भारत पन्ना
लफ़्ज़ों का सफ़र

अदालत का मतलब इमारत नहीं है, वह एक काम का नाम है, और वह काम बराबरी करना है

मुंसिफ़ का मतलब है आधा करने वाला। वकील का मतलब है जिसे सौंपा गया हो। तीनों शब्द अरबी की तीन अलग जड़ों से आए हैं और तीनों इंसाफ़ की तीन अलग तस्वीरें खींचते हैं।

कलकत्ता हाई कोर्ट की नई इमारत, 1862 के आसपास ली गई तस्वीर
तस्वीर: सैमुअल बोर्न सार्वजनिक डोमेन

"अदालत जाना पड़ेगा" कहने वाला आदमी एक जगह की बात कर रहा होता है।

प्लैट्स के शब्दकोश में यह शब्द जगह नहीं है।

पन्ना 759 पर उसकी व्युत्पत्ति इस तरह दर्ज है: यह फ़ारसी में आया अरबी शब्द है, और अरबी क्रिया अदल से बना क्रियार्थक संज्ञा है। उस क्रिया का अर्थ प्लैट्स ख़ुद लिखता है, बराबरी से पेश आना।

और अर्थों की सूची इसी तरतीब से चलती है। पहले समता, फिर न्याय, फिर क़ानून। और उसके बाद, चौथे नंबर पर, न्यायालय।

यानी शब्द पहले एक काम का नाम था। इमारत बाद में बनी।

जड़ जो हर दिन बोली जाती है

अरबी की जड़ें तीन अक्षरों की होती हैं, और उन्हीं तीन अक्षरों से पूरा एक परिवार निकलता है।

अदालत की जड़ है अ-द-ल।

इसी जड़ से अदल शब्द है, जिसका अर्थ न्याय है। और आदिल, यानी न्यायप्रिय।

आदिल को पहचानिए, क्योंकि वह हिंदी के पाठक के सामने रोज़ आता है और वह उसे अदालत से नहीं जोड़ता।

बीजापुर में जो वंश तीन सौ साल से भी कम में पाँच पीढ़ियाँ चला और जिसने गोल गुंबद बनवाया, उसका नाम आदिलशाही था। यूसुफ़ आदिल शाह ने उसकी नींव पंद्रहवीं सदी के आख़िर में रखी।

उस नाम का शाब्दिक अर्थ है, न्यायप्रिय बादशाह।

तो एक ही तीन-अक्षरी जड़ से एक इमारत का नाम निकला, एक वंश का नाम निकला, और वह जगह भी जहाँ आप मुक़दमा लड़ने जाते हैं।

तो अदालत में जो कुछ होता है, उसका नाम ही उस चीज़ पर रखा गया है जो वहाँ होनी चाहिए।

अ-द-लतीन अक्षरों की वह जड़ जिससे अदालत निकली है, और जिसका अर्थ बराबरी है

मुंसिफ़, जो आधा करता है

अब उसी शब्दकोश में मुंसिफ़ देखिए, पन्ना 1077।

प्लैट्स लिखता है कि यह अरबी क्रिया अंसफ़ का कर्तृवाचक कृदंत है, और उस क्रिया का अर्थ है बाँटना, आधा लेना, बराबरी से समायोजित करना।

और वह आगे बताता है कि यह क्रिया ख़ुद नस्फ़ से बनी है, जिसका अर्थ है बीच तक पहुँचना।

नस्फ़ का मतलब आधा होता है।

तो मुंसिफ़ का शाब्दिक अर्थ है, आधा करने वाला।

यह तस्वीर सीधी है। दो पक्ष हैं, बीच में कुछ है, और कोई उसे ठीक बीच से काटता है। इंसाफ़ का जो सबसे पुराना विचार है, वह तराज़ू का है, और यह शब्द उसी को पकड़ता है।

इसी जड़ से इंसाफ़ भी है, जो हिंदी में रोज़ बोला जाता है।

वकील, जिसे सौंपा गया हो

तीसरा शब्द अलग दिशा से आता है।

प्लैट्स पन्ना 1199 पर वकील को अरबी क्रिया वकल से जोड़ता है, और उस क्रिया का अर्थ लिखता है, अपने मामले किसी और को सौंपना।

अब अर्थों की सूची देखिए, क्योंकि उसका क्रम बताने वाला है।

राजदूत। एजेंट। उप। प्रतिनिधि। कमिश्नर। कारिंदा। प्रबंधक।

और उसके बाद, आख़िर में, अटॉर्नी और वकालत करने वाला।

यानी वकील का बुनियादी अर्थ बहस करने वाला नहीं है। वह है, वह आदमी जिसे आपने अपना काम सौंप दिया।

इसी जड़ से तवक्कुल भी बनता है, जिसका अर्थ भरोसा रखना है।

तीन जड़ें, तीन तस्वीरें

तीनों शब्द अरबी से हैं, पर तीनों की जड़ें अलग हैं और तीनों इंसाफ़ की अलग तस्वीर खींचती हैं।

अदालत कहती है, बराबरी से पेश आओ।

मुंसिफ़ कहता है, बीच से काटो।

वकील कहता है, किसी पर भरोसा करके अपना काम सौंप दो।

एक ही व्यवस्था के तीन नाम, और तीनों अलग बात कह रहे हैं। पहला मूल्य है, दूसरा तरीक़ा है, तीसरा रिश्ता है।

फिर ये पद बन गए

प्लैट्स के इन्हीं प्रविष्टियों में एक और परत है, और वह उन्नीसवीं सदी की है।

मुंसिफ़ वाली प्रविष्टि में, न्यायप्रिय और मध्यस्थ के बाद, कोष्ठक में लिखा है: भारत में, एक अधीनस्थ न्यायाधीश।

यानी जो शब्द गुण बताने के लिए था, वह एक नौकरी का नाम बन गया, और उस नौकरी की श्रेणी भी तय हो गई।

मुंसिफ़ी अलग प्रविष्टि है, और उसके अर्थ हैं न्याय, निर्णय, मध्यस्थता, और फिर मुंसिफ़ का पद तथा मुंसिफ़ की अदालत।

एक शब्द जो बराबरी के लिए बना था, उसका अपना दफ़्तर हो गया।

क़ाज़ी, क़ज़ा और क़ज़िया

अदालत में बैठने वाले का सबसे पुराना नाम मुंसिफ़ नहीं, क़ाज़ी है। और उस शब्द की जड़ जहाँ ले जाती है, वहाँ जाना चाहिए।

प्लैट्स क़ाज़ी को उस अरबी क्रिया का कर्तृवाचक कृदंत बताता है जिसका अर्थ है, न्याय करना, आदेश देना।

अब उसी जड़ का दूसरा शब्द देखिए। क़ज़ा।

प्लैट्स उसके अर्थ इस क्रम में देता है: ईश्वरीय आदेश, पूर्वनिर्धारण, भाग्य, नियति, मृत्यु। और उसी सूची में आगे चलकर, न्यायाधीश का पद या दंडादेश, न्यायपालिका, न्याय का प्रशासन।

एक ही शब्द जो भाग्य भी है और अदालत का फ़ैसला भी।

यह संयोग नहीं है। दोनों में एक बात साझा है, कि कोई और तय करता है और आप उसे मानते हैं।

इसी जड़ से तीसरा शब्द क़ज़िया है, और प्लैट्स उसके भी कई अर्थ देता है। एक तरफ़ तर्कशास्त्र का प्रस्ताव और अनुमान, दूसरी तरफ़ झगड़ा, विवाद, मुक़दमा और अदालती कार्रवाई।

हिंदी में क़ज़िया आज भी झगड़े के अर्थ में बोला जाता है। जो पहले तर्क का नाम था, वह बोलचाल में लड़ाई बनकर रह गया।

और एक मुहावरा प्लैट्स ने ख़ुद दर्ज किया है, जिसे पढ़कर हँसी आती है। जौनपुर का क़ाज़ी, अर्थात् एक मूर्ख आदमी।

शब्दकोश यह नहीं बताता कि जौनपुर के साथ यह बात क्यों जुड़ी। पर वह इतना बताता है कि उन्नीसवीं सदी की बोलचाल में क़ाज़ी का नाम सम्मान के साथ भी लिया जाता था और मज़ाक़ के साथ भी।

क़ाज़ी की एक और प्रविष्टि है, क़ाज़ी-उल-क़ुज़ात, यानी क़ाज़ियों का क़ाज़ी या प्रधान न्यायाधीश। प्लैट्स उसके आगे कोष्ठक में लिखता है कि ब्रिटिश शासन में यह पद अब समाप्त कर दिया गया है।

शब्दकोश एक दफ़्तर के बंद होने की सूचना भी दे रहा है।

और 1862 में क्या हुआ

अब प्लैट्स से निकलकर एक तारीख़ पर आइए, क्योंकि यहीं यह शब्द अपनी सबसे बड़ी करवट लेता है।

ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में जो अदालतें चलती थीं, उनका नाम ही सदर अदालत था। दीवानी की सदर दीवानी अदालत, फ़ौजदारी की सदर निज़ामत अदालत।

नाम फ़ारसी और अरबी का था, और यही नाम काग़ज़ों पर, मुहरों पर और वेतन-सूचियों पर चलता था।

फिर ब्रिटिश संसद ने 1861 में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम पारित किया। वह 16 अगस्त 1861 का है।

उस अधिनियम ने प्रेसिडेंसी शहरों की सुप्रीम कोर्ट और उन्हीं शहरों की सदर अदालतों को मिलाकर एक कर दिया, और नई संस्था का नाम रखा हाई कोर्ट।

कलकत्ता के लिए शाही पत्र 14 मई 1862 को जारी हुआ। मद्रास और बंबई के लिए 26 जून 1862 को।

तो जो शब्द अदालत था, वह अंग्रेज़ी नाम के नीचे चला गया। इमारत वही रही, मुक़दमे वही रहे, बहुत से मुंसिफ़ वही रहे। नाम बदल गया।

वही इमारत आज, कलकत्ता हाई कोर्ट
तस्वीर: अव्रज्योति मित्रा, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

तीन इमारतें, एक ही साल

1862 में तीन हाई कोर्ट बने और तीनों की इमारतें आज भी खड़ी हैं।

इनमें से एक ऊपर है। बाक़ी दो नीचे।

तीनों की बनावट अलग है और तीनों एक ही बात कहती हैं। जो अदालत पहले किसी हवेली, कचहरी या ख़ेमे में लगती थी, उसे अब एक ऐसी इमारत चाहिए थी जो दूर से दिखे।

मद्रास हाई कोर्ट, चेन्नई। इसकी बनावट को इंडो-सारासेनिक कहा जाता है
तस्वीर: योग बालाजी, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0
बंबई हाई कोर्ट, मुंबई
तस्वीर: अराउंडदग्लोब, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

यहीं वह पलटाव पूरा होता है जिससे यह लेख शुरू हुआ था। शब्द पहले एक काम था। फिर एक पद बना। और आख़िर में एक इमारत, जिसकी तस्वीर खींची जा सके।

और अदालत की सूची

अदालत वाली प्रविष्टि में प्लैट्स यौगिकों की एक लंबी सूची देता है, और उसे पढ़ना एक पुराने प्रशासन को पढ़ने जैसा है।

अदालत-ए-दीवानी, दीवानी अधिकार क्षेत्र की अदालत।

अदालत-ए-फ़ौजदारी, फ़ौजदारी अधिकार क्षेत्र की।

अदालत-ए-माल, राजस्व की अदालत।

अदालत-ए-ख़फ़ीफ़ा और अदालत-ए-ख़ुर्द, छोटे मुक़दमों की अदालत।

अदालत-ए-मजाज़, सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत।

दीवानी और फ़ौजदारी, ये दोनों आज भी हिंदी में हर दिन बोले जाते हैं। दीवानी दीवान से है, जो राजस्व और लेखे का पद था। फ़ौजदारी फ़ौजदार से, जो सैनिक और पुलिस अधिकार वाला पद था।

तो अदालत के आगे लगने वाले शब्द बताते हैं कि वह किस दफ़्तर से निकली है। एक हिसाब-किताब से, दूसरा फ़ौज से।

मुक़दमा, जो पहले भूमिका था

मुक़दमा हिंदी में इतना घुल चुका है कि उसके भीतर झाँकने की बात कोई नहीं सोचता।

प्लैट्स में उसका बहुवचन देखिए, मुक़दमात, और अर्थों का क्रम फिर बताने वाला है।

पहले आता है, भूमिकाएँ, प्रस्तावनाएँ, पूर्वप्रस्ताव, प्रारंभिक बातें, पूर्वापेक्षाएँ। उसके बाद, मुक़दमे और मामले। और उसके बाद, विषय।

तो मुक़दमे का पहला अर्थ मुक़दमा नहीं है। पहला अर्थ वह चीज़ है जो सबसे आगे रखी जाए, यानी शुरुआत में कही गई बात।

जड़ वही है जिससे क़दम बनता है, यानी आगे बढ़ना। और मुक़द्दम का अर्थ है, आगे रखा हुआ।

यह अपने आप में अदालत की सही तस्वीर है। आप जो लेकर जाते हैं वह फ़ैसला नहीं है, वह सिर्फ़ आगे रखी गई बात है।

ज़मानत की जड़ अलग है। प्लैट्स उसे ज़मान से जोड़ता है और अर्थ देता है, प्रतिभूति। उसी से ज़ामिन है, यानी वह आदमी जो किसी और के लिए ज़िम्मा लेता है।

प्लैट्स ज़मानत के आगे की सूची में ज़मानत-नामा भी देता है, और ज़मानत के क़ाबिल भी, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद वह बेलेबल लिखता है।

यानी 1884 में छपे एक शब्दकोश में वह शब्द मौजूद है जो आज भी हर ज़मानत अर्ज़ी में लिखा जाता है।

फ़ैसला, और उसका पहला अर्थ

अब उस शब्द पर आइए जो हर मुक़दमे के आख़िर में आता है।

प्लैट्स फ़ैसला को अरबी की उस जड़ से जोड़ता है जिसका अर्थ वह ख़ुद यूँ लिखता है, अलग करना या बाँटना, और फिर तय करना।

और अर्थों का क्रम फिर वही कहानी सुनाता है जो इस पूरे लेख की है।

पहले आता है, पृथक्करण, विभाजन। उसके बाद, निर्णय करना, निर्णय, अधिनिर्णय, न्यायिक दंडादेश, फ़ैसला, डिक्री। और उसके बाद, समायोजन, निपटान, मध्यस्थता।

तो फ़ैसले का पहला अर्थ फ़ैसला नहीं है। पहला अर्थ अलग करना है।

इसी जड़ से फ़स्ल भी है, जो हिंदी में मौसम की उपज के अर्थ में रोज़ बोला जाता है, और जिसका मूल अर्थ भी बाँटना ही है, यानी साल का एक कटा हुआ हिस्सा।

अदालत में जो होता है, भाषा उसे काटने का काम मानती है। मुंसिफ़ बीच से काटता है, फ़ैसला अलग करता है, और फ़स्ल साल को टुकड़ों में बाँटती है।

तारीख़ का दोहरा मतलब

एक शब्द और, जो हर मुक़दमे में सबसे ज़्यादा बार बोला जाता है।

प्लैट्स तारीख़ के अर्थ इस क्रम में देता है: तिथि, संवत्, युग, महीने का दिन, कालक्रम-वाक्य, और फिर इतिहास तथा वार्षिकी की पुस्तक।

यानी जिस शब्द से आप अगली पेशी का दिन पूछते हैं, वही शब्द इतिहास के लिए भी है।

अरबी और फ़ारसी में यह एक ही चीज़ के दो सिरे हैं। तारीख़ डालने का मतलब है किसी घटना को समय पर टाँक देना, और जो घटनाएँ इस तरह टँकती जाती हैं उनकी सूची ही इतिहास है।

हिंदी की अदालत में यह शब्द तीसरा अर्थ ले चुका है, और वह किसी शब्दकोश में नहीं है। तारीख़ का मतलब अब वह दिन है जिस दिन कुछ नहीं होता और अगला दिन दे दिया जाता है।

एक ही शब्द में तिथि भी है, इतिहास भी, और इंतज़ार भी।

और एक शब्द जो दो में गिना जाता है

प्लैट्स की तीसरी प्रविष्टि सबसे छोटी है और सबसे मज़ेदार।

अदालतैन। यह अदालत का द्विवचन है।

अरबी में एक से ज़्यादा और दो के लिए अलग-अलग रूप होते हैं। एक होता है एकवचन, दो के लिए द्विवचन, और उससे ऊपर बहुवचन।

और प्लैट्स इस द्विवचन का अर्थ यूँ लिखता है: दो अदालतें, अर्थात् दीवानी और फ़ौजदारी।

यानी भाषा ने इस बात को अपने व्याकरण में बैठा लिया कि अदालतें दो ही तरह की होती हैं।

तो अगली बार

इस लेख में जो शब्द खोले गए, वे गिनती में दस से ऊपर हैं और जड़ें उनकी छह से ज़्यादा नहीं।

अ-द-ल से अदालत, अदल और आदिल। न-स-फ़ से मुंसिफ़ और इंसाफ़। व-क-ल से वकील और तवक्कुल। क़-ज़-य से क़ाज़ी, क़ज़ा और क़ज़िया। फ़-स-ल से फ़ैसला और फ़स्ल। क़-द-म से मुक़दमा।

छह जड़ों पर पूरी अदालत खड़ी है।

अदालत, मुंसिफ़, वकील, इंसाफ़, दीवानी, फ़ौजदारी।

एक हिंदी बोलने वाला इन सबको अपने शब्द समझता है, और वे हैं भी। पर उनकी जड़ें अरबी में हैं और उनके अर्थ क्रियाओं के हैं, संज्ञाओं के नहीं।

इन छह में से पाँच आज भी हर रोज़ बोले जाते हैं। सिर्फ़ मुंसिफ़ बोलचाल से लगभग निकल गया है, और उसकी वजह भी वही 1862 है। जो पद रहा नहीं, उसका नाम भी धीरे-धीरे चला गया।

पर इंसाफ़ बचा रहा, और वह उसी नस्फ़ से बना है जिससे मुंसिफ़ बना था। यानी आधा करने से।

अदालत जाने का मतलब, शब्द के हिसाब से, किसी इमारत में जाना नहीं है।

उसका मतलब है, बराबरी में जाना।

स्रोतप्लैट्स, ए डिक्शनरी ऑफ़ उर्दू, क्लासिकल हिंदी ऐंड इंग्लिश, स्टाइनगास, ए कॉम्प्रिहेंसिव पर्शियन-इंग्लिश डिक्शनरी, हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी सभा, कलकत्ता हाई कोर्ट, अदालत का अपना इतिहास, इलाहाबाद हाई कोर्ट, हाई कोर्टों की उत्पत्ति और विकास

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