राधाकृष्णन गणित पढ़ना चाहते थे, दर्शन उन्होंने इसलिए लिया कि चचेरे भाई की पुरानी किताबें मिल गईं
5 सितंबर उनका जन्मदिन है। जिस आदमी के नाम पर शिक्षक दिवस है, उसने विषय चुना नहीं था, विषय उसे मिल गया था। और उसके नाम पर एक मुक़दमा भी है जिसका ज़िक्र इस दिन कभी नहीं होता।

20 अक्टूबर 1936 को ऑक्सफ़ोर्ड में एक व्याख्यान हुआ।
बोलने वाले अड़तालीस साल के एक भारतीय थे और वे उस दिन एक नई कुर्सी सँभाल रहे थे। कुर्सी का नाम था स्पाल्डिंग प्रोफ़ेसरशिप ऑफ़ ईस्टर्न रिलीजन्स ऐंड एथिक्स।
उनका नाम सर्वपल्ली राधाकृष्णन था।
वे उस कुर्सी पर सोलह साल रहे और ऑल सोल्स कॉलेज की फ़ेलोशिप भी उन्हें मिली।
पर वे उस विषय तक पहुँचे कैसे, यह क़िस्सा उस दिन से कहीं ज़्यादा दिलचस्प है।
वे दर्शन पढ़ना ही नहीं चाहते थे
राधाकृष्णन को गणित पढ़ना था।
घर की हालत ऐसी नहीं थी कि नई किताबें ख़रीदी जा सकें। उसी कॉलेज से पास हुए उनके एक चचेरे भाई ने अपनी पुरानी किताबें उन्हें दे दीं।
वे किताबें दर्शन की थीं।
तो विषय उन्होंने चुना नहीं। विषय उनके पास आ गया, क्योंकि उसकी किताबें मुफ़्त में मिल रही थीं और बाक़ी किसी विषय की नहीं।
इस एक बात को आज के दिन के साथ रखकर देखिए। जिस आदमी के जन्मदिन पर पूरा देश शिक्षक दिवस मनाता है, वह ख़ुद जिस विषय का शिक्षक बना, वह विषय उसे ग़रीबी ने दिया था।
चौदह और दस
1903 के मई में उनकी शादी हुई। वे चौदह के थे, सिवकामु दस की।
यह उस दौर के दक्षिण भारत में असामान्य नहीं था, और इसीलिए इसे आज के पैमाने से नहीं पढ़ा जा सकता। पर तारीख़ें अपनी जगह हैं।
वह शादी बावन साल चली। सिवकामु का देहांत 26 नवंबर 1956 को हुआ, जब राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति थे।
उनकी पाँच बेटियाँ थीं और एक बेटा। बेटे का नाम सर्वपल्ली गोपाल था, और वह आगे चलकर भारत के बड़े इतिहासकारों में गिना गया।
नौकरियों की गिनती
1909 में उन्होंने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया।
1918 में मैसूर के महाराजा कॉलेज में दर्शन के प्रोफ़ेसर हुए। 1921 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की किंग जॉर्ज पंचम पीठ पर आए। 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
यानी ऑक्सफ़ोर्ड जाने से पहले ही वे एक विश्वविद्यालय चला चुके थे, और वह भी तैंतालीस की उम्र में।
1931 में उन्हें नाइट की उपाधि मिली और वे सर राधाकृष्णन कहलाने लगे। आज़ादी के बाद यह उपाधि उनके नाम से हट गई और वे डॉक्टर राधाकृष्णन रह गए।

तीन कुर्सियाँ, एक ही आदमी
अब तारीख़ें एक साथ रखिए, क्योंकि यहीं वह बात है जो आमतौर पर नहीं बताई जाती।
ऑक्सफ़ोर्ड की स्पाल्डिंग पीठ उनके पास 1936 से 1952 तक रही।
1939 के आख़िर में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति बने और जनवरी 1948 के मध्य तक रहे। यानी नौ साल।
1949 में वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत बने और 1952 तक मॉस्को में रहे।
तीनों काम आपस में ओवरलैप करते हैं। कुछ वर्षों में वे एक साथ ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफ़ेसर और बनारस के कुलपति थे, और कुछ वर्षों में ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफ़ेसर और मॉस्को में राजदूत।
यह वह ज़माना नहीं था जिसमें हफ़्ते में दो बार उड़ान भरी जा सके। जहाज़ से इंग्लैंड जाने में हफ़्ते लगते थे।
वह कुर्सी बनी क्यों थी
स्पाल्डिंग पीठ ऑक्सफ़ोर्ड की पुरानी कुर्सियों में नहीं है। वह उसी दौर में बनी थी और बनवाने वाले का नाम एच. एन. स्पाल्डिंग था।
उसका मक़सद यह था कि पूर्व के धर्मों और नैतिक विचारों को पश्चिम में गंभीरता से पढ़ाया जाए।
तो कुर्सी नई थी, उसका काम तय था, और उस पर बैठने वाला पहला आदमी वहीं से आया था जिसके बारे में पढ़ाना था।
उनका अपना तर्क भी यही था। उस समय यूरोप में यह मान लिया गया था कि दर्शन ग्रीस से शुरू होता है और बाक़ी जगहों पर जो है वह धर्म है, दर्शन नहीं। भारतीय पाठ को दर्शन की तरह पढ़ाना अपने आप में उस मान्यता के ख़िलाफ़ खड़ा होना था।
और वह मुक़दमा जिसका ज़िक्र आज नहीं होता
यह हिस्सा शिक्षक दिवस की किसी सामग्री में नहीं मिलेगा, इसलिए इसे पूरा और ठीक-ठीक पढ़िए।
जदुनाथ सिन्हा मेरठ कॉलेज में दर्शन पढ़ाते थे। उन्होंने अक्टूबर 1922 में कलकत्ता विश्वविद्यालय को एक शोध-प्रबंध सौंपा था, जिसका विषय भारतीय मनोविज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान था। उसके परीक्षकों में ब्रजेंद्रनाथ सील थे और राधाकृष्णन भी।
20 दिसंबर 1928 को सिन्हा ने *द मॉडर्न रिव्यू* के संपादक को चिट्ठी लिखी। उनका आरोप था कि उनके शोध-प्रबंध के कई हिस्से राधाकृष्णन की किताब भारतीय दर्शन के दूसरे खंड में ज्यों के त्यों उठा लिए गए हैं। वह खंड 1927 में छपा था।
सिन्हा ने पहले चालीस जगहों की तुलना छापी, फिर अगले अंक में सत्तर और।
इसके बाद दोनों तरफ़ से मुक़दमे हुए। राधाकृष्णन ने मानहानि का दावा किया, रक़म एक लाख रुपये। सिन्हा ने कॉपीराइट के उल्लंघन का दावा किया, रक़म बीस हज़ार।
⚠ पहले किसने मुक़दमा किया, इस पर स्रोत आपस में अलग-अलग कहते हैं। हम दोनों दावों को साथ रख रहे हैं और क्रम तय नहीं कर रहे।
1929 के हिसाब से एक लाख रुपये बहुत बड़ी रक़म थी।
बीच-बचाव श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया। अप्रैल 1933 में दोनों पक्षों ने अपने-अपने मुक़दमे वापस ले लिए और 3 मई 1933 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश फणिभूषण चक्रवर्ती ने मामला ख़ारिज कर दिया।
समझौते की शर्तें कभी सार्वजनिक नहीं हुईं।
और यही इस पूरे प्रसंग की असल बात है। किसी अदालत ने यह तय नहीं किया कि आरोप सही था या ग़लत। मुक़दमा फ़ैसले तक पहुँचा ही नहीं।
इसलिए यह लेख न यह कहता है कि नक़ल हुई थी, न यह कि आरोप झूठा था। रिकॉर्ड में इतना है कि आरोप छपा, दोनों तरफ़ से दावे हुए, और चार साल बाद दोनों वापस ले लिए गए।
जदुनाथ सिन्हा 1978 तक जीवित रहे और दर्शन पर लिखते रहे।
मॉस्को में
राजदूत के तौर पर उनके तीन साल की सबसे मशहूर बात एक मुलाक़ात है।
स्तालिन विदेशी राजदूतों से लगभग नहीं मिलते थे। राधाकृष्णन से वे दो बार मिले। पहली बार जनवरी 1950 में, और दूसरी बार 5 अप्रैल 1952 को, जब राधाकृष्णन भारत लौटने वाले थे।
उस दूसरी मुलाक़ात का जो विवरण बार-बार दोहराया जाता है, वह यह है कि राधाकृष्णन ने विदा लेते हुए स्तालिन के गाल और पीठ पर हाथ रखा, और स्तालिन ने कहा कि आप पहले आदमी हैं जिसने मुझे राक्षस नहीं, इंसान की तरह देखा।
⚠ यह विवरण संस्मरणों से आता है, किसी सरकारी दस्तावेज़ से नहीं। हम इसे उसी रूप में दे रहे हैं, यानी एक बार-बार कही गई बात के तौर पर।
जो दस्तावेज़ी बात है वह इतनी है कि स्तालिन ने उनसे दो बार मुलाक़ात की, और उस दौर में यह अपने आप में असामान्य था।

वह आयोग जिससे यूजीसी निकला
1948 में उन्हें एक और ज़िम्मेदारी मिली, जिसका असर आज हर विश्वविद्यालय पर है।
4 नवंबर 1948 को विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग बना और उसके अध्यक्ष राधाकृष्णन थे। इसे राधाकृष्णन आयोग कहा जाता है। यह आज़ाद भारत का पहला शिक्षा आयोग था और उसने अगस्त 1949 में रिपोर्ट दी।
उसकी एक सिफ़ारिश यह थी कि उच्च शिक्षा के पैसे, स्तर और विकास को देखने के लिए एक अलग संस्था बने।
उसी सुझाव से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बना, जो 1953 में औपचारिक रूप से खड़ा हुआ।
तो जिस आदमी के जन्मदिन पर शिक्षक दिवस है, उसी की अध्यक्षता वाली रिपोर्ट से वह संस्था निकली जो आज भी तय करती है कि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले की योग्यता क्या होगी।
किताबें
पढ़ाने के साथ वे लगातार लिखते रहे।
उनका बड़ा काम भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण है, जो दो खंडों में 1920 के दशक में आया। 1926 में उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के मैनचेस्टर कॉलेज में हिबर्ट व्याख्यान दिया, और उसी दौर की उनकी किताब हिंदू जीवन-दृष्टि पर है।
बाद के वर्षों में उन्होंने भगवद्गीता, प्रमुख उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र के अनुवाद और टीका पर काम किया।
ये सब अंग्रेज़ी में लिखे गए, और यह उनके काम का हिस्सा था। जिस पाठक को वे समझाना चाहते थे, वह ऑक्सफ़ोर्ड और लंदन में बैठा था।
1962 का चुनाव निर्विरोध नहीं था
1952 में वे भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने और दस साल इस पद पर रहे। 1962 में राष्ट्रपति बने और 1967 तक रहे।
राष्ट्रपति का वह चुनाव अक्सर ऐसे बताया जाता है जैसे उसमें कोई मुक़ाबला ही न रहा हो। मुक़ाबला था।
राधाकृष्णन को 5,53,067 वोट मिले। चौधरी हरि राम को 6,341 और यमुना प्रसाद त्रिशूलिया को 3,537।
अंतर बहुत बड़ा है, पर दो नाम उस मतपत्र पर उनके सामने थे, और यह गिनती अपने आप में उस दौर की एक बात बताती है। लड़ना उस समय भी मुमकिन था, हारना तय होते हुए भी।

तनख़्वाह
राष्ट्रपति के तौर पर उनका वेतन दस हज़ार रुपये महीना था।
उन्होंने उसमें से ढाई हज़ार लिए। बाक़ी साढ़े सात हज़ार हर महीने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जाते रहे।
⚠ यह बात कई जगह छपी है पर हमें इसका कोई सरकारी दस्तावेज़ नहीं मिला। इसे उसी तरह पढ़ा जाए, यानी एक व्यापक रूप से दर्ज की गई बात के तौर पर।
1954 में उन्हें भारत रत्न मिला, उस पहले साल में जब यह सम्मान शुरू हुआ।
शिक्षक दिवस कैसे बना
राष्ट्रपति बनने पर उनके छात्रों और चाहने वालों ने कहा कि उनका जन्मदिन मनाया जाए।
उन्होंने मना नहीं किया। उन्होंने बदल दिया।
उनका सुझाव यह था कि 5 सितंबर को उनके जन्मदिन के बजाय शिक्षक दिवस की तरह मनाया जाए।
क़िस्सा इतना ही है और इसे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं। पर इसमें एक बात है जो छूट जाती है। यह सुझाव उस आदमी ने दिया जो उस वक़्त देश के सबसे बड़े पद पर पहुँच चुका था, और जिसने अपने जीवन का सबसे लंबा हिस्सा एक ही काम में लगाया था, पढ़ाने में।
इस साल के अड़तालीस
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शुक्रवार को विज्ञान भवन में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार देंगी। इस बार 48 शिक्षक चुने गए हैं।
वे 27 राज्यों, सात केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के छह संगठनों से हैं। इनमें केंद्रीय विद्यालय संगठन, नवोदय विद्यालय समिति, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय और सैनिक स्कूल शामिल हैं। 26 पुरुष हैं और 22 महिलाएँ।
चयन तीन चरणों में हुआ, ज़िले, राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर पर।
एक संख्या जो हिल रही है, वह गिनती है। 2024 में 82 शिक्षकों को यह पुरस्कार मिला था, 2025 में 45 को, और इस साल 48 को।
82 से 45 पर आना लगभग आधा हो जाना है। ऐसा क्यों हुआ, यह किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में हमें नहीं मिला। कम पुरस्कार का मतलब अक्सर यह होता है कि छँटनी कड़ी हुई, और यह अपने आप में बुरा नहीं है। पर बदलाव के साथ कारण छपना चाहिए था।
आख़िर में
राधाकृष्णन का देहांत 17 अप्रैल 1975 को मद्रास में हुआ। उम्र छियासी साल।
इस दिन का जो रूप स्कूलों में बना है, उसमें बच्चे एक दिन के लिए शिक्षक बनकर कक्षा लेते हैं।
जिस आदमी की वजह से यह दिन है, उसके लिए वह कुर्सी एक दिन की नहीं थी। और उस तक वह पहुँचा भी इसलिए था कि किसी और की पुरानी किताबें उसके हाथ लग गई थीं।
स्रोतराष्ट्रपति सचिवालय, शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर संदेश, इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी, राधाकृष्णन पर प्रविष्टि, ऑक्सफ़ोर्ड रेफ़रेंस, स्पाल्डिंग चेयर ऑफ़ ईस्टर्न रिलीजन्स ऐंड एथिक्स, विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की रिपोर्ट, 1948-49, अध्यक्ष एस. राधाकृष्णन, भारत निर्वाचन आयोग, 1962 के राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम