श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स सौ साल का हुआ, पर उसका यह नाम सिर्फ़ पचहत्तर साल पुराना है
प्रधानमंत्री शिक्षक दिवस की शाम शताब्दी समारोह में बोलेंगे। सरकारी विज्ञप्ति कहती है कि सर श्री राम ने 1926 में कॉलेज की स्थापना की। कॉलेज का अपना इतिहास अलग तारीख़ें देता है।
सौ साल किस चीज़ के?
प्रधानमंत्री कार्यालय की विज्ञप्ति में लिखा है कि प्रख्यात उद्योगपति सर श्री राम ने 1926 में इस कॉलेज की स्थापना की।
कॉलेज की अपनी वेबसाइट पर जो इतिहास दर्ज है, वह इससे अलग है। और वह ज़्यादा दिलचस्प है।
शुरुआत 1920 में हुई
कॉलेज का अपना विवरण कहता है कि 1920 में बसंत पंचमी के दिन दिल्ली के सात कारोबारियों ने मिलकर कमर्शियल एजुकेशन ट्रस्ट बनाया।
सात, एक नहीं।
उनमें सर श्री राम थे और उन्हीं के नेतृत्व में यह हुआ। बाक़ी नामों में लाला चुन्नामल और मास्टर शिव प्रसाद कॉलेज के अपने पन्नों पर मिलते हैं।
उसी साल ट्रस्ट ने चरखेवालान में एक कमर्शियल स्कूल खोला।
बारह छात्र और चार शिक्षक
कॉलेज की पढ़ाई दरियागंज में शुरू हुई। पता कॉलेज ख़ुद देता है: 8, दरियागंज, नई दिल्ली। इमारत किराए की थी।
पहले बैच में बारह छात्र थे और पढ़ाने वाले चार।
पहले प्राचार्य का नाम आर. के. कुमार था।
यह पूरी जानकारी कॉलेज ने ख़ुद दर्ज कर रखी है, और उसमें कहीं यह नहीं लिखा कि इसे 1926 में स्थापित माना जाए।
तो 1926 का क्या है
1926 में कमर्शियल कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ।
यही वह तारीख़ है जिससे शताब्दी गिनी जा रही है।
और यहाँ एक बात है जिस पर रुकना चाहिए।
1920 में दिल्ली विश्वविद्यालय था ही नहीं।
दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम 1 मई 1922 को लागू हुआ। विधेयक उसी साल जनवरी में केंद्रीय विधान सभा में आया, फ़रवरी में पास हुआ, और तब जाकर विश्वविद्यालय बना। शुरुआत में उससे तीन कॉलेज जुड़े, सेंट स्टीफ़ंस, हिंदू और रामजस।
यानी चरखेवालान का स्कूल और दरियागंज की वे कक्षाएँ उस विश्वविद्यालय से दो साल पहले शुरू हो चुकी थीं जिससे यह कॉलेज आगे जुड़ने वाला था।
संबद्धता उससे पहले हो भी नहीं सकती थी। जिस संस्था से जुड़ना था, वह ख़ुद मौजूद नहीं थी।
संबद्धता का मतलब है कि विश्वविद्यालय ने कॉलेज को अपने अधीन लिया, उसकी परीक्षाएँ लीं और उसकी डिग्रियाँ अपने नाम से दीं। यह किसी संस्था के जीवन में बड़ी घटना होती है, क्योंकि उसी दिन उसका पढ़ाया हुआ मान्य हो जाता है।
पर वह स्थापना का दिन नहीं है। पढ़ाई उससे छह साल पहले शुरू हो चुकी थी।
तीनों तारीख़ें एक साथ रखिए। 1920 से पढ़ाई के 106 साल। 1926 से विश्वविद्यालय के कॉलेज के 100 साल। और नाम के 75, जिस पर हम अभी आ रहे हैं।
तीनों सही हैं। मनाया एक जा रहा है।

बीच के साल
कॉलेज का अपना कालक्रम आगे यूँ चलता है।
जनवरी 1928 में कॉलेज की पत्रिका निकली, नाम यमुना।
पत्रिका का नाम न किसी संस्थापक पर है, न किसी देवता पर। शहर के पास बहने वाली नदी पर है।
1932 में उसे डिग्री कॉलेज का दर्जा मिला और वह बीए पास, वाणिज्य समूह की डिग्री देने लगा।
1943 में वाणिज्य में बीए ऑनर्स शुरू हुआ।
1948 में अर्थशास्त्र में एमए, और 1949 में वाणिज्य में स्नातकोत्तर।
एक व्यापारिक स्कूल से पूरे विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम तक पहुँचने में उन्तीस साल लगे।
और नाम कैसे पड़ा
1951 में कॉलेज ने अपनी रजत जयंती मनाई और उसी मौक़े पर अपना नाम बदलकर श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स रख लिया।
रजत जयंती 1926 से पचीस साल पूरे होने की थी।
इस एक तारीख़ से एक बात साफ़ हो जाती है। कॉलेज ख़ुद को हमेशा से 1926 से गिनता आया है, और इस लिहाज़ से इस साल की शताब्दी उसके अपने हिसाब से ठीक है।
जो बात ठीक नहीं है, वह यह कहना है कि उस साल कॉलेज की स्थापना हुई और वह एक आदमी ने की।
नाम बदलने का प्रस्ताव 1949 में आया था। कॉलेज के अपने विवरण के मुताबिक़ उसे लागू होने में तीन साल लग गए, और कारण यह था कि लाला श्री राम ख़ुद इसके लिए तैयार नहीं थे।
तीन साल किसी को मनाने में लगे कि अपना नाम कॉलेज पर लगने दीजिए।
यह उस दौर की एक बात बताता है। संस्था बनवाने वाले उस समय अपना नाम पत्थर पर लिखवाने की जल्दी में नहीं थे, और नाम अक्सर उनके जाने के बाद या बहुत देर से लगता था।
जिनके नाम पर कॉलेज है
लाला श्री राम का जन्म 27 अप्रैल 1884 को हुआ था। पिता मदन मोहन लाल, माँ चंदो देवी। वे पहली संतान थे।
स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली में हुई और 1900 में वे परिवार के कारोबार दिल्ली क्लॉथ मिल्स में शामिल हो गए।
यानी जिस साल वे सोलह के थे, उसी साल उन्होंने मिल में काम शुरू किया। और बीस साल बाद, छत्तीस की उम्र में, वे उन सात लोगों में थे जिन्होंने दिल्ली में वाणिज्य की पढ़ाई के लिए ट्रस्ट बनाया।
और जो नाम पहले चुने गए थे
संस्था का पहला नाम कमर्शियल एजुकेशन ट्रस्ट था और पहली इमारत कमर्शियल स्कूल कहलाई।
दोनों नामों में वाणिज्य है, और किसी में विद्या, ज्ञान या भारती नहीं है।
यह संयोग नहीं लगता। ट्रस्ट बनाने वाले कारोबारी थे, और जो चीज़ उन्होंने खोली वह ठीक उसी काम के लिए खोली गई जो वे रोज़ करते थे। खाता, हिसाब, पत्र-व्यवहार, बीमा और लदान के काग़ज़।
यह हमारा पढ़ना है। कॉलेज का अपना विवरण इतना ही कहता है कि सात कारोबारियों ने वाणिज्य की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ट्रस्ट बनाया।

और एक और शताब्दी
इसी हिसाब से एक बात और निकलती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने सौ साल 2022 में पूरे किए।
तो जो कॉलेज इस साल शताब्दी मना रहा है, वह उस विश्वविद्यालय से सिर्फ़ चार साल छोटा है जिसका वह हिस्सा है। और अगर 1920 से गिना जाए, तो वह उससे दो साल बड़ा है।
यही वजह है कि इन तारीख़ों को आपस में मिलाकर पढ़ना ज़रूरी है। एक संस्था की उम्र इस बात से तय होती है कि किस घटना को जन्म माना जाए, और यहाँ चुनने के लिए तीन घटनाएँ हैं।
आज का समारोह
प्रधानमंत्री 5 सितंबर की शाम सात बजे शताब्दी समारोह में शामिल होंगे और संबोधन देंगे।
विज्ञप्ति एक बात और जोड़ती है, कि यह समारोह शिक्षक दिवस पर हो रहा है और इससे मौक़ा और अहम हो जाता है।
1954 में कॉलेज पूरी तरह उत्तरी परिसर की उस जगह पर आ गया था जहाँ वह आज है। दरियागंज का वह बंगला अब कॉलेज का नहीं है।
बारह छात्रों से यहाँ तक की दूरी में सौ साल भी लगे और एक सौ छह भी। यह इस बात पर है कि गिनना कहाँ से शुरू किया जाए।
स्रोतश्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, कॉलेज का अपना इतिहास, प्रधानमंत्री कार्यालय, विज्ञप्ति, श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, संस्थापक के बारे में