तमिलनाडु ने क़ानून-व्यवस्था विभाग को सूचना अधिकार क़ानून से बाहर किया, जिस धारा से यह हुआ वह सिर्फ़ ख़ुफ़िया और सुरक्षा संगठनों के लिए है
इक्कीस सितंबर को जारी जी.ओ. संख्या 57 में एक ही वाक्य है: राज्यपाल ने लोक (क़ानून-व्यवस्था) विभाग को धारा 24(4) के तहत 'ख़ुफ़िया और सुरक्षा संगठन' घोषित कर दिया है। ठीक तीन महीने पहले सुप्रीम कोर्ट उसी धारा पर मध्य प्रदेश की एक अधिसूचना रद्द कर चुका है, यह कहते हुए कि दर्जा अधिकार क्षेत्र से तय होता है, नाम से नहीं।

जी.ओ. संख्या 57: तीन पंक्तियों की अधिसूचना, इक्कीस सितंबर
क़ानून-व्यवस्था विभाग को चलाने वाले अफ़सर जासूसी नहीं करते। वे रिपोर्टें पढ़ते हैं, बैठकें बुलाते हैं, मंज़ूरियाँ देते हैं। तो क्या ऐसा विभाग सूचना के अधिकार अधिनियम की भाषा में "ख़ुफ़िया और सुरक्षा संगठन" कहला सकता है? तमिलनाडु सरकार ने इक्कीस सितंबर को ठीक यही दावा किया, और उसी एक दावे पर पूरा क़ानून-व्यवस्था विभाग सूचना के अधिकार से बाहर हो गया।
दस्तावेज़ छोटा है।
तमिलनाडु सरकार के राजपत्र का असाधारण अंक संख्या 404 सोमवार, इक्कीस सितंबर की तारीख़ रखता है। भाग 2, खंड 2 में उस दिन एक ही सूचना छपी, शीर्षक "NOTIFICATION UNDER THE RIGHT TO INFORMATION ACT, 2005"। जारीकर्ता है मानव संसाधन प्रबंधन विभाग। आदेश क्रमांक जी.ओ. एम.एस. संख्या 57, अधिसूचना क्रमांक II(2)/HRM/711(c)/2026। पूरा पाठ अंग्रेज़ी में है, और एक ही वाक्य में सिमटा है:
"In exercise of the powers conferred by sub-section (4) of section 24 of the Right to Information Act, 2005 (Central Act 22 of 2005), the Governor of Tamil Nadu hereby specifies the Public (Law and Order) Department being an Intelligence and Security Organization established by the Government of Tamil Nadu for which the said Act shall not apply."
सीधी भाषा में: राज्यपाल ने धारा 24 की उपधारा (4) के सहारे लोक (क़ानून-व्यवस्था) विभाग को एक "ख़ुफ़िया और सुरक्षा संगठन" घोषित कर दिया है। अब उस विभाग पर सूचना का अधिकार अधिनियम लागू नहीं होगा। दस्तावेज़ पर दस्तख़त प्रधान सचिव सी. समयमूर्ति के हैं। न कोई प्रस्तावना है, न कोई वजह, न कोई अनुलग्नक। तीन पंक्तियाँ, एक दावा, ख़त्म।
यह विभाग तमिलनाडु सचिवालय के 'लोक विभाग' की एक शाखा है, चुनाव और मतदान जैसी बाक़ी शाखाओं के बराबर एक प्रशासनिक इकाई। यह पुलिस बल नहीं है। यह ख़ुद कोई जासूसी तंत्र नहीं चलाता, न किसी की निगरानी करता है। तो शुरुआत का सवाल दोबारा: छूट टिकाए रखने के लिए क़ानून जो शर्त रखता है, यह विभाग उस पर खरा उतरता भी है या नहीं? बाक़ी यह लेख उसी सवाल का पीछा करता है, दस्तावेज़ दर दस्तावेज़।
धारा 24(4): राज्य को मिली एक ख़ास ताक़त, दूसरी अनुसूची से अलग
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 24 में दो रास्ते हैं। इन्हें गड्डमड्ड करना यहाँ सबसे आसान ग़लती है। पहला रास्ता उपधारा (1) में है: केंद्र सरकार जिन ख़ुफ़िया और सुरक्षा संगठनों को अधिनियम की "दूसरी अनुसूची" में नाम से दर्ज कर दे, वे बाहर हो जाते हैं। अनुसूची का शीर्षक ख़ुद बताता है कि यह किसके लिए है: "INTELLIGENCE AND SECURITY ORGANISATION ESTABLISHED BY THE CENTRAL GOVERNMENT"। सूची में आसूचना ब्यूरो, रॉ, राजस्व आसूचना निदेशालय, प्रवर्तन निदेशालय, सीमा सुरक्षा बल और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल जैसे पंद्रह नाम हैं। एक भी राज्य सरकार का संगठन इसमें नहीं है। हो भी नहीं सकता। यह रास्ता राज्यों के लिए सिरे से बंद है।
राज्यों के लिए क़ानून ने अलग रास्ता बनाया, उपधारा (4) में। इसका पाठ है: "Nothing contained in this Act shall apply to such intelligence and security organisation being organisations established by the State Government, as that Government may, from time to time, by notification in the Official Gazette, specify." आगे दो परंतुक जुड़े हैं। उनका ब्यौरा आगे के हिस्से में है। तमिलनाडु के जी.ओ. संख्या 57 में साफ़ लिखा है "sub-section (4) of section 24"। दूसरी अनुसूची का वहाँ कहीं ज़िक्र नहीं। इसलिए यह पूछना ग़लत सवाल है कि तमिलनाडु को केंद्र की सूची में जगह मिली या नहीं। सही सवाल यह है कि तमिलनाडु का अपना दावा कितना टिकता है।
यह दावा राज्यपाल के नाम से आया है। पर राज्यपाल कोई अलग जाँच ख़ुद नहीं करते। सरकार जो फ़ाइल भेजती है, दस्तख़त उसी पर होते हैं। असली फ़ैसला मंत्रालय के दफ़्तर में हुआ है, और उसकी वजह अधिसूचना में दर्ज नहीं। न कोई फ़ाइल-नोटिंग सार्वजनिक है, न कोई अलग बयान आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जून में तय की ख़ुफ़िया संगठन की कसौटी
ठीक तीन महीने पहले, पंद्रह जून को, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 24(4) के इसी वाक्यांश पर फ़ैसला सुनाया। मामला था स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट बनाम कामता प्रसाद मिश्रा, 2026 INSC 644। पीठ में जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर थे। कहानी मध्य प्रदेश से शुरू होती है। लोकायुक्त संगठन के तहत काम करने वाली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट, यानी एसपीई, ने एक टाउन इंस्पेक्टर को भ्रष्टाचार के जाल में पकड़ा था। मई 2020 में अभियोजन की मंज़ूरी मिली। इंस्पेक्टर ने जुलाई 2020 में उसी मंज़ूरी की प्रक्रिया की जानकारी आरटीआई से माँगी। राज्य सूचना आयोग ने मना कर दिया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दिसंबर 2021 में जानकारी देने का आदेश दिया। एसपीई सुप्रीम कोर्ट चली गई। उसका भरोसा मध्य प्रदेश सरकार की पच्चीस अगस्त 2011 की उस पुरानी अधिसूचना पर टिका था, जिसने उसे धारा 24(4) के तहत छूट दे रखी थी। हाई कोर्ट के आदेश और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बीच साढ़े चार साल का फ़ासला है।
सुप्रीम कोर्ट ने पंद्रह साल पुरानी वह अधिसूचना रद्द कर दी। कोर्ट की दलील एक पंक्ति में है, और वही असली कसौटी है: "The SPE having been conferred jurisdiction only to investigate offences punishable under the Act of 1988, Sections 409, 420 and Chapter XVIII of the Penal Code, it cannot be termed to be an 'intelligence and security' organisation." भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की चंद धाराओं तक सीमित अधिकार क्षेत्र, कोर्ट के मुताबिक़, किसी संगठन को ख़ुफ़िया संगठन नहीं बना देता। अधिकार क्षेत्र ही दर्जा तय करता है। सिर्फ़ नाम रख देने से यह तय नहीं होता।
यह फ़ैसला तमिलनाडु पर सीधे लागू नहीं होता। मामला मध्य प्रदेश का था। संगठन अलग था। अधिसूचना भी 2011 की थी, 2026 की नहीं। पर जिस धारा और जिस वाक्यांश की व्याख्या कोर्ट ने की, वह ठीक वही धारा और वाक्यांश है जिसके सहारे इक्कीस सितंबर की अधिसूचना खड़ी है। कोर्ट ने जो सवाल पूछा, वह सीधा था: यह संगठन असल में करता क्या है? वही सवाल अब क़ानून-व्यवस्था विभाग के सामने भी खड़ा है।

विभाग की अपनी फ़ाइलें: दंगे, हिरासत में मौत, संसद के जवाब
लोक (क़ानून-व्यवस्था) विभाग करता क्या है? ईटीवी भारत तमिल की सत्ताईस सितंबर, दोपहर 12:12 बजे की रिपोर्ट इसका सबसे तफ़सीली ब्यौरा देती है। मलयमलर की उसी दिन सुबह की रिपोर्ट भी बड़े हिस्से में यही सूची दोहराती है। दोनों के मुताबिक़ विभाग के पास सांप्रदायिक और जातीय झड़पों की रिपोर्टें आती हैं। पुलिस फ़ायरिंग की जाँच से जुड़ी फ़ाइलें आती हैं, जिनके लिए विकटन की रिपोर्ट तमिलनाडु पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर 150(3) का हवाला देती है। हिरासत में मौत और पुलिस यातना की शिकायतें आती हैं, जिनके लिए वही रिपोर्ट स्टैंडिंग ऑर्डर 151 का ज़िक्र करती है। कॉफ़ेपोसा और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत निवारक निरोध के मामले आते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संदर्भ आते हैं। महीने भर के क़ानून-व्यवस्था हालात की समीक्षा बैठकें होती हैं। लोकसभा और राज्यसभा में क़ानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों के जवाब यहीं तैयार होते हैं। छात्रों, किसानों और राजनीतिक दलों के प्रदर्शनों का ब्यौरा भी यहीं आता है। राजनीतिक या सामाजिक आधार पर मुक़दमे वापस लेने के प्रस्ताव भी यहीं बनते हैं। मानहानिकारक लेखों, ख़बरों या भाषणों पर अभियोजन की मंज़ूरी के प्रस्ताव भी इसी विभाग से गुज़रते हैं।
यह सूची किसी एक अख़बार की नहीं है। चार अलग-अलग तमिल प्रकाशनों ने अलग-अलग शब्दों में लगभग यही फ़ेहरिस्त छापी, और चारों 27 सितंबर की हैं। इनमें से कोई भी दस्तावेज़ हमें ख़ुद नहीं मिला। न तमिलनाडु सचिवालय की वेबसाइट पर विभाग के कामकाज का ब्यौरा उपलब्ध था, न कोई कारोबार-आवंटन नियमावली सार्वजनिक मिली। यह सीमा साफ़ दर्ज कर लेनी चाहिए: यह सूची समाचार रिपोर्टों पर टिकी है, प्राथमिक दस्तावेज़ पर नहीं।
फिर भी जो तस्वीर बनती है, वह साफ़ है। विभाग मैदान में नहीं उतरता। यह रिपोर्टें पढ़ता है। यह मंज़ूरी देता है। यह जवाब लिखता है, बैठकें बुलाता है। पुलिस जो जानकारी जुटाती है, उसे सचिवालय के स्तर पर समेटने, बाँटने और जवाब देने का काम इसी विभाग का है। सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ऐसे ही काम को कसौटी बनाया था। उस मामले में विषय भ्रष्टाचार था। यहाँ क़ानून-व्यवस्था है।
दोनों परंतुक बचे रहते हैं: भ्रष्टाचार और मानवाधिकार
धारा 24(4) की छूट खोखली नहीं है। यह कहना ग़लत होगा कि विभाग अब हर जाँच से परे चला गया है। क़ानून ख़ुद दो शर्तें जोड़ता है, ठीक उसी उपधारा के भीतर जो छूट देती है। पहला परंतुक कहता है: "Provided that the information pertaining to the allegations of corruption and human rights violations shall not be excluded under this sub-section." दूसरा परंतुक एक प्रक्रिया जोड़ता है: मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी जानकारी माँगी जाए, तो वह राज्य सूचना आयोग की मंज़ूरी के बाद ही दी जाएगी, और धारा 7 में जो भी लिखा हो, ऐसी जानकारी अनुरोध मिलने के पैंतालीस दिन के भीतर देनी होगी।
पिछले हिस्से में जिन फ़ाइलों का ज़िक्र हुआ, वे इसी दायरे में आती हैं: हिरासत में मौत, पुलिस यातना, मानवाधिकार आयोग के संदर्भ। ये सब वही फ़ाइलें हैं जिन्हें दूसरा परंतुक खुला रखता है। छूट की अधिसूचना ने इन्हें छुआ तक नहीं। कोई नागरिक हिरासत में हुई किसी मौत की जानकारी आज भी माँग सकता है। रास्ता सीधा नहीं रहा। आयोग की मंज़ूरी अब बीच में आ गई है। पर रास्ता बंद नहीं हुआ।
भ्रष्टाचार वाला परंतुक तो और भी सीधा है। उसमें आयोग की मंज़ूरी की शर्त नहीं। पैंतालीस दिन की समय-सीमा भी नहीं। कोई अधिसूचना उसे छू ही नहीं सकती, क्योंकि वह उपधारा (4) की छूट-शक्ति के भीतर ही लिखा है, बाहर नहीं। तमिलनाडु के जी.ओ. संख्या 57 में इन परंतुकों का अलग ज़िक्र नहीं है। पर क़ानून में वे पहले से मौजूद हैं। अधिसूचना उन्हें हटा नहीं सकती।
2005 से 2026 तक: तमिलनाडु की छूट-सूची का सफ़र
तमिलनाडु के लिए धारा 24(4) का इस्तेमाल नया नहीं है। सूचना का अधिकार अधिनियम को राष्ट्रपति की मंज़ूरी पंद्रह जून 2005 को मिली। धारा 24 उसी दिन तुरंत लागू हो गई। आम नागरिक का सूचना माँगने का अधिकार तो बारह अक्टूबर 2005 को, एक सौ बीस दिन बाद, लागू हुआ। तमिलनाडु ने चौदह अक्टूबर 2005 को, यानी आम नागरिक का अधिकार लागू होने के महज़ दो दिन बाद, अपनी पहली छूट-सूची जारी कर दी: लोक विभाग की अधिसूचना संख्या II(2)/PUEL/778(c)/2005, उस दिन के राजपत्र असाधारण अंक के पहले पन्ने पर। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव का उसी दौर का रिकॉर्ड बताता है कि उस दिन तमिलनाडु सरकार ने चार अलग राजपत्र अधिसूचनाएँ जारी कीं और कुल बत्तीस एजेंसियों को दायरे से बाहर कर दिया। संगठन ने तब राज्य सरकार को पत्र लिखकर इतनी बड़ी सूची पर एतराज़ जताया था। उस बरस यह अधिसूचना लोक विभाग के नाम से आई थी। अब यह ज़िम्मेदारी मानव संसाधन प्रबंधन विभाग के पास है, जो पहले कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग कहलाता था।

वह मूल सूची क्रमांकित है। यह बात एक बाद की अधिसूचना से पता चलती है। ग्यारह जनवरी 2024 को जी.ओ. एम.एस. संख्या 3, अधिसूचना क्रमांक II(2)/HRM/40(a)/2024, ने उसी 2005 वाली सूची के क्रमांक ग्यारह को बदल दिया। नई इबारत में "Cyber Crime Wing and its units" को उसके तमाम दफ़्तरों समेत शामिल किया गया: चेन्नई का मुख्यालय, राज्य साइबर कमांड सेंटर, राज्य साइबर अपराध जाँच केंद्र और साइबर अरंगम, पाँच शहरों की क्षेत्रीय प्रयोगशालाएँ, और ज़िलों-शहरों के तमाम साइबर क्राइम थाने, जिनमें आर्थिक अपराध शाखा और महिला-बाल अपराध से जुड़े थाने भी गिनाए गए हैं। यह बदलाव चौदह अक्टूबर 2005 से ही लागू माना गया। पुरानी सूची में जो नाम 2005 में कुछ और था, उसकी जगह अब यह नया, कहीं बड़ा नाम पिछली तारीख़ से दर्ज है। आदेश पर दस्तख़त सचिव के. नंथाकुमार के हैं।
तेईस फ़रवरी 2024 को एक अलग तरह की अधिसूचना आई, जी.ओ. एम.एस. संख्या 30, अधिसूचना क्रमांक II(2)/HRM/102(b)/2024, जो 2005 की सूची में जुड़ी नहीं, बल्कि अपने आप में स्वतंत्र है। इसका पाठ ठीक उसी ढाँचे में है जिसमें अब की अधिसूचना है: "the Governor of Tamil Nadu hereby specify the Anti Terrorism Squad established by the Government of Tamil Nadu for which the said Act shall not apply." इस पर दस्तख़त सचिव एस. नागराजन के हैं। इक्कीस सितंबर 2026 की अधिसूचना इसी दूसरे ढंग की है, पुरानी सूची छेड़े बिना अपने बूते खड़ी। बीस साल में यह तीसरा मौक़ा है जब तमिलनाडु ने किसी नए संगठन को इसी तरह अलग से बाहर किया हो।
विधानसभा का रिकॉर्ड नहीं मिला
धारा 24 का एक और उपखंड बचा है। यह शर्त नहीं, प्रक्रिया तय करता है। उपधारा (5) कहती है: "Every notification issued under sub-section (4) shall be laid before the State Legislature." कितने दिनों के भीतर रखना है, क़ानून यह नहीं बताता, न "जल्द से जल्द", न गिनती के दिन, जैसा कुछ दूसरे प्रावधानों में मिलता है।

हमने तमिलनाडु सरकार के अपने सूचना-अधिकार पोर्टल पर इस विभाग से जुड़े जितने भी आदेशों और पत्रों का रिकॉर्ड मिलता है, वह खँगाला। सबसे ताज़ा प्रविष्टि तेईस जून 2026 की एक चिट्ठी है, वेब पोर्टल से जुड़ी। इक्कीस सितंबर की इस अधिसूचना का ज़िक्र वहाँ कहीं नहीं है। पोर्टल ख़ुद अभी इतना पुराना चल रहा है।
इसलिए विधानसभा में यह अधिसूचना रखी गई या नहीं, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड फ़िलहाल नहीं मिलता। यह नियम टूटने का सबूत नहीं है। अधिसूचना महज़ छह दिन पुरानी है, और पोर्टल का रिकॉर्ड वैसे भी महीनों पीछे चलता है। रिकॉर्ड न मिलना भी एक तथ्य है।
आयोग के आँकड़े: 6,049 बनाम 72,085
सबसे हाल की सालाना रिपोर्ट 2023 के लिए है। रिपोर्ट ख़ुद "during the year 2023" लिखकर अपनी अवधि बताती है। आयोग की अपनी वेबसाइट पर 2024 और 2025 की रिपोर्टों के सामने आज भी "Yet to be Prepared" दर्ज है। यह देरी तीन साल की है। सत्ताईस सितंबर 2026 तक यह देरी ख़ुद आयोग के अपने रिकॉर्ड में लिखी हुई है।
2023 की इसी रिपोर्ट में हर विभाग के सामने साल भर में मिलीं आरटीआई अर्ज़ियों की गिनती है। 'लोक विभाग', जिसकी एक शाखा क़ानून-व्यवस्था विभाग है, के सामने 6,049 का आँकड़ा दर्ज है। ठीक ऊपर की पंक्ति में 'गृह, निषेध और आबकारी विभाग' है, जिसके सामने 72,085 का आँकड़ा है। यह आँकड़ा क़रीब बारह गुना ज़्यादा है। यही वह विभाग है जिसके नीचे तमिलनाडु पुलिस और डीजीपी का दफ़्तर आते हैं। इक्कीस सितंबर की अधिसूचना ने इसे छुआ ही नहीं।
तो जो छूटा है, वह पूरा पुलिस महकमा नहीं है, सचिवालय की एक शाखा भर है, जिसे साल भर में छह हज़ार के आसपास अर्ज़ियाँ मिलती हैं, बहत्तर हज़ार नहीं। राज्य भर के सभी सरकारी दफ़्तरों को मिलाकर 2023 में कुल 4,87,641 आरटीआई अर्ज़ियाँ आईं, जो 2022 से 8,331 ज़्यादा थीं। इस बड़ी तस्वीर में लोक विभाग का हिस्सा क़रीब सवा फ़ीसदी बैठता है। बाक़ी अट्ठानबे फ़ीसदी से ज़्यादा कहीं और है।
स्रोततमिलनाडु सरकार राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 2, अंक संख्या 404, 21 सितंबर 2026: जी.ओ. एम.एस. संख्या 57, मानव संसाधन प्रबंधन विभाग, केंद्रीय सूचना आयोग: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का बेयर एक्ट पाठ (1 फ़रवरी 2011 तक संशोधित), तमिलनाडु सरकार राजपत्र, असाधारण, अंक संख्या 9, 11 जनवरी 2024: जी.ओ. एम.एस. संख्या 3, मानव संसाधन प्रबंधन (एआर-3) विभाग, तमिलनाडु सरकार राजपत्र, असाधारण, अंक संख्या 59, 23 फ़रवरी 2024: जी.ओ. एम.एस. संख्या 30, मानव संसाधन प्रबंधन (एआर-3) विभाग, तमिलनाडु सूचना आयोग: वार्षिक रिपोर्ट 2023 (अब तक की सबसे नई प्रकाशित रिपोर्ट), तमिलनाडु सूचना आयोग: वार्षिक रिपोर्टों की सूची, जहाँ 2024 और 2025 की रिपोर्ट के आगे आज भी 'Yet to be Prepared' दर्ज है, तमिलनाडु सरकार, सूचना का अधिकार पोर्टल: मानव संसाधन प्रबंधन विभाग (पूर्व नाम कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग) से जुड़े सभी आरटीआई आदेशों की सूची, वर्डिक्टम: स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट बनाम कामता प्रसाद मिश्रा, 2026 INSC 644, 15 जून 2026, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर: उसी फ़ैसले का क़ानूनी रिपोर्ट, पृष्ठभूमि और तर्क सहित, डीटी नेक्स्ट, 27 सितंबर 2026, सुबह 4:40 बजे: अधिसूचना की ख़बर और उसका उद्धरण, ईटीवी भारत तमिल, 27 सितंबर 2026, दोपहर 12:12 बजे: विभाग के कामकाज का सबसे तफ़सीली ब्यौरा, मलयमलर, 27 सितंबर 2026, सुबह 5:16 बजे, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई): तमिलनाडु में आरटीआई क्रियान्वयन का रिकॉर्ड, 14 अक्टूबर 2005 की चार अधिसूचनाओं और बत्तीस एजेंसियों का ब्यौरा