भारत पन्ना
लफ़्ज़ों का सफ़र

समोसा 1334 में भारत पहुँच चुका था, आलू की बारी सदियों बाद आई

इब्न बतूता के सफ़रनामे में मुल्तान से दिल्ली जाते हुए एक शाही भोज का ब्यौरा है, जिसमें मेवे और मसाले भरी एक तिकोनी पेस्ट्री परोसी गई, जिसे कोश फ़ारसी शब्द बताते हैं। आलू उस मेज़ पर नहीं था, क्योंकि वह पौधा तब अमरीका के बाहर कहीं उगता ही नहीं था।

भारत में एक किसान अपनी आलू की फ़सल के ढेर के पास, 2008 में ली गई तस्वीर; यही कंद समोसे की भरावन में सबसे बाद में पहुँचा
तस्वीर: Vishalsh521, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

मुल्तान से दिल्ली के रास्ते में, सिंध और पंजाब के बीच कहीं एक पड़ाव पर, तंबुओं के बीच खाना परोसा जा रहा था। साल था 1334 के आसपास। मेहमान ख़ुदावंद-ज़ादा नाम के एक मध्य एशियाई रईस थे, जो दिल्ली के सुल्तान की सेवा में आए थे, और उसी क़ाफ़िले में एक यात्री भी था जिसका नाम इब्न बतूता था। सुल्तान के दरबार ने रास्ते भर उनका भोज तैयार रखा, मुल्तान से चौबीस बावर्ची साथ भेजे गए, और हर पड़ाव पर खाना पहले से बना मिलता।

उस भोज में मांस था, घी में बनी मीठी भरी रोटियाँ थीं, और एक और चीज़ थी जिसे इब्न बतूता ख़ास तौर पर दर्ज करता है: मेवे और मसाले भरी एक तिकोनी पेस्ट्री, तली हुई। वह उसका नाम भी लिखता है।

वह उसे "संबूसक" कहता है।

छह सौ बरस से ज़्यादा हो गए। नाम आज भी है, बस उच्चारण बदल गया है: समोसा। आकार भी वही है, तिकोना। पर उस भोज में जो भीतर भरा था, वह आज किसी समोसे में शायद ही मिले। आलू वहाँ नहीं था। मटर भी नहीं। वजह सीधी है, और वह वजह भूगोल की है, भाषा की नहीं: वह भोज 1334 के भारत का था, और आलू तब दुनिया के इस हिस्से में कहीं मौजूद ही नहीं था।

एक ही शब्द के भीतर तीन अलग रफ़्तार से चलती घड़ियाँ हैं। लफ़्ज़ पुराना है, कोशों में दर्ज। पेस्ट्री पुरानी है, एक पढ़े जा सकने वाले सफ़रनामे में दर्ज। भरावन नई है, कुछ ही सदियों पुरानी। यह लेख तीनों को अलग-अलग जाँचता है, और जहाँ जाँच नहीं हो सकी, वहाँ रुक जाता है।

इब्न बतूता की मेज़ पर परोसा गया संबूसक

यह पूरी कहानी एक किताब से निकलती है, और वह किताब मौजूद है, पढ़ी जा सकती है।

इब्न बतूता का सफ़रनामा मूलतः अरबी में है। इसका मानक अंग्रेज़ी अनुवाद एच. ए. आर. गिब ने किया, हकलुयत सोसाइटी की दूसरी शृंखला में, चार खंडों में। तीसरा खंड 1971 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से छपा, और भारत की यात्रा का ब्योरा उसी खंड में है। यह लेख उसी खंड के पन्ना 606 और 607 की बात कर रहा है, और यह प्रति इंटरनेट आर्काइव पर सबके पढ़ने के लिए खुली पड़ी है।

घटना दिल्ली पहुँचने से पहले की है। इब्न बतूता सिंध के रास्ते भारत में दाख़िल हुआ था, और मुल्तान से दिल्ली तक चालीस दिन का सफ़र बताया गया है। साथ में एक और क़ाफ़िला था, ख़ुदावंद-ज़ादा और उनके परिवार का, जो दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ की सेवा में जा रहे थे। दरबार ने पूरे रास्ते उनके भोज का इंतज़ाम रखा।

दक्षिण दिल्ली में तुग़लक़ वंश का बनवाया तुग़लक़ाबाद क़िला, 2022 में ली गई तस्वीर; इब्न बतूता जिस सल्तनत की तरफ़ बढ़ रहे थे, वह इसी ख़ानदान की थी
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इब्न बतूता लिखता है कि वह इस भोज में सिर्फ़ एक बार शामिल हुआ। जो कुछ परोसा गया, उसका पूरा क्रम उसने दर्ज किया: पहले पतली गोल रोटियाँ, फिर बड़े टुकड़ों में भुना मांस, फिर घी में बनी मीठी भरी हुई रोटियाँ। इसके बाद जो आता है, वही इस लेख का विषय है। अनुवाद की पंक्ति यह है, ज्यों की त्यों: "they serve something which they call sambūsak, made of meat hashed and cooked with almonds, walnuts, pistachios, onions, and spices, put inside a piece of thin bread, fried in ghee." हर मेहमान के आगे इसके चार या पाँच टुकड़े रखे जाते।

मांस, बादाम, अख़रोट, पिस्ता, प्याज़, मसाले। तला हुआ। यही भरावन थी।

अनुवाद की उसी पंक्ति के नीचे, पन्ना 607 पर, गिब का अपना फ़ुटनोट है, संख्या 47: "From Pers. sanbusa, 'triangular'." यानी अनुवादक ख़ुद बताता है कि यह लफ़्ज़ फ़ारसी है, और इसका मतलब तिकोना है।

तीन बातें इस एक पैराग्राफ़ से तय होती हैं। एक, भारत में इस पेस्ट्री का यह सबसे पुराना दर्ज ब्योरा है जो इस लेख के लिए पढ़ा जा सका। दो, नाम और शक्ल दोनों 1334 तक पहुँच चुके थे। तीन, भरावन मांस और मेवों की थी, आलू की नहीं।

यह गवाही किसी सैलानी की उड़ती नज़र नहीं है। इब्न बतूता इसी यात्रा के कुछ ही समय बाद दिल्ली पहुँचा, और सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने उसे शहर का क़ाज़ी नियुक्त किया, एक ओहदा जो उसने बरसों निभाया। जिस दरबार का यह भोज था, आगे चलकर वही दरबार उसका अपना बन गया। इससे लेखक की चूक की गुंजाइश ख़त्म नहीं होती, पर इतना ज़रूर पता चलता है कि यह ब्योरा किसी दूर से सुनी बात का नहीं, भीतर से देखे हुए एक जीवन का हिस्सा है।

एक एहतियात यहीं दर्ज कर देनी ज़रूरी है। यह अनुवाद इंटरनेट आर्काइव के जिस स्कैन से पढ़ा गया, उसकी अक्षर-पहचान (OCR) हर जगह साफ़ नहीं है, और लफ़्ज़ "sambūsak" वहाँ थोड़ा बिगड़ा हुआ छपता है। पर स्टाइनगास के कोश का ठीक वही हेडवर्ड नीचे मिलता है, और दोनों आपस में मेल खाते हैं। इसलिए इस लेख में वह वर्तनी इस्तेमाल की गई है जो कोश देता है, स्कैन की बिगड़ी हुई शक्ल नहीं।

स्टाइनगास के कोश में संबूसा और संबूसक

इब्न बतूता की किताब एक यात्री का ब्योरा है, शब्दकोश नहीं। तो वही लफ़्ज़ किसी कोश में भी देखना ज़रूरी है।

फ़्रांसिस जोज़फ़ स्टाइनगास का ए कॉम्प्रिहेंसिव पर्शियन-इंग्लिश डिक्शनरी लंदन से 1892 में छपा, और आज भी फ़ारसी के सबसे भरोसेमंद पुराने कोशों में गिना जाता है। उसके पन्ना 700 पर दो हेडवर्ड लगातार दर्ज हैं।

पहला, संबूसक। अर्थ सिर्फ़ इतना दिया है: "A pie." एक पेस्टी।

दूसरा, संबूसा। अर्थ थोड़ा लंबा है: "A kind of triangular pasty, a pie; a square mantle which women wear doubled into a triangular form; anything triangular." यानी एक तिकोनी पेस्टी, और साथ ही वह चौकोर चादर जिसे स्त्रियाँ तिकोने आकार में मोड़कर ओढ़ती थीं, और कोई भी तिकोनी चीज़।

तिकोना ही वह धुरी है जिस पर यह पूरा शब्द-परिवार खड़ा है। पेस्ट्री, चादर, आकार, तीनों एक ही विशेषण से बँधे हैं।

यहाँ एक बात ठहरकर सोचने लायक़ है। दोनों हेडवर्ड शब्द का मूल अर्थ आकार बताते हैं, भरावन नहीं। नाम एक तिकोने रूप पर टिका है, किसी ख़ास सामग्री पर नहीं टिका। इसीलिए सदियों में भरावन जो मर्ज़ी बदलती रहे, नाम बदलने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती। शब्द ने कभी यह वादा नहीं किया था कि भीतर क्या मिलेगा, सिर्फ़ यह बताया था कि बाहर से यह कैसा दिखेगा।

उज़्बेकिस्तान के ख़िवा शहर में मिट्टी के तंदूर में पकता गोल समसा, 2017 की तस्वीर; यहाँ आकार गोल है, पर नाम उसी फ़ारसी जड़ से है जो कोशों में दर्ज मिलती है
तस्वीर: Davide Mauro, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

एक बात ग़ौर करने लायक़ है। स्टाइनगास इन दोनों हेडवर्ड के आगे कोई आगे की जड़ नहीं देता, कोई और भाषा नहीं बताता। शब्द फ़ारसी के भीतर एक साधारण, बसा हुआ लफ़्ज़ जैसा दर्ज है, किसी उधार के निशान के बिना।

लोकप्रिय लेखन में अक्सर एक मध्य-फ़ारसी यानी पहलवी रूप का दावा किया जाता है, "sanbōsag" जैसा कुछ, सितारा लगाकर पुनर्निर्मित रूप में। यह लेख उस दावे को नहीं दोहराता। डी. एन. मैकेंज़ी का A Concise Pahlavi Dictionary, जो पहलवी का मानक छोटा कोश है, इसी जाँच के लिए खोला गया, और उसमें ऐसा कोई रूप नहीं मिला। जो सितारा लगाकर लिखा जाता है, वह अनुमान है, दर्ज हुआ शब्द नहीं। यहाँ वह अनुमान भी दर्ज नहीं निकला, इसलिए यह लेख उसे इस्तेमाल नहीं करता।

प्लैट्स के कोश में समोसा, और एक कोश की अपनी अटकल

अब उसी लफ़्ज़ को हिंदी-उर्दू की तरफ़ से देखिए।

जॉन टी. प्लैट्स का ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिंदी ऐंड इंग्लिश 1884 में लंदन से छपा। पन्ना 677 पर समोसा दर्ज है, और भाषा-चिह्न सबसे पहले आता है: "P", यानी फ़ारसी।

उसके बाद कोष्ठक में दो बातें हैं। एक, संबूसा का हवाला, "q.v." के साथ, यानी वह अलग प्रविष्टि भी देखिए। दो, एक अनुमान: "prob. = S. सम + भुज 'having equal sides'।" यानी शायद यह संस्कृत सम और भुज से बना है, बराबर भुजाओं वाला।

अर्थ इस तरह दर्ज हैं: मेवे भरी एक तिकोनी पेस्ट्री, और वह चौकोर चादर जो तिकोने आकार में मोड़ी जाए, और कोई भी तिकोनी चीज़। एक यौगिक भी है, समोसा-वरक़ी, महीन परतों वाला एक और पेस्ट्री।

प्लैट्स पन्ना 680 पर संबूसा को अलग से भी दर्ज करता है। वहाँ भी भाषा-चिह्न "P" है, और अर्थ सिर्फ़ इतना: "= samosa, q.v."। दोनों एक ही शब्द के दो रूप हैं, दोनों फ़ारसी।

अब वह हिस्सा जो जाँचने लायक़ है। प्लैट्स की "prob." वाली अटकल, कि समोसा शायद संस्कृत सम-भुज से बना हो, ठीक उसी जाल की तस्वीर है जिससे यह पूरी शृंखला बचकर चलती है। आवाज़ का मिलना जड़ का सबूत नहीं होता। एक शब्द जो सुनने में संस्कृत जैसा लग सकता है, उसे संस्कृत सिद्ध करने के लिए तुलनात्मक कोश में जड़ चाहिए।

तो टर्नर का ए कंपैरेटिव डिक्शनरी ऑफ़ द इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़ खोला गया, समोसा और संबूसा, दोनों वर्तनी में। कोई प्रविष्टि नहीं मिली। जिस कोश को यह शृंखला भारतीय-आर्य वंश के लिए मानक मानती है, वह इस शब्द को जानता ही नहीं।

तो प्लैट्स की अपनी अटकल प्लैट्स के अपने भाषा-चिह्न से ही हार जाती है। समोसा "P" है, फ़ारसी। कोष्ठक वाला अनुमान एक हाशिया है, जिसे कोई दूसरा कोश सहारा नहीं देता।

हिंदी शब्दसागर: वही शब्द, आज की भरावन के साथ

अंग्रेज़ी और फ़ारसी कोशों के बाद हिंदी के अपने कोश की बारी है।

नागरी प्रचारिणी सभा का हिंदी शब्दसागर पन्ना 4987 पर समोसा दर्ज करता है। जड़ का हिस्सा छोटा है, कोष्ठक में सिर्फ़ इतना: "फ़ा॰ संबोसह्।" यानी फ़ारसी, और मूल रूप संबोसह्।

यह वर्तनी स्टाइनगास की संबूसा से थोड़ी अलग है, स्वर बदला हुआ है, पर जड़ वही एक है। दो अलग कोश, दो अलग समय, एक ही फ़ारसी शब्द को हिंदी और अंग्रेज़ी लिपि में हल्के अलग ढंग से पकड़ते हैं।

अर्थ के आगे शब्दसागर एक लंबा विशेष भी देता है, और वहीं आज की भरावन आती है। मैदा गूँथकर बेला जाता है, बीच से काटकर अर्धवृत्त बनाया जाता है, और एक हिस्से में मसालेदार आलू-मटर भरकर तिकोने आकार में लपेटा जाता है। फिर घी या तेल में तला जाता है। शब्दसागर यह भी जोड़ता है कि यह नमकीन और मीठा, दोनों तरह से बनता है।

मीठे समोसे की बात ख़ास तौर पर दर्ज करने लायक़ है, क्योंकि आम बोलचाल में समोसा सिर्फ़ नमकीन नाश्ते के तौर पर याद किया जाता है। शब्दसागर की यह प्रविष्टि बताती है कि बीसवीं सदी में भी यह शब्द तिकोने आकार के पूरे एक ढाँचे से बंधा था, किसी एक पकवान तक सीमित नहीं। ठीक वैसे ही जैसे स्टाइनगास और प्लैट्स के कोश ऊपर बता चुके हैं।

पंजाबी समोसे के लिए तैयार मसालेदार आलू की भरावन, धनिया और टमाटर के साथ; यही वह मिश्रण है जो पेस्ट्री बनने की सदियों बाद उसके भीतर पहुँचा
तस्वीर: Miansari66, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

आलू और मटर। यही वह भरावन है जो आज हर उत्तर भारतीय समोसे की पहचान है। और यही वह भरावन है जो 1334 के उस भोज में नहीं थी।

फ़ासला सिर्फ़ शब्दों का नहीं, सदियों का है। इब्न बतूता के संबूसक और शब्दसागर के समोसे के बीच छह सौ बरस से ज़्यादा हैं, और भरावन ठीक उन्हीं बरसों में बदली।

आलू की घड़ी अलग चलती है

यहीं वह दूसरी घड़ी शुरू होती है, जो पेस्ट्री की घड़ी से बिल्कुल अलग रफ़्तार से चलती है।

आलू दक्षिण अमरीका का पौधा है। आज के पेरू और बोलिविया के इलाक़े में, टिटिकाका झील के आसपास, किसानों ने इसे हज़ारों बरस पहले उगाना शुरू किया था। कोलंबस के जहाज़ 1492 में अमरीका पहुँचे। उससे पहले आलू का कोई पौधा पुरानी दुनिया में, यानी एशिया, अफ़्रीका या यूरोप में, कहीं नहीं था। यह बात इतिहास और वनस्पति-विज्ञान, दोनों में सहमति की है।

स्पेनी लोग आलू को पहले यूरोप ले गए, सोलहवीं सदी में। भारत तक इसका पहुँचना इससे भी बाद की बात है। जो ब्योरे मिलते हैं, वे भारत में आलू को सत्रहवीं सदी के आसपास रखते हैं, यूरोपीय व्यापारियों के ज़रिए, पहले तटीय इलाक़ों में। खेती व्यापक होने में इसके बाद भी बरसों लगे।

तो हिसाब सीधा है। इब्न बतूता ने जो संबूसक 1334 में खाया, उसके तीन सौ बरस बाद तक भी आलू भारत में मौजूद नहीं था। जिस भरावन का ज़िक्र वह करता है, मांस और मेवे, वह इसीलिए है, क्योंकि उस वक़्त कोई दूसरा विकल्प था ही नहीं।

यह अकेला उदाहरण नहीं है। मिर्च और टमाटर भी दक्षिण अमरीका के पौधे हैं, और भारतीय रसोई में इन दोनों की मौजूदगी आलू जितनी ही हाल की है। आज जिसे "पारंपरिक भारतीय स्वाद" कहा जाता है, उसका एक बड़ा हिस्सा उसी सोलहवीं-सत्रहवीं सदी की अदला-बदली से आया है जिसने आलू को भी यहाँ पहुँचाया। समोसा इसलिए अकेला मामला नहीं है, एक बड़े पैटर्न की एक मिसाल भर है।

आलू समोसे की उम्र इसलिए समोसे की अपनी उम्र से कहीं छोटी है। पेस्ट्री और नाम की उम्र कम से कम छह सौ बरस, कोशों और एक पढ़े गए सफ़रनामे से तय। भरावन की उम्र इसका आधा हिस्सा भी नहीं, और यह हिसाब इस लेख का नहीं, कैलेंडर का है।

एक बात साफ़ कर देनी चाहिए। यह लेख यह नहीं कहता कि ठीक किस साल किसी रसोइए ने पहली बार समोसे में आलू भरा। वह तारीख़ इस लेख के लिए देखे गए किसी स्रोत में नहीं मिली। जो तय है, वह सिर्फ़ इतना है कि वह तारीख़ सत्रहवीं सदी से पहले की नहीं हो सकती, क्योंकि आलू ख़ुद वहाँ नहीं था।

इस लेख की चार सीमाएँ

चार चीज़ें इस लेख से तय नहीं होतीं, और उन्हें दर्ज कर देना बेहतर है।

पहली, उर्दू लुग़त की जाँच नहीं हो सकी। स्लेट में यह उर्दू ज़बान के इस्तेमाल की पुष्टि के लिए नामित स्रोत था। इस सत्र में उर्दू डिक्शनरी बोर्ड की अपनी वेबसाइट तक पहुँच नहीं बनी, उसका सबसे जाना-पहचाना ऑनलाइन आईना बार-बार HTTP 502 के साथ अनुपलब्ध मिला, और रेख़्ता के शब्दकोश का डेटा उसके अपने ऐप के भीतर बंद निकला, बाहर से पढ़ा नहीं जा सका। यह कमी है, और उसे भरने के बजाय यहाँ दर्ज किया जा रहा है।

दूसरी, इस लेख में अमीर ख़ुसरो या आइन-ए-अकबरी का कोई हवाला नहीं है, जो समोसे पर लगभग हर लोकप्रिय लेख में मिलता है। वजह यह नहीं कि ऐसा कोई हवाला मौजूद नहीं होगा। वजह यह है कि इस लेख के लिए किसी पहचाने संस्करण में वह पन्ना ख़ुद नहीं पढ़ा जा सका, और बिना पढ़े कोई हवाला यहाँ नहीं जाता।

तीसरी, "sanbōsag" जैसा जो सितारा-चिह्नित मध्य-फ़ारसी रूप कई जगह घूमता मिलता है, वह मैकेंज़ी के पहलवी कोश में दर्ज नहीं मिला। यह लेख उसे अनुमान मानता है, दस्तावेज़ नहीं, और इस्तेमाल नहीं करता।

चौथी, यह लेख यह दावा नहीं करता कि फ़ारसी दुनिया में यह शब्द ठीक कब से बोला जा रहा था। स्टाइनगास और प्लैट्स उन्नीसवीं सदी के कोश हैं, और वे किसी शब्द की पहली दर्ज तारीख़ नहीं देते, सिर्फ़ उसका अर्थ देते हैं। इब्न बतूता का ब्योरा 1334 के आसपास का है, और यही वह सबसे पुरानी तारीख़ है जो इस लेख के लिए किसी पहचाने संस्करण में पढ़ी जा सकी। इससे पहले फ़ारस या मध्य एशिया में यह शब्द कब से चल रहा था, यह इस लेख का दावा नहीं है।

दो घड़ियाँ

एक ही थाली में दो अलग उम्र की चीज़ें रखी हैं। एक तीसरी घड़ी भी है, सबसे छोटी और सबसे धुँधली: वह ठीक तारीख़ जब दोनों आपस में मिलीं, यानी जब पहली बार किसी ने समोसे में आलू भरा। वह तारीख़ इस लेख के पास नहीं है, और शायद किसी भी दर्ज स्रोत के पास नहीं।

लफ़्ज़ पुराना है। स्टाइनगास के फ़ारसी कोश में यह एक बसा हुआ शब्द है, बिना किसी उधार के निशान के। प्लैट्स के कोश में वह फ़ारसी चिह्नित है, हिंदी-उर्दू का अपना बन चुका।

पेस्ट्री पुरानी है। इब्न बतूता ने उसे 1334 के आसपास एक भोज में खाया, और उसका नाम, उसका आकार, उसकी भरावन तक दर्ज कर दी।

भरावन नई है। आलू के बिना आज का समोसा शायद ही किसी को समोसा लगे, और वही आलू भारत में इब्न बतूता के तीन सौ बरस बाद तक पहुँचा ही नहीं था।

तीनों बातें एक ही शब्द के भीतर हैं, तीन अलग घड़ियों पर चलती हुई। अगली बार जब कोई तिकोना समोसा हाथ में आए, उसके भीतर मांस-मेवे की वह पुरानी भरावन नहीं होगी। उसका नाम फिर भी वही रहेगा जो छह सौ बरस पहले एक यात्री ने एक अजनबी मुल्क में लिखकर रख दिया था।

स्रोतइब्न बतूता, सफ़रनामा, अंग्रेज़ी अनुवाद एच. ए. आर. गिब, हकलुयत सोसाइटी (दूसरी शृंखला), खंड 3, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1971, पन्ना 606-607 और फ़ुटनोट 47 (इंटरनेट आर्काइव का स्कैन), एफ़. जे. स्टाइनगास, ए कॉम्प्रिहेंसिव पर्शियन-इंग्लिश डिक्शनरी, लंदन 1892, पन्ना 700 (संबूसा, संबूसक), जॉन टी. प्लैट्स, ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिंदी ऐंड इंग्लिश, लंदन 1884, पन्ना 677 (समोसा) और पन्ना 680 (संबूसा), आर. एल. टर्नर, ए कंपैरेटिव डिक्शनरी ऑफ़ द इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज़, ऑक्सफ़र्ड 1962-66, समोसा और संबूसा दोनों वर्तनी में खोजा गया, कोई प्रविष्टि नहीं मिली, श्यामसुंदर दास (सं.), हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, पन्ना 4987, डी. एन. मैकेंज़ी, ए कंसाइज़ पहलवी डिक्शनरी, ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1971, 'sanbōsag' या मिलते-जुलते रूप के लिए खोजा गया, कोई प्रविष्टि नहीं मिली, विकिपीडिया, 'History of the potato', आलू के दक्षिण अमरीकी मूल और भारत में सत्रहवीं सदी के आसपास पहुँचने के सामान्य ब्योरे के लिए, प्राथमिक स्रोत के तौर पर नहीं, उर्दू लुग़त का ऑनलाइन संस्करण — इस सत्र में बार-बार HTTP 502 के साथ अनुपलब्ध रहा; उद्धृत नहीं किया गया

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।