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति, नर्मदा के किनारे 182 मीटर ऊँची। द ट्रिब्यून इसे दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति बताता है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अक्तूबर 2018 को खोला था, वाइब्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़। मूर्ति के आस-पास अब एक पूरा नगर बसाया गया है, तीस से ज़्यादा घूमने-देखने के ठिकानों के साथ।

समारोह की जगह भी उसी परिसर में है। "बस बे" इलाक़े में एक अस्थायी ढाँचा बनाया गया है, जर्मन एल्यूमिनियम का गुंबद, करीब एक हज़ार मेहमानों के बैठने लायक़। द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया के मुताबिक़ यह जानकारी नर्मदा ज़िला प्रशासन की 7 सितंबर की एक विज्ञप्ति से आई है। पूरा कार्यक्रम पचहत्तर मिनट का रखा गया है।
एक इत्तिफ़ाक़ इसी सूची में छिपा है। बहत्तरवें संस्करण में ग़ैर-फ़ीचर वर्ग का सर्वश्रेष्ठ निर्देशन पुरस्कार आनंद एल. राय को मिला है, फ़िल्म का नाम "स्टैच्यू ऑफ यूनिटी - एकता का प्रतीक"। जिस स्मारक के नीचे आज मंच बना है, उसी पर बनी एक फ़िल्म को आज वहीं पुरस्कार मिलेगा। यह पत्र सूचना कार्यालय के अपने दस्तावेज़ में दर्ज है, किसी प्रीव्यू की खोज नहीं।
जुलाई से सितंबर तक का फ़ासला, और सूची पर एक नज़र
घोषणा और समारोह के बीच फ़ासला भी देखा जा सकता है। इस बार विजेता 18 जुलाई को घोषित हुए, समारोह 22 सितंबर को, यानी छियासठ दिन बाद। पिछले तीन संस्करण देखें तो फ़ासला लगभग एक जैसा रहा है, इकहत्तरवें में एक अगस्त से तेईस सितंबर 2025 तक तिरपन दिन, सत्तरवें में सोलह अगस्त से आठ अक्तूबर 2024 तक तिरपन दिन, उनहत्तरवें में चौबीस अगस्त से सत्रह अक्तूबर 2023 तक चौवन दिन। यह पैटर्न 2018 में नहीं था। पैंसठवें संस्करण में एलान और समारोह के बीच सिर्फ़ बीस दिन का फ़ासला था, तेरह अप्रैल से तीन मई तक। तो छियासठ दिन का यह फ़ासला हाल के तीन बरसों जैसा ही है, बस दो हफ़्ते ज़्यादा, और 2018 के मुक़ाबले तिगुने से भी ज़्यादा।
अब उस सूची पर, जिसकी घोषणा जुलाई में हो चुकी थी। सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार आर्टिकल 370 को मिला है, हिंदी फ़िल्म, निर्देशक आदित्य सुहास जांभले। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री यामी गौतम, उसी फ़िल्म के लिए। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार बँटा है, मम्मूटी को ब्रह्मायुगम के लिए और कार्तिक आर्यन को चंदू चैंपियन के लिए। सर्वश्रेष्ठ निर्देशन राजकुमार पेरियासामी को, तमिल फ़िल्म अमरन के लिए। रणदीप हुड्डा को निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फ़िल्म का पुरस्कार मिला, स्वातंत्र्य वीर सावरकर के लिए, वही फ़िल्म जिसमें वे ख़ुद अभिनेता भी हैं। सम्पूर्ण मनोरंजन देने वाली सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कल्कि 2898 एडी बनी, और राष्ट्रीय, सामाजिक तथा पर्यावरण मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कैप्टन मिलर। ग़ैर-फ़ीचर वर्ग में भंगार सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म बनी, और राम-नामी को सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का पुरस्कार मिला।

दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की घोषणा बाद में हुई, 16 सितंबर 2026 को, और यह अनंत नाग को मिला है। उनका जन्म 4 सितंबर 1948 को कर्नाटक में हुआ। उन्होंने कन्नड़ फ़िल्म संकल्प से अभिनय शुरू किया, और हिंदी सिनेमा में पदार्पण फ़िल्म अंकुर से किया। छह भारतीय भाषाओं में तीन सौ से ज़्यादा फ़िल्में उनके नाम हैं, और टीवी धारावाहिक मालगुडी डेज़ भी। पाँच फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, कर्नाटक राज्य के पाँच सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार, और 2025 में पद्म भूषण, यह सब पत्र सूचना कार्यालय के अपने दस्तावेज़ में दर्ज है।
एक और सवाल इस रिपोर्ट को शुरू में मिला था, क्या कोई पुरस्कार-विजेता समारोह से दूर रहेगा। फ़्री प्रेस जर्नल ने 21 सितंबर शाम को लिखा कि कार्तिक आर्यन उसी दिन सुबह पौने छह बजे वड़ोदरा की उड़ान में थे, अपने माता-पिता के साथ, वहाँ से दो घंटे की गाड़ी से एकता नगर के लिए, मंगलवार के समारोह से एक दिन पहले। यह सवाल इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक इतना ही खुला था, और जो दर्ज मिला वह यही है।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, 18 जुलाई 2026, शाम 7:30: '72nd National Film Awards for the year 2024 Announced', विजेताओं की पूरी तालिका, पत्र सूचना कार्यालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, 20 सितंबर 2026, दोपहर 12:54: राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार पर पीआईबी बैकग्राउंडर, एनएफ़डीसी-राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, आधिकारिक वेबसाइट: National Film Awards Regulations एवं 72nd National Film Awards 2024 की प्रवेश-नियमावली, बीस पन्ने, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: 17th National Film Awards, समारोह-स्थल University Centenary Auditorium, Madras, 21 नवंबर 1970, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: 60th National Film Awards, 2013, समारोह-स्थल New Delhi, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: 65th National Film Awards, 2018, समारोह-स्थल New Delhi, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: 69th National Film Awards, 2023, समारोह-स्थल New Delhi, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: 70th National Film Awards, 2024, समारोह-स्थल New Delhi, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: 71st National Film Awards, समारोह 23 सितंबर 2025, समारोह-स्थल New Delhi, वाइब्स ऑफ़ इंडिया, 8 सितंबर 2026, सुबह 8:27 (अद्यतन 8:38): 'Breaking A 72-Year Tradition: National Film Awards Ceremony Shifts To Gujarat', द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया, 8 सितंबर 2026: '72nd National Film Awards: Ceremony To Be Held In Gujarat; First Time Outside New Delhi In Decades', द ट्रिब्यून, सूर्य एस. पिल्लई, 22 सितंबर 2026, सुबह 9:24: 'Stage set for 72nd National Film Awards; special German dome erected in Gujarat's Ekta Nagar', फ़्री प्रेस जर्नल, कबीर सिंह भंडारी, 21 सितंबर 2026, शाम 5:01: 'Kartik Aaryan Spotted On Early Morning Flight To Ekta Nagar'