असम से मदुरै भेजी गई हथिनी दुर्गा की फ़ाइल में जाँच, रिपोर्ट और सिफ़ारिश एक ही दिन की हैं
सोमवार, 7 सितंबर की रात पाँच साल की एक हथिनी असम से मदुरै के मीनाक्षी अम्मन मंदिर के लिए चली। तमिलनाडु के वन विभाग का जो काग़ज़ उसके साथ था, उस पर 4 सितंबर की तारीख़ है, और उसी तारीख़ पर मदुरै के ज़िला वन अधिकारी का मुआयना, उनकी रिपोर्ट और राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की सिफ़ारिश, तीनों दर्ज हैं। बंदी हाथी (स्थानांतरण या परिवहन) नियम, 2024 इन तीन पड़ावों के लिए मिलाकर 37 दिन तक का समय देता है।

सोमवार, 7 सितंबर की रात असम से एक ट्रक तमिलनाडु की तरफ़ निकला। उसमें पाँच साल की एक हथिनी थी, नाम दुर्गा, माइक्रोचिप संख्या 0008179117। पता मदुरै का मीनाक्षी अम्मन मंदिर, और सड़क का रास्ता क़रीब तीन हज़ार किलोमीटर।
जिस काग़ज़ के सहारे वह चली, उस पर तारीख़ 4 सितंबर है।
उसी एक तारीख़ पर मदुरै के ज़िला वन अधिकारी ने मंदिर के हाथीख़ाने का मुआयना किया, उसी तारीख़ पर उन्होंने फ़ॉर्म तीन में अपनी रिपोर्ट लिखी, और उसी तारीख़ पर तमिलनाडु के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने फ़ॉर्म चार में असम को अपनी सिफ़ारिश भेज दी। बंदी हाथी (स्थानांतरण या परिवहन) नियम, 2024 इन तीन पड़ावों के लिए मिलाकर 37 दिन तक का समय देता है।
दुर्गा उन पाँच हाथियों में से एक है जिन्हें असम से तमिलनाडु के मंदिरों तक भेजा जाना है। बाक़ी चार अभी असम में हैं। उनके लिए उसी 4 सितंबर को चेन्नई से जो दूसरी चिट्ठी निकली, उसमें ज़िला समितियों से कहा गया है कि रिपोर्ट "इस पत्र के मिलने की तारीख़ से 15 दिन के भीतर, बिना चूक" भेजी जाए। असम के संरक्षणकर्मी रोहित चौधरी ने 11 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की बनाई उच्चाधिकार समिति को लिखकर इन स्थानांतरणों को रोकने की माँग की है।
चार सितंबर की चिट्ठी और उसमें दर्ज पाँच नाम
चेन्नई के गिंडी में राज्य वन मुख्यालय से निकली उस चिट्ठी की संख्या सी.नं. HOTNFD/6801/2026/WL1 है। विषय एक पंक्ति में है: असम से तमिलनाडु पाँच बंदी हाथियों का अंतरराज्यीय स्थानांतरण, सहमति माँगी गई, रिपोर्टें तलब की गईं।
उसके नीचे सात संदर्भ हैं, सातों असम के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की चिट्ठियाँ, संदर्भ संख्या WL/FG.27/TP/Captive Elephant/2025-26/Part, तारीख़ें अगस्त की 20 (दो), 21, 26, 28 और 29 (दो)। पाँच हाथियों के लिए सात चिट्ठियाँ।
सूची इस तरह है:
| नाम | लिंग | माइक्रोचिप | उम्र | मालिक | तमिलनाडु में तय जगह |
|---|---|---|---|---|---|
| दुर्गा | मादा | 0008179117 | 5 साल | पुण्य पेगू, स्वर्गीय मुही पेगू के पुत्र | मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर |
| हीरालाल | नर | 00081790EC | 8 साल | शमसुल हक़, स्वर्गीय हाजी अब्दुल जलील के पुत्र | अरुल्मिगु मंदिर, तिरुवन्नामलै |
| शिव | नर | 000817E45A | 6 साल | मुखेश्वर मोरान, स्वर्गीय जगत मोरान के पुत्र | अरुल्मिगु मंदिर, तिरुवन्नामलै |
| रूपसिंह | नर | 000770A96E | 13 साल | पियल मोरान, स्वर्गीय दोगल मोरान के पुत्र | श्री वैद्यनाथ स्वामी मंदिर, वैथीश्वरन कोइल, नागपट्टिनम |
| बिजुली | मादा | 0008176103 | 5 साल | हितेश्वर मोरान, स्वर्गीय पेना मोरान के पुत्र | श्री कांची कामकोटि गजशाला, कांचीपुरम |
अख़बारों में यह सूची एक जगह उलट कर छपी है। नॉर्थईस्ट न्यूज़ ने 12 सितंबर को रोहित चौधरी के अभ्यावेदन के हवाले से रूपसिंह का मालिक हितेश्वर मोरान और बिजुली का पियल मोरान लिखा। वन विभाग की सूची में यह उलटा है, और यह लेख दस्तावेज़ का पाठ ले रहा है।
तिरुवन्नामलै के मंदिर का नाम इसी पन्ने पर, लगातार दो पंक्तियों में, दो तरह लिखा है: हीरालाल के आगे "अन्मचलेश्वरर", शिव के आगे "अरुणाचलेश्वरर"। मंदिर एक ही है।
शिव को लेकर एक फ़र्क़ वर्तनी का नहीं है। नॉर्थईस्ट न्यूज़ के मुताबिक़ मद्रास हाई कोर्ट में रिट याचिका 30528/2026 के एक अंतर्वर्ती आवेदन में इन्हीं पाँच के लिए इजाज़त माँगी गई है, और उसमें शिव की जगह रामेश्वरम का रामनाथस्वामी मंदिर दर्ज है। वन विभाग की चिट्ठी में तिरुवन्नामलै। दोनों काग़ज़ एक ही पखवाड़े के हैं।
प्रतिलिपियाँ चारों ज़िलों के वन अधिकारियों और चारों प्राप्तकर्ता संस्थाओं को गई हैं। संस्थाओं वाली प्रविष्टि के आगे कोष्ठक में लिखा है कि प्रति "पावर ऑफ़ अटॉर्नी यानी श्रीमती अनुराधा सुब्रमण्यन" के मार्फ़त जा रही है, और नीचे उनका नीलांकरै का पता है। चारों के लिए मुख़्तारनामा एक ही व्यक्ति के पास है।
नियम छह का रास्ता और उस पर तय दिनों का हिसाब
बंदी हाथी (स्थानांतरण या परिवहन) नियम, 2024 भारत के राजपत्र में 14 मार्च 2024 को सा.का.नि. 191(अ) के रूप में छपे, वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 63(1)(छ-आठ) के तहत, और इनमें छह फ़ॉर्म लगे हैं।
नियम 3 के मुताबिक़ आवेदन फ़ॉर्म एक में उस उप वन संरक्षक को जाता है जिसके इलाक़े में हाथी पंजीकृत है, और फ़ॉर्म एक में एक ख़ाना "स्थानांतरण का प्रयोजन" का है। नियम 4 उस अधिकारी को तीन काम देता है: चिकित्सक से फ़ॉर्म दो में प्रमाणपत्र लेना; जहाँ हाथी अभी है उस जगह की विस्तृत जाँच और भौतिक सत्यापन; और 15 दिन में फ़ॉर्म तीन की रिपोर्ट प्रतिपालक को भेजना।
दूसरे राज्य वाला रास्ता नियम 6 में है, छह उपनियमों में बँटा। भेजने वाले राज्य का प्रतिपालक 15 दिन में कागज़ात लेने वाले राज्य के प्रतिपालक को भेजता है। वह 7 दिन में उन्हें उस ज़िले के उप वन संरक्षक को भेजता है जहाँ हाथी रखा जाना है, वह अधिकारी 15 दिन में जाँच और भौतिक सत्यापन करके फ़ॉर्म तीन भेजता है, और लेने वाले राज्य का प्रतिपालक 15 दिन में फ़ॉर्म चार में सिफ़ारिश लौटाता है।
और फिर उपनियम 5: रिपोर्टों की जाँच के बाद भेजने वाले राज्य का मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक 7 दिन के भीतर लिखित आदेश से स्थानांतरण को मंज़ूर या नामंज़ूर करेगा।
इजाज़त तमिलनाडु नहीं देता। वह सिफ़ारिश करता है। आदेश असम को लिखना है।
तमिलनाडु के हिस्से के तीन पड़ाव, यानी 7 दिन, 15 दिन और 15 दिन, मिलकर 37 दिन बनते हैं। दुर्गा की फ़ाइल में तीनों 4 सितंबर के हैं। नियम में लिखे दिन बाहरी सीमा हैं, न्यूनतम नहीं, इसलिए एक दिन में काम निपटा देना अपने आप नियम तोड़ना नहीं है। फ़ाइल से इतना दिखता है कि नियम ने जितना समय दिया उसका एक दिन इस्तेमाल हुआ, और उसी दिन जारी दूसरी चिट्ठी बाक़ी चार के लिए 15 दिन माँग रही थी।
ढुलाई अलग प्रक्रिया है: नियम 8 के तहत उसका आवेदन फ़ॉर्म पाँच में जाता है, परमिट फ़ॉर्म छह में मिलता है, और उसकी प्रति हर उस राज्य के प्रतिपालक को जानी है जिसके इलाक़े से हाथी गुज़रेगा। नियम 9 के मुताबिक़ साथ महावत और एक सहायक जाएँगे, चिकित्सक का प्रमाणपत्र होगा कि हाथी फ़िट है और उसमें मस्त, यानी हाथियों में आने वाली उत्तेजना की हालत, या किसी संक्रामक रोग का लक्षण नहीं, और बेहोशी की दवा सिर्फ़ चिकित्सक के परामर्श पर मिलेगी। नियम 10 मंज़ूरी के तीन महीने में स्थानांतरण और परमिट की एक महीने की सीमा तय करता है, और दोनों की अवधि बढ़ाने से मना करता है।
मदुरै के ज़िला वन अधिकारी की फ़ॉर्म तीन रिपोर्ट
फ़ॉर्म तीन उस रिपोर्ट का नाम है जो उप वन संरक्षक भरता है। दुर्गा के मामले में इसे मदुरै मंडल के ज़िला वन अधिकारी रेवती रमन ने भरा, संदर्भ 5779/2026/C1, तारीख़ 4 सितंबर 2026। मुआयने की तारीख़ भी 4 सितंबर लिखी है।
उम्र वाले ख़ाने में जन्मतिथि 27 फ़रवरी 2021 दर्ज है और उम्र "4 सितंबर 2026 को 5 साल 6 महीने 9 दिन"। उसी दिन बने फ़ॉर्म चार में वही जन्मतिथि है और उम्र 5 साल 6 महीने 8 दिन। जोड़ के हिसाब से आठ सही है।
छठा ख़ाना "हाथी की आवास सुविधा का पता और जीपीएस स्थान" माँगता है, और उसमें भरा है: अरुल्मिगु मीनाक्षी अम्मन मंदिर, मदुरै 625001, N 9.919352, E 78.12063। सातवाँ ख़ाना "हस्तांतरिती की आवास सुविधा का पता" माँगता है, और उसमें वही मंदिर, वही अक्षांश और देशांतर हैं। जिस काग़ज़ पर सिफ़ारिश टिकी है, उसमें हाथी का मौजूदा ठिकाना वही दर्ज है जहाँ उसे भेजा जाना है।
नौवाँ ख़ाना पूछता है कि क्या हाथी की सेहत की जाँच नियमित होती रही है। दसवाँ पूछता है कि क्या हाथी फ़िट है। दोनों में "लागू नहीं" लिखा है। ग्यारहवें ख़ाने, "कोई अन्य विवरण", में "शून्य"।
बारहवें ख़ाने की सिफ़ारिश शर्तों के साथ है। रिपोर्ट कहती है कि मौजूदा आवास में पक्की छत, ठीक निकासी और पर्याप्त हवा है और वह तमिलनाडु बंदी हाथी (प्रबंधन और अनुरक्षण) नियम, 2011 के मानकों पर खरा उतरता है। आराम की जगह रेत से भरी है, पर उस पर पक्षियों की बीट, धूप और बारिश से बचाने के लिए ठंडी छत वाली चादर लगाने की सिफ़ारिश है। नहाने की जगह एक ही है और वह मंदिर की मौजूदा हथिनी पार्वती के लिए है, इसलिए रिपोर्ट उसे बढ़ाने या बदलने को कहती है ताकि दुर्गा उसका इस्तेमाल कर सके।

रिपोर्ट का आख़िरी वाक्य कारण बताता है। उसमें लिखा है कि हाथी स्वभाव से सामाजिक होते हैं, इसलिए मीनाक्षी मंदिर में एक और हथिनी दुर्गा के आने से मौजूदा मंदिर हथिनी पार्वती को साथ मिलेगा।
उस फ़ाइल में यह कहीं दर्ज नहीं है कि दुर्गा जहाँ से आ रही है, वह जगह किस हाल में है। नियम 4(1)(ख) के तहत वह जाँच उस ज़िले के अधिकारी की है जहाँ हाथी पंजीकृत है। चिट्ठी में पुण्य पेगू का पता तिनसुकिया ज़िले का लाइका पोमुआ वन गाँव लिखा है। असम की तरफ़ की वह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं है।
इजाज़त असम को देनी थी
नियम 6(5) के मुताबिक़ लिखित आदेश असम के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पास करना था। तमिलनाडु की चिट्ठी असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के पंजाबाड़ी, गुवाहाटी कार्यालय को संबोधित है।
वह आदेश सामने नहीं है। नॉर्थईस्ट नाउ ने 9 सितंबर को लिखा कि असम वन विभाग ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया, और तमिलनाडु के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसे इतना ही बताया कि असम से हाथी लाए जा रहे हैं, ब्योरा देने से इनकार कर दिया। उसी रिपोर्ट में ट्रक की पंजीकरण संख्या DD 01A 9525 दर्ज है और नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से यह दावा है कि हाथी को रात में इसलिए ले जाया गया ताकि लोगों की प्रतिक्रिया से बचा जा सके। यह दावा स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं है।
नॉर्थईस्ट न्यूज़ और प्रतिदिन टाइम की 8 सितंबर की शुरुआती रिपोर्टों में गंतव्य केरल बताया गया था। वन विभाग के काग़ज़ मदुरै कहते हैं।
नियम सात की शर्तें और नियम ग्यारह की अपील
नियम 7 तीन बातें तय करता है। पहली, इजाज़त सिर्फ़ उस हाथी को मिलेगी जिसका स्वामित्व प्रमाणपत्र इन नियमों के लागू होने से पहले का हो, सिवाय ऐसे हाथी से पैदा हुए बच्चे के। नियम 14 मार्च 2024 को लागू हुए। दुर्गा की जन्मतिथि 27 फ़रवरी 2021 है, उससे पहले की, पर उसके प्रमाणपत्र की तारीख़ किसी सार्वजनिक काग़ज़ में नहीं है।
दूसरी, स्थानांतरण तीन हालात में मंज़ूर हो सकता है: मालिक अब हाथी को रखने की स्थिति में न हो; या नई जगह पर उसकी देखभाल पहले से बेहतर होगी; या प्रतिपालक को बेहतर देखभाल के लिए यह उचित लगे। सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनिमल राइट्स के आलोक हिसारवाला गुप्ता ने असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को लिखा कि ख़बरों के मुताबिक़ इन हाथियों को इसलिए समर्पित किया जा रहा है क्योंकि मालिक उन्हें रख नहीं पा रहे, जो पहली शर्त है।
तीसरी शर्त सबसे कड़ी है और चर्चा में सबसे कम रही है। नियम 7(3) कहता है कि स्थानांतरण तब तक अनुमन्य नहीं होगा जब तक हाथी का आनुवंशिक प्रोफ़ाइल पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के इलेक्ट्रॉनिक निगरानी ऐप में दर्ज न हो चुका हो। 18 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने वाइल्डलाइफ़ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर बनाम भारत संघ में मंत्रालय और बंदी हाथी स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति से यही रिपोर्ट माँगी कि डीएनए प्रोफ़ाइलिंग पूरी हुई या नहीं और वह जानकारी गज सूचना ऐप पर चढ़ी या नहीं।
नियम 11 की बनावट देखने लायक़ है। अपील वही कर सकता है जो आवेदक हो और जिसका आवेदन प्रतिपालक ने ठुकराया हो; वह राज्य वन विभाग के प्रशासनिक प्रमुख के पास 60 दिन में जाती है और सरकार को 30 दिन में फ़ैसला करना होता है। इजाज़त दे दिए जाने के ख़िलाफ़ इन नियमों में कोई अपील नहीं है। एतराज़ करने वाले को उच्चाधिकार समिति या अदालत तक ही जाना पड़ता है, और इस मामले में यही हुआ है।
जंगल से बंदी तक का क़ानूनी दरवाज़ा
एशियाई हाथी वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची एक में क्रम संख्या 83 पर है, यानी उसे क़ानून का सबसे ऊँचा संरक्षण मिला है। धारा 2(16) का खंड (ख) कहता है कि किसी जंगली या बंदी प्राणी को पकड़ना, खदेड़ना, फंदे या जाल में लेना और ऐसी हर कोशिश "शिकार" में शामिल है। पकड़ना ही शिकार है। धारा 9 अनुसूची एक और दो के प्राणियों के शिकार पर रोक लगाती है।

उस रोक में दो दरवाज़े हैं, धारा 11 और धारा 12। हाथी वाला दरवाज़ा धारा 11(1)(क) है: प्रतिपालक तभी इजाज़त दे सकता है जब उसे तसल्ली हो कि वह प्राणी मनुष्य के जीवन के लिए ख़तरनाक हो गया है, या इतना अशक्त या बीमार है कि ठीक नहीं हो सकता। 2003 में जुड़ा दूसरा परंतुक इस कहानी की धुरी है: पकड़े गए प्राणी को बंदी नहीं रखा जाएगा जब तक प्रतिपालक को तसल्ली न हो कि उसे जंगल में दोबारा बसाया नहीं जा सकता, और इसके कारण लिखित में दर्ज न किए जाएँ।
धारा 40 घोषणा की है: अनुसूची एक के बंदी प्राणी का क़ब्ज़ा रखने वाला प्रतिपालक को उसकी संख्या, ब्योरा और रखने की जगह बताएगा। धारा 40(2क) 2003 से रोक लगाती है कि प्रमाणपत्र वाले के सिवा कोई अनुसूची एक का बंदी प्राणी हासिल या क़ब्ज़े में नहीं रखेगा, उत्तराधिकार को छोड़कर। इसी उपधारा के नीचे परंतुक है: उपधारा (2क) और (2ख) जीवित हाथी पर लागू नहीं होंगी।
प्रमाणपत्र धारा 42 देता है, उस व्यक्ति को जो प्रतिपालक की राय में वैध क़ब्ज़े में है, और 2003 का परंतुक कहता है कि उसे जारी करने से पहले वह देखेगा कि आवेदक के पास उस प्राणी के आवास और देखभाल की पर्याप्त सुविधा है।
धारा 43 हस्तांतरण को नियंत्रित करती है। उपधारा 1 कहती है कि प्रमाणपत्र रखने वाला उस प्राणी को बिक्री या किसी अन्य वाणिज्यिक प्रतिफल के तरीक़े से हस्तांतरित नहीं करेगा। दान इस रोक में नहीं आता। उपधारा 2 दूसरे राज्य में हस्तांतरण की सूचना 30 दिन में देने को कहती है, और 2022 के संशोधन ने इसी उपधारा में परंतुक जोड़ा: वैध प्रमाणपत्र रखने वाले द्वारा धार्मिक या किसी अन्य प्रयोजन के लिए बंदी हाथी का हस्तांतरण या परिवहन उन शर्तों के अधीन होगा जो केंद्र सरकार विहित करे। 2024 के नियम वही शर्तें हैं।
डीएनए मानचित्रण के आँकड़े और बंदी हाथियों की गिनती
नियम 7(3) जिस आनुवंशिक प्रोफ़ाइल की माँग करता है, उसकी तस्वीर सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी जा चुकी है। नॉर्थईस्ट न्यूज़ ने 4 सितंबर को रिट याचिका (सिविल) 743/2014 से जुड़ी 25 फ़रवरी की बैठक के कार्यवृत्त के हवाले से लिखा कि 2,075 बंदी हाथियों के डीएनए नमूने मैप हो चुके हैं: क़रीब 40 फ़ीसदी "अज्ञात मूल" के, 34.1 फ़ीसदी क़ैद में पैदा हुए, 25 फ़ीसदी जंगल से पकड़े हुए। पहली और तीसरी श्रेणी मिलकर क़रीब 65 फ़ीसदी, यानी लगभग 1,350 हाथी।
अज्ञात मूल या जंगल से पकड़ा हुआ दर्ज होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि किसी हाथी की बंदी हालत अवैध है। 1972 से पहले पकड़े गए हाथी क़ानूनी रूप से बंदी हैं, और उनकी संतानें भी।
गिनती अलग सवाल खड़ा करती है। 18 अगस्त 2026 को मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट की बंदी हाथी स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति की छठी बैठक के कार्यवृत्त रखे। लाइव लॉ और बार एंड बेंच की रिपोर्टों के मुताबिक़ अदालत ने दर्ज किया कि बंदी हाथियों की संख्या 2,675 से बढ़कर 2,725 हो गई है, और इनमें 1,678 निजी व्यक्तियों के पास हैं। दोनों ने पुरानी संख्या को 2018 का बताया; नॉर्थईस्ट न्यूज़ ने उसी संख्या को 2019 का लिखा। नई संख्या 27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की है।
जो श्रेणियाँ इन्हीं रिपोर्टों में गिनाई गई हैं, वे जुड़ती नहीं। निजी व्यक्ति 1,678, वन विभाग 768, पुनर्वास केंद्र 332, मंदिर 96, चिड़ियाघर 63 और सर्कस 47। इनका योग 2,984 होता है, जो बताए गए कुल 2,725 से 259 ज़्यादा है। कार्यवृत्त सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए यह फ़र्क़ किस वजह से है, यह अभी तय नहीं किया जा सकता।
जंगल की गिनती अलग दस्तावेज़ में है। भारतीय वन्यजीव संस्थान और प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट की 2021-2025 की गणना, पहली बार डीएनए पर आधारित, देश में 22,446 जंगली हाथी आँकती है और असम में 4,159, कर्नाटक के 6,013 के बाद दूसरा नंबर; रिपोर्ट ख़ुद कहती है कि यह अनुमान पुरानी गणनाओं से सीधे तुलना करने लायक़ नहीं है। उसी रिपोर्ट के इतिहास वाले हिस्से में असम का पुराना काम दर्ज है: मुग़ल काल में हर साल क़रीब 500 से 600 हाथी असम के जंगलों से पकड़े जाते थे, और अबुल फ़तह गिलानी ने अकबर के समय क़रीब 2,500 हाथियों के बंदी होने का हिसाब लिखा, जिनकी भरपाई हर साल लगभग 13 फ़ीसदी की दर से जंगल से होती थी। आज देश में बंदी हाथी 2,725 हैं।
मद्रास हाई कोर्ट का 2 सितंबर का फ़ैसला
21 सितंबर 2021 को मद्रास हाई कोर्ट की प्रथम पीठ ने, मुख्य न्यायाधीश संजीब बनर्जी और न्यायमूर्ति पी.डी. आदिकेशवलु, रिट याचिका 3656/2021 में कहा कि राज्य सुनिश्चित करे कि किसी और हाथी को बंदी न बनाया जाए, सिवाय ऐसे हाथी के इलाज के लिए जो जंगल में ख़ुद को सँभालने लायक़ न हो, और कोई निजी व्यक्ति किसी हाथी को न पकड़े और न रखे, उनके सिवा जो पहले से हैं।
27 फ़रवरी 2023 को उसी अदालत के एकल न्यायाधीश ने रिट याचिका (एमडी) 7655/2020 में जो आदेश दिया, उसका पैराग्राफ़ 15 इस मामले की जड़ में है। मुक़दमा ललिता नाम की एक हथिनी का था, जिसे एस.जी.एम. शाह उर्फ़ शेख़ मोहम्मद ने 2000 में ख़रीदा था और जिसका स्वामित्व अपने नाम कराने का उनका आवेदन ठुकरा दिया गया था। जनवरी और फ़रवरी 2023 में गिरने के बाद उसकी हालत बिगड़ी, न्यायाधीश ख़ुद पशु कल्याण कार्यकर्ताओं के साथ उसे देखने गए और कई घावों के साथ पाया, और अगले दिन मामला "उल्लेख के लिए" सूचीबद्ध होने पर यह आदेश आया।
उस पैराग्राफ़ में चार बातें थीं: वन सचिव राज्य के सभी मंदिर और निजी हाथियों का निरीक्षण कराएँ; प्रथम पीठ के आदेश को इस रूप में पढ़ा जाए कि मंदिर या निजी व्यक्ति अब नया हाथी न लें; सभी बंदी हाथियों को सरकारी पुनर्वास शिविरों में भेजने पर विचार हो; और बंदोबस्ती विभाग हर मंदिर को कोई हाथी न लेने का निर्देश दे।
2 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने डब्ल्यू.ए.(एमडी) 979 और 848/2023 में ये चारों निर्देश रद्द कर दिए, तटस्थ उद्धरण 2026:MHC:3581। अदालत ने कहा कि वह राहत नहीं दी जा सकती जो किसी पक्ष ने माँगी ही नहीं, ख़ासकर तब जब उसका असर उन लोगों पर पड़ता हो जिन्हें कभी सुना ही नहीं गया। पीठ ने 2011 के उन्हीं नियमों का हवाला दिया, जिनमें क्रूरता के 26 कृत्य गिनाए गए हैं और जिनका नियम 15 राज्य और ज़िला स्तर पर कल्याण समितियाँ बनाकर हर तीन महीने में समीक्षा कराता है। यह व्यवस्था मंदिरों को हाथी रखने की इजाज़त देती है, और अदालत एक मामले का फ़ैसला करते हुए ऐसे नियम को पलटने जैसा निर्देश नहीं दे सकती जब तक नियम ख़ुद चुनौती में न हों।

ललिता से जुड़े निर्देश, इलाज, सेवानिवृत्ति, महावत का बना रहना और आसपास की शांति, खंडपीठ ने बरक़रार रखे। जो उसने नहीं माना, वह ललिता के मामले से पूरे राज्य पर लागू घोषणा तक की छलाँग था।
असम से पाँचों के प्रस्ताव चेन्नई 20 से 29 अगस्त के बीच पहुँच चुके थे, यानी इस फ़ैसले से पहले। फ़ैसले ने फ़ाइल शुरू नहीं की। उसने वह खड़ा निर्देश हटाया जो तमिलनाडु के मंदिरों को नया हाथी लेने से रोकता था, और दो दिन बाद तमिलनाडु की सहमति चली गई।
उच्चाधिकार समिति के सामने रखी माँग
रोहित चौधरी ने 11 सितंबर को उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष को लिखा। समिति सुप्रीम कोर्ट की बनाई है, अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति दीपक वर्मा। पत्र में दो आदेशों का सहारा है: सुप्रीम कोर्ट का 12 मई 2023 का आदेश, अबीर फुकन बनाम भारत संघ में, जिसमें समिति के काम में स्वामित्व प्रमाणपत्रों की वैधता, हाथी को हटाने की ज़रूरत, लेने वाली सुविधा की क्षमता, सेहत, उम्र और ढुलाई शामिल बताए गए; और मणिपुर हाई कोर्ट का 20 नवंबर 2024 का फ़ैसला, नोंगमैकापम विक्टिना बनाम भारत संघ में, जिसके बारे में पत्र कहता है कि 2024 के नियमों के बावजूद समिति का अधिकार क्षेत्र बना हुआ है।
चौधरी ने पूछा है कि ये स्थानांतरण स्थायी हैं या तय अवधि के, और अवधि के हैं तो वह लिखी जाए और दोनों राज्यों के प्रतिपालकों को वापसी सुनिश्चित करने को कहा जाए। पाँच-पाँच साल की दुर्गा और बिजुली के बारे में उन्होंने यह जाँच माँगी है कि वे क़ैद में जन्मी थीं या बचाई गई थीं, और जन्मी थीं तो उनकी माँओं की बंदी हालत कितनी क़ानूनी थी।
गुप्ता का अभ्यावेदन इससे पहले असम पहुँचा था। उसमें माँग है कि पाँचों के स्वामित्व का इतिहास, माइक्रोचिप और डीएनए ब्योरा, पिछली अनुमतियाँ, समर्पण की परिस्थितियाँ और किसी एजेंट, बिचौलिए या प्रतिफल का ब्योरा जाँचा जाए, और हाथी असम में ही रखे जाएँ। धारा 42क यह रास्ता खुला रखती है: प्रमाणपत्र रखने वाला सात कार्यदिवस की सूचना देकर बंदी प्राणी प्रतिपालक को समर्पित कर सकता है, प्रमाणपत्र उसी तारीख़ से रद्द होता है, मुआवज़ा नहीं मिलता, और प्राणी राज्य सरकार की संपत्ति हो जाता है।
इसी बहस की एक पुरानी फ़ाइल अभी खुली है। असम सरकार ने सितंबर 2022 में गुवाहाटी हाई कोर्ट में याचिका दायर करके जॉयमाला की वापसी माँगी थी, जिसे 2011 में तीन साल के लिए श्रीविल्लिपुत्तुर नाचियार तिरुकोविल को पट्टे पर दिया गया था और जो अब भी तमिलनाडु में है। न्यायमूर्ति देवाशीष बरुआ ने 31 अगस्त को रिपोर्ट किए गए आदेश में जॉयमाला समेत असम के नौ हाथियों का मामला उच्चाधिकार समिति को भेजा, तमिलनाडु सरकार को हर महीने उन सुविधाओं के निरीक्षण को कहा, और यह भी कि जिन्हें पोषण या चिकित्सा न मिल रही हो उन्हें ज़ब्त करके पुनर्वासित किया जाए। उन नौ के परमिट बरसों पहले ख़त्म हो चुके थे।
इसके बीच जो सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है, वह छोटी सूची है। नियम 6(5) के तहत असम का लिखित आदेश। फ़ॉर्म एक, जिसमें "स्थानांतरण का प्रयोजन" भरा जाता है। पाँचों के स्वामित्व प्रमाणपत्रों की तारीख़ें, जिन पर नियम 7(1) टिका है। और असम की तरफ़ की वह फ़ॉर्म तीन रिपोर्ट, जो बताती कि हाथी जहाँ से चले, वह जगह कैसी थी। मदुरै, तिरुवन्नामलै, नागपट्टिनम और कांचीपुरम की ज़िला समितियों को दिए गए 15 दिन 19 सितंबर के आसपास पूरे होते हैं।
स्रोततमिलनाडु वन विभाग, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक राकेश कुमार डोगरा की चिट्ठी सी.नं. HOTNFD/6801/2026/WL1, 4 सितंबर 2026, असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) को: दुर्गा के अंतरराज्यीय स्थानांतरण पर फ़ॉर्म चार की सिफ़ारिश और मदुरै के ज़िला वन अधिकारी की फ़ॉर्म तीन रिपोर्ट, सात पन्ने, तमिलनाडु वन विभाग, सी.नं. HOTNFD/6801/2026/WL1, 4 सितंबर 2026: पाँच बंदी हाथियों के अंतरराज्यीय स्थानांतरण पर मदुरै, तिरुवन्नामलै, नागपट्टिनम और कांचीपुरम की ज़िला स्तरीय बंदी हाथी कल्याण समितियों को भेजी गई चिट्ठी, नाम-उम्र-माइक्रोचिप-मालिक की सूची सहित, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 3 उपखंड (i), सं. 178, 14 मार्च 2024, पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय: सा.का.नि. 191(अ), बंदी हाथी (स्थानांतरण या परिवहन) नियम, 2024 का पूरा पाठ और छह फ़ॉर्म, इंडिया कोड, विधायी विभाग: वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (1972 का 53) का अद्यतन पाठ, धारा 2(16), 9, 11, 40, 42, 42क, 43 और अनुसूची एक, भारतीय वन्यजीव संस्थान और प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट: 'स्टेटस ऑफ़ एलिफ़ेंट्स इन इंडिया, डीएनए बेस्ड सिंक्रोनस ऑल इंडिया पॉपुलेशन एस्टिमेशन ऑफ़ एलिफ़ेंट्स, 2021-2025', राज्यवार अनुमान और मुग़लकालीन पकड़ का ब्योरा, नॉर्थईस्ट नाउ, 9 सितंबर 2026: तमिलनाडु वन विभाग की चिट्ठियों के आधार पर पाँचों हाथियों का ब्योरा, ट्रक की पंजीकरण संख्या, और असम वन विभाग की चुप्पी पर रिपोर्ट, नॉर्थईस्ट नाउ, 12 सितंबर 2026, महेश डेका: रोहित चौधरी की 11 सितंबर की चिट्ठी का विस्तृत ब्योरा, अबीर फुकन और नोंगमैकापम विक्टिना मामलों के हवाले सहित, नॉर्थईस्ट न्यूज़, 12 सितंबर 2026: रोहित चौधरी के अभ्यावेदन में दर्ज नाम, उम्र और मालिक, तथा 18 अगस्त 2026 की सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही में रखे गए बंदी हाथियों के आँकड़े, नॉर्थईस्ट न्यूज़, 4 सितंबर 2026: 25 फ़रवरी की बैठक के कार्यवृत्त से डीएनए मानचित्रण के आँकड़े, 2026 की बंदी हाथी गिनती, और मद्रास हाई कोर्ट में रिट याचिका 30528/2026 का अंतर्वर्ती आवेदन, नॉर्थईस्ट न्यूज़: सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनिमल राइट्स के आलोक हिसारवाला गुप्ता का असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को अभ्यावेदन, और 18 अगस्त 2026 के सुप्रीम कोर्ट आदेश का उद्धरण, नॉर्थईस्ट न्यूज़, 31 अगस्त 2026: न्यायमूर्ति देवाशीष बरुआ का आदेश, जॉयमाला और असम के आठ अन्य हाथियों का मामला उच्चाधिकार समिति को, लाइव लॉ, 2 सितंबर 2026, उपासना सजीव: मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ का फ़ैसला, डब्ल्यू.ए.(एमडी) 979 और 848/2023, उद्धरण 2026 LiveLaw (Mad) 422, वर्डिक्टम, 2 सितंबर 2026: अरुल्मिगु श्री सुब्रमण्य स्वामी तिरुकोइल बनाम एस.जी.एम. शाह, तटस्थ उद्धरण 2026:MHC:3581, फ़ैसले का तर्क और ललिता के मामले का ब्योरा, लाइव लॉ: वाइल्डलाइफ़ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) 743/2014 में 18 अगस्त 2026 के निर्देश, उद्धरण 2026 LiveLaw (SC) 867, बार एंड बेंच: 18 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के हाथी क्लीनिक, डीएनए प्रोफ़ाइलिंग और स्वामित्व प्रमाणपत्र से जुड़े निर्देश, बार एंड बेंच, सितंबर 2021: मद्रास हाई कोर्ट की प्रथम पीठ का 21 सितंबर 2021 का आदेश, रिट याचिका 3656/2021, प्रतिदिन टाइम, सितंबर 2026: दुर्गा के मानस से निकलने की शुरुआती रिपोर्ट, जिसमें गंतव्य केरल बताया गया था, असम ट्रिब्यून, 13 सितंबर 2026: पाँच हाथियों के स्थानांतरण पर उच्चाधिकार समिति से हस्तक्षेप की माँग